क्रांतिकारी साहित्यकार और समाजसुधारक: अण्णाभाऊ साठे (1 अगस्त 1920 - 18 जुलाई 1969)
1 अगस्त अण्णाभाऊ साठे जयंती
ओम प्रकाश त्यागीनिरंतर संघर्षमय जीवन जीते हुए अण्णाभाऊ ने 14 लोकनाटक, 35 उपन्यास और 300 से ऊपर कहानियां, लगभग 250 लावणियां लिखीं। लगभग छह फिल्मों की पटकथाएं और यात्रा वृतांत लिखा। उनकी लिखी 10 कहानियों/उपन्यासों का फिल्मांकन भी हुआ। यात्रा वृतांत ‘मेरी रूस यात्रा’ को दलित साहित्य का पहला यात्रा-वृतांत होने का गौरव प्राप्त है। उनके उपन्यासों और नाटकों की देश-विदेश में खूब चर्चा हुई, 1959 में प्रकाशित ‘फकीरा’ उपन्यास को खूब सराहा गया, इसे उन्होंने डॉ. अम्बेडकर को समर्पित किया था। यह उपन्यास इसी नाम के मातंग जाति के क्रांतिकारी की शौर्यकथा है, जिसमें उसका सामाजिक जीवन भी समाया हुआ है। इस उपन्यास का 27 देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। 1961 में इसे महाराष्ट्र सरकार के शीर्ष पुरस्कार से सम्मानित किया गया, इस पर बनी फिल्म की न सिर्फ उन्होंने पट-कथा लिखी थी वरन, फिल्म के एक किरदार ‘सावळया‘ का रोल भी किया था।

“आगे बढ़ो! जोरदार प्रहार से दुनिया को बदल डालो। ऐसा मुझसे भीमराव कह कर गए हैं। हाथी जैसी ताकत होने के बावजूद गुलामी के दलदल में क्यों फंसे रहते हो । आलस त्याग, जिस्म को झटककर बाहर निकलो और टूट पड़ो।” – अण्णाभाऊ साठे
तुकाराम भाऊराव उर्फ शिवशिर अण्णाभाऊ साठे का जन्म 1 अगस्त 1920 को सांगली जिले में वाववा तालुका के वाटेगांव या लहान गांव में मांग (मातंग) नामक अनुसूचित जाति में हुआ था। इनके पिता का नाम भाऊराव और माता का नाम वालूबाई था। आपका विवाह जयवंती बाई से हुआ था। अछूत और देश की सर्वाधिक विपन्न जातियों में से एक, जिसका कोई स्थायी धंधा तक नहीं था। पेट भरने के लिए उस जाति के सदस्य शादी-विवाह, पर्व-त्योहार के अवसर पर ढोल और तुरही बजाते। नाच-गाकर लोगों का मनोरंजन करते और रस्सी बुनते। उससे जो आय हो जाती उसी से जैसे-तैसे गृहस्थी चलाते थे। लेकिन ये काम हमेशा तो मिलने वाले नहीं थे, इसलिए बाकी समय में वे मेहनत-मजदूरी वाला कोई भी काम कर लेते थे।
अछूत होने के कारण ये गांव के बाहर रहते थे, इनके रहने के स्थान को ‘मांगबाड़ा’ कहा जाता था। गांव में जब भी कोई अफराध होता तो शक ‘मांगबाड़ा पर ही जाता। शर्म की बात यह है कि मानव-मात्र के अधिकारों की सुरक्षा का दावा करने वाली औपनिवेशिक अंग्रेजी सरकार ने सम्पूर्ण मांग जाति को क्रिमिनल ट्राइव एक्ट - 1871 के अंतर्गत अपराधी जाति घोषित कर रखा था। हिन्दू वर्णाश्रम धर्म में मांग जाति के लोगों का कार्य गांव की पहरेदारी करना होता है। कुछ ‘समझदार’ किस्म के ग्रामीण किसी ‘मांग’ को ही गांव की चौकीदारी सौंप देते थे। कहीं-कहीं यह कहावत भी प्रचलित थी कि मांग के घर में आटे का बर्तन भले खाली हो, दीवार पर बंदूक/तलवारें जरूर टंगी होती है। भाऊ भी इससे अलग नहीं थे।
अछूत तो अछूत तिसपर माँ-बाप अत्यंत गरीब थे। कुलकर्णी (ब्राह्मण) गुरुजी के नीचपन के कारण केवल डेढ़ दिन ही स्कूल में टिक पाये और स्कूल छोड़ देना पड़ा। पेट की आग शांत करने के लिए उन्होने अपने गाँव वाटेगाँव (सांगली) से बम्बई का लगभग 400 किमी का सफर पैदल ही तय किया। शुरू में आप बम्बई के घाटकोपर के चिराग नगर की एक चाल में रहा करते थे। अपने कैरियर एक मिल मजदूर के रूप में शुरू किया, फिर मुंबई के तेज जीवन और धरना, बैठकों, सत्याग्रह और विरोध प्रदर्शन की रोमांचक राजनीतिक जीवन का अनुभव करने के बाद, वे एक तमाशा मंडली में शामिल हो गए।
अण्णाभाव की तेज आवाज, याद करने के लिए अपनी क्षमता, हारमोनियम, तबला, ढोलकी, बुलबुल की तरह विभिन्न उपकरणों खेल में अपने कौशल, तमाशा की दुनिया में उन्हें स्टार बना दिया। क्यूंकि खुद वो बहुत कामों में मजदूरी किये थे इसलिए उनकी बातें और सोच हमेशा समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचती थी। यहां वे मजदूर आंदोलनों से गुजरते हुये कम्युनिस्ट लोगों के संपर्क में आए और आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ गए (बाद में वे रूस भी गए)।
