यह आजादी झूठी है मुल्क की जनता भूखी है

सुशान्त कुमार

 

पिछले कुल साल पहले महाराष्ट्र के नासिक शहर में जाने का अवसर मिला। वहां घूमते-घूमते एक चौक पर पहुंच गया। जिसका नामकरण महाराष्ट्र के मशहूर साहित्य रत्न और शायर अन्नाभाऊ साठे के नाम से किया गया है। कुछ ताजे तस्वीरों के साथ आपके समक्ष प्रस्तुत हूं उनके द्वारा देखी गई भारत के आजादी की सच्ची तस्वीरों के साथ। 

सन् 1947 को गुजरे आधी सदी बीतने को आई है परन्तु व्यापक भारतीय जनमानस की जिन्दगी में आजादी का सूरज अभी भी उदय नहीं हुआ है। आजादी की सांस के लिए छटपटाते हुए करोड़ों दलितों, बन्धुआ मजदूरों सी जिन्दगी जीने वाले किसानों, दमन की चक्की में पिसते मजदूरों व बेरोजगारों की लाइन में खड़े नौजवानों सहित एक आम भारतीय ने जो सपनों का सुनहरा जाल बुना था वह कभी का चकनाचूर हो चुका है।

अमीर-गरीब के बीच की बढ़ती खाई, बेकारी, गरीबी, अनपढ़ता, घुटने टेक विदेश नीति, कर्जों का लगातार बढ़ता बोझ, आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? हमारी आजादी की लड़ाई में गलती आखिर कहां पर हुई है? ‘जमीन जोतने वाले की’ का नारा भारत में हकीकत में क्यों नहीं बदल पाया? बड़े-बड़े उद्योग धंधों के बावजूद भारत कर्जों के बोझ के नीचे क्यों है? विस्तृत कृषि योग्य भूमि, अथाह कच्चे माल के स्त्रोतों, वनों, नदियों के बावजूद भारत की आधी आबादी भुखमरी की शिकार क्यों हैं?

1947 के बाद भी भारत बड़े जमींदारों, राजा-रजवाड़ों, दलाल पूंजीपतियों व विदेशी कम्पनियों के पंजों से मुक्त क्यों नहीं हो पाया? भारतीय जनता के खून-पसीने पर ऐश करने वाले जमींदार व राजे-रजवाड़े संसद-विधान सभाओं में जनता के प्रतिनिधि बन कर कैसे पहुंच गए?

जब तक हम अपने इतिहास का पुनरावलोकन करके उन गलतियों को नहीं पहचान लेते जिनके कारण आज हमारी हालत इतनी बुरी हो चुकी है, तब तक हमें न तो इन प्रश्नों का उत्तर मिलेगा और न ही हमें आगे का रास्ता स्पष्ट हो पाएगा। इतिहास को जानने की जरूरत इसलिए भी होती है ताकि विकास के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए हम पुन: वे गलतियां न कर बैठे जो हम पहले कर चुके होते हैं।

चर्चित दलित शायर अन्नाभाऊ साठे ने हमें 16 अगस्त 1947 को मोर्चा निकालकर यह आजादी झूठी है मुल्क की जनता भूखी है का नारा दिया था। सत्ता हस्तांतरण के बाद देश के शासक मूलत: विश्वबैंक, आईएमएफ व विश्व व्यापार संगठन के निर्देशों पर चल रहे हैं। पहले ही देश को डंकल प्रस्ताव व गैट के साथ देश को नई गुलामी की जंजीरों में कसा कसा जा चुका है। 

90 के दशक के बाद निजीकरण, उदारीकरण व भूमंडलीकरण की नीतियों ने साम्राज्यवादी वित्तीय छवि को बड़े सादगी से गरीब देशों के शासकों ने अपने देश में अमल में लाया है। सरकार बड़े कॉरपोरेट घरानों व विश्व साम्राज्यवाद के साथ सांठगांठ कर शोषण व गुलामी की नई व्यवस्था पर कार्य कर रही है। जल, जंगल व जमीन से परिपूर्ण देश गरीबी व भूखमरी के कगार पर खड़ा कर दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद कई राज्यों में  गरीबों में बांटे जाने वाले सस्ते दरों के राशन खुले बाजार में बेचने का कारनामा करके वहां के सरकारें भ्रष्टाचार में डूब चुकी है। देश में मजदूरों पर शोषण के सारे हदों को पार कर दिया है। कारखाना मालिक काम से निकालना, गिरफ्तारी, मारपीट, लापता व हत्या जैसे घिनौने हथकंडों को अख्तियार कर रही है।

