म्यूनिख में खुला मोर्चा, भारत में खलबली

मोदी सरकार का सोरोस के प्रति हमलावर रूख, लगता है उनसे जुड़ी संस्थाओं पर जल्द जांच और प्रतिबंध लगेगी

पुष्परंजन, ईयू-एशिया न्यूज़ के नई दिल्ली संपादक

 

इवाल्ड हिनरिश फोन क्लाइस्ट श्मेंजिन को आप केवल प्रकाशक मत समझिए। यह वही सैन्य अधिकारी थे, जिन्होंने 20 जुलाई 1944 को तानाशाह एडोल्फ हिटलर की हत्या की योजना बनाई थी। अवकाश प्राप्त के बाद वह प्रकाशक बन गए। 8 मार्च 2013 को इवाल्ड हिनरिश 90 साल की उम्र में अपने शहर म्यूनिख से सदा के लिए सिधार गये। शीत युद्ध के कालखंड में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन ( एमएससी ) को ‘वेरकुंडे कांफ्रेंस‘ के नाम से जाना जाता था। उस समय यह सम्मेलन पश्चिमी जर्मनी और अमेरिका के बीच विशेष संवाद बनाये रखने का एक मंच था। अमेरिका को यूरोप के सबसे महत्वपूर्ण इलाके में अपना दबदबा बनाये रखना था, चुनांचे म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस (एमएससी) उसकी कूटनीति का अहम हिस्सा बना।

जर्मन एकीकरण और बर्लिन की दीवार ढहने के बाद जर्मन चांसलर कार्यालय के पूर्व उप प्रमुख होर्स्ट टेलचिक की सदारत में इस सम्मेलन की पहुंच मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ-साथ एशिया तक बढ़ गई। म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन का थोड़ा और वैचारिक विस्तार हुआ, परिणाम स्वरूप ‘एमएससी‘ अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के सबसे अहम मंचों से एक बन चुका है, जिसमें प्रत्येक साल चुनिंदा देशों के शासन प्रमुख और रक्षा विशेषज्ञ हिस्सा लेते हैं।

2009 में जर्मन राजनयिक वोल्फगांग इशिंगर ने अपने एक आलेख में लिखा था, ‘हमें अमेरिकी एक मंच की आवश्यकता थी, ताकि बर्लिन अपनी सुरक्षा सरोकारों की ओर वॉशिंगटन का ध्यान आकृष्ट कर सके।‘ यह एक महत्वपूर्ण मंच है, तभी 2019 में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अपने पहले विदेश दौरे के लिए म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन को चुना था।

यह सम्मेलन निजी तौर पर आयोजित किया जाता है, इसलिए इसे जर्मन सरकार द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम नहीं मानना चाहिए। फिर भी ‘एमएससी‘ में अमेरिकी वर्चस्व दिखता है, जिसकी वजह से यह सम्मेलन मास्को से अदावत का अधिकेंद्र बनता रहा है। 2007 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस सम्मेलन में चेतावनी दी थी, कि अगर अमेरिका ने पूर्वी यूरोप में मिसाइल कवच प्रणाली लगाई तो इससे हथियारों की होड़ शुरू हो जाएगी। 17 साल बाद वही हुआ। आज तीन दिवसीय सुरक्षा सम्मेलन में यूक्रेन युद्ध, बहस का मुख्य विषय है।

यह पहला अवसर है, जब रूस का बहिष्कार किया गया है। रूस के किसी भी प्रतिनिधि को अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया गया। तो क्या म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन को एक पक्षीय मानें? म्यूनिख शहर के बीचों-बीच सात तारा होटल ‘बायरिशर होफ‘ में होने वाली सालाना बैठक, खुद को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर विचारों के आदान प्रदान का स्वतंत्र मंच बताती है। कैसे कहिएगा कि यह स्वतंत्र मंच है? यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की को वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिये अपनी बात कहने का अवसर दे रहे हैं, पुतिन को नहीं बुलाकर, उनकी औकात कम दिखाना चाहते हैं। यह तो 'स्कोर सेटल' करना हुआ, जिसकी काली छाया दिल्ली में आहूत जी-20 सम्मेलन पर पड़ने की पूरी संभावना है।

यूक्रेन युद्ध अगले सप्ताह अपने दूसरे वर्ष में प्रवेश कर जाएगा। जिस तरह का वातावरण जी-20 की पिछली शिखर बैठक, और उसके प्रकारांतर इस रविवार तक म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में देखने को मिलेगा, उससे यूक्रेन युद्ध की शीध्र समाप्ति की आशा करना बेकार है। म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन को संबोधित करते हुए जर्मन चांसलर ओलाफ शुल्त्ज़ ने कहा कि हमारा देश यूक्रेन में बहुत जल्द लेपर्ड टैंक तैनात करेगा। यह टकराव की भाषा है। सुलह के लिए टैंक की तैनाती नहीं होती।

