आजीवक अर्थात दलितों का इको चैंबर

आजीवक चिंतन के सामने ऐसा कोई सवाल नहीं है जिसका जवाब ना दिया गया हो और ना दिया जा सके

कैलाश दहिया

 

एक मित्र ने आजीवक धर्म के संदर्भ में "इको चैंबर" शब्द का प्रयोग किया है। इस का अर्थ है कि सभी धर्म इको चैंबर हैं! इस का अर्थ हुआ कि आजीवक भी अपने आप में एक संपूर्ण धर्म है। विचार-विमर्श की प्रक्रिया में इस बात को स्वीकार कर लेना आजीवक चिंतन की ही विजय है। इसका अर्थ यह भी है कि आजीवक की तुलना दुनिया के किसी भी धर्म से की जा सकती है। निश्चित ही यह बेहद सकारात्मक बात है।

यहां बताया यह भी जा सकता है कि सभी धर्मों की अपनी विशेषताएं होती हैं। कोई भी धर्म अपने समय और परिस्थितियों में अपनी परंपरा, रीति-रिवाज और चिंतन में विकसित होता है। इस रूप में आजीवक देश और विदेश के सभी धर्मों से अलग रूप में विकसित हुआ है। अब अगर कोई धर्म को एक चैंबर कहे तो क्या किया जा सकता है! यह व्यक्ति विशेष की अपनी सोच और सीमा को दर्शाता है। कार्ल मार्क्स ने धर्म को अफीम बताया है। इन्हीं अर्थों में आजीवक धर्म को इको चैंबर के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

पूछा जाए, इस 'इको चैंबर' का क्या अर्थ होता है? इको चैंबर का अर्थ होता है 'एक बंद जगह जहाँ आवाज़ गूंजती है।' एआई पर इसका अर्थ यह भी बताया गया है, 'एक ऐसा माहौल जिसमें इंसान सिर्फ़ उन्हीं विश्वासों या विचारों से मिलता है जो उसके अपने विचारों से मिलते हैं, ताकि उसके मौजूदा विचारों को और मज़बूत किया जा सके और दूसरे विचारों पर विचार न किया जाए।' विकीपीडिया पर भी इस बारे में बताया गया है, 'इको चैंबर को एक ऐसे वातावरण या पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें प्रतिभागी ऐसे विश्वासों का सामना करते हैं जो उनके पहले से मौजूद विश्वासों को बढ़ाते या मजबूत करते हैं।'

इन परिभाषाओं के संदर्भ में पूछा जाए, अगर आजीवक अपनी समस्याओं के समाधान के लिए लगातार अपनी बात को हर तरह से प्रस्तुत कर रहे हैं, तब इसमें गलत क्या है? दलित तो यही बताएगा ना कि उसके साथ हजारों सालों से कैसा बर्ताव किया गया है। वह तो बताएगा ही कि उसके साथ छुआछूत बरती गई है। उसकी स्त्रियों पर बलात्कार किए गए हैं और उन्हें जारकर्म में धकेला गया है। यह अपराध आज भी नहीं रुके हैं। आए दिन इसकी बस्तियों को जलाया जा रहा है। ज्ञान की खोज करते उसका सिर काटा गया है। आत्मरक्षा के लिए हथियार उठाने पर उसका अंगूठा ले लिया गया है। उसके ईश्वर को छीन लिया गया और उसके धर्म संस्थानों पर कब्जा किया गया है। ले देकर एक आरक्षण नाम का टुकड़ा मिला है जिसे लगातार कोसा जा रहा है।