उन दिनों मनोरंजन का प्रमुख साधन गाना-बजाना था। अण्णा का दिमाग तेज व याददाश्त गजब की थी। बचपन से ही अनेक लोकगीत उन्हें उन्हें कंठस्थ थे। वे गा-बजाकर अपना और दूसरों का मनोरंजन करते। खेल ही खेल में यदा-कदा कुछ नया भी रच देते थे। यही नहीं, वे तलवार, भाला, दांडपट्टा, कटार आदि चलाने में भी सिद्धहस्त थे। इन हथियारों का प्रयोग अवसर विशेष पर शौर्यकला का प्रदर्शन करने के लिए किया जाता था। असल में वे सामंतों के मनोरंजन का साधन थे, वैभव और शौर्य लुटा चुके जमींदार, सामंत शौर्यकलाओं का मंचन देखकर ही आत्मतुष्ट हो जाया करते थे। बात-बात पर न्याय, नैतिकता, धर्म और संस्कृति की दुहाई देने वाले पंडितजन, जाति के नाम पर आदमी-आदमी में भेद के सवाल पर चुप्पी साध जाते थे।
अण्णा के पिता मुंबई में एक अंग्रेज के घर माली का काम करते थे, बाकी परिवार गांव में रहता था। भाऊराव नौकरी करते थे, इस कारण बाकी सजातीय परिवारों की अपेक्षा उनकी आर्थिक हैसियत थोड़ी अच्छी थी। फिर भी जीवन संघर्षमय था। भाऊराव बेटे को पढ़ाना चाहते थे, एक बार छुट्टी लेकर गांव पहुंचे तो अण्णा की मां ने उनका स्कूल में दाखिला कराने की सलाह दी। लेकिन स्कूल मास्टर कुलकर्णी ‘अपराधी’ जाति के बालक को दाखिला देने को तैयार न था।
काफी अनुनय-विनय के बाद वह राजी हुआ, फिर भी जाति-द्वेष बना रहा। अपमान और तिरस्कार भरे माहौल में अण्णाभाऊ ने कुछ दिन जैसे-तैसे काटे लेकिन शीघ्र ही उनका स्वाभिमानी मन वहां से ऊब गया। आखिर प्राथमिक शिक्षा पूरी होने से पहले ही, स्कूल को हमेशा के लिए अलविदा कह, वे जीवन की पाठशाला में भर्ती हो गए। जो सीखा जीवनानुभवों से सीखा, जितना सीखा उतना समाज को लगातार लौटाते भी रहे।
उन दिनों देश में स्वाधीनता आंदोलन की गर्मी थी जिससे क्रांतिकारी गतिविधियों में तेजी आई हुई थी। अंग्रेजों का भारतीयों पर संदेह बढ़ता ही जा रहा था। ऊपर से 1930 के दशक की भीषण आर्थिक मंदी का असर, एक दिन भाऊराव को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। हताश-निराश भाऊराव गांव पहुंचे, यह सोचकर कि वहां जैसे बाकी लोग जीते हैं, वैसे वे भी दिन बिता लेंगे। लेकिन गांव पहुंचते ही एक नई आफत से सामना हुआ, उस वर्ष पूरे महाराष्ट्र में सूखा पड़ा था और अकाल जैसे हालात बन चुके थे। उन दिनों मुंबई औद्योगिक नगरी के रूप में तरक्की कर रही थी, लोग रोजगार की तलाश में उसकी ओर आ रहे थे। रोजी-रोटी के सवालों से जूझ रहे भाऊराव साठे ने भी मुंबई जाने का फैसला कर लिया।
मगर किराये के लिए जरूरी पैसे उनके पास न थे, बस मुंबई पहुंचने की ललक थी, जो देखते ही देखते उनका संकल्प बन गई। किराये का इंतजाम न हुआ तो परिवार को साथ ले, एक दिन पैदल ही मुंबई की ओर निकल पड़े। गांव-गांव भटकते, खाते-कमाते, पैदल चलते-चलते पूरा परिवार किसी तरह पूना पहुंचा। वहां वे लोग एक ठेकेदार के लिए पत्थर तोड़ने का काम करने लगे। अण्णा भी काम में उनकी मदद करते, लगातार मेहनत से वह कमजोर पड़ने लगे थे। ठेकेदार अपने मजदूरों को बंधुआ समझता था, आखिरकार एक पठान की मदद से भाऊराव परिवार को लेकर वहां से निकल लिए। आगे फिर वही पैदल यात्रा, वही संघर्ष और जहालत से भरा जीवन, वाटेगांव से मुंबई करीब 255 किलोमीटर था इस दूरी को पैदल पाटने में ही दो महीने गुजर ग ।
रास्ते में कुछ कड़वे अनुभव भी हुए, एक बार की बात है चलते-चलते अण्णा को भूख लग आई थी। सामने पके आमों से लदा एक पेड़ देखा तो भूख और भड़क उठी। उसी बेचैनी में उन्होंने पेड़ के मालिक से पूछे बगैर दो-चार आम तोड़ लिए। अचानक मालिक ने आकर उन्हें दबोच लिया, घबराए अण्णा ने आम वापस लौटाने की पेशकश की, लेकिन वह माना नहीं। डरा-धमकाकर आमों को दुबारा डाल से लटकाने की जिद करने लगा। इस तरह की अपमानजनक घटनाओं से जन्मे आक्रोश का असर रचनात्मक निखार के साथ अण्णाभाऊ की करीब-करीब हर रचना में है। उनकी बहुप्रसिद्ध कहानी ‘खुलांवादी’ का एक पात्र कहता है - ‘ये मुरदा नहीं, हाड़–मांस के जिंदा इंसान हैं। बिगडै़ल घोड़े पर सवारी करने की कूबत इनमें है। इन्हें तलवार से जीत पाना नामुमकिन है।’
