कहां है नांदगांव का सबसे प्राचीन उर्दू स्कूल?

उर्दू स्कूल की स्थापना 1857 के महासंग्राम के 43 वर्ष पहले हो गया था

शेख अंसार

 

राजनांदगांव के उर्दू स्कूल की स्थापना रियासतकाल में सन् 1814 में हुई है। इस लिहाज़ से उर्दू स्कूल, राजनांदगांव के सभी स्कूलों की जननी स्कूल कही जाएगी। क्योंकि शेष शिक्षण संस्थाएं इसके बाद अस्तित्व में आयीं है। स्टेट हाई स्कूल की स्थापना 1886 में हुई। लेकिन स्टेट स्कूल की माध्यमिक शाला हन्फी मस्जिद के पास गोलबाजार में लगती थी, यह मीडिल स्कूल 1975 -76 के सत्र में स्टेट हाई स्कूल के मुख्य भवन में स्थानांतरित की गई, फरवरी 1944 में राजा सर्वेश्वरदास म्युनिसिपल स्कूल की स्थापना हुई है।

ठाकुर प्यारेलालसिंह स्कूल की स्थापना जुलाई 1965 को हुई थी स्कूल भवन के अभाव में यह स्कूल शहर के चौखडीयापारा में संचालित होती थी, पुराना भवन जीई रोड के पास भवन निर्माण होते ही वहां स्थानांतरित कर दी गयी।

यह अजीब है कि बाद के स्कूल से, पहले के स्कूल का पहचान बताना,  ठौर - ठिकाना बताना मसलन म्युनिसिपल स्कूल (अब - सर्वेश्वरदास नपनि उत्कृष्ट विद्यालय, स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम विद्यालय योजना, राजनांदगांव) का निर्माण फरवरी 1944 में हुआ है, जबकि उर्दू स्कूल की स्थापना 1857 के महासंग्राम के 43 वर्ष पहले हो गया था।

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि जो बच्चा 1814 में उर्दू स्कूल का इब्तेदाई छात्र रहा होगा और जब मुल्क में 1857 के आम बगावत का आगाज़ हुआ तब उर्दू स्कूल के पहले सत्र का छात्र पढ़ - लिखकर अब 43 - 44 साल का गबरू जवान होकर अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम का हिस्सा बन गया हो।

उर्दू स्कूल ( सन् 1814 ) के दाखिला - खारिज पंजी का जब अवलोकन किये तब इल्म हुआ कि पंजी के सरल क्रमांक में 1 से 942 तक के बच्चों का नाम वाला पन्ना नही है, बेहद जर्जर हो चुके 943 सरल क्रमांक वाला पृष्ठ प्राचीन, जहीन तो है लेकिन अपने हालात के कारण बेहद माजूर होने के बावजूद आने वाली नस्लों के लिए मौजूद है।

कहां है नांदगांव का सबसे प्राचीन उर्दू स्कूल?

अतीत में रियाआ की मुसलसल मांग पर रियासत के कारिंदों ने एक टीलानुमा स्थान पर उर्दू स्कूल की स्थापना किया था। उस समय ऐसी घेराबंदी या किसी किस्म की हदबंदी नहीं होती थी, उर्दू स्कूल से लगा हुआ आज का जयस्तंभ उस समय नहीं था, खाली जगह थी जिसे बस स्थानक के तौर पर और रात्रिकालीन आमसभा के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था, क्योंकि राजनांदगांव के मिजाज के मुताबिक आमसभाएं रात में ही सम्पन्न होती थी। बाजू में जूनी हटरी संजती थी, बड़े - बड़े मॉल, मार्ट, शोरूम के बावजूद जूनी हटरी संजती है, और भविष्य में संजती रहेगी।

