सिंधु घाटी सभ्यता के तथाकथित पतन

नॉलेज गैप के कारण कल्चरल लैप्स हुआ होगा

दक्षिण कोसल टीम

 

Manoj Abhigyan
सिंधु घाटी सभ्यता के तथाकथित पतन अर्थात् 1750 BCE और तथाकथित ऋग्वैदिक काल की शुरुआत अर्थात् 1500 BCE के मध्य तकरीबन 250 साल का लंबा अंतराल है.

क्या तथाकथित आर्य 250 साल तक आक्रमण ही करते रहे? फर्जी आर्य आक्रमण सिद्धांत गढ़ने की क्या जरूरत थी?

सिंधुघाटी सभ्यता के समय हमारा उन्नत व्यापार, शिल्प आदि था और फिर हम एक झटके में गंवई लोग बन गए. गजब गपोड़ रहे हैं हमारे इतिहासकार भी.

 



Orhan Rajput
सिंधु सभ्यता के पतन के कई अवधारणाओं में से आर्य आक्रमण भी एक अवधारणा है,यह भी बहुत ऑथेंटिक नहीं मानी जाती क्योंकि यह कुछ कब्र पर आधारित निष्कर्ष है।

बाकी कई अन्य अवधारणा ज्यादा तार्किक और मजबूत है।

 



अशोक कुमार
सिंधुघाटी सभ्यता या अन्य सभ्यतायों को किसीने तो नष्ट किया था उस प्रकरण में आर्यों का नाम भी आया,नए दौर में एक चलन है पुराने इतिहास को बदलने की, वैदिक काल के विषय पर सभी को ज्ञान है उसके लिए वेद पुराण आदि मौजूद हैं उनपर बात करने से ही आस्था आहत हो जाती है।इतिहास है साथ साथ उस इतिहास का भूगोल भी भूगर्भ में है ।

 



Girish Shukla
आर्य आक्रमण की थ्योरी अनुमानों पर आधारित है जिसके वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिलते हैं. 1947 में तत्कालीन एएसआई के डायरेक्टर मार्टीमर व्हीलर ने ये अनुमान लगाया कि आर्यों के देवता इंद्र को पुरंदर इसलिए कहा जाता है क्योंकि वो पुर यानी प्राचीर या दुर्ग जो कि सिंधु घाटी सभ्यता के प्रभु वर्ग का ठिकाना होता था, के विध्वंसक थे.

दूसरा सिद्धांत एएसआई के ही एक और डायरेक्टर जान मार्शल ने दिया जो मोहनजोदड़ो में अस्त व्यस्त पड़े मानव कंकालों पर आधारित है पर बाद में उन कंकालों की उम्र पता चली तो पता चला कि वे अलग अलग समय के नरकंकाल हैं और लापरवाही से दफनाने के कारण अस्त व्यस्त हुये होंगे. ऐसा जार्ज डेल्स नाम के आर्कियोलाजिस्ट का मानना था...मोहनजोदड़ो में जितने भी नरकंकाल मिले थे उनमें दो कंकालों के संहार की पुष्टि हुई थी.

 


 

जयवीर सुबोध 
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भारत में संस्कृत का विकास एक पिजिन ( Pidgin ) भाषा के रूप में हुआ। ईरान के आर्यपुत्र डेरियस प्रथम ( छठीं सदी ई.पू. ) का शासन जब भारत के गांधार तथा पंजाब क्षेत्र पर स्थापित हुआ, तब भारत की प्राकृत भाषी जनता पर शासन एवं संवाद कायम करने के लिए ईरानी नौकरशाहों को एक पिजिन भाषा की जरूरत महसूस हुई।
ईरानी और प्राकृत के मिश्रण से पैदा हुई यही भाषा बाद में संस्कृत के नाम से जानी जाती है। इसी पिजिन भाषा के माध्यम से ईरानी नौकरशाहों ने भारत की प्राकृत भाषी जनता से संवाद स्थापित किए तथा उन पर शासन किए।