मुंबई पहुंचते समय तुकाराम उर्फ अण्णाभाऊ की उम्र महज 11 वर्ष थी। गांव में जहां अछूत होने के कारण कोई काम न देता था, मुंबई में काम की कमी न थी। सो घर चलाने के लिए मुंबई में अण्णा ने कुलीगिरी की, होटल में बर्तन धोने से लेकर वेटर तक का काम किया, घरेलू नौकर रहे, कुत्तों की देखभाल के लिए एक अमीर की चाकरी की, घर-घर जाकर सामान बेचा, कुछ और काम न मिलने पर बूट-पालिश पर हाथ भी आजमाया। इस बीच फिल्म देखने का शौक पैदा हुआ, मूक फिल्मों का जमाना था। पर शौक ऐसा कि अपनी मामूली आमदनी का बड़ा हिस्सा टिकट खरीदने पर खर्च कर देते थे। जीवन-संघर्ष के बीच अक्षर जोड़ना और पढ़ना-लिखना सीखा। फिल्मी पोस्टरों और दुकानों के आगे लगे होर्डिंग्स से पढ़ना-लिखने व सीखने में मदद मिली। चेंबुर, कुला, मांटुगा, दादर, घाटकोपर वगैरह…मुंबई में काम के अनुसार उनके ठिकाने भी बदलते रहे।
अण्णा भाऊ के निकट रिश्तेदार बापू साठे एक ‘तमाशा’ मंडली चलाते थे। गाने-बजाने का शौक अण्णा को उन्हीं तक ले गया औऱ वे ‘तमाशा’ से जुड़ गए। इस बीच एकाएक ऐसी घटना हुई जिससे अण्णाभाऊ के सोचने का ढंग ही बदल गया। तमाशा मंडली को एक गांव में कार्यक्रम करना था, तमाशा शुरू होने से पहले उसके मंच पर महाराष्ट्र में ‘क्रांतिसिंह’ के नाम से विख्यात नाना पाटिल वहां पहुंचे। वहां उन्होंने ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी नीतियों का खुलासा करने वाला जोरदार भाषण किया। मिलों में हो रहे शोषण के लिए पूंजीपतियों और सरमायेदारों की कारगुजारी पर भी बात की। भाषण सुनने के बाद अण्णा भाऊ को अब तक का गाया-सुना अकारथ लगने लगा।
छुटपन में वे ‘भगवान विट्ठल’ की सेवा में अभंग गाया करते थे। उनमें जातीय ऊंच-नीच को धिक्कारा गया था व बराबरी का संदेश भी था। अब समझ में आया कि गरीबी सामाजिक समानता की राह में सबसे बड़ी बाधक है। आर्थिक असमानता केवल नियति की देन नहीं है, उसका कारण वे लोग हैं जो देश और समाज के धन पर कुंडली मारे बैठे हैं। यह भी समझ में आया कि गाने-बजाने का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है बल्कि उससे सोये हुए समाज को जगाया भी जा सकता है। उसी दिन अण्णा के ‘लोकशाहिर’ (लोककवि) अण्णा भाऊ बनने की नींव पड़ी। समाज में अमीर-गरीब की खाई को वे कम्युनिस्ट विचारधारा की कसौटी से परखने लगे। यही उन्हें कालांतर में कम्युनिस्ट पार्टी तक ले गया।
तमाशा में उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का भरपूर अवसर मिला। ‘तमाशा’ में वे कोई भी वाद्य बजा लेते, किसी भी प्रकार की भूमिका कर लेते थे। निरंतर सीखने और नए-नए प्रयोग करने की योग्यता ने उन्हें रातों-रात तमाशा मंडली का महानायक बना दिया। कुछ दिनों बाद अपने दो साथियों के साथ मिलकर अण्णा ने 1944 में ‘लाल बावटा कलापथक’(लाल क्रांति कलामंच) नामक नई तमाशा मंडली की शुरुआत की। जिसके तहत उन्होंने कई क्रांतिकारी कार्यक्रम पेश किए। उस समय तक देश में आजादी के प्रति चेतना जाग्रत हो चुकी थी। ‘तमाशा’ जनता से संवाद करने का सीधा माध्यम था। ‘लाल बावटा’ के माध्यम से अण्णाभाऊ मजदूरों के दुख-दर्द को दुनिया के सामने लाते, लोगों को स्वतंत्रता का महत्त्व समझाते थे इससे वे मजदूरों के बीच तेजी से लोकप्रिय होने लगे। अपनी मंडली को लेकर वे महाराष्ट्र के गांव-गांव तक पहुंचे। वहां लोगों को आजादी के लिए तैयार रहने और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का आवाह्न किया । लोग उन्हें ‘शाहिर अण्णा भाऊ साठे’ और ‘लोकशाहिर’ कहकर पुकारने लगे।
आगे चलकर सरकार ने ‘तमाशा’ पर प्रतिबंध लगा दिया। जिसके तहत ‘लाल बावटा’ को भी बंद करना पड़ा, लेकिन अण्णा भाऊ के भीतर छिपा कलाकार इतनी जल्दी हार मानने को तैयार न था। उन्होंने अपने विचारों को लोकगीतों में ढालना आरंभ कर दिया। तमाशा मंडली छोड़ वे एक मिल में काम करने लगे, वहां मजदूरों की समस्याओं से सीधा परिचय हुआ। कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति लगाव तो ‘क्रांतिसिंह’ नाना पाटिल का भाषण सुनने के बाद से ही था। मिल में मजदूरी करते हुए वे कम्युनिस्ट पार्टी के भी संपर्क में आए और उसके सक्रिय सदस्य बन गए। लोकगीतों के माध्यम से कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने लगे। पार्टी के लिए दरियां बिछाने से लेकर भाषण देने तक का काम किया। इसी बीच विवाह हुआ, लेकिन पहला विवाह ज्यादा जमा नहीं। दूसरा विवाह एक परित्यक्त स्त्री से किया जिससे संतान भी हुई, लेकिन वह संबंध भी ज्यादा दिन टिक न सका।