 

 

सेज के लिए देशी-विदेशी शासकों को आकर्षित करने के लिए श्रम कानूनों में तब्दीली की जा चुकी है। कई राज्य सरकारों ने इस संबंध में घोषनाएं की है। ठेका कानूनों को बदला जा रहा है ताकि खुले तौर पर नग्न ठेका श्रम प्रणाली को सभी उद्योगों में लागू किया जा सके। घोषित तथा अघोषित नियमों-कानूनों के जरिए मजदूरों के पास जो हक बरसों के संघर्षों के बाद प्राप्त हुए है उसे पूरी तरह से खत्म किया जा रहा है। केन्द्र सरकार ने मार्च 2005 में फैक्टरी एक्ट में तब्दीली कर औरतों को रात्री पाली में काम करने पर मजबूर कर दिया है। अब तो चार श्रम कोड में मजदूर कानून बन रहे हैं।

सर्वोच्च न्यायालय भी मजदूरों के हक के खिलाफ निर्णय दे रहे है। सेज की पहली बड़ी त्रासदी यह है कि इससे लाखों किसान परिवार और उन पर निर्भर खेत मजदूरों के परिवार बेघर हो चुके हैं। इस तरह 10 लाख से भी ज्यादा लोग सेज कायम होने से पहले ही बेघर तथा बेरोजगार हो गए हैं। बेघर और बेरोजगार होने वालों की तादाद वादा किए गए रोजगारों की तादाद से कई गुना है।

इन लोगों की हालत बेहद दयनीय हो गई हैं क्योंकि अब उनके लिए दूसरा रोजगार मिलना मुश्किल हुआ है अपनी इज्जत की रोजीरोटी छीन जाने से उन्हें बेआबरू होकर दर-बदर भटकना पड़ रहा है। फसल की पैदावार का नुकसान ही कम से कम 250 से 400 करोड़ होता है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों में चाय के कारोबार में आने के बाद छोटी कंपनियां बंद हुई है। वर्ल्ड  बैंक की रिपोर्ट के अनुसार यूनिलीवर, एलायड डायोनस, कैडबरी जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत है। मेक्डोनाल्ड, केएफसी व नेस्ले की कंपनियां हमारी बाजार को कब्जा कर रही है। वालमार्ट जैसी विदेशी कंपनियों के साथ रिलायंस जैसी कंपनियां खुदरा व्यापार के बहाने गरीबों की हाथ काटने उतर आई है।

जबकि बाकी के बीस फीसदी में छोटी कंपनियों की हिस्सेदारी है। 37 से ज्यादा चाय कंपनियां बंद हो चुकी है और 10 हजार से ज्यादा मजदूर बेरोजगार हो चुके है। हजारों मजदूरों की भूख से मौत हो चुकी है। छत्तीसगढ़ में पिछले कई महिनों से निकाले गए मजदूरों ने काम पर वापस लेने के लिए प्रबंधन व सरकार से गुहार लगाई है।

भारत में एक ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश को 200 वर्षों तक औपनिवेशिक गुलामी में रखी। अब 27 हजार से भी ज्यादा बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत आ रही है। क्या देश अब भी आजाद है? छत्तीसगढ़ में ही बीएनसी मिल को बंदकर बालको, राज्य परिवहन निगम का निजीकरण कर दिया गया है। रायगढ़ में तमनार से लेकर बस्तर तक की कहानी कुछ यही बयान कर रही है।

हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने प्रदेश में पिछले 14 सालों में 14793 किसानों का आत्महत्या दर्ज किया है। जसमें एनसीआरबी ने 2011 से 2013 तक की अवधि में ऐसी मौतों की गणना नहीं की है। कृषि विशेषज्ञ संकेत ठाकुर ने कहा है कि प्रदेश में 17 लाख छोटे किसान बैंकों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। फायदे में हैं, बस कुछ बड़े किसान।

