सन्नाटे का कठिन प्रेत
मार्क्स और एंगल्स कृत कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो पर राजनीतिज्ञ यानिस वारोफकिस की भूमिका
अम्बरीशप्रसिद्ध कवि, विचारक और ग्रीस के वित्त मंत्री रहे, राजनीतिज्ञ यानिस वारोफकिस ने मार्क्स और एंगल्स कृत कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो, जिसे हिन्दी में साम्यवादी घोषणापत्र के रूप में जाना जाता है, की सुदीर्घ भूमिका लिखी है। इस भूमिका में वारोफकिस ने वर्तमान समय में घोषणापत्र की प्रासंगिकता को विश्लेषित किया है। मूल अंग्रेजी से अनुवाद अम्बरीश ने किया है - सम्पादक

किसी भी घोषणा पत्र के प्रासंगिक बने रहने के लिए उसे अपने विस्मित कर देने वाले नए विचारों एवं छवियों के साथ मस्तिष्क को संक्रमित करते समय हमारे हृदयों से कविता की तरह संवाद करना चाहिए। इसे चाहिए कि वह हमारे चारों ओर होने वाले विस्मयकारी तकलीफदेह एवं रोमांचकारी परिवर्तनों के सही कारणों को समक्ष रख सके। साथ ही हमारी वर्तमान चुनौतियों के बरक्श संभावनाओं को भी उजागर कर सके।
जिस को पढ़ते हुए हमें यह महसूस हो कि इन सच्चाईयों के तह तक स्वयं पहुँचने में हम निराशाजनक रूप से अपर्याप्त हैं। साथ ही उस अतीत के गतिरोध को पुनः उजागर कर उन विषयों पर से पर्दा उठाना चाहिए जिन्हें हम आज तो सौभाग्य समझ बैठे हैं। अंततः उसमें बीथोवन सिंफनी कि उस शक्ति की दरकार होती है जो हमें भविष्य का अग्रदूत बनने का आग्रह करता है । ताकि अनावश्यक सामूहिक पीड़ा खत्म हो और वास्तविक स्वतंत्रता की शक्ति के अ एहसास हेतु मानवता प्रेरित हो।
लंदन के 46, लिवरपूल स्ट्रीट से फरवरी 1848 में प्रकाशित होने वाले घोषणापत्र के अलावा इन सभी भावनाओं को मजबूती से समाहित करता अन्य दूसरा कोई भी घोषणा पत्र नहीं हुआ। अँग्रेज क्रांतिकारियों द्वारा 'द कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो' अथवा 'कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र' इसी नाम से पहली बार यह प्रकाशित हुआ था । जर्मनी के दो युवाओं द्वारा लिखा गया उनमें से एक 29 वर्ष का दार्शनिक कार्ल मार्क्स था जो हेगेलियन तर्कवाद से प्रेरित था और फ्रेडरिक एंगल्स , मैनचेस्टर मिल का 28 वर्षीय उत्तराधिकारी। राजनीतिक साहित्य के रूप में घोषणा पत्र असाधारण है । इसकी सबसे कुख्यात पंक्तियां जिनमें से शुरुआती एक है ( एक भूत यूरोप को सता रहा है- यह साम्यवाद का भूत है ।) शेक्सपीरियन गुण से लबरेज। ठीक वैसे ही जैसे हैमलेट को अपने पिता के भूत से सामना करना पड़ा था।
पाठक यह कल्पना करने को मजबूर हो जाता है - "क्या मुझे इतिहास के अप्रतिरोध्य ताकतों द्वारा थोप दिए दिए गए दुर्भाग्यजनक हालातों के कष्टदायक तीरों को झेलने के आदेश का सामना करना चाहिए या मैं इन ताकतों में शामिल हो जाऊं, यथास्थिति के खिलाफ हथियार उठाऊं। इसका विरोध करते हुए एक नई बहादुर दुनिया की शुरुआत करूं।"
मार्क्स और एंगेल्स के तत्कालीन पाठकों के लिए यह कोई अकादमिक दुविधा का मसला नहीं था जिस पर यूरोप के सैलूनों और गुटों में बहस होती हो। घोषणापत्र कार्रवाई का आह्वान था। और इस भूतिया आह्वान पर ध्यान देने का मतलब प्रायः उत्पीड़न या कुछ मामलों में कठिन कारावास होता था। 21वीं शताब्दी के दहलीज पर खड़ी युवा पीढ़ी आज इसी तरह के दुविधा का सामना कर रही है - " एक स्थापित व्यवस्था के अनुरूप ढलें जो कि ढह रही है और खुद को पुनः उत्पन्न करने में असमर्थ है? अथवा नए तरीकों से काम करने , खेलने और साथ मिलकर रहने के लिए व्यवस्था का विरोध करें ? चाहे इसके लिए व्यक्तिगत रूप से खासी कीमत ही क्यों न चुकानी पड़े।"
