पंडवानी बनाम तीजन बाई नहीं रही
तीजन बाई का व्यक्तित्व भारतीय स्त्री की अदम्य जिजीविषा का भी प्रतीक है
सुशान्त कुमारसब अनित्य हैं। सबको एक दिन चले जाना हैं। लेकिन मरणोपरांत कुछ व्यक्तियों की ख्याति हिमालय से भी ऊंची होती हैं। तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के गनियारी गाँव में हुआ था। पंडवानी लोकगीत-नाट्य की वे पहली महिला कलाकार हैं। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व मंच तक पहुंचाने वाली पंडवानी की अप्रतिम लोकगायिका तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रही वह 70 वर्ष की थी।
सब अनित्य हैं। सबको एक दिन चले जाना हैं। लेकिन मरणोपरांत कुछ व्यक्तियों की ख्याति हिमालय से भी ऊंची होती हैं। तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के गनियारी गाँव में हुआ था। पंडवानी लोकगीत-नाट्य की वे पहली महिला कलाकार हैं। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व मंच तक पहुंचाने वाली पंडवानी की अप्रतिम लोकगायिका तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रही वह 70 वर्ष की थी। किंतु उनकी उपलब्धियों का मयार जितना बड़ा है, उससे कहीं अधिक बड़ा उनका संघर्ष और साधना है।
कहा जाता हैं कि वह विपन्न परिवार से थी। उनका बचपन आर्थिक अभावों के बीच बीता, परंतु लोकसंस्कृति की समृद्ध विरासत उनके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी बनी। नाना ब्रजलाल से सुनी महाभारत की कथाएं उनके भीतर केवल स्मृति बनकर नहीं रहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का आधार बन गईं। यही कारण है कि जब वे मंच पर भीम, अर्जुन, द्रौपदी या कर्ण का प्रसंग गाती थीं, तो वे पात्र अभिनय नहीं, बल्कि जी उठते थे।तीजन भारतीय लोककला की सबसे प्रतिष्ठित हस्तियों में गिनी जाती हैं। उन्होंने अपनी सशक्त आवाज, प्रभावशाली अभिनय और अनूठी प्रस्तुति शैली से महाभारत की कथाओं को जन-जन तक पहुंचाया और पंडवानी जैसी पारंपरिक लोककला को विश्व में नई पहचान दिलाई।
भारतीय समाज में लंबे समय तक लोककलाओं में भी स्त्री की भूमिका सीमित रही। पंडवानी में महिलाओं के लिए बैठकर गाने की परंपरा थी, जबकि खड़े होकर अभिनय करना पुरुषों का अधिकार माना जाता था। तीजन बाई ने इस रूढि़वाद को अपने साहस से तोड़ा। उन्होंने ‘कापालिक’ शैली में मंच पर खड़े होकर पंडवानी प्रस्तुत की। तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के एक साधारण परिवार में हुआ। बचपन से ही उन्हें महाभारत की कथाओं और पंडवानी गायन में गहरी रुचि थी।
सामाजिक और पारिवारिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर एक अलग पहचान बनाई। उन्होंने पुरुष प्रधान मानी जाने वाली ‘कपालिक शैली’ में पंडवानी प्रस्तुत कर परंपरागत मान्यताओं को भी चुनौती दी। यह केवल कलात्मक प्रयोग नहीं था, बल्कि स्त्री की रचनात्मक स्वतंत्रता के साथ पुरूषप्रधान समाज के खिलाफ उद्घोष था। विरोध, उपेक्षा और सामाजिक बहिष्कार जैसी अनेक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपनी साधना नहीं छोड़ी। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि परंपरा का सम्मान वही कर सकता है, जिसमें उसे नए आयाम देने का साहस भी हो।
उनकी प्रस्तुतियों की विशेषता केवल गायन नहीं, बल्कि अभिनय, संवाद, भाव-भंगिमा और मंच पर जीवंत अभिव्यक्ति रही। देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। बताते चले कि हबीब तनवीर ने उनकी कला को व्यापक मंच दिया। इसके बाद तीजन बाई ने देश-विदेश में पंडवानी की ऐसी प्रतिष्ठा स्थापित की, जिसकी पहले कल्पना भी कठिन थी।
यूरोप, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अनेक देशों के दर्शकों ने उनकी प्रस्तुतियों में भारतीय लोकसंस्कृति की अद्भुत शक्ति का अनुभव किया। वे छत्तीसगढ़ी में प्रस्तुति देती रहीं और यह सिद्ध कर दिया कि लोककला किसी भाषा की मोहताज नहीं होती, उसकी संवेदना सार्वभौमिक होती है। इस कड़ी में पंथी नृतक देवदास बंजारे भी हैं।
भारतीय लोककला में उनके असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1988 में पद्मश्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी, 2003 में पद्मभूषण, 2018 से सम्मानित किया। उन्हें फुकुओका पुरस्कार और सरकार ने 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए।
पंडवानी गायन के दौरान हबीब तनवीर तीजन बाई के अभिनय, गायन और गर्जन को देखकर काफ़ी प्रभावित हुए और देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने उन्हें पंडवानी गाने का मौक़ा दिलवाया।
मशहूर फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें अपने धारावाहिक ‘भारत एक खोज’ में महाभारत प्रसंग के लिए आमंत्रित किया। इस तरह तीजन बाई की कला घर-घर तक पहुंची। तीजन बाई की प्रतिभा को देखते हुए भिलाई स्टील प्लांट ने उन्हें साल 1986 में नौकरी दी।
बिलासपुर विश्वविद्यालय ने साल 2003 और रविशंकर विश्वविद्यालय ने साल 2006 में तीजन बाई को डी.लिट्. की मानद उपाधि से सम्मानित किया। यह उनकी विद्वता को भी प्रदर्शित करता हैं।
तीजन बाई ने केवल एक कलाकार के रूप में ही नहीं, बल्कि लोक संस्कृति की संवाहक और नई पीढ़ी के कलाकारों की प्रेरणा बनकर भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके प्रयासों से पंडवानी को नई पीढ़ी में लोकप्रियता मिली और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर नई प्रतिष्ठा दिलाई।
तीजन बाई का व्यक्तित्व भारतीय स्त्री की अदम्य जिजीविषा का भी प्रतीक है। उन्होंने साबित किया कि परिस्थितियां चाहे कितनी ही कठिन क्यों न हों, प्रतिभा यदि श्रम, अनुशासन और आत्मविश्वास से जुड़ जाए तो वह इतिहास रच सकती है। भारतीय लोककला के इतिहास में तीजन बाई का नाम सदैव सम्मान और गौरव के साथ लिया जाएगा। उनकी कला, संघर्ष और समर्पण आने वाली पीढिय़ों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।

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