उद्योगनगरी के रूप में पनपती मुंबई हजारों मजदूरों, किसानों की शरण-स्थली थी। गांव में गरीबी, बेरोजगारी और सामंती उत्पीड़न से त्रस्त मजदूर वर्ग बेहतर जीवन की आस में उसकी ओर खिंचे चले आते थे। उनके लिए वही एक उम्मीद थी, लेकिन बेतरतीव मशीनीकरण ने लोगों की समस्या में इजाफा किया था। एक ओर बड़ी-बड़ी स्लम बस्तियां उभर रही थीं, दूसरी ओर ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं। अमीर-गरीब के बीच निरंतर बढ़ते अंतराल से उन्हें लगने लगा था कि जिन सपनों के लिए उन्होंने अपना गांव-घर छोड़ा था, वे मुंबई आकर भी फलने वाले नहीं है।
उस समय तक रूस को आजाद हुए करीब 25 वर्ष बीत चुके थे। अण्णाभाऊ सोवियत संघ की तरक्की के बारे में सुनते, प्रभावित होते। रूस की क्रांतिगाथाएं सुनकर उनका मन उमंगित होने लगता। 1943 के आसपास उन्होंने स्तालिनग्राद को लेकर एक पावड़ा (शौर्यगीत) लिखा। उस पावड़े का अनुवाद रूसी भाषा में भी हुआ, उसके बाद तो अण्णाभाऊ की कीर्ति-कथा देश-देशांतर तक व्यापने लगी।
इस बीच उन्होंने कई उपन्यास और कहानियां लिखीं, कम्युनिस्ट पार्टी के साहित्य को पढ़ा । उन्हें समझ आने लगा कि सामाजिक और आर्थिक विकास परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। वगैर एक के दूसरे को साधना संभव नहीं है, खासकर भारत जैसे समाजों में जहां जाति मजबूत सामाजिक संस्था के रूप में वर्षों से अपनी पकड़ बनाए हो। धर्म उसका समर्थन करता हो लोग मानते हों कि वे वही हैं, जो उन्हें होना चाहिए। जहां तथाकथित ईश्वरीय न्याय को ही श्रर्वश्रेष्ठ न्याय माना जाता हो। बड़ा वर्ग मानता हो कि समाज में जो जहां है सब ईश्वर इच्छा से है। भारतीय समाज में ऊंच-नीच, अमीर-गरीब की बेशुमार खाइयां हैं, बावजूद इसके वर्ग-संघर्ष के लिए यह सबसे अनुपजाऊ धरा है। लोगों की यथास्थितिवादी मनोवृति, परिवर्तन की हर संभावना को विफल कर देती है। जब कभी उसके विरुद्ध आवाज उठी, धार्मिक संस्थाएं लोगों को नियतिवाद का पाठ पढ़ाने के लिए सामने आ गईं।
गौतम बुद्ध ने जाति को चुनौती दी, उनका आभामंडल इतना प्रखर था कि उनके रहते प्रतिक्रियावादी शक्तियां वर्षों तक सिर छुपाए रहीं। उनके जाते ही देश में फिर ब्राह्मणवादी साहित्य की बाढ़-सी आ गई, नियतिवाद को शास्त्रीय मान्यता देने के लिए पुराणों और स्मृतियों की रचना की गई। शताब्दियों के बाद संत कवियों ने जाति को ललकारा तो तुलसीदास अपनी रामचरितमानस लेकर आ गए, सामाजिक समानता का सपना शताब्दियों के लिए पुनः नेपथ्य में खिसक गया। धर्म जाति का सुरक्षा-कवच है, इस रहस्य से पर्दा उठा उनीसवीं शताब्दी में।
नई शिक्षा और विचारों के आलोक में लोगों ने जाना कि वगैर धर्म को चुनौती दिए जाति से मुक्ति असंभव है जबकि आर्थिक और सामाजिक समानता के लिए सांस्कृतिक वर्चस्व से बाहर निकलना जरूरी है। इस संबंध में सबसे पहली पुकार ज्योतिराव फुले की थी, पुकार क्या मानो मुक्ति-मंत्र था । उस मुक्ति-मंत्र को सिद्धि-मंत्र में बदला डॉ. अम्बेडकर ने। जाति का दंश डॉ. अम्बेडकर ने भी झेला था और अण्णाभाऊ ने भी। साम्यवादी चेतना जहां अण्णाभाऊ के लोकगीतों को ओज से भरपूर बनाती थी, वहीं डॉ. अम्बेडकर से उन्हें हालात से टकराने की प्रेरणा मिलती थी, मार्क्स और अम्बेडकर, अण्णाभाऊ के लिए दोनों ही प्रेरणास्रोत थे।
एक क्रांतिधर्मी कलाकार की तरह अण्णाभाऊ ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन तथा गोवा मुक्ति आंदोलन के लिए काम किया। जनता के हित में एक कलाकार के रूप में वे हर आंदोलन में आगे रहे, उनके लिखे पावड़े, लावणियां मुक्ति आंदोलनों को ऊर्जा प्रदान करते रहे। 1945 में अण्णा भाऊ ने साप्ताहिक ‘लोकयुद्ध’ के लिए पत्रकार के रूप में काम करना आरंभ किया, अखबार साम्यवादी विचारधारा को समर्पित था। आम आदमी के संघर्ष, उसकी पीड़ा और उसके अभावों को वे एक पत्रकार के रूप में लगातार उठाते रहे, इसने उन्हें जनसाधारण के बीच नायकत्व प्रदान किया।
अखबार के लिए काम करते हुए उन्होंने अक्लेची गोष्ट, खाप्पया चोर, मजही मुंबई जैसे नाटक लिखे। सरकार ने ‘तमाशा’ पर प्रतिबंध लगाया तो अण्णाभाऊ ने ‘लाल बावटा’ के लिए लिखे गए नाटकों को आगे चलकर उन्होंने लावणियों और पावड़ा जैसे लोकगीतों में बदल दिया। तमाशे में वे अकेले गाते थे, लोकगीत बनने के बाद वे जन-जन की जुबान पर छाने लगे। अपने कई लोकगीतों में अण्णाभाऊ ने मुंबई में बसे श्रमिक वर्ग के जीवन की त्रासदियों का जीवंत चित्रण कर, उनके स्वप्न-भंग की स्थिति को दर्शाया था। ऐसी रचनाएं किसी भी गैरजिम्मेदार सरकार के लिए बेचैनी का कारण बन सकती थीं।
