क्रांति, स्मृति और आत्म-पहचान के बीच: वर्तमान में ‘परसेपोलिस’ की प्रासंगिकता
परसेपोलिस को पढ़ना अनेक स्तरों से होकर गुजरने जैसा अनुभव है
डॉ सुमन पाण्डेयविगत 4 जून 2026 को ईरान की मशहूर लेखिका, चित्रकार और लोकतान्त्रिक आंदोलनों की मुखर हिमायती मरजाने सतरापी का इंतकाल हो गया। उनके आत्मकथात्मक ग्राफ़िक उपन्यास परसेपोलिस के हवाले से सतरापी को याद कर रही हैं सुमन पाण्डेय, जिनका मानना है कि ‘परसेपोलिस को पढ़ना केवल एक ग्राफिक नॉवेल पढ़ना नहीं है; यह इतिहास, राजनीति, स्मृति, स्त्री-अस्तित्व, कला और मनोविज्ञान के अनेक स्तरों से होकर गुजरने जैसा अनुभव है।’
मरजाने सतरापी का जन्म 1969 में ईरान में हुआ। वे एक शिक्षित, राजनीतिक रूप से जागरूक और उदार विचारों वाले परिवार में पली-बढ़ीं। उनका बचपन ईरान की इस्लामी क्रांति (1979) और उसके बाद के सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों के बीच बीता। किशोरावस्था में उनके माता-पिता ने उन्हें सुरक्षा और बेहतर शिक्षा के लिए ऑस्ट्रिया भेज दिया। बाद में वे कुछ समय के लिए ईरान लौटीं, लेकिन अंततः फ्रांस में बस गईं। निर्वासन, सांस्कृतिक विस्थापन और पहचान का संकट उनके लेखन के केंद्रीय विषय बने। सतरापी केवल लेखिका ही नहीं थीं; वे चित्रकार, फिल्म निर्देशक और राजनीतिक-सांस्कृतिक टिप्पणीकार भी थीं।
उनकी रचनाओं में निजी जीवन और राजनीतिक इतिहास लगातार एक-दूसरे से संवाद करते हैं। एक दुखद तथ्य यह भी है कि 4 जून 2026 को उनका निधन हो गया। वे पिछले कुछ वर्षों से ईरान में महिलाओं के अधिकारों और लोकतांत्रिक आंदोलनों की मुखर समर्थक रही हैं।
खिका मरजाने सतरापी ने ग्राफिक नॉवेल के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनकी प्रमुख कृतियों में Persepolis, Embroideries (फ़्रेंच, 2003), Chicken with Plums (2004) तथा Woman, Life, Freedom (2023–2024) शामिल हैं। इनमें Persepolis उनकी सर्वाधिक चर्चित और प्रभावशाली रचना मानी जाती है।
मरजाने सतरापी की ग्राफिक आत्मकथा Persepolis मूलतः फ़्रेंच भाषा में चार खंडों Persepolis 1 (2000), Persepolis 2 (2001), Persepolis 3 (2002) और Persepolis 4 (2003) में प्रकाशित हुई थी।
इन खंडों में क्रमशः लेखिका के बचपन, ईरानी इस्लामी क्रांति और ईरान-इराक युद्ध के प्रभाव, ऑस्ट्रिया में निर्वासन और सांस्कृतिक विस्थापन के अनुभव, तथा ईरान वापसी के बाद आत्म-पहचान और स्वतंत्रता की खोज का चित्रण किया गया है। बाद में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हुआ, जिसमें प्रथम दो फ़्रांसीसी खंडों को संयुक्त रूप से Persepolis: The Story of a Childhood (2003) तथा अंतिम दो खंडों को Persepolis 2: The Story of a Return (2004) शीर्षक से प्रकाशित किया गया।