कारण कि ईरानी नौकरशाह न तो प्राकृत जानते थे और न गांधार - पंजाब की जनता ईरानी भाषा जानती थी।

मगर ईरानी शासक डेरियस प्रथम के समय में संस्कृत भाषा नहीं बनी थी बल्कि वह मिश्रित भाषा ( पिजिन ) थी और इस नाते वह कामचलाऊ थी। इसीलिए डेरियस प्रथम के समय में संस्कृत का इस्तेमाल राजकीय कार्यों और शिलालेखों में नहीं किया जा सका।

पिजिन भाषा क्या है? आइए, इसे एक उदाहरण से समझें। नागालैंड में एक नगामी भाषा है। नगामी मूलतः असमिया और नागा समुदाय की भाषाओं का मिश्रण है। नागा समुदाय की भाषाएँ मूलतः तिब्बती - बर्मी ग्रुप की हैं, जबकि असमिया मूलतः आर्य ग्रुप की भाषा है। दोनों ग्रुप की भाषाएँ एक - दूसरे के लिए अबूझ थीं। परिणामतः आपस में संवाद - संपर्क के लिए एक पिजिन भाषा का निर्माण हुआ। यहीं नगामी है।
जैसा कि कहा गया है कि डेरियस प्रथम के समय में संस्कृत की पहचान मिश्रित भाषा ( पिजिन ) के रूप में थी। मौर्य काल में भी वह मिश्रित भाषा ही रही। यहीं कारण है कि मौर्य काल में भी संस्कृत का इस्तेमाल राजकाज और शिलालेखों में नहीं किया जा सका।

हाँ, इतना जरूर है कि मौर्य काल में भी ईरान से आए सामंत और कर्मचारी काफी हद तक बने रहे। मौर्य राजाओं ने ईरानी सामंत तुषस्प और सेनापति पुष्यमित्र जैसों को सेवा में बनाए रखे।

मौर्य काल के आखिरी दिनों में जब सैनिक सत्ता पलट हुई, तब संस्कृत को पिजिन भाषा से भाषा बनने का मौका मिला। मगर जिसे हम क्लासिकल संस्कृत कहते हैं, वह ईसा के बाद विकसित हो सकी, जिसमें बाद में शिलालेख लिखे गए।

एक पिजिन भाषा की हैसियत से संस्कृत के विकास को पूर्व और उत्तर दो रूपों में देखा जाना चाहिए। इसका पूर्व रूप वैदिक भाषा है, जिसमें ईरानी तत्व ज्यादा है। इसे अवेस्ता और डेरियस प्रथम के शिलालेखों से जाँचा जा सकता है। सुविधा के लिए डेरियस प्रथम के अभिलेखों से संस्कृतीकरण की प्रक्रिया को चित्र में समझाया गया है।

पिजिन संस्कृत का उत्तर रूप क्लासिकल संस्कृत है, जिसमें प्राकृत तत्व अधिक हैं। यहीं संस्कृत ईसा के बाद के शिलालेखों में प्रयुक्त हुई है।

कुछ बाद में यहीं क्लासिकल संस्कृत थाईलैंड, कंबोडिया, इंडोनेशिया जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में पहुँची। यहीं कारण है कि पिजिन संस्कृत का पूर्व रूप ( वैदिक संस्कृत ) के नमूने दक्षिण- पूर्व एशियाई देशों में नहीं मिलते हैं, वहाँ सिर्फ क्लासिकल संस्कृत के अभिलेख मिलते हैं।
 


जयवीर सुबोध 
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ईरान के शासक आर्यपुत्र डेरियस प्रथम ( 532-486 ई. पू. ) ने जब पंजाब पर कब्जा किया, तब उसके कुछ सामंत और कर्मचारी भी प्रशासन के लिहाज से पंजाब में बस गए। आर्यों की पहली काॅलनी भारत के पंजाब में इसी समय बसी। ये ईरानी ही आर्य थे।

