गोंड़ आदिवासियों ने शव दफनाने सहित कई घोषणायें किये


 

इस आदिवासी महासभा में ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है कि समाज के लोग अब शवों को जलाएंगे नहीं बल्कि दफनाएंगे। बताया यह जा रहा है आदिवासी संस्कृति को बढ़ावा देने के लिये यह निर्णय लिया गया है। इसके साथ ही समाज के सभी समारोहों में शराब अब पूर्ण रूप से प्रतिबंधित होगा। देवी-देवताओं की पूजा में भी शराब अर्पण करने की परंपरा रही है, तो इसकी जगह अब महुआ का फूल अर्पित किया जाएगा।
समाज का कहना है कि यदि सामाजिक समारोह में शराब पिलाई गई, तो आयोजक पर अर्थदंड लगाया जाएगा।

उत्सवों में शराब पर दो हजार इस पर भी वैवाहिक कार्यक्रम में 5 हजार रुपए अर्थदंड रखा गया है। सिर्फ शराब ही नहीं, बल्कि कई ऐसे फैसले किए गए हैं, जो समाज को अपने पुराने आदिवासी संस्कृति की ओर लौटा ले जाती है। ज्यादातर लोग जानते ही हैं कई आदिवासी समाज और समूहों रूढि़ परंपरा के तहत शराब उनकी संस्कृति का एक हिस्सा रहा है।

इस महासभा में समाज के लिए संविधान तैयार किया गया है, जो 60 पेज का है। इसमें 50 से अधिक प्रस्ताव पारित किए गए हैं। प्रमुख रूप से शराब पर प्रतिबंध, दहेज पर रोक, समाज में मृत्यु, जन्म व विवाह समेत अन्य कार्यक्रम में पवित्र ग्रंथ गोंडी कोयापूनेम के आधार पर काम करना शामिल है। समाज द्वारा बनाए गए 60 पेज के लिखित संविधान को जिला महासचिव सिद्दराज मेरावी समेत पदािधकारियों ने अनुमोदन किया है।

दहेज पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया है। कोई भी परिवार उपहार स्वरूप अपनी बेटी को कुछ भी देता है, तो वह वैवाहिक कार्यक्रम में समाज के सामने नहीं लाएगा। उपहार को सीधे वर के घर भेजा जाएगा।

जिले के सभी गोंड़ एक ही माने जाएंगे। अब राज गोंड़, धू्रव गोंड़ सभी एक होंगे। रोटी-बेटी भी चलेगा। बारात में लोगों की संख्या कम कर दी है, केवल 50 लोग ही बारात में जाएंगे। सगाई में 20 लोग। अंतिम संस्कार के दौरान अब मृतक को दफनाया जाएगा। विषम परिस्थितियों में समाज के निर्णय अनुसार जलाया जा सकता है। समाज के बच्चों के लिए भर्ती परीक्षा की तैयारी करने विशेष कोचिंग कक्षा संचालित की जाएगी। इसके लिए समाज व्यवस्था करेगा।

समाज के महासचिव सिद्दराम मरावी ने बताया कि गोंड़ समाज की रीति नीति, संस्कृति व परंपराएं प्रकृति से जुड़ी हैं। सदियों पहले शवों को दफनाया ही जाता था। अब उस परंपरा को फिर से शुरू करना है क्योंकि अब यह जरूरत है। पेड़ कम से कम कटें, प्रकृति का कम नुकसान हो इसलिए शवों को दफनाना ज्यादा सही होगा। निर्णय समाज के लोगों पर निर्भर है। 

आदिवासी नेता चैतराम राज का कहना है कि आदिवासियों में सिंधुघाटी सभ्यता से ही शवों को दफनाने की परंपरा रही है लेकिन हिंदु धर्म के प्रभाव में आकर कुछ इलाकों में शवों को जलाया जाता है। अब इस फ़ैसले से उन पर भी असर पड़ेगा।


आदिवासी नेता अर्जुन सिंह ठाकुर कहते हैं कि संविधान ने आदिवासियों को रीति रिवाजों के मामले में विशेष अधिकार दिये हैं। प्रदेश में लगभग 89 लाख आदिवासी निवासी करते हैं। इस निर्णय को प्रदेश और देश के आदिवासी मान ले कोई जरूरी नहीं है। कुछ फैसले मानने योग्य हैं। लेकिन शराब पर प्रतिबंध ना लगाकर इसे आबकारी एक्ट के तहत आदिवासियों को विक्रय करने दिया जाना चाहिए। जहां तक जाति तोड़ कर विवाह की बात हुई है यह अच्छी बात है। 