त्पश्चात इन दोनों को एक ही संपूर्ण संस्करण The Complete Persepolis के रूप में भी प्रकाशित किया गया, जिसने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान दिलाई। इसके बाद यह विश्व की अनेक भाषाओं में अनूदित हुई और ग्राफिक साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण कृति के रूप में स्थापित हुई। यद्यपि सतरापी की अन्य रचनाएँ भी स्त्री-अनुभव, स्मृति, कला और सामाजिक यथार्थ के प्रश्नों को गहराई से उठाती हैं, किन्तु प्रस्तुत लेख विशेष रूप से Persepolis पर केंद्रित है, जो व्यक्तिगत स्मृति और राजनीतिक इतिहास के अद्वितीय संगम के रूप में सामने आती है।
आख़िर मारजाने सतरापी ने अपनी आत्मकथात्मक ग्राफिक नॉवेल के लिए परसेपोलिस शीर्षक ही क्यों चुना? प्राचीन फ़ारसी साम्राज्य की राजधानी परसेपोलिस केवल एक ऐतिहासिक नगर नहीं, बल्कि ईरान की सांस्कृतिक स्मृति और सभ्यतागत विरासत का प्रतीक है। सतरापी इस शीर्षक के माध्यम से यह संकेत देती हैं कि ईरान की पहचान केवल इस्लामी क्रांति, धार्मिक सत्ता या समकालीन राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक दीर्घ सांस्कृतिक परंपरा का उत्तराधिकारी राष्ट्र है।
साथ ही, जिस प्रकार आज परसेपोलिस के अवशेष इतिहास की स्मृति को संजोए हुए हैं, उसी प्रकार यह ग्राफिक नॉवेल भी लेखिका के बिखरे हुए बचपन, बदलते राष्ट्र और आत्म-पहचान की स्मृतियों को संरक्षित करती है। इस प्रकार परसेपोलिस शीर्षक व्यक्तिगत स्मृति, राष्ट्रीय इतिहास और सांस्कृतिक अस्मिता के बीच एक सशक्त सेतु का कार्य करता है।
इस प्रकार परसेपोलिस शीर्षक केवल पुस्तक का नाम नहीं है; यह पूरी कृति का वैचारिक प्रवेश-द्वार है। यह पाठक को स्मरण कराता है कि मारजाने सतरापी की कथा एक लड़की की निजी कहानी होते हुए भी एक सभ्यता, एक राष्ट्र और उसकी स्मृतियों की कहानी है। इसलिए यह शीर्षक पुस्तक की विषयवस्तु को गहरी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अर्थ प्रदान करता है।
साहित्य की कुछ कृतियाँ अपने समय का प्रतिनिधित्व करती हैं, जबकि कुछ ऐसी होती हैं जो समय की सीमाओं का अतिक्रमण कर मानवीय अनुभवों के सार्वकालिक दस्तावेज़ में परिवर्तित हो जाती हैं। परसेपोलिस ऐसी ही एक कृति है। पहली दृष्टि में यह एक ईरानी लड़की की आत्मकथात्मक स्मृतियों पर आधारित ग्राफिक नॉवेल प्रतीत होती है, किंतु गहराई से पढ़ने पर यह सत्ता, स्मृति, स्त्री-अस्तित्व, नागरिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक पहचान और बाल-मन की जटिलताओं का बहुआयामी पाठ बन जाती है। यही कारण है कि अपने प्रकाशन के दो दशक से अधिक समय बाद भी परसेपोलिस विश्वभर के पाठकों, शोधार्थियों और चिंतकों के लिए समान रूप से प्रासंगिक बनी हुई है।
लेखिका एवं चित्रकार मरजाने सतरापी ने अपनी निजी स्मृतियों को जिस कलात्मक और वैचारिक संवेदनशीलता के साथ रूपायित किया है, वह इस कृति को मात्र आत्मकथा के दायरे से बाहर ले जाती है। यह पुस्तक हमें यह समझने का अवसर देती है कि इतिहास केवल राजाओं, राष्ट्रों और युद्धों का वृत्तांत नहीं होता; इतिहास उन सामान्य नागरिकों के जीवन में भी घटित होता है जो सत्ता के निर्णयों के परिणामों को प्रत्यक्ष रूप से जीते हैं। परसेपोलिस इसी ‘जीए हुए इतिहास’ का दस्तावेज़ है।
राजनीति का निजी जीवन में प्रवेश