बस्तर और सरगुजा तो बैंक विहीन लगते हैं। सरकार के हर मोर्चे पर फेल होने के चलते ग्रामीणों का जीना दूभर हो गया है। करोड़ों रुपए के कई घोटालों ने घोटाला ने सरकार को बैकफूट में ला खड़ा किया है। व्यापमं तथा सिविल सेवा परीक्षाओं की घोटले की आंच मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ की रायपुर में गूंज रही है। लाखों बेरोजगारों के भविष्य व प्रतिभाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ का मामला इस मामले में उजागर हुआ है। कैग ने खुलासा किया है कि प्रदेश की जेलों में कैदियों की भारी भीड़ में बदल गया है।

हमने जून के अंक में ‘जेल एक भयावह दुनिया’ पर अंक प्रकाशित किया था। जिसमें जेल के बदहाल हालतों व सरकार की रवैया का उल्लेख था। जिसकी पुष्टि नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) ने किया है। कैग ने अपने रिपोर्ट जारी करते हुए बताया कि 6 हजार कैदियों की कुल क्षमता वाली जेलों में 16 हजार कैदी है।

जेलों में 85 प्रतिशत जेल स्टॉफ की कमी है। पांच कैदियों पर एक शौचालय के मानक के विपरीत यहां 12 कैदियों पर एक शौचालय है। कई जेलों में इससे भी बुरी हालत है। जेलों में अस्पताल बंद हैं और निर्माणाधीन बैरकों का काम अटका हुआ है। नियंत्रक महालेखा परीक्षक ने राज्य सरकार के नौ विभागों में 2 हजार 729 करोड़ रुपए की आर्थिक अनियमितता पकड़ी है। इसमें से आधी अनियमितता केवल जल संसाधन विभाग में हुई है।

जहां तक भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का सवाल है भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे नौकरशाहों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं हुई। 2013 के अंत तक राज्य के न्यायालयों में भ्रष्टाचार के 233 विचाराधीन मामलों में केवल 13 मामलों में ही सुनवाई होना, 5 मामलों में सजा और 8 अभियुक्तों का बरी होना जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर ही नहीं बल्कि सरकार की नीति व नीयत पर सवाल खड़े करती है। दस वर्षों में 375 अधिकारी-कर्मचारियों को रिश्वत लेते पकड़े जाने का मामला उठा है। 

 

 

देश में 21 करोड़ से अधिक दलितों की संख्या दुनिया के पांचवें बड़े राष्ट्र की आबादी से अधिक है। लेकिन जमीनी हकीकत से हम मुंह नहीं मोड़ सकते। अनेक हिस्सों में आज भी उन पर इसलिए अत्याचार होते है क्यांकि वे दलित हैं। कहीं बुद्ध-अंबेडकर के मूर्तियों को तोड क़र उन्हें अनादरित किया जाता है, तो कहीं कुए या तालाब से पानी नहीं भर सकते। दलित महिलाओं को नग्न कर गांवों में घुमाया जाता है। तो कहीं प्रतिष्ठा के नाम पर हर दिन और हर पल महिलाओं का कत्ल कर दिया जाता है। शादियों में आज भी दलित घोड़ी पर सवार नहीं हो सकता। मणिपुर की घटना से देश उबर नहीं पाई है।

कांग्रेस, भाजपा दलित उत्थान के नारे लगाते नहीं थकती लेकिन चंद लोगों के उत्थान को दरकिनार कर दिया जाए तो आम दलित आज भी विकास की राह ताक रहा है। लंदन में उनका घर खरीदकर स्मारक बनाने की भी योजना है। लेकिन देश की तमाम राजनीतिक पार्टियों के द्वारा  डॉ. अम्बेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि तभी मानी जाएगी, जब गांव की झोपड़ी में रहने वाले आम दलित के मन में आत्मविश्वास जग सके। हर क्षेत्र में उसे बराबरी का हक मिले। 