मौर्यकाल में भी ये आर्य सामंत और कर्मचारी बने रहे। मौर्य राजाओं ने ईरानी सामंतों और कर्मचारियों को अपनी सेवा में रखा। अशोक ने एक ईरानी सामंत तुषस्प को कठियावाड़ का शासक बनाया। धीरे - धीरे ये आर्य सामंत और कर्मचारी मजबूत होते गए... और एक दिन एक ईरानी सामंत पुष्यमित्र ने मौर्य सम्राट बृहद्रथ से सेनापति का पद हासिल कर लिया।

फिर पुष्यमित्र सेनापति से राजा बना और भारत में आर्य - साम्राज्य की स्थापना की। गुप्त राजाओं ने आर्य - साम्राज्य को बल प्रदान किया। बाद में, सामंतवाद के दौर में विभिन्न राजवंशों ने बड़े पैमाने पर मंदिरों का निर्माण कराया। यही है भारत में आर्यों के आगमन की कहानी।

1500 ई. पू. में आर्यों के आने की बात सही नहीं है। उनके विजय की बात भी सही नहीं है। भारत का आर्यीकरण डेरियस प्रथम के समय से अर्थात छठी सदी ई. पू. से धीरे - धीरे क्रमशः हुआ।

अब संस्कृत भाषा पर आते हैं। जैसा कि ठीक इसके पिछले पोस्ट में मैंने बताया कि आर्यपुत्र डेरियस प्रथम के अभिलेख और संस्कृत भाषा मिलती - जुलती है। ये जो पंजाब में आर्य सामंत और कर्मचारी डेरियस प्रथम के समय में बसे थे, उनकी भाषा भारत के लोगों से टकराकर संस्कृत में बदल रही थी। मगर उसको पूरी तरह से बदलने में समय लगा... और आज जिस रूप में संस्कृत है, वह रूप ईसा के आसपास तैयार हुआ।

सिंधु घाटी से लेकर गौतम बुद्ध के समय तक बौद्ध सभ्यता चलती रही। कई बौद्धों ने समय - समय पर इसमें कुछ जोड़ा और घटाया। जैसे विपस्सी बुद्ध ने विपस्यना जोड़ी, गौतम बुद्ध ने मध्यमार्ग जोड़ा। बौद्ध सभ्यता धीरे - धीरे क्रमशः बढ़ती गई। फिर समय बदला और धीरे - धीरे आर्य सभ्यता आई।

इस प्रकार बौद्ध सभ्यता की इमारत पर धीरे - धीरे आर्य - सभ्यता का उदय हुआ।



Kailash Prakash Singh
जिस प्रागैतिहासिक वैदिक युग की बात ब्राह्मण ग्रंथों में की जाती है, वह दरअसल वजूद में था ही नहीं।

तमाम इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के समय निर्धारण में ईश्वी पूर्व वैदिक युग की कल्पना की है। यह निराधार है। वेद संस्कृत में लिखे गए हैं। संस्कृत का पहला शिला लेख दूसरी शताब्दी का मिलता है। इसका मतलब है कि दूसरी शताब्दी से पहले भारत में संस्कृत थी ही नहीं। तो फिर वेद कैसे दूसरी शताब्दी से पहले के हो सकते हैं?
भारत की प्राचीनतम सभ्यता सिंधु घाटी की है। सिंधु घाटी की सभ्यता अत्यंत उन्नत रूप में थी। सिंधु घाटी की सभ्यता के विघटन के बाद ब्राह्मणों ने वैदिक सभ्यता का जिक्र किया है। वे उस समाज को जंगलों में झोपड़ियों में रहते हुए दिखाते हैं। इससे जाहिर है कि वैदिक सभ्यता ब्राह्मणों की मनगढ़ंत कहानियाँ हैं।
वेदों की रचना गुप्ता काल से शुरू होती है और मुगल काल तक चलती है।

 



Ajay Kumar Khunte

इस पोस्ट पर मेरी असहमति है...