परसेपोलिस की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि यहाँ राजनीति संसदों, घोषणापत्रों और वैचारिक भाषणों तक सीमित नहीं रहती। वह घरों में प्रवेश करती है, परिवारों के संबंधों को प्रभावित करती है, बच्चों की कल्पनाओं को बदल देती है और स्त्रियों के शरीर तक को अपने नियंत्रण का क्षेत्र बना लेती है। ईरान की इस्लामी क्रांति के प्रसंगों को पढ़ते हुए स्पष्ट होता है कि सतरापी किसी राजनीतिक विचारधारा की पक्षधरता नहीं करतीं। उनका सरोकार उन मनुष्यों से है जो राजनीतिक परिवर्तन की कीमत चुकाते हैं।
बालिका मरजाने आरंभ में क्रांति को न्याय और परिवर्तन के उत्सव की तरह देखती है। उसके भीतर आदर्शवाद, उत्साह और बेहतर समाज का सपना है। किंतु धीरे-धीरे वही क्रांति निगरानी, अनुशासन और भय की व्यवस्था में बदलती दिखाई देती है। यहाँ पुस्तक एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है क्या प्रत्येक क्रांति अंततः सत्ता के किसी नए रूप में परिवर्तित हो जाती है? और क्या सत्ता का स्वभाव मूलतः नियंत्रणकारी होता है? सतरापी इन प्रश्नों के उत्तर नहीं देतीं, बल्कि पाठक को स्वयं विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं।
इतिहास की जगह स्मृति
इस पुस्तक को पढ़ते समय बार-बार यह अनुभव होता है कि यह इतिहास की पुस्तक नहीं, बल्कि स्मृतियों का इतिहास है। यहाँ घटनाएँ तिथियों और आँकड़ों के रूप में नहीं आतीं, बल्कि अनुभवों, भय, हानि और प्रेम के रूप में सामने आती हैं।स्मृति का यह स्वरूप अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि आधिकारिक इतिहास प्रायः सत्ता के दृष्टिकोण से लिखा जाता है।
उसमें आम मनुष्यों की पीड़ाएँ और निजी अनुभव गौण हो जाते हैं। परसेपोलिस इसी रिक्ति को भरती है। यह दिखाती है कि किसी भी राजनीतिक घटना का वास्तविक अर्थ उसके सामाजिक और मानवीय प्रभावों में निहित होता है। यही कारण है कि पुस्तक पढ़ते समय पाठक ईरान के इतिहास को नहीं, बल्कि ईरान के लोगों के जीवन को समझने लगता है। यह कृति हमें स्मृति को एक वैध ऐतिहासिक स्रोत के रूप में स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती है।
बाल-मन का राजनीतिक संसार
परसेपोलिस का सबसे अद्वितीय और मार्मिक पक्ष उसका बाल-मनोवैज्ञानिक आयाम है। साहित्य और इतिहास दोनों में बच्चों की दृष्टि अक्सर अनुपस्थित रहती है, किंतु सतरापी ने एक बच्चे की चेतना के माध्यम से राजनीति को देखने का साहस किया है। मरजाने युद्ध, क्रांति और सामाजिक प्रतिबंधों को उसी तरह समझने का प्रयास करती है जैसे कोई भी संवेदनशील बच्चा करेगा प्रश्न पूछकर, कल्पनाएँ रचकर और अपने सीमित अनुभवों के आधार पर अर्थ निर्मित करके।
वह ईश्वर से संवाद करती है, नायकों की कल्पना करती है और धीरे-धीरे यह समझने लगती है कि वास्तविक दुनिया उसकी कल्पनाओं से कहीं अधिक जटिल है। यह प्रक्रिया केवल एक बच्ची की कहानी नहीं है; यह उस मनोवैज्ञानिक आघात का भी चित्रण है जो राजनीतिक अस्थिरता बच्चों पर छोड़ती है। युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, वह बच्चों की स्मृतियों, उनके भय और उनकी सुरक्षा-बोध को भी प्रभावित करता है। आज जब विश्व के अनेक हिस्सों में युद्ध, विस्थापन और सांप्रदायिक संघर्ष जारी हैं, तब परसेपोलिस का यह पक्ष और भी अधिक प्रासंगिक हो उठता है।
