सम्राट असोक को लेकर गपोडिय़ों की गप्प

वे भारत कभी नहीं आए

कन्हैयालाल खोब्रागढ़े

 

‘चेत्तमासे सुक्क-अट्ठीमी दिवसे उउप्पाजिजत्वा,
यस्सेसो दुल्लभो लोकों पातुभावो अभिण्हसो।
असोको आसि तेसं तु पुञ्ञतेजबलोद्धिको।।’

‘उत्तरविहारटट्कथायं’ चीख चीख कर सम्राट असोक के जन्म को चैतमास शुक्ल पक्ष अष्टमी बताया है, लेकिन ब्राम्हणी विचारधारा के इतिहासकारों ने असोक के शिलालेखों को लेकर भ्रांति फलाई जा रही थी कि किसी भी शिलालेख में असोक का नाम नहीं हैं। अफवाह फैलाने वालों ने खूब फेंका लेकिन असोक के दो शिलालेखों ने गपोडिय़ों के गप्प को पूरी तरह से हवा में उड़ा दिया। 

कर्नाटक के मस्की शिलालेख में असोक का नाम स्पष्ट से दिया हुआ है और ‘देवानांपिय’ भी लिखा हुआ है। दूसरा रूम्मिनदेई स्तंभलेख है जिसमें बुद्ध के आगे शाक्यमुनि लिखा है। इसी तरह असोक के पहले देवानांपिय लिखा है ताकि किसी को शक न हो कि यह लेख असोक का नहीं हैं। 

सम्राट असोक यदि नहीं होते तो भारत में बुद्धगया, सारनाथ, कुशीनगर, श्रावस्ती भारत के नक्शे में नहीं होते। भारत के लोगों ने असोक को भूला दिया, परन्तु स्वतंत्रता मिलने पर सम्राट असोक के स्तम्भ के शीर्ष पर लगे सिंहों की आकृति को राजचिह्न बनाकर तथा राष्ट्रीय ध्वज तीरंगे में असोक चक्र स्थापित कर के सम्राट असोक को अपनी सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है। 

सम्राट असोक की विदेश नीति बड़ी पुख्ता थी। मेगस्थनीज ने लिखा है कि मौर्यकाल भारत का स्वर्ण युग था। कुछ इतिहासकाारों ने गुप्तकाल को भारत का स्वर्ण युग बताकर महान मौर्य सम्राटों की छबि को धूमिल करने की कोशिश की है। जिस गुप्तकाल को भारत का स्वर्ण काल बताते हैं वह चोल साम्राज्य से भी छोटा था। जिस गुप्त साम्राज्य की साहित्यिक उपलब्ध्यिों का यशोगान है, उनकी प्राय: प्रामाणिकता संदिग्ध है। कुला मिलाकर गुप्तकाल के पास ऐसा कुछ भी नहीं बचता, जिसके बलबूते उसे प्राचीन भारत का स्वर्ण युग कहा जा सके। 

भारत का असली स्वर्ण युग मौर्य काल था। भारत के बौद्धों को सम्राट असोक का जन्मदिन बड़े गर्व एवं उत्साह के साथ मनाना चाहिए। सम्राट असोक ने प्रजा की तकलीफों को जानने के लिए 256 रातें राजमहल के बाहर क्षेत्र में गुजारी थी। सम्राट असोक की ‘पियदसिन’ उपाधि को भारत की कांग्रेस पार्टी ने इंदिरा गांधी के समय उपयोग में लाकर उन्हें ‘प्रियदर्शिनी’ कहकर सम्मानित किया हैं।

यदि पुरातत्व पर यकीन करें तो राम और इंदिरा गांधी की उपाधि असोक के ‘पियदसिन’ से प्रेरित जान पड़ता है। साधारण आदमी अपने बाल बच्चों के लिए क्या नहीं करता लेकिन सम्राट असोक ने अपने पुत्र महिंद और पुत्री संघमित्रा को बौद्ध श्रमणों के रूप में बुद्धधम्म प्रचार के लिए लंका भेजा। उनके इन संतानों ने अपने देश के बाहर जाकर श्रीलंका में बुद्धधम्म प्रचार में जीवन बीता दिया। वे भारत कभी नहीं आए लंका में ही परिनिर्वाण प्राप्त किया। भारत के महान सम्राट असोक के जन्म दिवस पर भारतवासियों को बधाई और मंगलकामनाएं।
 


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