भले ही कम्युनिस्ट पार्टियां राजनीतिक परिदृश्य से लगभग पूरी तरह गायब हो गई हैं फिर भी साम्यवाद का भूत जो घोषणा पत्र के माध्यम से चला रहा है उसका चुप रहना कठिन साबित हो रहा है।
स्वादिष्ट /मज़ेदार/रोचक विडंबना
क्षितिज से परे देखना किसी भी घोषणापत्र की महत्वाकांक्षा होती है। लेकिन अपने समय का सटीक विवेचन करने में जो सफलता मार्क्स और एंगेल्स को मिली वह अभूतपूर्व है। डेढ़ सौ वर्षों बाद भी विश्व के अंतर्विरोधों और विकल्पों का विश्लेषण करने में घोषणा पत्र आज अद्भुत रूप से सफल है । 1840 के समय पूंजीवाद अभी जन्म ले रहा था ।वह स्थानीय, कमजोर और टुकड़ों में विभक्त था। किंतु फिर भी मार्क्स एवं एंगेल्स उसकी गहरी पड़ताल करते हैं और हमारे समय में भूमंडलीकृत व्यावसायिकृत, बख्तरबंद तथा एकाधिपत्य जमाते हुए पूँजीवाद को पहले से ही भाप रहे थे। वैश्वीकरण नामक इस प्राणी का जन्म 1991 के बाद हो रहा था और ठीक इसी समय व्यवस्थाएं मार्क्सवाद की मृत्यु और इतिहास के मृत्यु की घोषणाएं कर रही थीं।
मुझे अच्छी तरह याद है कि 1970 के आरंभ में वामपंथी अर्थशास्त्रियों ने भी किस तरह घोषणापत्र के इस आधारभूत भविष्यवाणी को चुनौती दी थी कि पूंजी हर जगह फैल जाएगी।अपनी जड़ें जमा लेगी और प्रत्येक जगह गठजोड़ स्थापित कर लेगी। दारूण यथार्थ यह कि जिन्हें उस समय तीसरी दुनिया के देश कहा गया उनकी तरफ ध्यान दिलाते हुए उनका तर्क था कि यूरोप अमेरिका और जापान के मुख्य नगरों में फैलने से पहले ही यहाँ पूँजी की चमक खो चुकी थी।
व्यावहारिक तौर पर वे सही थे। यूरोप अमेरिका और जापान की बहुराष्ट्रीय कंपनियां जो अफ्रीका, एशिया और लातिनी अमेरिका के बाहरी इलाकों में कार्यरत हैं, उन्होंने अपने को उपनिवेशों के संसाधनों को शोषित करने वाले की भूमिका में सीमित कर लिया और इस तरह वहाँ पूँजीवाद अपने प्रसार में असफल रहा। इन देशों में पूंजीपतियों का विकास (सर्वाधिक बर्बर के साथ ही समस्त देशों को सभ्य बनाने की क़वायद) से ओत-प्रोत करने के बजाय, उन्होंने तर्क दिया कि तीसरी दुनिया में विदेशी पूँजी विकासशील देशों को पुनर्विकास के रास्ते पर ला रही है।
यह कुछ ऐसा था मानो घोषणापत्र ने प्रत्येक कोने में पूँजी के फैल जाने की क्षमता पर बहुत विश्वास जताया था। मार्क्स से सहानुभूति रखने वाले अर्थशास्त्रियों समेत अधिकतर ने घोषणा पत्र की भविष्यवाणी पर संदेह व्यक्त किया कि " विश्व बाजार का शोषण प्रत्येक देश में उत्पादन और उपभोग के वैश्विक स्वरूप का मार्ग प्रशस्त करेगा ।"
भले ही देर लगी पर यह बात साफ हो गई कि घोषणापत्र सही था। भविष्यवाणी की पुष्टि, सोवियत संघ के विघटन और दो करोड़ चीनी एवं भारतीय कामगारों को पूँजीवादी बाजार में झोंक दिए जाने से हुई। असल में, पूँजी के पूरी तरह वैश्विक होने के लिए सबसे पहले वही हुकूमतें टूटकर अलग हुईं जिन्होंने घोषणापत्र के प्रति निष्ठा की शपथ ली थी। क्या इतिहास के पास इससे भी अधिक मजेदार विडंबना है ?