प्रसंगवश उनकी दो लावणियों का उल्लेख किया जा सकता है। ‘मुंबईची लावणी’ (मुंबई की लावणी) तथा ‘माझी मैना गावावीर राहिली’ (मेरी प्रिया गांव में रहती है)। उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मुंबई में औद्योगिकीकरण की शुरुआत हुई थी । उससे रोजगार की तलाश में गांवों से श्रमिकों और कामगारों का पलायन आरंभ हुआ। उनमें से अधिकांश वे थे जिन्हें गांवों में भीषण गरीबी और सामंती उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। जो वहां रोजगार के अभाव में फाकाकशी का जीवन जीते थे। सामंती उत्पीड़न से मुक्ति और उपयुक्त रोजगार की साध लेकर वे मुंबई पहुंचे थे। वहां पहुंचकर पता चला कि हालात में लगभग ज्यों के त्यों हैं।
केवल उत्पीड़क चेहरों में बदलाव आया है। गांव में वे सामंती उत्पीड़न और जातिवाद का शिकार थे। शहर में जातिभेद ज्यादा अंतर नहीं आया है, जबकि सामंत की जगह पुलिस और कानून के नाम पर बनी संस्थाओं ने ले ली है। ‘मुम्बईची लावणी’ में इसी पर कटाक्ष किया गया था - “ मुंबई में शिखर पर मालाबार पहाड़ियां है, वह इंद्रपुरी है देवताओं की नगरी। वह धन कुबेरों की बस्ती है, रात–दिन सुख में आकंठ डूबे रहने वाले श्रीमंत लोग वहां रहते हैं । दूसरी और परेल हैं, जहां गरीब, मजदूर, कबाड़ी, भिखारी डेरा डाले हुए हैं। वे रात–दिन पसीना बहाते हैं, कड़ी मेहनत के बाद जो मिल जाता है, उसे खा लेते हैं। तीन बत्ती, गोलपीठ और फोरस रोड पर, जिंदा रहने की कीमत पर, न जाने कितने शरीर रोज खरीदे–बेचे जाते हैं।”
दूसरी लावणी ‘माझी मैना गावावीर राहिली’ में उन मजदूरों की विरह-वेदना और पीड़ा समाई थी, जो घर-परिवार को छोड़कर नए सपने और उम्मीदें लेकर मुंबई आए थे। वहां पहुंचकर वे स्वप्न-भंग की अवस्था में जी रहे थे गरीब-मजदूरों का दुख-दर्द देख अण्णाभाऊ का संवेदनशील मन आहत होता तो कहानी, उपन्यास और लोकगीतों के रूप में बाहर आता था। उनकी रचनाएं मुंबइया जीवन की हकीकत बयान करती थीं। ऐसा कलाकार लोगों के दिल पर भले ही राज कर ले, उस सरकार को, जिसमें श्रीमंतों का आधिक्य हो, कतई रास नहीं आता। अपने सरोकारों के कारण अण्णाभाऊ भी सरकार की आंखों की किरकिरी बने रहते थे।
देश में उस समय अंग्रेजी राज्य के खिलाफ जबर्दस्त आन्दोलन हो रहे थे। भाऊ ने सन 1947 के दौरान नाना पाटिल आदि क्रांतिकारियों के साथ अंग्रेजों के विरुध्द बगावत में डट कर भाग लिया था। उस समय भाऊ कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जुड़े थे, उनके जिम्मे पार्टी का प्रचार कार्य था। भाऊ दलित-शोषितों के बीच एक लोकप्रिय जन-कवि के रूप में प्रसिध्द थे। वे विनोदी स्वभाव के थे, वे अपनी क्रांतिकारी शाहिरी के बीच जब विनोद की बातें करते तो पब्लिक में हँसी के फव्वारे छूटते थे। वे एक बड़े ही दिलचस्प कलमकार थे, उन्होंने अपनी कविता, कहानी और नाटकों से दलित-शोषितों को उनके अस्मिता की जुबान दी थी।
16 अगस्त 1947 को जब देश का सारा ब्राह्मण-बनिया आजादी के जश्न में सराबोर था कम्युनिस्टों के भारी विरोध के बावजूद उन्होने बारिश में भीगते हुये 60 हजार लोगों की रैली बॉम्बे में निकाली और उद्घोषणा दी। “ये आजादी झूठी है देश की जनता भूखी है।” शायद उन्हें आभास हो गया था कि केवल ब्राह्मण-बनिए ही आजाद हुये हैं। अंततः वे कम्युनिस्ट काल्पनिक दुनिया से बाहर आ गए और वास्तविकता स्वीकारते हुये आंबेडकरवादी बन गए। उन्होंने अपनी भावनाएं कुछ इस तरह व्यक्त की।
जग बदल घालूनी घाव। सांगुनी गेले मज भीमराव।।
गुलामगिरीच्या या चिखलात। रुतुन बसला का ऐरावत।।
अंग झाडूनी निघ बाहेरी। घे बिनीवरती घाव।।
धनवंतांनी अखंड पिळले। धर्मांधांनी तसेच छळले।।
मगराने जणू माणिक गिळीले। चोर जहाले साव।।
ठरवून आम्हा हीन अवमानीत। जन्मोजन्मी करुनी अंकित।।
जिणे लादून वर अवमानीत। निर्मुन हा भेदभाव।।
एकजुटीच्या या रथावरती। आरूढ होऊनी चलबा पुढती।।
नव महाराष्ट्रा निर्मुन जगती। करी प्रगट निज नाव।।