ऐसे ही दलित लगातार अपनी समस्याओं और उनके समाधान प्रस्तुत कर रहा है। इस से वर्णवादियों, नास्तिकों और आजीवक विरोधियों आदि को दिक्कत हो रही है। इसी क्रम में 'इको चैंबर' नया-नया शब्द आया है। पूछा जा सकता है, दलित की समस्याओं और उनके समाधान के अनुरूप जब कंप्लीट 'आजीवक धर्म' की बात की जा रही है, तब किसी को यह इको चैंबर क्यों लग रहा है? ऐसा तो नहीं कि दलित विरोधी समझ गए हैं कि अब दलित किसी के हाथ नहीं आने वाला। यह सही है कि दलित ने अपनी मूल समस्या खोज ली है और ये आजीवक धर्म की छतरी के नीचे एकत्रित हो गए हैं। किसी को यह इको चैंबर दिखता है तो यह देखने वाले की दृष्टि का ही दोष हो सकता है।

यहां पूछा जा सकता है, किसी का उस इको चैंबर के बारे में क्या विचार है जिसमें सदियों से दलितों के साथ अमानवीय बर्ताव किया जा रहा है? उस इको चैंबर का सभी को पता होना चाहिए। अगर नहीं पता, तो बताया जा रहा है उस इको चैंबर का नाम ब्राह्मण है। जिसे वैदिक, द्विज, आर्य, वर्ण, सनातन और हिंदू धर्म भी कहा जा रहा है। 

वैसे, सोचने वाली बात यह है कि 'इको चैंबर' शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया है? क्या इस से हिटलर के गैस चैंबरों की तरफ इशारा किया गया है? सीधे-सीधे धर्म शब्द क्यों नहीं कहा जा सका? दरअसल, चैंबर लिखना किसी की नकारात्मक सोच को दर्शाता है। जिस से बचना चाहिए। सभी को पता होना चाहिए कि धर्म दुनिया की सबसे बड़ी व्यवस्था है।

जिस के आगे बाकी सभी व्यवस्थाएं बौनी सिद्ध होती हैं। फिर चाहे वह किसी सरकार या किसी राजनीतिक सत्ता की व्यवस्था क्यों ना हो। अब कोई धर्म को चैंबर कहे या कुछ और यह कहने वाले की मर्जी। प्रसंगवश! बताया जा सकता है कि धर्महीन लोगों को ही दलित, पिछड़ा या आदिवासी कहा जाता है। बताया जाए, अगर धर्म कोई इको चैंबर होता तो डॉ. भीमराव अंबेडकर बौद्ध धर्म में नहीं जाते।

बताया जा सकता है, इस इको चैंबर को ही इकोसिस्टम भी कहा जा सकता है। असल में, इको चैंबर के नाम पर प्रतिध्वनि या पुनरावृत्ति की बात कही जा रही है। ऐसे ही महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर को भी कहा गया है। डॉक्टर साहब ने किसी की भी ना सुनते हुए अपनी बात को रखा है और उसी क्रम में आजीवक धर्म सामने आया है।

अब आगे बताया जाए, धर्म एक इको चैंबर है। इस इको सिस्टम की खासियत यह होती कि इस के भीतर रहने वाले इस में गूंजती आवाज से परिचित रहते हैं। इस से भी अच्छी बात यह है कि इस इको सिस्टम को बाहरी लोग केवल देख-सुन पाते हैं। लेकिन समझने में असमर्थ होते हैं। यूं समझिए, इस्लाम, ईसाइयत, यहूदी, ब्राह्मण वगैरह सभी का अपना इको सिस्टम या इको चैंबर है। ऐसे ही आजीवक का अपना इको सिस्टम है। जिस से सभी आजीवक भली भांति परिचित हैं।

आजीवक इको चैंबर में वे लोग स्वभावत: प्रवेश कर जाते हैं जिन की आवाज कहीं नहीं सुनाई पड़ती। इन्हें लोग दलित कहते हैं। असल में, ऐसे लोगों को ही इको सिस्टम की जरूरत होती है। ऐसे लोग दूसरों के इको सिस्टम में जाकर भी अपनी आवाज नहीं सुन सकते। लेकिन, ये आजीवक इको चैंबर में अपनी आवाज भली-भांति सुन पा रहे हैं। क्योंकि, इस में इन की अपनी आवाज ही सम्मिलित रहती है। तब वे अपनी आवाज का अपने जैसी आवाजों से आसानी से तारतम्य बिठा लेते हैं।