चलिए उर्दू  स्कूल के सहन में चलते हैं -  कल के इतिहास को आज के भूगोल से ही समझना होगा, मामला स्कूल का है विषयवार - क्रमवार ही समझना होगा। तब राजनांदगांव के मुख्य मार्ग का नाम जीई रोड नही पड़ा था। स्कूल में दाखिले का मुख्य मुहाना आज के जीई रोड की ओर से था। सन् 1814 में शहर क्या दो - तीन गांव का मेल का कस्बे जैसे था, कस्बे की ओर से आने वाले विद्यार्थियों के लिए म्युनिसिपल स्कूल के पूर्व दिशा के कोने से एक और रास्ता आबादी की ओर निकलती थी, इसी कोने में छात्र - छात्राओ एवं आमजनों के पेयजलापूर्ति की दरकार से एक बड़ा कुआं बनाया गया था।

स्कूल के अहाते में पूर्व - दक्षिण - पश्चिम के कोने में उर्दू स्कूल का भवन था जहां उर्दू माध्यम से पढ़ाई जाती थी। पहले के समूचे उर्दू स्कूल के भवन को खण्डित कर छोटा कर दिया गया है। लेकिन उर्दू स्कूल अपनी उम्र, तासीर, तालीम और तकाज़े की वजह से आज भी अव्वल और बुलंदी पर हैं। चुनांचे, दाखिल पंजी का मुआयना करते समय मन उत्साह और रोमांच से तब भर गया था, पंजी के हर पन्ने पर अंकित विद्यार्थियों के नाम हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी समुदाय के विद्यार्थियों का नाम आसानी से दिखाई पड़ता है।

 उस जमाने में मोतीपुर, कन्हारपुरी, स्टेशनपारा, चिखली, तिलई के बच्चों को गोल स्कूल पहुंचना थोड़ा मुश्किल होता था। लिहाज़ा इस इलाके के लोग अपने - अपने इलाके में आबादी के मुताबिक़ किसी एक के घर में दालान में या छपरी में या ढाबे में बच्चों को इक_ा कर मुहल्ले - पड़ोस का पढ़ा - लिखा जानकार उर्दू - अरबी की तालीम  दिया करते थे। पहले हमारे शहर राजनांदगांव को जिला का दर्जा नही मिला था, आवागमन के साधन सीमित थे रोड नही बने थे अब हमारे शहर में जिला मुख्यालय है फिर भी रोड आज भी जिला के स्तर के अनुरूप नही बन पाये हैं।

हिन्दी - उर्दु सहोदर है सौतेली नहीं !

उर्दू ने दी नसीहत , हिंदी ने मुझको पाला
हिंदी  जो  मेरी माँ  है ,  उर्दू है मेरी खाला

दोनों ने ही सँवारा, है  शख्सियत  को मेरी
उर्दू ने दी नजाकत,  हिंदी  ने  भी संभाला

आजादी की  लड़ाई  में,  दोनों  थी बराबर
उर्दू थी खुद में आतिश हिंदी स्वयं में ज्वाला

दोनों  ही  मेरी  अपनी, दोनों ही मेरी भाषा
उर्दू  जो  करे  रोशन,  हिंदी  भी दे उजाला

दोनों  मेरी  जुबां  हैं,  दोनों  मेरी  जरूरत
उर्दू   है  मेरी  रोटी,  हिंदी    मेरी  निवाला

साहबखाने के ऊपर ढाबा में मोहतरमा जेबा खातून बच्चों को पढ़ाती 

मोहतरमा जेबा खातून, जनाब अब्बास खां, जनाब इब्राहिम खां, जनाब हनीफ खां, युनूस पटवारी ये सब मुआल्लिम दीन थे, मुआल्लिम इस्लाम थे!