18 फरवरी से 20 फरवरी, 2022 को आयोजित म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में विदेश मंत्री एस. जयशंकर गये थे, तब उन्होंने चीन से सीमा विवाद का मुद्दा उठाया था। भारतीय विदेश मंत्री ने पेइचिंग की ओर से सीमा पर सैन्य बलों को न तैनात करने के समझौते का उल्लंघन किये जाने पर विश्व समुदाय का ध्यान आकृष्ट किया था। इस बार एस. जयशंकर म्यूनिख जाना ज़रूरी क्यों नहीं समझे? वही बेहतर बता सकते हैं। जबकि उस सम्मेलन में रूस छोड़कर उन देशों के नेता भी उपस्थित हैं, जिनकी शिरक़त दिल्ली जी-20 शिखर बैठक में अपेक्षित है। क्या अडानी पर उठे सवालों से बचना भी एक वजह है?

एस. जयशंकर भले न जाएं, मगर म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में भारत का 'डंका' दूसरे कारणों से बज रहा है। अमेरिकी उद्योगपति व निवेशक जॉर्ज सोरोस ने जर्मनी म्यूनिख रक्षा सम्मेलन शुरू होने से पहले एक आयोजन में कहा था कि भारत तो एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकतांत्रिक नहीं हैं। मोदी के तेजी से बड़ा नेता बनने की अहम वजह भारतीय मुसलमानों के साथ की गई हिंसा है। सेरोस ने कहा कि भारत रूस से कम कीमत पर तेल आयात करता है। मगर, उपभोक्ताओं को कोई राहत नहीं है। जॉर्ज सोरोस के अनुसार, "गौतम अडानी मामले में पीएम मोदी चुप्पी साधे हुए हैं। लेकिन विदेशी निवेशकों और संसद में सवालों उठे का उन्हें जवाब देना होगा। जो कुछ हो रहा है, इससे सरकार पर उनकी पकड़ कमजोर होगी।"

सोरोस के इस बयान से सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक पर संग्राम छिड़ा हुआ है। सत्ता पक्ष इसे सीधा देश तोड़ने की हरक़त मानता है। पहले स्मृति ईरानी को आगे किया, फिर शनिवार 18 फ़रवरी 2023 को सिडनी में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा, "सोरोस मानते हैं कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक नहीं है। कुछ समय पहले ही उन्होंने हम पर आरोप लगाया था कि हम करोड़ों मुस्लिमों की नागरिकता छीनने की कोशिश कर रहे हैं, जो कि जाहिर तौर पर नहीं हुआ। मैं कह सकता है कि मिस्टर सोरोस एक बुजुर्ग, अमीर और राय रखने वाले व्यक्ति हैं, जो सोचते हैं कि उनके विचारों से फैसला होना चाहिए कि पूरी दुनिया कैसे चलेगी।"

जयशंकर ने आगे कहा, "मैं सोरोस को सिर्फ बुजुर्ग, अमीर और राय रखने वाला कहकर रुक सकता हूं। लेकिन वे बुजुर्ग, अमीर और राय रखने वाले के साथ खतरनाक भी हैं। जब ऐसे लोग और संस्थान विचार रखते हैं, तो वे अपने संसाधनों को नैरेटिव गढ़ने में लगा देते हैं। सोरोस जैसे लोगों को लगता है कि चुनाव तभी अच्छे हैं, जब उनकी पसंद का व्यक्ति जीत जाए। लेकिन अगर चुनाव का नतीजा कुछ और होता है, तो वह उस देश के लोकतंत्र को त्रुटिपूर्ण कहने लगते हैं, और यह सब एक खुले समाज की वकालत करने के नाम पर किया जाता है।"

मोदी सरकार के मंत्री जिस तरह सोरोस के प्रति हमलावर हैं, उससे लगता है कि उनसे जुड़ी संस्थाओं पर जल्द ही जांच और प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया आरंभ होगी। सोरोस पहले भी शी चिनफिंग और पुतिन को तानाशाह कह चुके हैं। नतीजतन पुतिन ने नवंबर 2015 में सोरोस की दो संस्थाएं, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (ओएसएफ) और ओपन सोसाइटी इंस्टीच्यूट (ओएसआई) को प्रतिबंधित कर दिया था। ‘सोरोस फंड मैनेजमेंट‘ ने मूल रूप से साम्यवाद से संक्रमित देशों को दुरूस्त करने का मुहिम छेड़ा। उनकी चैरिटी संस्थाओं के बज़रिये दुनिया भर में लोकतंत्र के निर्माण के उद्देश्य से बनी परियोजनाओं को आर्थिक मदद मिलती है।

