अधिवक्ताओं के चुनाव में ‘यमन देवांगन’ की दावेदारी से हलचल:
रोमांचक रहेगा अधिवक्ता अध्यक्ष पद का मुकाबला:
जिला अधिवक्ता संघ राजनांदगांव के हर दो वर्ष में एक बार चुनाव की सरगर्मियां अब अपने चरम पर पहुंच चुकी हैं। कचहरी परिसर से लेकर वकीलों के घरों तक अधिवक्ता यमन देवांगन के नाम की चर्चा जोरों पर हैं। युवा, ऊर्जावान, विधि विशेषज्ञ और हमेशा दूसरों की मदद के लिए तत्पर रहने वाले यमन देवांगन ने इस बार जिला अधिवक्ता संघ के सबसे प्रतिष्ठित और गरिमामय अध्यक्ष पद के लिए अपनी मजबूत दावेदारी पेश की है। ...
पंडवानी बनाम तीजन बाई नहीं रही:
तीजन बाई का व्यक्तित्व भारतीय स्त्री की अदम्य जिजीविषा का भी प्रतीक है:
सब अनित्य हैं। सबको एक दिन चले जाना हैं। लेकिन मरणोपरांत कुछ व्यक्तियों की ख्याति हिमालय से भी ऊंची होती हैं। तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के गनियारी गाँव में हुआ था। पंडवानी लोकगीत-नाट्य की वे पहली महिला कलाकार हैं। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व मंच तक पहुंचाने वाली पंडवानी की अप्रतिम लोकगायिका तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रही वह 70 वर्ष की थी।...
आजीवक अर्थात दलितों का इको चैंबर:
आजीवक चिंतन के सामने ऐसा कोई सवाल नहीं है जिसका जवाब ना दिया गया हो और ना दिया जा सके:
इसका अर्थ यह भी है कि आजीवक की तुलना दुनिया के किसी भी धर्म से की जा सकती है। निश्चित ही यह बेहद सकारात्मक बात है। यहां बताया यह भी जा सकता है कि सभी धर्मों की अपनी विशेषताएं होती हैं। कोई भी धर्म अपने समय और परिस्थितियों में अपनी परंपरा, रीति-रिवाज और चिंतन में विकसित होता है। इस रूप में आजीवक देश और विदेश के सभी धर्मों से अलग रूप में विकसित हुआ है।...
गीत, ग़ज़ल अउ कविता के फुलवारी 'छतनार':
राजकुमार चौधरी 'रौना' छत्तीसगढ़ी साहित्य बर एक समर्पित नाम हे:
छतनार के ए फुलवारी मं गीत, छंद, ग़ज़ल, मुक्तक अउ नवा कविता के रकम-रकम के फूल फूले हें। जेमा जिनगी के रंग हे। माटी के ममहासी हे। बेरा के व्यथा हे। प्रगतिशीलता हे। जागरण के आरो हे, संदेश हे। मया-पीरा के कथा घलाव हे। प्रकृति के सुघराई हे।...
क्रांति, स्मृति और आत्म-पहचान के बीच: वर्तमान में ‘परसेपोलिस’ की प्रासंगिकता:
परसेपोलिस को पढ़ना अनेक स्तरों से होकर गुजरने जैसा अनुभव है:
विगत 4 जून 2026 को ईरान की मशहूर लेखिका, चित्रकार और लोकतान्त्रिक आंदोलनों की मुखर हिमायती मरजाने सतरापी का इंतकाल हो गया। उनके आत्मकथात्मक ग्राफ़िक उपन्यास परसेपोलिस के हवाले से सतरापी को याद कर रही हैं सुमन पाण्डेय, जिनका मानना है कि ‘परसेपोलिस को पढ़ना केवल एक ग्राफिक नॉवेल पढ़ना नहीं है; यह इतिहास, राजनीति, स्मृति, स्त्री-अस्तित्व, कला और मनोविज्ञान के अनेक स्तरों से होकर गुजरने जैसा अनुभव है।’...