जब जनाब अब्बास खां पहली पाली में काम पर जाते तो सुबह के टाईम इब्राहिम खां पढ़ाते थे और शाम के वक्त अब्बास खां पढ़ाते थे, और जब इब्राहिम खां पहली पाली में काम पर जाते तो सुबह के टाईम अब्बास खां पढ़ाते और शाम के वक्त इब्राहिम खां पढ़ाते थे।

जिस दिन बीएनसी मिल्स दोनों को एक ही पाली में काम पर बुला लिया जाता तो उस दिन बच्चों की छुट्टी हो जाती थी।

मिलचाल, लैबर कालोनी, मोतीपुर - तुलसीपुर के बच्चे मरहूम मुस्तुफा शरीफ साहब (मरहूम अहमद शरीफ, जनाब मुमताज शरीफ, जनाब अनवर शरीफ, जनाब महबूब शरीफ के वालिद) के साहबखाने के ऊपर ढाबा में मोहतरमा जेबा खातून बच्चों को पढ़ाती थीं। इसके कुछ समय बाद मरहूम वाहिद कुरैशी पटवारी साहब (मरहूम नबी कुरैशी, मरहूम सरवर कुरैशी, जनाब शब्बीर कुरैशी के वालिद) के साहबखाने में दो शिफ्टों में पढ़ाई जाती थी।

दो शिफ्टों में पढ़ाने का दिलचस्प वजह यह थी, पढ़ाने वाले दोनों नवजवान मरहूम अब्बास खां और जनाब इब्राहिम खां ये दोनों हाजरात अपनी जवानी के दिनों से एशिया की विख्यात बंगाल नागपुर कॉटन मिल्स के मुलाजिम थे, जनाब इब्राहिम खां, जनाब अब्बास खां दोनों ही फोल्डिंग डिपार्टमेंट (घड़ीखाता) में काम करते थे। जनाब इब्राहिम खां -  मरहूम अब्बास खां की योग्यता इतनी थी, कि बीएनसी मिल्स का जीएम साहब इन्हें समय - समय पर बीएनसी मिल्स के विशाल टाईम ऑफिस में बुलवाकर क्लर्कियल काम सौंप दिया जाता था।

एक सवाल यहां बेहद मौजूं से पैदा होती है, ऐसी स्थिति में ये दोनों हाजरात (जनाब इब्राहिम खां - मरहूम अब्बास खां) कहां से तालीम हासिल कियें थे? मोतीपुर रेलवे क्रासिंग के एकदम सामने की आबादी में हिंगनघाट से काम की तलाश में अपने रिश्तेदार के पास एक नवजवान आये थे, उनका नाम था मोहम्मद हनीफ वे काफी तालीमयाफ्ता थे अभी उन्हें कोई काम नही मिला था, लेहाजा हनीफ साहब बच्चों को उर्दू - अरबी की पढ़ाया करते थे, उन्हीं बच्चों के साथ इब्राहिम खां और अब्बास खां को दीनी तालीम से नवाजा था।

मोतीपुर - तुलसीपुर में दीनी तालीम का कोई जरिया नहीं था

मीना बाज़ार में जनाब बाबूभाई अपने बदन में लगाकर मौत के कुएं में छलांग लगाते थे, लेकिन बच्चों को अनपढ़ता के अंधेरे कुएं से निकालने का ख्वाब हमेशा देखते थे।

मरहूम बन्नूखां, मरहूम शेख अनवर उर्दू - अरबी के तालीम से अपरिहार्य कारणों से महेरूम थे लेकिन उनके दिलों में माआसरे के बच्चों को उर्दू - अरबी और दीनी तालीम से लबरेज कर देने की तमन्ना थी, उनकी ही यह तड़प थी जो मदरसे गौसिया के तामीर को अंजाम दिया।

यह वाकिया है,1960 के दशक  की है। पहले शहरों में मीना बाजार के नाम से नुमाइश जैसा महीनों चलने वाला कार्यक्रम प्रदर्शित होता था। हमारे मोतीपुर मस्जिद तुलसीपुर के सबसे पहले हुए मुतवल्ली जनाब बाबूभाई एक मीनाबाजार के संस्थापक - संचालक थे, प्रतिदिन मीना बाजार बंद होने से पहले अंतिम आईटम - शो मौत का छ्लांग होता था। मौत के छ्लांग का यह जोखिम भरा करतब बाबूभाई साहब अंजाम देते थे।