सैंधव सभ्यता में पुरातात्विक सामग्रियों की प्रचुरता है जबकि साहित्यिक सामग्रियों का नितांत अभाव है इसलिए कोई ठोस निष्कर्ष ले पाना कठिन है।

इसका ठीक उल्टा वैदिक काल है साहित्यिक सामग्री प्रचुर है जबकि पुरातात्विक नगण्य।

वैदिक संस्कृति हाइली ओवररेटेड है।अभी अभी वैदिक गणित और संस्कृत पर आप पोस्ट डाले उसके कमेंट को पढ़कर अनुभव कर सकते हैं आर्य आक्रमण अभी तक चल ही रहा है mit, हावर्ड,कैम्ब्रिज में phd किया हुआ सवर्ण कभी भी संस्कृत,ज्योतिष और आयुर्वेद की आलोचना कर ही नहीं सकता और इनको थोपना ही आर्य आक्रमण का एक रूप है।

मानव सभ्यता के प्रारंभ में एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र में एक विशेष सांस्कृतिक संकुल विकसित हुआ और इस क्षेत्र विशेष में एक नस्लीय विशेषता भी हम देख सकते है कालांतर में भौगोलिक आव्रजन हुआ जिससे कल्चरल अम्लगमेशन हुआ।
आर्य आक्रमण कांसेप्ट में भी हम यही पाते हैं।प्रारम्भ में यह एक नस्लीय अवधारणा रही फिर सांस्कृतिक अवधारणा का रूप ले ली।

ऐतिहासिक रूप से हम तीन प्रमाण का अनुभव कर सकते हैं।

पहला नस्लीय: आधुनिक डीएनए अध्ययन में हपलो ग्रुप R1a1(आर्य नस्लीय ) की जीन में उपस्थिति उत्तर पश्चिम से दक्षिण की ओर घटते जाता है, आज भी उत्तर पश्चिम पाकिस्तान में कलश/काफिर जनजाति निवास करती है जिनकी भाषा संस्कृत के निकट है और पूजा पद्धति वैदिक धर्म के नजदीक है, इंद्र प्रमुख देवता है और जनजाति होकर भी किसी यूरोपीय की तरह फक गोरे होते हैं।
 

दूसरा भाषाई: आर्य परिवार की भाषा का व्यवहार उत्तर पश्चिम से दक्षिण की ओर कम होते जाता है।

तीसरा सांस्कृतिक: ऋग्वेद में कई जगह वैदिक जन से इतर लोगों के साथ संघर्ष का प्रसंग आता है,जो शारीरिक बनावट रंग रूप से वैदिक जन से बिल्कुल अलग थे।
आज भी सवर्ण खासकर ब्राम्हणों और अवर्ण के कुल देव, गृह देव और प्राचीन धार्मिक व्यवहार में बहुत भिन्नता मिलती है, अवर्ण लोगों के मूल देव/गृह देव, गोत्र आदि आर्य भाषी शब्दों से सम्बंध नहीं रखते।

एक सांस्कृतिक सुप्रीमेसी देखने को मिलती है।

वैदिक देवता हमारे लोकव्यवहार में नहीं है बल्कि स्थानीय ग्राम और गृह देव् होते हैं,मिशनरी ढंग से आर्य धर्म के व्यवहार अपनाए गए प्रतीत होता है। इसलिए आर्य प्रवास थ्योरी सत्य प्रतीत होता है।यह एक दिन में किसी राजा के साथ लड़ाई की बात नहीं है बल्कि एक सांस्कृतिक वर्चस्व के रूप में हुई 250 वर्ष का गैप नहीं बल्कि अफगानिस्तान से दो आब तक प्रवास में कम से कम एक हजार वर्ष लगे होंगे।यह एक बृहद संस्कृति अमलगमेशन था।

धीरे धीरे सैकड़ों ग्रुप्स में कई सदी तक आव्रजन हुआ होगा एक क्षेत्र में एक ग्रुप का डोमिनेन्स बड़ा होगा तो पूर्ववर्ती लोग खदेड़ दिए गए होंगे इसलिए एक दो पीढ़ी बाद शहरी सभ्यता के शिल्पकार ,विशेषज्ञ नए लोगों को मिले नहीं होंगे तो नॉलेज गैप के कारण कल्चरल लैप्स हुआ होगा।

संक्षेप में वस्तुनिष्ठ ढंग से एक्सप्लेन कर पाना कठिन है।
 


 

Manoj Abhigyan
Ajay Kumar Khunte जी आर्य प्रवास थ्योरी ठीक है, आक्रमण करके पराजित करने वाली थ्योरी से मेरी असहमति है.