भारत में भी 2016 से सोरोस की बहुत सारी संस्थाएं सरकार की वाच लिस्ट में हैं। गृह मंत्रालय ने 2016 में जिन 18 एनजीओ को निगरानी सूची में डाला था, उसमें ‘सोरोस फंड मैनेजमेंट‘ भी निशाने पर रहा है। हंगरी के बुडापेस्ट में जन्में जार्ज सोरोस, न्यूयार्क में अपनी जड़ों को जमा चुके अमेरिकी सटोरिये हैं, अरबों डाॅलर के फंड उपलब्ध कराने वाले घनकुबेरों में से एक हैं। न्यूयार्क में रहते हुए ट्रंप के विरूद्ध मोर्चा जार्ज सोरोस ने ही सबसे पहले खोला था। जार्ज सोरोस की संस्था ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन‘ 1999 से भारत में सक्रिय है। भारत में ऑपरेशनल यह फाउंडेशन 40 हज़ार से अधिक छोटे कारोबारियों को माली मदद दे चुका है। 37 लाख ग़रीबों को सहयोग के साथ-साथ, हर वर्ष साढ़े छह सौ स्काॅलरशिप भी सोरोस का फाउंडेशन देता है।

अपने देश में निवेश आमंत्रित करने वाली मोदी सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि सोरोस फंड मैनेजमेंट का बड़ा पैसा माइक्रोसाॅफ्ट, एपल, अलीबाबा, अमेजन, सेल्सफोर्स में लगा हुआ है। 2010 में जानकारी मिली थी कि बांबे स्टाॅक एक्सचेंज में चार फीसद स्टेक जार्ज सोरोस ने हासिल कर लिया था। अब यह बढ़कर कितना है? देश के वित्तमंत्री को पता करना चाहिए। यही नहीं, सोरोस फंड का पैसा फूड-वेजिटेबल इंडस्ट्री, खाद्य प्रसंस्करण, फार्मास्यूटिकल्स के कारोबार में लगा है। तमिलनाडु में ‘बी वेल हाॅस्पीटल चेन‘, सोरोस फंड से बनी, जिससे दर्जन भर अस्पताल संचालित हैं।

सोरोस की ‘ओएसएफ इंडिया‘ कई योजनाओं को वित्तीय मदद दे रही है, जिनमें ‘सहाय शिक्षा योजना‘, कौशल विकास के लिए ‘सहाय शिक्षा योजना‘, ‘सहाय आरोग्य योजना‘, ‘सहाय कृषि योजना‘ संचालित हैं। यदि इनके कार्यक्रमों की आड़ में देश विरोधी गतिविधियाँ चल रही हैं, तो सरकार विगत नौ वर्षों से कहां सोई पड़ी थी? 2013 में ओसवाल ग्रुप ने संगरूर में फर्टिलाइजर कारखाना लगाया, जिस वास्ते सोरोस फंड ने 1530 करोड़ रूपये दिये थे। सोरोस फंड के बजरिये इस तरह के निवेश 2014 से अबतक देश में कहां-कहां हुए, इसे पता करना सरकार की मशीनरी का काम है। यदि ये सब देश को तोड़ने वाली गतिविधियाँ हैं, तो इसे तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिए।

‘शेरपा‘, एक फ्रेंच एनजीओ है, जिसका काम मानवाधिकार हनन, सुरक्षा के क्षेत्र में गड़बड़ सौदा करने वालों, पर्यावरण का सत्यानाश करने वालों, और आर्थिक अपराधियों पर नज़र रखना है। ‘शेरपा‘ को फंड मिलता है, जार्ज सोरोस के ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन‘ से। इसी ‘शेरपा‘ ने नवंबर 2018 में राफेल सौदे के विरुद्ध हल्ला बोला था। शेरपा के वकील 36 राफेल फाइटर जे़ेट की डील में गड़बड़ियों के खि़लाफ रंजन गोगोई के समय सुप्रीम कोर्ट गये थे। ‘शेरपा‘ का कार्यालय भारत में भी है। इसके अलावा ह्यूमन राइट्स लाॅ नेटवर्क, कोर्डिनेशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक राइट्स आर्गेनाइजेशन, राइट टू फूड कैंपेन, सेंटर फाॅर पाॅलिसी रिसर्च, एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिसर्च, अमर्त्य सेन की संस्था ‘नमाति‘ को वित्तीय मदद जार्ज सोरोस की संस्थाओं से मिलती है, ऐसा बताते हैं। अब जिस तरह दोनों तरफ़ से मोर्चा खुला है, उससे लगता नहीं कि सोरोस फंड से पैसे लेना किसी के लिए आसान होगा। जार्ज सोरोस ने जो नश्तर म्यूनिख के मंच से चुभोया है, उसका जवाब जल्द मिलेगा !

 

 


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