उनकी दूसरी रचनाएं भी रूसी, फ्रांसिसी, चेक, जर्मनी आदि भाषाओं में अनूदित हुईं। इसके अलावा हिंदी, गुजराती, बंगाली, तमिल, मलियाली, उड़िया आदि देशी भाषों में भी हुआ। अण्णाभाऊ द्वारा लिखित पुस्तकों में फकीरा, वारण का शेर, अलगुज, केवड़े का भुट्टा, कुरूप, चंदन, अहंकार, आघात, वारणा नदी के किनारे, रानगंगा आदि उपन्यास; चिराग नगर के भूत, कृष्णा किनारे की कथा, जेल में, पागल मनुष्य की फरारी, निखारा, भानामती, आबी आदि 14 कहानी संग्रह; इनामदार, पेग्यां की शादी, सुलतान आदि नाटक हैं।
उनके लिखे लोकनाटकों में तमाशा (नौटंकी), दिमाग की काहणी, खाप्पया चोर, देशभक्ते घोटाले, नेता मिल गया, बिलंदर पैसे खाने वाले, मेरी मुंबई, मौन मोर्चा आदि प्रमुख हैं। उन्होंने कई फिल्मों की पटकथाएं भी लिखीं, जिनमें फकीरा, सातरा की करामात, तिलक लागती हूं रक्त से, पहाड़ों की मैना, मुरली मल्हारी रायाणी, वारणे का बाघ तथा वारा गांव का पाणी प्रमुख हैं। इनमें से कुछ का वर्णन किए बिना वर्ग-संघर्ष और सामाजिक न्याय को एक साथ साधने वाले जमीनी लेखक अण्णाभाऊ की इस जीवनी का लिखा जाना बेईमानी होगा।
अपनी किशोरावस्था से ही अण्णाभाऊ वामपंथ के संपर्क में आए थे । सामाजिक विषमता और छूआछूत को उन्होंने बचपन से देखा-भोगा था। इसलिए छूआछूत और सामाजिक विषमता के विरुद्ध भारत में संघर्ष कर रहे डॉ. अम्बेडकर के प्रति उनकी श्रद्धा भी स्वाभाविक थी । उपन्यास ‘फकीरा’ को जो इसी नाम के मातंग जाति के क्रांतिकारी के जीवन पर आधारित था, उन्होंने डॉ. अम्बेडकर को समर्पित किया था। उनका समूचा लेखन जीवन अनुभवों का दस्तावेज है। एक कहानी संग्रह की प्रस्तावना में उन्होंने अपने इस दृष्टिकोण को बड़ी बेबाकी से प्रस्तुत किया है- ‘जो जीवन मैंने जिया, जीवन में जो भी भोगा, वही मैंने लिखा…मैं कोई पक्षी नहीं हूं जो कल्पना के पंखों पर उड़ान भर सकूं। मैं तो मेडक की तरह हूं, जमीन से चिपका हुआ।’
एक प्रसिद्ध दोहे में उन्होंने हिंदुओं के शेषनाग के मिथ पर टिप्पणी करते हुए लिखा था- ‘यह पृथ्वी शेषनाग के मस्तक पर नहीं टिकी है। अपितु वह दलितों, काश्तकारों और मजदूरों के हाथों में सुरक्षित है।’ उनका कहना था कि कला शिवजी की तीसरी आंख की तरह होती है, जो संसार को भेदती हुई सभी मिथों को जलाकर भस्म कर देती है। इस आंख को सदैव सतर्क रहना चाहिए, तथा मनुष्य के हितों की देखभाल करनी चाहिए। अण्णाभाऊ के सरोकार मानवीय थे। उनके लेखन में कल्पनातत्व सिर्फ उतना है, जितना रचनात्मक बने रहने के लिए आवश्यक होता है।
वे रूसी लेखकों में गोर्की से बेहद प्रभावित थे, जिन्होंने हाशिये के पात्रों को मुख्यधारा के साहित्य में जगह दी थी। अण्णाभाऊ भी अपनी लावणियों, लोकगीतों, कहानियों, उपन्यासों आदि के माध्यम से आम आदमी की चिंताओं और सरोकारों को जगह देते हैं । विशेषरूप से अछूत जातियों की समस्याओं तथा उनके चरित्र के उदात्त पहलुओं को बार-बार उठाते हैं। यही कारण है कि लिखते समय उन्होंने कल्पना का कम से कम सहारा लिया है। ‘मेरे सभी पात्र जीते-जागते समाज का हिस्सा हैं, उनका ऐसा दावा था ।
अण्णाभाऊ ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में गरीबी और जातीय उत्पीड़न के सताए लोगों को जगह दी थी। ऐसे लोग जो साहित्य में उपेक्षित थे। उनकी कहानियों में महार, मांग, रामोशी, बालुतेदार और चमड़े का काम करने वाले पात्र समाए हुए हैं। न केवल उनकी जीवंत उपस्थिति है, अपितु उनकी पीड़ाओं और संघर्ष को भी सम्मान के सहेजा गया है। अण्णाभाऊ की एक बहुत ही मार्मिक कहानी है ‘तीन भाखरी’। एक गांव में दो औरते रहती है, उनके बीच सास-बहू का रिश्ता है। दोनों मेहनत-मजदूरी करती हैं, अगर किसी दिन मेहनत से चूक जाएं तो घर का चूल्हा ठंडा पड़ा रहता है। बेहद गरीबी का जीवन जी रही वे औरतें आपस में हमेशा लड़ती रहती हैं।
गांव के लोग अशिक्षित, रूढ़िवादी और भूत-प्रेत में विश्वास रखने वाले हैं। दोनों स्त्रियां अछूत हैं, इस कारण गांव-भर की उपेक्षा और तिरस्कार का शिकार हैं। एक दिन सांताजी, कहानी का एक पात्र बताता है कि दोनों भुखमरी की कगार पर हैं। उनके पास कुछ भुट्टे थे, जिससे केवल तीन रोटियां बन सकती हैं। दोनों स्त्रियां पेशोपेश में हैं कि रोटियों का बंटवारा कैसे होगा। दोनों सोचती है कि अगर वह रोटी बनाए तो दो रोटियों पर उसका अधिकार होगा, बहू का भी यही विचार था। परिणाम यह होता है कि दोनों सोचते-सोचते लेट जाती हैं, अगले दिन भूख के कारण उनके प्राण चले जाते हैं।