लोक असर के सम्पादक दरवेश आनंद ने बस्तर के इतिहास और संस्कृति पर अपने शोध प्रबंध में कहते हैं आदिवासी रीति रिवाज में दफनाकर मठ बनाने की विधि है। सड़कों के किनारे जंगलों में गोंड, मुरिया तथा माडिय़ा जैसी जनजाति संस्कृतियों में मृतक स्तम्भ बनाये जाते हैं। रोजमर्रे की इस्तेमाल की वस्तु और प्राकृतिक चिन्हों को स्तम्भ में उकेरा जाता है। पारंपरिक वाद्य यंत्राों को बजाकर सभी महिला और और पुरूष शवयात्रा में शामिल होते हैं। आगंतुकों को नया वस्त्र इत्यादि भेंट किया जाता है। ढोलक सहनाई आदि पारम्परिक वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल इस अवसर पर किया जाता है। 

आदिवासी मामलों के जानकार संतोष कुंजाम आदिवासी में वधु मूल्य दिया जाता है दहेज प्रथा नहीं। श्रृंगार का सामान दिया है। शादी कर के लाने को कुल वधु कहा जाता है। एक में शामिल करना अच्छी पहल हो सकती है। दफनाने की व्यवस्था पहले से है। हिंदु एटोलॉजी से आई है। दफनाने के बाद पत्थर और लोक कलाकृति बनाते हैं। पुराने आदिवासी परम्पराओं का अनुपालन कर रहे हैं। 

राज्य के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र बस्तर में आदिवासियों में शवों को दफऩाने की ही परंपरा रही है। लेकिन पूर्वी हिस्से और बीच के मैदानी इलाक़ों में शवों को जलाने की भी प्रथा रही है। आदिवासी गांवों में फर्जी मुठभेड़ों के मामलों में भी जहां जहां शवों को दफनाया गया है वहां ऐसे शवों के कोर्ट के आदेश के बाद दुबारा निकालकर परीक्षण भी किया गया है। 

गोंडवाना दर्शन के पूर्व सह सम्पादक रहे बीएल कोर्राम इस मामले पर कहते हैं संविधान में प्राप्त अधिकार के तहत रूढ़ी परंपरा और आदिवासी दार्शनिक मोतीराम कंगाली के कोया पुनेम दर्शन के अनुसार आदिवासियों में शवों को दफऩाने की ही परंपरा रही है।  शहरी संस्कृति और जगह के अभाव में आदिवासी भी शवों को जलाने लगे हैं। और तो और जला कर उसे गंगा में विसर्जन की परम्परा को अपना रहे हैं लेकिन आदिवासी शवों को दफनाते ही हैं। 

बताते चले कि कवर्धा के सरदार पटेल मैदान में जिला गोंडवाना गोंड़ महासभा  और युवक युवती परिचय सम्मेलन का आयोजन किया था। औंधी के आदिवासी नेता सिया नुरेटी कहते हैं कि गोंड आदिवासी समाज में महिलाएं बराबरी से अंतिम संस्कार में शामिल होती हैं और दफनाने की प्रक्रिया में भी शामिल होती हैं।

कोरबा के आदिवासी शक्ति पीठ के प्रमुख आरएस मारको कहते हैं कि शव का दफनाना आदिवासी मूल संस्कृति का हिस्सा है जबकि जलाना आदिवासी संस्कृति में नहीं आता है। शराब देवी देवताओं को पूजने में प्रयोग में लाया जाता है जबकि इसका दुरूपयोग हो रहा है। इसलिए समय के साथ शराब पर यदि प्रतिबंध लगा दिया जाये तो समाज को उन्नति की ओर ले जाया जा सकता। कोरबा में 15 गोंड़ सभा ने एक महासभा बनाकर सेवक मरावी के नेतृत्व में  समाज में पूजा और शादी को ब्राह्मणों से करवाने पर पूर्णत: प्रतिबंध का फैसला लिया गया है। इसके अलावा समाज के विभिन्न वर्गों में आपस में रोटी बेटी का संबंध बनाने पर जोर दिया गया है। 
 


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