स्त्री-विमर्श का गहरा स्वर
यदि परसेपोलिस को केवल राजनीतिक संस्मरण माना जाए तो उसके एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण आयाम की उपेक्षा होगी। यह पुस्तक मूलतः स्त्री की आत्म-पहचान की भी कथा है। सतरापी दिखाती हैं कि राजनीतिक सत्ता का सबसे प्रत्यक्ष हस्तक्षेप अक्सर स्त्री-शरीर पर होता है। पहनावा, व्यवहार, शिक्षा और सामाजिक भूमिकाएँ सब कुछ नियंत्रण का विषय बन जाते हैं।
किंतु पुस्तक स्त्रियों को केवल पीड़ित रूप में प्रस्तुत नहीं करती। वे प्रतिरोध करती हैं, प्रश्न करती हैं और अपनी स्वायत्तता की रक्षा करती हैं। मरजाने की माँ और विशेष रूप से उनकी दादी इस संदर्भ में अत्यंत महत्त्वपूर्ण पात्र हैं। दादी पुस्तक में स्मृति, नैतिकता और प्रतिरोध की जीवित परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं। वे मरजाने को सिखाती हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आत्मिक गरिमा है। इस प्रकार परसेपोलिस का स्त्रीवाद पश्चिमी अकादमिक विमर्शों तक सीमित नहीं है। यह जीवनानुभवों से उपजा हुआ स्त्रीवाद है, जो स्वतंत्रता को केवल अधिकार नहीं बल्कि अस्तित्व की शर्त मानता है।
कला के रूप में प्रतिरोध
एक दृश्य संस्कृति शोधार्थी के लिए परसेपोलिस का अध्ययन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह ग्राफिक नॉवेल इस धारणा को चुनौती देती है कि गंभीर साहित्य केवल शब्दों में लिखा जा सकता है। सतरापी के श्वेत-श्याम चित्र अपने भीतर गहन राजनीतिक और सांस्कृतिक अर्थ समेटे हुए हैं। चित्रों की सादगी पाठक को भ्रमित कर सकती है, किंतु यही सादगी उनकी शक्ति भी है।
काला और सफेद रंग यहाँ केवल दृश्य तत्व नहीं, बल्कि स्मृति और विस्मृति, स्वतंत्रता और नियंत्रण, जीवन और मृत्यु के बीच के तनावों का प्रतीक बन जाते हैं। विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि लेखिका हिंसा का चित्रण सनसनीखेज़ ढंग से नहीं करती है। वे रक्त और विनाश की बजाय उनके मनोवैज्ञानिक प्रभावों को अधिक महत्त्व देते हैं। परिणामस्वरूप कला यहाँ केवल प्रतिनिधित्व नहीं करती, बल्कि प्रतिरोध का कार्य भी करती है।
निर्वासन और पहचान का संकट
पुस्तक का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न है। जब मरजाने यूरोप पहुँचती है, तब वह स्वयं को दो संसारों के बीच बँटा हुआ पाती है। वह ईरान में पर्याप्त आधुनिक नहीं थी और यूरोप में पर्याप्त पश्चिमी नहीं। यह अनुभव वैश्वीकरण और प्रवासन के वर्तमान दौर में अत्यंत प्रासंगिक है। आज लाखों लोग ऐसी ही सांस्कृतिक अस्मिताओं के बीच जीवन जी रहे हैं। परसेपोलिस बताती है कि पहचान कोई स्थिर सत्य नहीं है; वह निरंतर निर्मित और पुनर्निर्मित होने वाली प्रक्रिया है।
आज भी परसेपोलिस को पढ़ना क्यों आवश्यक है?
