पढ़बो पढ़ाबो छत्तीसगढ़ी

28 नवम्बर ‘हमर छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस’ पर विशेष

रमेश कुमार साहू

 

‘जिंदगी मा सुघराई के गीत गाबो,
जेठ मा अमराई, पूस मा घाम-शीत खाबो।
जननी के माटी ल छोड़ कहाँ जाबो,
चल न जी चल न वो, छत्तीसगढ़ी मा गोठियाबो।।


इन्हीं प्रसंगों से एक भाषा उतर कर आती है छत्तीसगढ़ी भाषा, बोली अब प्रमाणिक रूप ले चुकी है और सीधे मन में उतरने वाली आत्मीयता की भाषा वास्तविक रूप में इसे भाषा कहा जाये तो ज्यादा उपयुक्त होगा। 

छत्तीसगढ़ी भाषा एक मात्र प्रदेश की ऐसी भाषा है, जिसमें आत्मीयता और रस का मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया जाये तो प्रथम पायदान पर रहेगी। 28 नवम्बर 2007 को राजभाषा बनने पर भी कार्यलयीन भाषा न बन पाना वास्तविक रूप में थोड़ा विचार विमर्श का विषय है, हर शासन ने अपने स्तर पर  प्रयास किया, खासकर, किसने किया यह सर्वविदित हंै, पर आज छत्तीसगढ़ में रहने वाले निवासी छत्तीसगढ़ी भाषा से दूर होते नजर आ रहे है। 

वास्तव में समस्या कहां है? छत्तीसगढ़ में बस्तीकरण का दौर 1955-56 के दौर में प्रारम्भ होता है, जहां अन्य राज्यों के वासी जीवनयापन के लिए रहने-बसने लगे, इसने अपनों के साथ अपनी भाषा को अपनी संस्कृति की सोच ले चलते रहे, परन्तु छत्तीसगढ़ की जनता में उदारवादी की भावनाओं को देखी गई जिसके परिणाम स्वरूप भाषायी मिश्रण और छत्तीसगढ़ी भाषा का आंचलिक स्वरूप भी गोंड़ी, जशपुरी, लरिया, खल्टाही के रूप में देखने को मिलता है।

हालांकि छत्तीसगढ़ जनजातियों का गढ़ है, उनकी भाषा, उनकी संस्कृति का ही विकसित रूप छत्तीसगढ़ी बोली है। 

भाषा के जीवनपर्यंत जीवित रहने के लिए हमारेे कई साहित्यकारों ने छत्तीसगढ़ी शब्दकोष को सजाया, संवारा, जतन किया परन्तु आधुनिकीकरण के युग में जहां राष्ट्र चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद यहां के लोग बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार की मार झेल रहे हैं, ऐसे समय में कौन इस ओर ध्यान दे और दे रहे हैं, उनकी स्थिति क्या हैं? आगे की राह क्या हैं?

इन सब पर छत्तीसगढ़ शासन का मुहर लगाने वाले नौकरशाही से लेकर बादशाही तबके के लोगों को संवेदना से युक्त होकर सोचने और इस पर त्वरित कार्यवाही करने की जरूरत है। 

हम यहां आंकड़ों और छत्तीसगढ़ी भाषायी विकास को प्रदर्शित  करने की बजाय छत्तीसगढ़ी में ‘बोले अउ गाठियाये बर’ ज्यादा उत्कंठित हैं। 

हम प्रशासन के कार्यों की अवहेलना नहीं बल्कि सराहना करते हैं, लेकिन मंचों में दो शब्द भाषण देकर उतरने के बाद की स्थिति से भी अवगत हो जाये तो और बेहतर होगा, वैसे इस ओर भरसक प्रयास जारी है, होनी भी चाहिए।

हिन्दी और छत्तीसगढ़ी संपूरक है, इस पर कोई द्वंद्व न हो,  क्योंकि यह कौशल की भूमि है, राम की माटी है, विश्राम की माटी है, जहां सरगुजा की गूंज भारत ही नहीं अपितु समूचे विश्व में विख्यात हैं, अत: ‘छत्तीसगढ़ी भाषा राजभाषा दिवस एक दिन वाला काम नहीं करना हैं, भैय्या बल्कि छत्तीसगढ़ी ल आत्मा में उतारबो त ज्यादा बने लागही।’

लेखक छत्तीसगढ़ी भाषा अउ साहित्य संगठन से जुड़े हैं और राजनांदगांव में निवासरत हैं।


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