पीपुल्स यूनियन फॉर डैमोक्रैटिक राइट्स की रपट में  चिंता जाहिर की गई है कि आदिवासी क्षेत्रों में रोजमर्रा के उत्पीडऩ और बीच-बीच में होने वाले नरसंहार की कोई खबरें बाहर ही नहीं आतीं। सैन्य बलों द्वारा नियमित गश्त लगाना, सडक़ों और बसों में सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी, काम की जगहों, घरों, खेतों पर या सफर करते समय लोगों को मारना-धमकाना आदि से साफ दिखता है कि सलवा जुडूम की प्रत्यक्ष हिंसा की जगह किस तरह से लगातार, राजमर्रा की छिपी हुई हिंसा ने ले ली है। ‘बीच-बीच में और रोजाना’ की हिंसा और अधिकारों के हनन की दोहरी नीति से आदिवासी खुलकर बोलने और जानकारी बांटने से पूरी तरह डरने लगे हैं।

आदिवासी गांवों में लोग तभी बोलते है जब उनसे सवाल पूछे जाते हैं या फिर उन्हें कुछ खास कहना होता है। दूसरी ओर उन्हें अपने क्षेत्र के बारे में कोई भी आधिकारिक जानकारी नहीं दी जाती। आदिवासियों को डर है कि पोलावरम बांध से 300 गांव डूब जाएंगे, पर सेन्ट्रल एम्पावरमेंट कमिटी 2006 के अनुसार बांध से 4 बस्तियों के 2,335 परिवारों के 11, 766 लोग प्रभावित होंगे। सच क्या है? क्या डर बेवजह है? अगर ऐसा है तो लोगों के डर और असुरक्षा को शांत करने के लिए उन्हें कोई भी जानकारी क्यों नहीं दी गई है?

भारत की आजादी के लिए लडऩे का दावा करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का चरित्र 1885 से लेकर 1947 व उसके बाद तक क्या रहा है? भारतीय मुक्ति संर्घ में महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल, अटल बिहारी वाजपेयी, रविंद्र नाथ टैगोर, हेडगेवर, गोलवरकर, श्रीपाद डांगी, ईएमएस नंबूदरीपाद, बीपी रणदिवे, ज्योति बसु आदि की क्या भूमिका रही है? अहिंसा व स्वराज के अर्थ भिन्न-भिन्न लोगों के लिए क्या थे? कांग्रेस व जनसंघ की आजादी व आम आदमी की आजादी में क्या फर्क था? इन प्रश्नों का उत्तर खोजना निहायत जरूरी है।‘एक झूठ को अगर सौ बार बोला जाए तो वह सच लगने लगता है।’

ऐसा ही एक झूठ भारत की आजादी में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और गांधी, नेहरू, श्यामाप्रसाद मुखर्जी व डांगी की महानता के किस्से इतने ज्यादा सुनाए हैं कि एक बच्चे के मस्तिष्क में भी यह बात बैठ जाती है कि वे सभी महान थे जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया तो उनके देशभक्ति के आगे अपनी जान कुर्बान करने वाले डॉ. भीमराव अम्बेडकर, सुभाष चंद्र बोस, तमाम नौजवानों, मजदूरों और किसानों के संघर्षों और बलिदानों को बौना बना दिया गया है। हमें इतिहास के अनछुए पन्नों को उठा कर इस झूठ के विरूद्ध खड़े होने का प्रयत्न करना होगा।

इतिहास में दर्ज है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटिश राज, भारत के उभरते पूंजीपति वर्ग और बड़े जमींदारों की दलाली की थी और यह कि कांग्रेस का उद्देश्य ब्रिटिश राज को खत्म करके स्वतंत्र भारत की स्थापना करना नहीं था बल्कि ब्रिटिश राज के साथ गठबंधन करके प्रशासन में हिस्सेदारी प्राप्त करना था।

इन चारों का गठजोड़ भारतीय जनता के विरूद्ध था यानी भारतीय जनमानस को जिसने इनकी सत्ता को उखाडऩे का प्रयत्न किया, ये चारों ही अपना दुश्मन समझते थे। इस संपादकीय में इतनी कम जगह में भारतीय इतिहास के तमाम पहलुओं की चर्चा कर पाना असम्भव है।

अत: भारतीय इतिहास के निर्णायक मोड़ों के घटनाक्रम में ही चर्चा को सीमित रखा गया है। सत्ता हस्तांतरण के इस पर्व पर इतिहास व देश में घट रहे घटनाओं को एक नए ढंग से समझने का प्रयास करना चाहिए।

दक्षिण कोसल में 2015 में प्रकाशित सम्पादकीय में सम्पादन के साथ।


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