हमारे वर्तमान का इतिवृत्त
कोई भी आज घोषणापत्र पढ़ते हुए वर्णित संसार की तस्वीर देखकर आश्चर्यचकित होगा कि यह तो हमारा अपना संसार है जो प्रौद्योगिकी नवाचार के कगार पर काँपते हुए लड़खड़ा रहा है। 'घोषणापत्र' के समय भाप इंजन ने सामंती जीवन के लय और ढर्रे के समक्ष बड़ी चुनौती प्रस्तुत की थी। किसान वर्ग मशीनों के धुरी एवं पहियों में बह गए और मालिकों, कारखानों के स्वामियों एवं व्यापारियों के एक नए वर्ग ने धीरे-धीरे अभिजात्य वर्ग के रूप में समाज पर नियंत्रण कर लिया ।
अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं स्वचालन ने एक विध्वंसकारी भय का धुँधलका खड़ा कर दिया है जो समस्त स्थाई और पुख़्ता संबंधों को मिटा देने का वादा करता है । "उत्पादन के साधनों में निरंतर क्रांतिकारी बदलाव... होने पर घोषणापत्र दावा करता है- 'समाज के सभी संबंधों के बदल जाने, उत्पादन में निरंतर आमूल परिवर्तन लाने, सभी प्रकार के सामाजिक परिस्थितियों में लगातार व्यवधान तथा कभी समाप्त न होने वाली अनिश्चितता एवं उपद्रवों के बारे में।
हालाँकि मार्क्स और एंगेल्स के लिए ये विघटन जश्न का कारण था। जो मानवता को अंतिम रूप से उठाने के लिए उत्प्रेरक का कार्य करता है जिससे वो उस पूर्वग्रह को उखाड़ फेंकता है जो पूर्वाग्रह उस मशीन के मालिकों और मशीन बनाने, चलाने और उसके साथ काम करने वाले लोगों के बीच बड़े विभाजन को हवा देता है। घोषणा पत्र में प्रौद्योगिकी के प्रभाव पर वे लिखते हैं कि "जो भी ठोस है सब हवा में पिघल जाएगा, जो कुछ पवित्र है अपवित्र हो सकता है और अंत में व्यक्ति शांतचित होकर अपने जीवन के यथार्थ को और इससे अपने संबंधों का सामना करने पर मजबूर हो जाएगा।
हमारे पूर्वग्रहों को बहुत कठोरता से हवा में उड़ाने और प्रौद्योगिकीय परिवर्तन द्वारा मिथ्या निश्चितताओं को पैदा कर हमें बाध्य किया जा रहा है । बलपूर्वक या चमत्कार पूर्ण ढंग से हमें एहसास कराया जा रहा है कि हम एक दूसरे से कितने दयनीय संबंधों द्वारा जुड़े हुए हैं।
आज हम इसका हिसाब-किताब, स्याही की नदियां बहाने में और 'वैश्वीकरण से ऊपजे असंतोष' पर वाद-विवाद के बिंदुओं में देख सकते हैं। भूमंडलीकरण ने कैसे अरबों लोगों को परिवर्तित किया! इसका जश्न मनाते हुए सापेक्ष रूप से और गरीब हुई जनता से लेकर बड़े-बड़े पश्चिमी समाचार पत्र , हॉलीवुड की हस्तियां , सिलिकॉन वैली के उद्यमी, बिशप और यहां तक कि वारेन बफेट की संपत्ति के फाइनेंसर तक सभी इसके अपेक्षा से कम प्रभाव का शोक मनाते हैं । इनमें से कुछ हैं- असहनीय असमानता, बेशर्म लालसा ,जलवायु परिवर्तन और बैंकरों तथा धनाढ्य वर्ग द्वारा हमारे संसदीय लोकतंत्रों का अपहरण।
घोषणापत्र के पढ़ने वालों को इन पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए । यह तर्क करता है कि संपूर्ण समाज अधिक से अधिक बड़े विरोधी शिविरों में बँटता जा रहा है-दो बड़े वर्गों में - जो सीधे एक दूसरे के विरुद्ध खड़े हो रहे हैं।जैसे-जैसे उत्पादन मशीनीकृत होगा और लाभांश मशीन का होता जाएगा, उनके स्वामी हमारी सभ्यता को चलाने वाले हो जाएंगे । तब समाज गैरश्रमिक शेयरधारकों एवं गैरस्वामी मजदूर-श्रमिकों के बीच विभाजित हो जाता है। जहाँ तक मध्यवर्ग का सवाल है यह एक कमरे में बंद डायनासोर है जो विलुप्ति के कगार पर है।