आजीवक चैंबर में गूंजती आवाज को सुनने के लिए विरोधियों ने भी कान लगा रखे हैं। लेकिन वे इस आवाज को सुनने में असमर्थ हैं। इस इको सिस्टम में प्रवेश की सबसे बड़ी खासियत यह है कि किसी भी व्यक्ति को अपने सामंती विचारों को छोड़कर इसमें प्रवेश करना होता है। सामंती विचारों के साथ इस इको सिस्टम में गूंज रही आवाज को सुनना असंभव है।

बताना यह भी है, इस धरती का भी एक इको सिस्टम या इको चैंबर है और इस यूनिवर्स का भी। जैसे धरती पर अनेक इको सिस्टम हैं ऐसे ही यूनिवर्स के भी असंख्य इको चैंबर हैं। इको चैंबर को सुनने का सामर्थ्य व्यक्ति को अपने भीतर पैदा करना होता है। अन्यथा, वह अपनी ही आवाज भी नहीं सुन पाता। अपनी ही आवाज ना सुनने वाले को क्या कहते हैं यह बताने की जरूरत नहीं।

तो, आजीवक इको चैंबर, वातावरण या पारिस्थितिकी तंत्र में दलित ऐसे विश्वासों का सामना कर रहे हैं जो हमारे पहले से मौजूद विश्वासों को बढ़ा और मजबूत कर रहे हैं। और यह विश्वास हमें अपने रीति-रिवाज , परंपरा और चिंतन के साथ मिल रहा है। जिस में दलितों की गुलामी से मुक्ति निहित है।

यूं, आजीवक चिंतन में पक्षकारों और विरोधियों, दोनों की की जिज्ञासाओं के समाधान किए जा रहे हैं। यहां तक की छद्म पहचान के साथ लिख रहे लोगों को भी निरुत्तर किया गया है। केवल धूर्तों से किसी तरह का संवाद संभव नहीं है, क्योंकि वे जार होते हैं। और, जार लम्पट, नंग, बेशर्म, बेहया और चोर होता है। बताइए , ऐसों से संवाद कैसे संभव है! शेष सभी मित्रों से विचार-विमर्श की प्रक्रिया लगातार चल रही है।

इसी प्रक्रिया में नई शब्दावली में भी सवाल आते हैं। जिनके वैसे तो जवाब दिए जा चुके हैं, लेकिन नई शब्दावली में भी जवाब दिए जा सकते हैं। यही आजीवक चिंतन की ताकत है। यही किसी भी चिंतन के धर्म में परिवर्तित होने की पहचान है। जो धर्म नए और पुराने सवालों के जवाब ना दे सके उसका अर्थ होता है कि वह अपंग और अधूरा धर्म है। आजीवक चिंतन के सामने ऐसा कोई सवाल नहीं है जिसका जवाब ना दिया गया हो और ना दिया जा सके। इसी से दलितों की समस्याओं के समाधान निकल रहे हैं।

बताना यह है, आजीवक इको चैंबर में आजीवक धर्म के संस्थापक महान मक्खलि गोसाल की सहस्त्रवीणा की आवाज गूंजती रहती है। जिसके सुर कुछ ऐसे सुनाई पड़ते हैं "नो धम्मो ति, नो तवो ति, नत्थि पुरिस्कारे।" असीम शांति में इस इकोसिस्टम में सम्मिलित लोग कबीर साहेब के इकतारे पर झूमते देखे जा सकते हैं। एक अन्य बात जो बताई जा सकती है, इस इको चैंबर में अभी कुछ ही स्वर बोलते दिख रहे हैं तब लोगों की यह दशा हो गई है। सोचा जा सकता है, जब सारे दलित एक स्वर में आजीवक बोलेंगे तब क्या होगा? उस सुर की कल्पना कोई भी कर सकता है। उम्मीद है मित्र समझेंगे।

 


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