'रुला देता है टाइटैनिक'

दिलीप कुमार पाठक

 

 

जैक डॉसन भी अब साउथटैम्प्टन से अमेरिका के लिए वापस समुद्री यात्रा पर सवार हो जाता है. जैक डॉसन को जहाज में ही एक ख्वाबों की शहजादी रोज़ (केट विंसलेट) मिलती है. रोज़ अमीर शहजादी है, लेकिन दौलत से उसे वह ख़ुशी नहीं मिलती, जिसकी उसे दरकार है. रोज़ की सगाई काल (बिली ज़ेन) से हो चुकी है, जिसे वो पसंद नहीं करती, जो एक खड़ूस आदमी है, जो अपनी दौलत पर मगरूर है..

रोज़ (केट विंसलेट) भी अपने परिवार और मंगेतर के साथ टाइटैनिक जहाज पर यात्रा कर रही है... जैक गरीब और थर्ड क्लास में सफ़र करने वाला एक आम लड़का है. एक दिन रोज़ अपनी जिंदगी से नाखुश रोज़ जहाज से कूदकर आत्महत्या करने की कोशिश करती है.. तब ही जैक आकर उसे बचा लेता है....रोज़ को जैक की बेफिक्री पसंद आती है.. जैक के ज़िन्दगी जीने का सलीका बड़ा सुन्दर है.. जैक रोज़ से बताता है.. मैं मछलियाँ पकड़ता हूं, घूमता हूं, जहां मिलता है सो जाता हूँ..

पेंटिंग, स्केच बनाता हूं... मुझे पता है जहाज से उतरने के बाद फिर से मुझे किसी पुल के नीचे सोना पड़ेगा. रोज़ के लिए यह सब बहुत अनोखा था. सबसे अनोखा था, जहाज से समुद्र में थूकना आदि जैक.. रोज़ को छोटी - छोटी हरकतों से ज़िन्दगी जीने का फलसफा समझा देता है. इस पर कौन विश्वास करेगा? कि शहजादी रोज.. आम से लड़के जैक को प्यार करने लगेगी.. वाकई रोज़ की अमीरी का मयार बहुत ऊंचा है, क्योंकि रोज़ का दिल बड़ा है. 

जैक एक साहसी, कलाकार है... रोज़ को आजतक बहुत खास फील कराने वाले दोस्त ही मिले थे, लेकिन जैक सिर्फ उसे एक प्यारी सी लड़की कहता है....जैक के सपने बहुत ज्यादा बड़े नहीं है, उसे पता है कि आज टाइटैनिक में हूँ, तो कल यायावरी में पैदल चलना होगा, इसमें खास बात यह है, कि जैक खुश है. और यही बात रोज़ को उसकी तरफ खींच रही है. 

जैक सही वक़्त पर पहुंचकर ' शहजादी 'रोज़' बचाते हुए अपनी बाहों में भर लेता है... और उसने रोज़ को आत्महत्या करने से रोका. किस्मत भी  इसी तरह खेलती है. कोई व्यक्ति एक सुसाइड पॉइंट पर खड़ा है, और कोई मदद के लिए खड़ा है! यह कोई चमत्कार ही तो है. जैक एवं रोज़ दोनों एक - दूसरे में खो जाते हैं.  दोनों अपने हाव - भाव से रोमांटिक.. प्रेम की कविताएं सुना रहे हैं, यूँ लगता है... जैसे जैक को रोज की मुस्कान में चेहरे पर सूरज की लालिमा..

उसके होठों पर गुलाब.. आँखों में इन्द्रधनुषी चमक बिखरी दिखती है.. मुहब्बत भी तो ऐसे ही होती है. दोनों ने वायदा कर रखा है, कि जैसे ही जहाज अमेरिका पहुंचेगा, हम यह दौलत की दुनिया छोड़ कर भग जाएंगे.. रोज़ ऐसे महसूस करती है, आम सा लड़का जैक उसकी नई दुनिया का बादशाह होगा, और मैं इसकी मल्लिका.. 

फिल्म की कहानी बुढ़ापे में रोज सुना रही है, तब देखा जा सकता है, कि सालो से रोज अपने प्रेमी जैक के लिए तरस रही है. वहीँ यह भी पता चलता है, कि उस छोटी सी यात्रा में जैक एवं रोज़ ने कितनी भरपूर ज़िन्दगी जी लिया था.. टाइटैनिक डूबने के बीच, जैक और रोज़ दोनों ने एक-दूसरे एवं जरूरतमंदों के लिए कितनी जद्दोजहद करते हैं. आख़िरकार प्रेमियों का उद्देश्य भी तो मनुष्यता की रक्षा ही करना होता है. 