ठीक उसी समय, अतिअमीर लोग दूसरे अन्य लोगों के जीवन को असुरक्षित वेतन एवं गुलामी के संकट में डूबते हुए देखकर अपराधबोध एवं तनाव से ग्रस्त हो जाते हैं। मार्क्स और एंगेल्स को पूर्वाभास हो गया था कि यह सर्वोच्च शक्तिशाली अल्पसंख्यक वर्ग ऐसे ध्रुवीकृत समाजों पर 'शासन करने में अक्षम साबित होंगे क्योंकि वे गुलाम मजदूरों को एक भरोसेमंद अस्तित्व की गारंटी देने की स्थिति में नहीं होंगे । अपने घेरेबंद समुदायों के पिंजरे में कैद वे स्वयं को अवसादग्रस्त पाते हैं और अपने धन का आनंद नहीं ले पाते। उनमें से कुछ जो अपने दीर्घकालिक स्वार्थ को समझने हेतु पर्याप्त स्मार्ट हैं वे यह पहचान करते हैं कि ' उपलब्ध बीमा नीतियों में से कल्याणकारी राज्य सर्वोत्तम है किंतु अफसोस की बात यह है कि एक सामाजिक वर्ग के रूप में बीमा के प्रीमियम की कंजूसी करना उनके स्वभाव में होगा और वह अपेक्षित करों के भुगतान से बचने के लिए अथक प्रयास करेंगे , इस बात की घोषणा पत्र व्याख्या करता है।
क्या यह वही बात नहीं है जो हमें मालूम चली? अति अमीर स्थाई रूप से असुरक्षित असंतुष्ट गुट में हैं। निरंतर क्लीनिक में आ जा रहे हैं, अनथक मनोविज्ञान की शरण ले रहे हैं और उद्यमिता गुरुओं के चक्कर में डूब रहे हैं। इसी दौरान अन्य सारे लोग दोनों जून की रोटी , बच्चों की फीस जुटाने के लिए संघर्षरत हैं। एक से दूसरे क्रेडिट कार्ड से काम चलाते हैं या अवसाद से लड़ते हैं । वे दिखावा करते हैं कि उनका जीवन चिंता मुक्त है। वे दावा करते हैं कि जो उन्हें पसंद है वही करते हैं या कोई काम भी इसीलिए करते हैं कि उन्हें पसंद है। जबकि सच्चाई यह है कि वह सोने के लिए भी रोते हैं यह मानते हुए कि वे चिंता से उपजी अनिद्रा का प्रबंधन कर लेंगे।
अच्छा करते हुए दिखने वाले, व्यवस्था के राजनेतागण एवं सुधाररत अकादमिक अर्थशास्त्री सभी इस स्थिति के प्रति एक ही तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। इसके तहत वे कारणों( - मशीनों भूमि, संसाधनों आदि असमान संपत्ति अधिकारों के कारण शोषण) की उपेक्षा करते हुए लक्षणों (जैसे की आय की असमानता) की तीखी निंदा करते हैं। यह कहने में कोई आश्चर्य नहीं कि हम गतिरोध की अवस्था में हैं। निराशा के उस प्रकार में जी रहे हैं जिसमें भीड़ की सबसे बुरी प्रवृत्ति हावी रहती है और जिसमें लोकप्रिय लोगों के हित कोर्ट से ही पूरा होते हैं।
उन्नत प्रौद्योगिकी के विकास के साथ ही हम उस क्षण के बेहद करीब हैं जब हमें तय करना चाहिए कि हम एक दूसरे से सभ्य एवं तार्किक तरीके से कैसे जुड़ें। हम अब और कार्य की अनिवार्यता के पीछे छुप नहीं सकते। दमनकारी सामाजिक मानदंड इसे बढ़ाता है। 21वीं सदी के पाठकों को घोषणा पत्र इस गड़बड़ी को देखने का अवसर प्रदान करता है। साथ ही बहुसंख्यक जनता को नई सामाजिक व्यवस्था से उपजे असंतोष से बचने के उपायों की पहचान करने की सलाहियत देता है। जिसमें प्रत्येक का स्वतंत्र विकास सभी के मुक्त विकास हेतु जरूरी शर्त है। यद्यपि इस लक्ष्य को हासिल करने की कार्ययोजना इसमें वर्णित नहीं है फिर भी घोषणा पत्र हमेशा उम्मीदों के स्रोत के रूप में मौजूद है जिसे खारिज नहीं किया जा सकता।
इतिहास के तेरह शब्दों का सिद्धांत
घोषणापत्र 1848 की तरह ही अपने पाठकों को आज भी उसी शक्ति से उत्तेजित, उत्साहित एवं शर्मसार करता है तो इसका कारण यह है कि सामाजिक वर्गों के बीच संघर्ष वही पुराना है। वास्तव में मार्क्स एवं एंगेल्स के लिए समस्त मानव इतिहास की हिंसा और अराजकता के निचोड़ को तेरह अधिक साहसी शब्दों में रखा जा सकता है " अब तक विद्यमान सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का ही इतिहास है"।