Divesh Kumar
Ajay Kumar Khunte सहमत। अच्छा विश्लेषण है। लेकिन क्या आर्यों का प्रवास अफगानिस्तान से हुआ है ? क्योंकि आर्यों का पुरोहित वर्ग जो अग्नि पूजा और जेंद अवेस्ता का ज्ञान लेकर आए थे वो तो ईरानी संस्कृति है।



Ajay Kumar Khunte
ऋग्वेद पढ़ेंगे तो साफ़ पता चलता है कि नई जगह में जीवन की तलाश में आये हैं…धार्मिक व आध्यात्मिक बातें कम ही हैं बल्कि व्यावहारिक जीवन के समस्याओं को साधने का प्रयास ऋग्वेद में आम है, मेन पॉवर की कमी साफ़ पता चलती है पुत्र पैदा कर सकने वाले पुत्रों की कामना की गई है…

भारतीय उपमहाद्वीप के मुख्य पेड़ पौधों का उल्लेख नहीं है पीपल का भी नहीं…समुद्र के लिये मूल शब्द नहीं वैदिक संस्कृत में,हाथी के लिये भी नहीं…
देवताओं के वस्त्रों में ऋग्वेद काल और उत्तर वैदिक कल में उल्लेखनीय कमी आती है जिससे विद्वानों का मत है ठंडी जगह से प्रवास हुआ।

सिर्फ़ प्रवास हुआ कहना उचित नहीं है शांतिपूर्ण प्रवास 21 सदी में संभव नहीं है तो 4000 साल पहले तो और कठिन था शांतिपूर्ण प्रवास।

ऋग्वेद में ऐसे लोगों से संघर्ष का बार बार उल्लेख है जिनके शारीरिक बनावट भाषा आदि उनसे भिन्न था,उपहास पूर्वक चपटी नाक वाला, लिंग पूजक कहा गया है।
धार्मिक ग्रंथों के असुर, राक्षस आदि खल चरित्रों के मूल में वैदिक काल के वे लोग हैं जिनसे आर्यों का संघर्ष हुआ।

आज भी यहाँ अवर्ण जातियों के धार्मिक व्यवहार सवर्णों से एक विभाजन रेखा का साफ़ पता चलता है…

इसलिए एक सेंट्रलाइज़ संघर्ष समझना उचित नहीं बल्कि समूह ,झुंड में बार बार प्रवास हुआ और गाँव के बाहर जैसे खानाबदोश डेरा लगाकर रहते हैं वैसे एक दो वर्ष तक रहे होंगे और गाँव के सिस्टम में घुसे होंगे ना कि आमने सामने की लड़ाई…और सैन्धव लोग स्थायी जीवन और संपन्नता के कारण नशे आदि के कारण जीवन को अलास्यपूर्ण बना लिए रहे होंगे।

ईरान से आने के कोई साक्ष्य नहीं मिलते बल्कि ईरानी ग्रुप और भारतीय ग्रुप पहले एक रहे होंगे फिर अलग अलग दिशा में बढ़े होंगे…इतना तो तय है ठंडे से गरम की ओर प्रवास हुआ,भाषा विज्ञान भी ईरान के समर्थन में नहीं है…आजकल PIE प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा पर भी बहुत काम हो रहा है ,इस पर एक नजर मारना चाहिये कुछ आईडिया मिलता है…

DNA सैंपलिंग का बुक जो अभी अभी आया है उसमें रिसर्चर भारत में सैंपल लेने से किस तरह रोड़ा पैदा किया गया यह बताया है…भारत में आर्य प्रवास थ्योरी हिस्ट्री का विषय न होकर राजनीति और धर्म का विषय है।

DNA संबंधीत book को अवश्य पढ़ा जाए…निष्कर्ष लेने में बहुत आसानी रहेगी।



Ajay Kumar Khunte
Manoj Abhigyan जी…निम्न सभ्यता द्वारा उच्चतर सभ्यता को डोमिनेन्ट कर देना इतिहास के लिये नई बात नहीं हैं…हूण,शक और मंगोलों के मामले भी ऐसे ही हैं…



Manoj Abhigyan
Ajay Kumar Khunte जी, कमेंट्स के नोटिफिकेशन ही नहीं मिल रहे.