जैक एक बार रोज़ को बताता है "मैं एक स्ट्रगलर हूं" उसने अपने कुछ पेंटिंग स्केच दिखाए, जिनमें कई महिलाओं की न्यूड पेंटिंग थीं... इससे प्रभावित होकर रोज़ - जैक से अनुरोध करती है कि "इसी तरह मेरा भी स्केच बनाओ". रोज़ अपने बेडरुम से पारदर्शी ड्रेस पहनकर बाहर निकलती है. रोज़ का लेटा हुआ न्यूड पेंटिंग कहानी का अहम हिस्सा बन जाती है..

देखा जाए तो जैक और रोज़ परस्पर एक - दूसरे को प्रेम तो करते ही हैं, और एक दूसरे की इज्ज़त करते हैं. रोज़ रईस है लेकिन अपनी ज़िन्दगी में थोड़ा उलझी हुई है..  उसकी माँ और मंगेतर ने रोज़ को बाध्य कर रखा है. माँ ने भावनात्मक रूप से.. वहीँ मंगेतर ने अर्थिक रूप से बांध रखा है.. रोज़ के मंगेतर काल ने जैक को नीचा दिखाने के लिए उस पर पर डायमंड नेकलेस चुराने का आरोप लगाया..

तब रोज़ ने बताया कि जहाज पर सवार आधे लोगों का मरना तय है, तो काल ने जवाब दिया, "बेहतर है. आधे लोगों का नहीं" कुछ थर्ड क्लास लोगों का क्योंकि जैक थर्ड क्लास से सफ़र कर रहा है". काल अपनी मंगेतर रोज़ को "वेश्या कहता है". रोज़ अपने मंगेतर से कहती है "मैं तुम्हारी बीवी बनने की बजाय जैक की वेश्या बनना पसंद करूंगी..." यह भी प्रेम का एक रूप है, जो प्रेम में पड़ी प्रेमिका के लिए कुछ भी असंभव नहीं है. 

लिबरल प्रेमी जैक गरीब है, लेकिन उसके साथ रोज़ को एक स्वतंत्र जीवन मिलेगा.. जो हमेशा प्रेरित करता है. लगता है कि जहाज सहित सब नष्ट हो जाएगा, लेकिन जैक - रोज़ को जीवन जीने के लिए प्रेरित करते हुए कहता है - "रोज़ मुझसे वायदा करो कुछ भी हो जाए तुम हार नहीं मानोगी, और अपनी ज़िन्दगी भरपूर जीना.." 

जहाज में और लोगों के द्वारा भी उच्च मानवीय मूल्यों को दर्शाते हुए दिखाया गया है.. जो अपनी बहादुरी और प्यार के साथ भयावह परिस्थितियों का सामना करते हैं: एक माँ अपने बच्चों को परिवार और घर की कहानियों सुनाकर शांत करती है. एक बुजुर्ग दंपत्ति अपने रूम में बिस्तर पर प्यार के शब्द फुसफुसाते हुए मौत को ही स्वीकार करते हैं, कहते हैं  यह बुजुर्ग दंपत्ति असल में भी थे, जिन्होंने ऐसे किया था.. उन्होंने तो बचने के लिए जद्दोजहद ही नहीं की थी. जहाज में पानी ज़्यादा भर जाने पर भी यूनिट के लोग संयम से डेक के नीचे मौत की त्रासदी तक लगे रहते हैं.

वहीँ उस भयावह मंज़र के बीच में भी कुछ लोग संगीत में भजन बजा रहे होते हैं,कि लोगों को भय से मुक्ति मिले. "Nearer, My God, to Thee.”,  " God, we are coming to you.."  तब ही जैक आकर हौसला बढ़ाते हुए कहता है " स्वयं भगवान जहाज को डुबो नहीं सकते, हौसला रखिए..." जैक की संवेदनशीलता दिल छू लेने वाली है. 