सामंती अभिजात्य वर्ग और धर्म तंत्र से लेकर औद्योगिक साम्राज्य एवं राष्ट्र राज्यों तक प्रौद्योगिकी में होने वाले लगातार क्रांतिकारी बदलाव एवं मौजूदा वर्ग की चली आ रही परंपरा के बीच सतत संघर्ष ही इतिहास के चक्र में दर्ज है।टकराने वाले सामाजिक वर्ग में जैसे बदलाव आते हैं ठीक वैसे ही सामाजिक तकनीक में प्रत्येक व्यवधान के साथ ही हमारे भीतर का संघर्ष अपना रूप बदल लेता है। पुराने वर्ग मर खप जाते हैं और अंततः केवल दो वर्ग ही बचे रहते हैं - एक वह वर्ग जिसके पास सब कुछ है और दूसरा वह जिसके पास कुछ भी नहीं। बुर्जुआ वर्ग और सर्वहारा।
इस विकट परिस्थिति को हम स्वयं आज ही पाते हैं जबकि हम मालिकों और गैर मालिकों के बीच की खाई समेत सभी वर्गों के बीच के भेदों को कम करने के लिए पूंजीवाद के शुक्रगुजार हैं; मार्क्स और एंगेल्स चाहते थे कि हम ये महसूस करें कि पूंजीवाद प्रौद्योगिकी के परिणामों से बचने के लिए पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हुआ है । हमारा पूंजीवादी समाज संक्रमण की मिश्रित अवस्था में है । मेंढक के जैसा सामाजिक जिसे अपनी सही तरीके से सांस लेने की क्षमता का पूर्ण विकास करने के लिए गलफड़ों को छोड़ देना चाहिए। यह हमारा कर्तव्य है कि इन गलफड़ों ( उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व वाली आदिम धारणा) को फाड़ दें और परिवर्तनकामी हाथों (जिसमें रोबोट्स,भूमि और संसाधनों का समाजीकरण होना चाहिए) को मजबूत करना चाहिए।
वर्तमान में जब इस आदिम श्रम अनुबंध से बँधी नई प्रौद्योगिकी समाज में सामने आ रही है तो वो बड़ी मात्रा में विभेद पैदा कर रही है। घोषणापत्र के अविस्मरणीय शब्द हैं कि ' कोई समाज जिसने उत्पादन और विनिमय के ऐसे विशाल साधनों को गढ़ा है वह उस जादूगर के समान है जिसने अपने मंत्रों से नीचे की दुनिया की शक्तियों को बुला तो लिया है पर अब वह उन शक्तियों को नियंत्रित करने में अक्षम है।
जादूगर हमेशा सोचेगा कि उसके ऐप्स, सर्च इंजन, रोबोट्स और जेनेटिकली इंजीनियर्ड बीज सभी के लिए धन और खुशियां लाएंगे। किंतु जब ये समाज में आए तो दिहाड़ी मजदूरों और मालिकों में बँट गए। ये तकनीकी चमत्कार मजदूरी और कीमतों को उस स्तर तक ले जाएंगे जिससे अधिकांश व्यवसायों को कम लाभ पहुंचेगा। सही मायनों में यह बड़े टेक, फार्मा कंपनियों एवं उन चंद निगमों के लिए बहुत फायदेमंद हैं जिनका असाधारण रूप से बड़े राजनीतिक एवं आर्थिक शक्तियों पर नियंत्रण है।
यदि हम नियोक्ता और कर्मचारी के बीच श्रम अनुबंधों का होना जारी रखते हैं तब निजी संपत्ति का अधिकार शासित होगा और यह पूँजी को अमानवीय छोर तक ले जाएगा। हम केवल जन उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व को खत्म करके तथा नई तकनीकी के साथ तालमेल बिठाते हुए एक नए तरह के समान मालिकाना हक के द्वारा इस व्यवस्था को प्रतिस्थापित करके असमानता को खत्म कर सकेंगे ,और सामूहिक खुशी को पा सकेंगे।
मार्क्स और एंगेल्स के तेरह शब्दीय ऐतिहासिक सिद्धांत के अनुसार कामगार एवं मालिक के बीच गतिरोध की हमेशा गारंटी दी गई है। घोषणापत्र यह भी कहता है कि पूँजीपति वर्ग का पतन और सर्वहारा की जीत भी समान रूप से सुनिश्चित है। अभी तक इतिहास ने इस भविष्यवाणी को रद्द ही किया है जिसने घोषणापत्र के अंतर्निहित विश्लेषण के बारे में गंभीर संदेह उत्पन्न कर दिया है। किंतु आलोचक यह भूल गए हैं कि प्रचार के किसी योग्य अंश की ही तरह घोषणापत्र भी जानबूझकर दृढ़तापूर्वक उम्मीद को प्रस्तुत करता है। ठीक उसी तरह जैसे ट्राफलगर के युद्ध से पहले अपने सैनिकों को लामबंद करते हुए लॉर्ड नेल्सन यह घोषणा करते हैं कि इंग्लैंड उनसे अपेक्षा रखता है कि वे अपना कर्तव्य करें । यद्यपि कि ऐसा वे करेंगे इस बात पर उसे संदेह है । घोषणापत्र सर्वहारा वर्ग से आदर्शात्मक अपेक्षा रखता है कि वे अपने लिए अपने कर्तव्यों को पूरा करेंगे।