उनकी सुप्रसिद्ध कहानी ‘सुलतान’ जो एक कैदी की कहानी पर केंद्रित है, के प्रमुख पात्र सुलतान का मानना है कि मनुष्य को उसकी जरूरत की चीजें रोटी, कपड़ा और मकान आसानी से प्राप्त होनी चाहिए । लेकिन गरीबी के कारण उसका सोच आगे नहीं बढ़ पाता। अंततः वह केवल इसलिए जेल चला जाता है क्योंकि मनुष्य को वहां उसकी न्यूनतम आवश्यकता की तीनों चीजें आसानी से उपलब्ध होती हैं। कुछ ऐसा ही दूसरी कहानी के पात्र भोमक्या और गोपिकाबाई भी करते हैं।
भुखमरी से बचने के लिए भोमक्या सुलतान की तरह जेल चला जाता है तो गोपिकाबाई एक किसान की शरण ले लेती है। भोमक्या या सुलतान में से कोई भी अपराधी मनोवृत्ति का नहीं था। उन्होंने जेल में रहना केवल इसलिए पसंद किया था, क्योंकि वहां उनकी न्यूनतम आवश्यकताएं आसानी से पूरी हो जाती थीं। अण्णाभाऊ जेल जाने को भुखमरी की समस्या का समाधान नहीं मानते। बल्कि जेल को ऐसा ठिकाना मानते हैं, जहां नागरिक जीवन और मनुष्य का विकास एक साथ ठहर जाते हैं।
एक और कहानी ‘सांवला’ का उल्लेख यहां आवश्यक है। कथानायक सांवला पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्री के पक्ष में सवाल उठाता है। रामोशी और मांग जाति के अपने मित्रों के साथ वह ब्रिटिश सत्ता से टकराता है। वे सभी अपने कार्य के प्रति ईमानदार हैं। इस बीच सांवला और उसके साथियों को काशी नाम की युवती के बारे में पता चलता है जो ससुराल में दहेज-उत्पीड़न की शिकार है। अपने साथियों के साथ सांवला काशी को उसके सास-ससुर के चंगुल से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्ष करता है। इस पर उसके सास-ससुर सांवला पर काशी के साथ बलत्कार का आरोप लगा देते हैं।
आरोप से क्षुब्ध सांवला काशी के ससुर से कहता है - ‘दादा पाटिल! क्या आप सोचते हैं कि सिर्फ आप ही बेदाग चरित्र वाले हैं, क्या आप हमें चरित्रहीन मानते हैं, आपसे किसने यह कहा है?‘लोग कहते हैं कि सभी मांग बलात्कारी होते हैं।’ यह सुनकर सांवला को क्रोध आ जाता है। वह कहता है, ‘कौन हैं वे लोग, मुझे बताओ। मैं उनकी पूरी दुनिया को जलाकर भस्म कर दूंगा।’ कहानी स्त्री समानता और स्वाधीनता के पक्ष में समाप्त होती है। ऐसे विद्रोही चरित्रों से अण्णाभाऊ की कहानियां भरी पड़ी हैं।
अण्णाभाऊ के रचनाकर्म का कोई भी उल्लेख उनके उपन्यास ‘फकीरा’ के बिना संभव नहीं है। उनके अधिकांश कथापात्रों की तरह इस उपन्यास का कथापात्र फकीरा भी वास्तविक जीवन से उठाया गया है। वह जाति से मांग और शाश्वत विद्रोही है, फिर भी मानवीय है। अवसर आने पर वह अपने पिता के हत्यारों को मारने के बजाय, उन्हें महज दंड देकर छोड़ देता है । उपन्यास जहां सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करता है, वहीं जाति के जंजाल में फंसी अछूत जातियों की पीड़ा को भी सामने लाता है। महाराष्ट्र में मांग और महार कहीं-कहीं प्रतिद्विंद्वी जातियों के रूप में सामने आती हैं। इस उपन्यास में अण्णाभाऊ इन दोनों अछूत जातियों की एकता पर भी जोर देते हैं।
भाऊ को ‘इंडो-सोवियत कल्चर सोसायटी’ की और से रूस आने का निमंत्रण मिला था। इस यात्रा का जिक्र उन्होंने अपने सफरनामा ‘माझा रशियाचा प्रवास’ में किया है। रूस यात्रा की अभिलाषा कितनी गहरी थी, इसका वर्णन उन्होंने अपने यात्रा वृतांत में स्वयं किया है – ‘मेरी अंतःप्रेरणा थी कि अपने जीवन में मैं एक दिन सोवियत संघ की अवश्य यात्रा करूंगा । यह इच्छा लगातार बढ़ती ही जा रही थी। मेरा मस्तिष्क यह कल्पना करते हुए सिहर उठता था कि मजदूर–क्रांति के बाद का रूस कैसा होगा। लेनिन की क्रांति और उनके द्वारा मार्क्स के सपने को जमीन पर उतारने की हकीकत कैसी होगी! कैसी होगी वहां की नई दुनिया, संस्कृति और समाज की चमक–दमक! मैं 1935 में ही कई जब्तशुदा पुस्तकें पढ़ चुका था। उनमें से ‘रूसी क्रांति का इतिहास’ और ‘लेनिन की जीवनी’ ने मुझे बेहद प्रभावित किया था। इसलिए मैं रूस के दर्शन को उतावला था।’