Ajay Kumar Khunte
Manoj Abhigyan फ्री नहीं हो पा रहा था इसलिए लेट कमेंट किया…आपके टॉपिक ऐसे रहते हैं कि बिना कमेंट्स दिल है कि मानता नहीं…



Rahul Singh
Ajay Kumar Khunte , ब्रो नफरती चिंटू न बनो। अगर आर्य यमनाया कल्चर से आए तो हड़प्पन कौन से यहां के इंडिजनस थे? इवन फर्स्ट इंडियन कौन सा यहां के थे ? रही बात आर्य इनवेजन की थियरी तो यह अभी तक मिले प्रमाणों के हिसाब से असत्य सिद्ध हो चुकी है । हड़प्पन संस्कृति के विनाश का कारण क्लाइमेट चेंज था। छोटी मोटी लड़ाइयां हुई हो सकती है लेकिन बड़ा युद्ध खुद आर्यों के बीच ही हुआ था । इतिहास का मजा लो, इसको नफरत का माध्यम मत बनाओ।



Ajay Kumar Khunte
Rahul Singh जी…नफरत की बू आपसे आ रही है श्रीमान मैं हिस्टोरिकल फैक्ट ही लिखा आर्य गलत किए ऐसा कहीं पर नहीं लिखा…मानव सभ्यता के इतिहास में ये सामान्य बात है एक सभ्यता दूसरे पर हावी हो जाए…लेकिन आप लोग आर्य प्रवास एवं इनवेशन थ्योरी को हिस्ट्री का विषय नहीं बल्कि धर्म और राजनीति का विषय बना लिये हैं इसलिए फर्दर स्टडी ठप्प पड़ गई इस विषय पर…
 



Rahul Singh
आर्यों से रिलेटेड कोई भी थियरी तब तक एकदम सटीक नहीं हो सकती जब तक हड़प्पन लिपि न पढ़ ली जाए, ऋग्वेद और पुरानी अवेस्ता को डिकोड न कर लिया जाय, आर्यनाम वजेह एक्जेक्टली कहां है यह पता न कर लिया जाए, मिडिल ईस्ट में हित्ताइट और सुमेर के लोगो का आर्यन देवी देवताओं से संबंधित अभिलेख डिकोड न कर लिए जाएं, यमनाया कॉर्डेड वेयर और सिंतस्था कल्चर का आर्टिफिशियली एग्जेक्ट रिक्रिएशन न हो जाए।
 


 

Aar Ravi Vidrohee 
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तीथी गलत है ... इतिहासकार सही तीथी निर्धारण नही कर पाये... सिन्धु सभ्यता 8500 पुरानी है... हम केवल अनुमान लगा रहे है . सिन्धु सभ्यता क्या थी किसी को नही पता . हम आजतक उसकी लिपी भी नही पढ पाये... ये सुनिश्चित है सिन्धु सभ्यता बाहर के आक्रमण से नष्ट हुई थी . एक सभ्यता ने दूसरी सभ्यता को आत्मधात कर लिया... उसकी 60% बाते अपना ली... सिन्धु सभ्यता मे हर काम के माहिर लोगों का एक सगठन था जो समाज के विभिन्न कार्य करता था जिसे आर्यो ने बाद मे अपने वर्ण मे शुद्र कहकर शामिल कर लिया... इतिहासकार कोई जादूगर नही कि जो उन्होने कहा वो ही सत्य है... सबसे पहले उन्होने काल की गणना ही गलत की... 8500 ई पू को सीधा 1750 ई. पू कर दिया यानी 6000 सालो का अन्तर...
 


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