1912 में डूबे टाइटैनिक जहाज की असल कहानी पर ट्रेजडी, रोमांस, को यथार्थ के धरातल पर.. 1997 में फ़िल्मकार जेम्स कैमरून ने इस पर एक फिल्म बनाकर पूरी दुनिया को चौंका दिया था. महान फ़िल्म टाइटैनिक का दुखांत दर्दनाक होता है. जिसमें संवेदनशील प्रेमी जैक अपनी प्रेमिका रोज़ को बचाने के लिए अपनी जान दे देता है.. वहीँ प्रेमिका रोज़ अपनी पूरी ज़िंदगी जैक की यादों के सहारे बिता देती है. कैमरन ने उसमें जैक (डिकैप्रियो) और रोज (केट विंस्लेट) के रूप में प्रेम की अनोखी कहानी पिरोई, जो सोचने पर मजबूर कर दे. फ़िल्म का दुखांत क्लाईमेक्स बहुत ही दिलचस्प, किसी भी व्यक्ति को रोमांचित कर दे. 

इस महात्वाकांक्षी जहाज को बनाने में  $7.5 मिलियन खर्च हुए थे. टाइटैनिक जहाज 31 मार्च 1909 में बनना शुरू हुआ था, इसके निर्माण का काम 31 मई 1911 पूर्ण हुआ. 10 अप्रैल 1912 में एक महात्वाकांक्षी टाइटैनिक जहाज 2,223 यात्रियों को लेकर साउथटैम्प्टन से अमेरिका के लिए अपनी पहली यात्रा पर निकला था... टाइटैनिक की पहली यात्रा ही इसकी अंतिम यात्रा हो गई. चार दिन की यात्रा के बाद, 14 अप्रैल 1912 को वह एक हिमबर्ग से टकरा गया था... और लगभग ढाई घण्टे में दो टुकड़ों में टूटकर समुद्र की सतह पर समा गया था..

जिसमें 1,517 लोगों की मृत्यु हुई, यह त्रासदी इतिहास की सबसे बड़ी समुद्री आपदाओं में से एक है. कहते हैं, कि जिस हिमबर्ग से जहाज टकराया था, वह 10 हजार साल पहले ग्रीनलैंड से अलग हुआ था, वहीँ टकराने के दो हफ्ते बाद वह हिमबर्ग नष्‍ट हो गया था. उत्‍तर अटलांटिक सागर में जहां टाइटेनिक दुर्घटनाग्रस्त हुआ था, वहां का तापमान -2 डिग्री था... इस तापमान में कोई भी व्‍यक्ति 15 मिनट से ज्‍यादा जीवित नहीं रह सकता था. कहते हैं कि टाइटैनिक में अधिकांश लोग कम तापमान में सर्द के कारण मरे थे.  टाइटेनिक जहाज $7.5 मिलियन में बनकर तैयार हुआ था, लेकिन दिलचस्‍प बात यह है कि इस पर बनी गई फिल्म पर $200 मिलियन खर्च हुए थे, लेकिन जेम्स कैमरून ने फिल्म से इतनी दौलत कमाई थी, कि टाइटैनिक जैसे कई जहाज खरीदे जा सकते हैं.. 

110 साल पुराने टाइटैनिक, एवं 26 साल पुरानी फिल्म टाइटैनिक का नाम सुनकर आज भी लोग रोमांचित हो जाते हैं. कुछ विशेषज्ञों का दावा है, कि टाइटैनिक बच सकता था, लेकिन जब टाइटैनिक अपनी पहली यात्रा पर निकला था, तब कुछ गैरजिम्मेदार विशेषज्ञों ने डींगे मारी थीं, कि टाइटैनिक कभी डूब ही नहीं सकता, यही गलती ले डूबी थी....वहीँ उसके कुछ बचाव के लिए वो इंतजाम नहीं किए गए, जो करने चाहिए थे...

सोनार युक्ति के तहत टाइटैनिक के मलबे की तस्वीरें भी जारी हुई थीं, वहीँ दशकों बाद कुछ मिले मलबे को लाखों लोगों ने देखा था, जिनका अनुभव बहुत रोमांचित था... वहीँ उसका नष्ट मलबा आज भी समुद्री सतह पर मौजूद है.. -2 डिग्री तापमान में इतने विशाल टाइटैनिक जहाज को निकाल पाना बहुत मुश्किल है.... देखना यह है कि क्या टाइटैनिक कभी समुद्र की सतह से निकल पाएगा... क्योंकि हज़ारों सवाल उसी में दफ्न हैं.. आज भी जिनके बहुतेरे अनसुलझे प्रश्नो के जवाबों की दरकार है. 

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