घोषणापत्र उन्हें प्रेरित करता है कि वे संगठित हों और एक दूसरे को मजदूरी- गुलामी के बंधन से मुक्त करें और इस प्रक्रिया में होने वाली बर्बादी से समाज को छुटकारा दिलाएं। क्या वे ऐसा करेंगे ? मौजूदा स्वरूप में यह असंभव दिखता है। लेकिन एक बार फिर हमें 1990 के दशक में होने वाले वैश्वीकरण का इंतजार करना होगा जब घोषणापत्र के हिसाब से पूँजी की क्षमता को पूरी तरह सही ठहराया जा सके। संभव है कि ऐसा ना हो कि नया विश्व घोषणापत्र पत्र के पूर्वानुमान के अनुसार ऐतिहासिक भूमिका निभाने से पहले ही तेजी से बढ़ते हुए सर्वहारा वर्ग को और अधिक समय की जरूरत पड़े ? निस्संदेह ही यह कोई नहीं जानता कि इस नाटक का अंत कैसे होगा ।
किंतु अभी जब तक न्यायाधीश बाहर है मार्क्स और एंगेल्स हमें बताते हैं कि यदि हम क्रांति की लफ़्फ़ाजी से डरते हैं अथवा हम अपने आपको कर्तव्यपथ से भटकाते हैं तब हम अपने आप को एक लंबवत सर्पिलाकार टनल में पाते हैं जिसमें पूँजी मानव आत्मा को संतृप्त और प्रक्षालित करते हुए फीका बना देती है। घोषणापत्र के अनुसार हम केवल एक चीज के बारे में निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि जब तक पूँजी का समाजीकरण नहीं होगा हम विकास के दुःस्वप्न में पिसने को अभिशप्त रहेंगे।
अपर्याप्त चिंतनशीलता
दुःस्वप्न के विषय पर संशयवादी पाठक उत्तेजित होंगे कि एकाधिपत्यवादी सत्ता को वैधता देने और गुलाग गॉर्ड( व्लादीमीर लेनिन के आदेश से स्थापित जबरन श्रम शिविरों के सुरक्षा प्रहरी ) की भावना को चुराने में घोषणा पत्र की खुद की सहभागिता क्या है? निश्चित रूप से हमने देखा है कि घोषणापत्र के संदेश किस तरह बाहर बरते जाते हैं। रक्षात्मक प्रतिक्रिया देने के बजाय यह पूछा जा सकता है कि वॉल स्ट्रीट की ज्यादतियों के लिए एडम स्मिथ पर कोई दोषारोपण नहीं करता, अथवा स्पेनिश न्यायिक जांच हेतु न्यू-टेस्टामेंट को कोई कटघरे में नहीं खड़ा करता।
हम अनुमान लगा सकते हैं कि घोषणापत्र के लेखक इस आरोप का कैसे जवाब देते। मैं मानता हूं कि पूर्वग्रह के लाभ से मार्क्स और एंगेल्स अपने विश्लेषण में एक महत्वपूर्ण त्रुटि स्वीकार करना चाहेंगे और वह है अपर्याप्त स्वतुल्यता। कहने का तात्पर्य यह है कि पर्याप्त विचार प्रस्तुत करने में वे नाकाम रहे और जिस संसार का वे विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे थे उस संसार का खुद अपने विश्लेषण पर पड़ने वाले प्रभावों पर एकदम चुप्पी साध जाते हैं । पाठकों को उनकी उदासीनता से उबारने के इरादे से घोषणा पत्र में समझौता न करने वाली भाषा में एक दमदार कहानी सुनाई।
मार्क्स और एंगेल्स की दूरदृष्टि यह देख पाने में असफल रही कि शक्तिशाली निर्देशित पाठों के पास शिष्य, अनुगामी यहां तक कि पौरोहित्य की प्रवृत्ति है। और यह भी कि इस वफादारी का इस्तेमाल करके घोषणापत्र में निहित सत्य का उपयोग वे अपने लाभ के लिए करने लगेंगे। इसके साथ ही वह अन्य साथियों को गाली देने लगें, अपना खुद का शक्तिशाली आधारभूमि बना लें, प्रभावित करने की हैसियत बना लें, बिस्तर का सहारा लेकर प्रभावित करने वाले विद्यार्थियों को जुटा लें , पोलितब्यूरो पर नियंत्रण कर लें और जो कोई भी विरोध करें उसे 'गुलाग' में फेंक दें। इसी तरह मार्क्स और एंगेल्स पूंजीवाद पर अपने लेखन के प्रभाव का स्वयं अनुमान लगाने में विफल रहे। इस हद तक कि सोवियत यूनियन इसके यूरोपीय पिछलग्गुओं, फिदेल कास्त्रो के क्यूबा, टीटो की युगोस्लाविया और कई पश्चिमी समाजवादी लोकतांत्रिक सरकारों के निर्माण में घोषणापत्र ने सहायता दी।