हमारे मोतीपुर के तीन बुजुर्गवार दिनी तालीम के लिए बेहद फिक्रमंद रहते थे, मरहूम बन्नूखां (जनाब इब्राहिम खां और हाजी मोहम्मद मुनीर खां के वालिद) मरहूम बाबूभाई (हीरू ब्रदर्स के वालिद ) मरहूम शेख अनवर  (असलम मिस्त्री के वालिद) ये तीनों बुजुर्गो की रायशुमारी के बाद बाबूभाई के आशियाने मोतीपुर रेल्वे चौकी के पास बच्चों के तालीम का इन्तजाम किया गया, बच्चों को पढ़ाने के लिए दरोगाचाल में रहने वाले हाफिज मुन्नू मियां को मुकर्रर किया गया। 

अब हर सुबह छोटे - छोटे, बच्चे - बच्चियां को सीने से कायदा लगाकर जाते आसानी देखा जा सकता था। पढऩे जाते इन बच्चों के नज़ारों का जिक्र जब हमारे बड़े बूढ़े बुजुर्ग करते हैं, तो अनायस शफ़दर हाशमी साहब की वह कविता ज़ेहन पर उभरने लगता है।

किताबें करती हैं बातें
बीते ज़माने की,
दुनिया की,इंसानों की
आज की, कल की, तय
एक-एक पल की

खुशियों की, ग़मों की,
फूलों की, बमों की,
जीत की, हार की,
प्यार की, मार की

क्या तुम नहीं सुनोगे
इन किताबों की बातें?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं,
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं

किताबों में चिडियाँ चहचहाती हैं,
किताबों में खेतियाँ लहलहाती हैं
किताबों में झरने गुनगुनाते हैं,
परियों के किस्से सुनाते हैं

किताबों में रॉकेट का राज है,
किताबों में साइंस की आवाज़ है
किताबों का कितना बड़ा संसार है,
किताबों में ज्ञान का भंडार है
क्या तुम इस संसार में
नहीं जाना चाहोगे?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं,
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।


मदरसा गौसिया और मोती मस्जिद तुलसीपुर की बुनियाद पड़ी

बाबूभाई साहब के आशियाने में चलने वाले अस्थाई मदरसा से, मदरसा गौसिया और मोती मस्जिद तुलसीपुर की बुनियाद पडऩे लगी थी!

मोतीपुर रेल्वे क्रासिंग से जो सीधा रास्ता जाता है, दक्षिण से उत्तर क्रासिंग से बमुश्किल 100 मीटर की दूरी पर सीधे हाथ की तरफ जनाब बाबूभाई साहब का गरीबखाना है। छोटा सा रकबा है जिसमें अपने फैमिली के साथ रहते थे।

भरा - पूरा परिवार था सामने के हालनुमा कमरा था जहां मदरसा पढ़ायी जाती उसी कांच और लकड़ी से बनाया शोकेस के इतर कमरे में चूडिय़ों और मनिहारी का समान करीने से सजे होते थे। मदरसा के दौरान यह चूड़ी का दुकान पूरी तरह प्रभावित रहती थी। बच्चे जब पढक़र चले जाते थे, तब कहीं जाकर चूड़ी दूकान में आबादी के अनुपात में खरीदारी होती थी। 

मदरसा अभी चल ही रहा कि हाफिज मुन्नू मियां के नजराने के बाबत मांग और भुगतान पर नाइत्तफाकी हो गयी, मुन्नू मियां दरोगाचाल से साइकिल चलाकर मोतीपुर पढ़ाने आते थे अगरचे उनके जरूरत के मुताबिक न मिले तो उनको भी फैमिली की आवश्यक जरूरतें पूरी करने में खासी मुश्किलात पेश आती थी। दूसरी तरफ ऐसी कोई इंतजामिया कमेटी थी नहीं कि हाफिज साहब की वाजिब जरूरत पूरी की जा सकें।