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि दो दशक पहले लिखी गई एक ईरानी ग्राफिक नॉवेल आज भी क्यों पढ़ी जाए? इसका उत्तर पुस्तक की इसी बहुआयामी प्रकृति में छिपा है। आज का विश्व तीव्र राजनीतिक ध्रुवीकरण, सांस्कृतिक संघर्षों, पहचान की राजनीति और नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े प्रश्नों से जूझ रहा है। ऐसे समय में परसेपोलिस हमें यह समझने में सहायता करती है कि राजनीतिक घटनाओं का वास्तविक प्रभाव मनुष्यों के जीवन पर कैसे पड़ता है।
यह पुस्तक हमें किसी भी राष्ट्र या संस्कृति को रूढ़ छवियों के आधार पर देखने से रोकती है। पश्चिमी मीडिया द्वारा निर्मित ईरान की एकांगी छवि के विपरीत, सतरापी हमें एक जीवंत समाज, संवेदनशील परिवारों और सपने देखने वाले लोगों से परिचित कराती हैं। इस प्रकार यह पुस्तक पूर्व और पश्चिम, “हम” और “वे” जैसी द्वैतवादी धारणाओं को चुनौती देती है।
समकालीन स्त्री-विमर्श के संदर्भ में भी इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है। जब विश्वभर में स्त्री की स्वतंत्रता, उसकी देह और उसकी सामाजिक भूमिका को लेकर बहसें जारी हैं, तब परसेपोलिस स्त्री-अस्तित्व के प्रश्नों को गहरी मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करती है। इसके अतिरिक्त, यह पुस्तक लोकतंत्र और स्वतंत्रता के मूल्यों को भी नए सिरे से समझने का अवसर देती है। यह हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रताएँ स्थायी नहीं होतीं; उन्हें निरंतर संरक्षित और अर्जित करना पड़ता है। नागरिक चेतना और लोकतांत्रिक मूल्यों की यह शिक्षा आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक प्रतीत होती है।
निष्कर्ष
परसेपोलिस को पढ़ना केवल एक ग्राफिक नॉवेल पढ़ना नहीं है; यह इतिहास, राजनीति, स्मृति, स्त्री-अस्तित्व, कला और मनोविज्ञान के अनेक स्तरों से होकर गुजरने जैसा अनुभव है। यह कृति हमें सिखाती है कि इतिहास केवल बड़े नेताओं और युद्धों की कथा नहीं, बल्कि उन बच्चों, स्त्रियों और सामान्य नागरिकों की भी कहानी है जिनके जीवन पर इतिहास अपनी सबसे गहरी छाप छोड़ता है।
मारजाने सतरापी की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वे निजी अनुभव को सार्वभौमिक मानवीय अनुभव में रूपांतरित कर देती हैं। परसेपोलिस अपने समय का दस्तावेज़ होते हुए भी समय की सीमाओं से परे चली जाती है। यही कारण है कि आज भी इसे पढ़ना केवल साहित्यिक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक सजग नागरिक, संवेदनशील पाठक और गंभीर शोधार्थी के रूप में हमारी बौद्धिक ज़िम्मेदारी भी है। यह पुस्तक हमें अतीत को समझने के साथ-साथ वर्तमान को पढ़ने और भविष्य के प्रति अधिक सचेत होने की दृष्टि प्रदान करती है।
यह नया पथ में छप चुका है।

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