बावजूद इसके इन विकासों ने कोई श्रृंखला प्रतिक्रिया नहीं शुरू की जिससे घोषणापत्र के पूर्वानुमान और विश्लेषण से निराशा हुई। रूस की क्रांति और फिर दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्यवाद के डर ने पूंजीवादी सत्ताओं को बाध्य किया कि वे पेंशन योजनाएं, राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवाएँ यहां तक कि यह विचार भी अंगीकार करें कि धनी गरीबों के लिए भुगतान करें और छोटे बुर्जुआ विद्यार्थियों के लिए उदारवादी विश्वविद्यालयों का निर्माण करें। इस बीच सोवियत संघ के प्रति तीव्र शत्रुता ने उन्माद खड़ा कर दिया और एक भय का माहौल बनाया। जोसेफ स्टालिन एवं पोल पॉट जैसे व्यक्तियों के लिए विशेष रूप से बहुत उर्वर साबित हुआ। मेरा मानना है कि कम्युनिस्ट पार्टी पर घोषणापत्र के पड़ने वाले प्रभावों का पूर्वाभास ना देने के कारण मार्क्स और एंगेल्स को पछतावा होता।
जिस द्वंदात्मक ता को वे विश्लेषित करना पसंद करते हैं उसी की उपेक्षा करने पर वे खुद को सजा दे रहे होंगे । वह द्वंदात्मकता है कि कैसे श्रमिकों के राज्य पूंजीवादी राज्य की आक्रामकता से लड़ते हुए खुद तेजी से अधिनायकवादी सत्ता में परिवर्तित होते जाएंगे और कैसे साम्यवाद के भय से प्रतिक्रिया स्वरूप पूंजीवादी राज्य और अधिक सभ्य होते जाएंगे ।निश्चित रूप से वे लेखक धन्य होते हैं जिनकी त्रुटियां उनके शब्दों की शक्ति के कारण होती है और भी अधिक धन्य हैं वे जिनके त्रुटियां अपने आप ठीक हो जाती है हमारे वर्तमान समय में घोषणापत्र से प्रेरित मजदूरों के राज्य करीब-करीब चले गए हैं और कम्युनिस्ट पार्टियां भंग या अस्त-व्यस्त हो गई हैं । घोषणा पत्र से प्रेरित सत्ताओं के साथ प्रतिस्पर्धा से मुक्त वैश्वीकृत पूंजीवाद ऐसा व्यवहार कर रहा है मानो वो घोषणा पत्र द्वारा वर्णित सर्वोत्तम संसार को निर्मित करने के प्रति दृढ़ संकल्पित हो।
विकल्प तो है ही
आज भी जो चीज घोषणा पत्र को वास्तव में प्रेरणादायी बनाता है वह है इसकी हमारे लिए अनुशंसाएं जो यहां तक भी साथ थीं और अब भी हैं। एक ऐसे संसार में जहां हमारा जीवन एक ऐसी ब्रह्मांडीय ऊर्जा से लगातार आकार बदलता जा रहा है जिसमें प्रत्येक सीमाओं, बंधनों और स्थितियों को तोड़ने की ही नीति अपनाई। यही उसकी सार्वभौमिकता है। यही उसकी सीमा है और केवल इसी से वह बँधा हुआ है। उबेर चालकों और वित्त मंत्रियों से लेकर बैंकिंग अधिकारियों और अत्यधिक गरीब जनता तक हम सभी इसी उर्जा (ताकत )से अभिभूत महसूस करने हेतु क्षमा किए जा सकते हैं । पूँजीवाद की पहुँच इस कदर व्यापक हो गई है कि कभी-कभी बिना इसके संसार की कल्पना असंभव सी प्रतीत होती है। टी आई एन ए (Tina-There is no alternative) के अटूट जादू में गिरफ्त होने की भावना, नपुंसक होने की तरफ एक छोटा कदम है यह ग्रंथि कि 'इसका कोई विकल्प नहीं है '।
किंतु, आश्चर्यजनक रूप से (जैसा कि घोषणापत्र दावा करता है) जिस समय हम टी आई एन ए के आगे घुटने टेकने वाले होते हैं ठीक उसी समय प्रचुर मात्रा में विकल्प उठ खड़े होते हैं। इस मोड़ पर हमें बढ़ते हुए असमानता की भर्त्सना करने अथवा हमारी लोकतांत्रिक संप्रभुता के विलुप्त होने पर सतर्कता या इन सभी अन्याय पर उपदेश की आवश्यकता बिल्कुल नहीं है। न ही हमें पेट पकड़ कर भागने वाले हताशाजनक कृत्यों को करना चाहिए: ना किसी पूर्व आधुनिक या तकनीकी पूर्व राज्य की तरफ लौटने हेतु रोने की आवश्यकता है जहाँ हम राष्ट्रीयता की भावना का उत्थान कर सकें। इन आशंकाओं और समर्पण के समय घोषणापत्र जिन तत्वों को आगे बढ़ाता है वह है पूँजीवाद और उसकी बुराइयों का तार्किकता के शीतल किंतु प्रखर प्रकाश में साफ समझ और उसका तटस्थ मूल्यांकन।