मामूली रंज से हाफिज मुन्नू मियां मदरसा पढ़ाना बंद कर दिये। अब चलते मदरसे को बंद नहीं किया जा सकता, लेहाजा एडहॉक स्तर पर दरोगाचाल के ही जनाब अजीमुद्दीन पटवारी से अर्ज़ किया गया आप कुछ समय के लिए हमारे मदरसा के बच्चों को पढ़ा दीजिए। पटवारी अजीमुद्दीन साहब पढ़ाने को राजी हो गये, आइंदा पढ़ाई बादस्तूर जारी रही।

आज जहां मोती मस्जिद तुलसीपुर कायम है, वह जमीन मोतीपुर निवासी रामचरण आत्मज सुखरू राम कोस्टा की थी। रामचरण वल्द सुखरू से यह जमीन किशोरी लाल आत्मज कांशीराम ब्राह्मण ने 30 नवम्बर 1955 को खरीदा था। नगर सेठ भैरूलाल आत्मज सोहनलाल कुलवाल खन्डेलवाल ने किशोरीलाल वल्द कांशीराम ब्राह्मण से यह जमीन 24 जुलाई 1967 को खरीद लिया। कुछ महीनों बाद यह जमीन मोतीपुर निवासी मरहूम गौश मोहम्मद वल्द नूर मोहम्मद की अम्मा साहिबा ने यह जमीन खरीद लिया था।

हलीमा बाई बेहद मोहब्बती इंसाफ पसंद दीनी तालीम पसंद परहेजग़ार महिला थी। मरहूम बन्नूखां वल्द मरहूम महबूबखां, मरहूम शेख अनवर वल्द मरहूम शेख अज़ीज़, मरहूम बाबूभाई वल्द मरहूम अब्दुल भाई, मरहूम मुमताजअली वल्द मरहूम हनीफअली, जनाब जियाउल रहमान वल्द मुंशी नूरूलरहमान, महबूबअली उर्फ़ बब्बू उस्ताद वल्द मरहूम चिरागअली मरहूम मुस्तुफाअली वल्द मरहूम शेख अहमद हवलदार, मरहूमअब्दुल कादर (बाबू) वल्द मरहूम अब्दुल वहाब इन बुजुर्गो की कुछ करगुजरने वाली टोली थी, जो हमारे इस माआसरे के जिम्मेदार शहरी थे। 

यह सारे बुजुर्गवार एक राय होकर तय किये कि जनाब बन्नूखां और जनाब शेख अनवर हलीमा बाई उर्फ़ फुलूबाई के पास जाएं और उनसे उनकी तुलसीपुर वाली को मदरसा के लिए बात करें। जनाब बन्नूखां और जनाब शेख अनवर फुलूबाई के पास जाकर बेहद माजऱत से दरख्वास्त किया कि बाईजी (क्योंकि फुलूबाई भी इन लोगों को भाई की तरह मानती थी) हमें आपका वह तुलसीपुर वाला जगह अगरचे मदरसा के लिए देते तो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी और इससे दीनी काम भी आसान होगा। हलीमा बाई उर्फ़ फुलूबाई राज़ी हो गई।

हलीमा बाई ने अपनी जमीन को तारीख़ 19 अगस्त 1968 को 2000 रूपये में अध्यक्ष, मदरसा मुस्लिम कमेटी मोतीपुर (तुलसीपुर) के नाम से बिक्री कर रजिस्ट्री कर दिया!

विक्रेता - हलीमा बाई मोतीपुर
क्रेता - अध्यक्ष, बाबूभाई मुस्लिम कमेटी मोतीपुर (तुलसीपुर ) 

 तीन गवाहों की मौजूदगी में
गवाहन - गौशमोहम्मद वल्द नूरमोहम्मद, मुमताजअली वल्द हनीफ अली, बन्नूखां वल्द महबूबखां...


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