हजारों साहित्यकार आपको मिल जाएंगे पर भयानक विपरीत परिस्थितियों को झेलकर ऊंचाइयों को छूते हुये बहुत कम मिलेंगे। अण्णाभाऊ साठे की महानता किस बात में है? स्कूली अनपढ़ होते हुये भी उन्होने पढ़ने-लिखने की न केवल योग्यता हासिल ही नहीं की बल्कि क्रांति का बहुत बड़ा साहित्य भी रचा जो अच्छे-अच्छे ज्ञानपीठियों की मिट्टी-पलीद कर दे। कम्युनिस्ट आंदोलन के नकली और खोखलेपन को समझने का उनसे अच्छा कोई उदाहरण नहीं है। उन्होंने ‘लोकयुद्ध’ के साप्ताहिक रिपोर्टर के तौर पर भी काम किया था। भाऊ के क्रन्तिकारी काव्य की शोहरत रूस, जर्मनी, पोलेंड आदि देशो तक पहुंची थी। उनकी किताबों के वहां अनुवाद वहां हुए, इन मुल्कों में वे शोषितों के साहित्यकार के रूप में पहिचाने जाने लगे थे। उन्हें इन देशों से निमंत्रण आते थे। 1948 में उन्हें विश्व साहित्य परिषद् का निमंत्रण मिला था। मगर, भारत सरकार ने उन्हें इजाजत नहीं दी थी।
भाऊ के कलम की शोहरत महाराष्ट्र के सिने-जगत में तो थी ही, हिंदी सिने-जगत भी इससे अछूता नहीं था। मगर, ये सब भाऊ साठे की जिंदगी की शोहरत का एक हिस्सा था। असल में ये कलम की शोहरत कभी उनके घर की माली हालत की हिस्सेदार नहीं बनी। वे गरीब परिस्थिति के तो थे ही, उनके दलित-कलमकार और जाति-गत स्वाभिमान ने कभी उन्हें अपनी जमीन से ऊपर उठने नहीं दिया। दूसरे, उंच-नीच की घृणा पर आधारित हिन्दू समाज-व्यवस्था में दलित कवि या लेखक का जीना बड़ा दूभर होता है ।
मुंबई में रहते हुए अण्णाभाऊ ने तरह-तरह के काम किए, पैसा भी कमाया, लेकिन गरीबी से पीछा नहीं छूटा। वे 22 वर्ष तक घाटकोपर की खोलियों में रहे। यहां एक सवाल उठ सकता है । कई बड़े अभिनेताओं और फिल्म निर्माताओं से अण्णाभाऊ का संपर्क था। उनकी कहानियों पर फिल्में बन चुकी थीं। उपन्यास ‘फकीरा’ का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका था। बावजूद इसके क्यों अपने लिए ठीक-ठाक घर का इंतजाम न कर सके? इस तरह की जिज्ञासा अण्णाभाऊ के एक ख्यातिप्राप्त मित्र को भी थी।
वर्षों तक घाटकोपर की चाल में रहते देख उसने अण्णाभाऊ से पूछा कि भाऊ, ‘आपकी अनेक पुस्तकों का देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। फिल्मों की पटकथाएं भी आपने लिखी हैं। आपकी कई कहानियों और उपन्यासों पर फिल्में बन चुकी हैं। ‘फकीरा’ के रूसी भाषा में अनुवाद से रायल्टी भी मिली होगी। उससे आप बड़ा-सा बंगला क्यों नहीं बनवा लेते? और फिर वहां लिखने का कार्य जारी रख सकते हैं? इस पर अण्णाभाऊ ने हंसते हुए कहा था? ‘ठीक कहते हो। लेकिन बंगले में आरामकुर्सी पर बैठकर लिखते समय मैं गरीबी की सिर्फ कल्पना कर सकता हूं। गरीबी की पीड़ा और उसका दर्द तो भूखे पेट रहकर ही अनुभव किया जा सकता है।’ उनके ये ख्याति-प्राप्त मित्र कलाकार विठ्ठलराव उपम थे।
अनुभूति की इसी प्रामाणिकता के लिए अण्णाभाऊ ने गरीब-मजदूरों के बीच रहते थे। बिना किसी अहमन्यता, बगैर किसी विशिष्टताबोध के। भाऊ की ख्याति के साथ-साथ उनके दुश्मन भी पैदा हुए थे। ब्राम्हण कम्युनिस्ट तो हाथ धोकर कबके उनके पीछे पड़े थे। उनकी कविता, कहानी और नाटकों पर ‘स्थापित राष्ट्रीय साहित्कारों’ को खासी आपत्ति थी। उनके लिखे नाटकों के मंचन में भारी रूकावट पैदा हो रही थी। अंतत: भाऊ को नाटकों से अपने को अलग करना पड़ा। यह उनके लिए बड़ा आघात था, आघात इतना बड़ा था कि वे उसे बर्दास्त नहीं कर पाए और उन्होंने अपने-आप को शराब के हवाले कर दिया।
जिस शख्स के घर के सामने से शराबी जाने से डरता था, वह अब शराब का दास बन गया। धीरे-धीरे भाऊ मौत के मुंह में समाने लगे, उनके प्रकाशकों ने उनके साथ दगा किया । उनके अपने रिश्तेदारों ने उनके पास जो भी था, उसे हजम कर लिया। 1968 में राज्य सरकार कुछ मेहरबान हुई, अण्णाभाऊ के रहने के लिए छोटा-सा घर उपलब्ध करा दिया गया। लेकिन गरीब मजदूरों के बीच, उन्हीं की तरह रहने वाले उस जिंदादिल इंसान को नया ठिकाना रास नहीं आया। एक साल के भीतर ही, 18 जुलाई 1969 को वह महान कलाकार मुंबई को हमेशा के लिए अलविदा कह, दुनिया से चला गये।
1 अगस्त 2002 को भारत सरकार ने उनके 82वें जन्म दिवस पर डाक टिकट जारी किया। सरकार का यह प्रयास एक शाश्वत विद्रोही, प्रखर प्रतिभा को मूर्तियों में कैद कर देने जैसा ही माना जाएगा, क्योंकि दर्जनों सरकारी अकादमियां और सांस्कृतिक संस्थाएं होने के बावजूद अण्णाभाऊ के कृतित्व का एकांश भी हिंदी में उपलब्ध नहीं है। परिणामस्वरूप हिंदी के लेखक इस मराठी कला-संस्कृति और साहित्य की महानतम प्रतिभा के लेखकीय और कलात्मक अवदान से वंचित हैं।
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