घोषणापत्र यह तर्क देता है कि पूंजीवाद के साथ समस्या यह नहीं है कि यह बहुत अधिक तकनीक का उत्पादन करता है या यह अनुचित है। पूंजीवाद की असल समस्या है कि यह अतार्किक है। केवल भंडारण के लिए ही संचय करके पूँजी सफलता पूर्वक अपना प्रसार बढ़ता जा रहा है जिसके फलस्वरूप मानव कामगारों को बहुत कम पारिश्रमिक पर मशीन की तरह काम करना पड़ रहा है। जबकि रोबोटों को इस तरह के सामान के उत्पादन के लिए तैयार किया जाता है जिनको खरीदना आम कामगारों के बस की बात नहीं और रोबोटों को उन सामानों की कोई आवश्यकता नहीं। पूंजी ने जिन शानदार मशीनों को उत्पन्न किया उनके तार्किक इस्तेमाल में उसे विफलता मिली। जिसके कारण समस्त पीढ़ियों को अभाव ,जर्जर जीवन, बेरोजगारी और अवकाशहीनता का दंश झेलना पड़ा। यहाँ तक कि पूंजीपति भी क्रोधी स्वयंभू में परिवर्तित हो रहे हैं।
घोषणापत्र का तर्क है कि वे इस स्थाई डर में जीते हैं कि यदि वे अपने साथी मनुष्यों को उपभोक्ता में बदलना बंद कर देंगे तो उनके पूँजीपति बनने का क्रम रुक जाएगा। वे निम्नतम सर्वहारा की बढ़ती हुई तादात में शामिल हो जाएंगे। यदि पूँजीवाद के अन्यायपूर्ण प्रतीत होने के पीछे कारण यह है कि ये अमीर और गरीब सबको गुलाम बनाता है, मानव और प्राकृतिक संसाधनों को बर्बाद कर देता है, 'उत्पादन की यही धारा जो अकूत दौलत को चतुराई से निकालता है वह औद्योगिक पैमाने पर गहरे विषाद एवं असंतोष को भी पैदा करता है' तो घोषणापत्र के हिसाब से हमारा पहला कार्य तो यह होना चाहिए कि इस सर्व विजेता ऊर्जा की खुद को कमजोर बनाने वाली कड़ी की पहचान करें। पत्रकारों द्वारा यह प्रश्न पूछे जाने पर कि आज पूंजीवाद के लिए सबसे बड़ा खतरा कौन है? या क्या है ? मैं यह जवाब देकर उनकी उम्मीदों को धराशायी कर देता हूँ कि पूँजी ही सबसे बड़ा खतरा है। बेशक इस विचार को मैं दशकों से घोषणापत्र से ही चुरा रहा हूँ।
यह कहना कि पूँजीवाद के ऊर्जा को नष्ट करना न तो संभव है और ना ही वांछनीय असल में पूँजी के विकास की रफ्तार को तेज करने की चाल है (ताकि यह वातावरण से गुजरते हुए उल्का पिंड की तरह जलने लगे)। जबकि दूसरी तरफ (तार्किक, सामूहिक कार्रवाई के द्वारा) हमारी मानवीय भावनाओं के परे जाने वाली प्रवृत्ति का प्रतिरोध करना है । संक्षेप में घोषणा पत्र की सिफारिशें यह है कि हम पूंजीवाद के परिणामों को सीमित करते हुए और इसके समाजीकरण की तैयारी के साथ पूंजी को इसकी सीमा तक आगे बढ़ाएं। हमें और अधिक रोबोट्स ,बेहतर सौर पैनल, त्वरित संचार और परिवहन नेटवर्क की आवश्यकता है।
लेकिन समान रूप से ही हमें राजनीतिक तौर पर संगठित होने की भी आवश्यकता है ताकि हम कमजोरों की रक्षा कर सकें, बहुतायत को सशक्त बना सकें और पूँजीवाद के दुष्परिणामों को पलटने के लिए जमीन तैयार करना होगा। व्यावहारिक रूप में देखा जाए तो इसका अर्थ है कुछ कम आधुनिक अवस्थिति हेतु वापसी के सभी मांगों की अवहेलना करना कर टीआई एन ए का ईलाज करना है जिसकी वो हकदार है । पहले के पूँजीवादी स्वरूप में जीवन में कुछ भी नैतिक नहीं था। टीवी दिखाता है कि डाउनटन एब्बे जैसे शिष्ट अतीत के लिए एक आकलित नॉस्टैल्जिया हेतु बड़े पैमाने पर किया गया निवेश हमें इस बात की खुशी देता है कि वह अपने ही युग में रह रहे हैं। साथ ही जब हम यह जप रहे होते हैं कि 'मानवता के पूर्व इतिहास का अंत इतना शीघ्र नहीं हो सकता' तब वे हमें परिवर्तन का त्वरक और वाहक बनने हेतु प्रोत्साहित कर रहे होते हैं।
अनुवादक आर-23, बोरसी, दुर्ग, छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं।
Add Comment