पिछड़े मन से निकली दलित  विरोधी कविता

‘किस-किस से लड़ोगे’ कविता संग्रह पर समीक्षा

कैलाश दहिया 

 

कवि ने एक कायस्थ परिवार के माध्यम से अपनी यह कविता रची है। इस परिवार में बहुतों ने अंतरजातीय विवाह किया है, फिर भी जाति ज्यों की त्यों खड़ी है। कवि ने लिखा है, ‘आपने खुद यादव लडक़ी से शादी की/ आपके एक भाई ने/ मुस्लिम लडक़ी से शादी की/ आपके एक बेटे ने/ कलवार से शादी की/ दूसरे ने/ हज्जाम से शादी की/ तीसरे ने/ चमार से शादी की/ आपकी एक बेटी ने/ खटिक(खटीक) लडक़े से शादी की/ और दूसरी ने/ मुंडा से शादी की/ अब तक तो/ आपका कायस्थवाद कम हो जाना चाहिए था/ लेकिन यह तो बढ़ता ही जा रहा है।’ (पृष्ठ -60) क्या कवि को इस पर सोचना नहीं चाहिए, ऐसा क्यों है?

इसी कविता के माध्यम बताया जा सकता है कि कवि अभी दलित विमर्श में गहरे नहीं उतर पाए हैं, अन्यथा ऐसी कविता सामने नहीं आती। वैसे यह कविता प्रगतिवादियों, जनवादियों, वामपंथियों और उदारवादियों के मुंह पर तमाचा तो है ही। साथ ही, अंतरजातीय विवाह के नाम पर जाति तोडऩे की बात करने वालों को भी आइना दिखा देती है।

ऐसा माना जाता है कि कवि अपने ख्यालों की दुनिया में विचरते हैं। ऐसे में इन की मदद के लिए दार्शनिक आगे आते हैं। इस रूप में महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर ने दलितों को चिंतन की भूमि उपलब्ध करवाई है। बावजूद इस के अभी भी दलित कविता के स्वर उलझे दिखाई पड़ते हैं, वे जब-तब जाति को लेकर रूदन करते हुए जाति तोडऩे की बात करने लगते हैं। इस में मराठी दलित कविता तो चौराहे पर खड़ी मिलती है। कमोवेश यही हाल हमारे पिछड़े वर्ग के कवि-लेखकों का है। इन में भी जाति को लेकर हीनता की भावना भरी हुई है। कवि जब लिखते हैं  ‘यह सवाल/अंतत: दाग ही दिया/ मुझ पर उसने की/ किस जाति से हो?’ (पृष्ठ- 86) क्या यह हीनता से जुड़ा मामला नहीं है?
 

इधर, जाति से जुड़ी सारी हीनताओं को समाप्त करते हुए डॉ. धर्मवीर बताते हैं- ‘भारत में जाति ऐसी चीज से जुड़ चुकी है जो अमिट है। जाति में अपने मां-बाप का नाम सम्मिलित रहता है जिसे कभी भी नहीं भुला जा सकता। अपने मां-बाप का नाम लेना कोई बुराई नहीं है- बुराई दूसरी बात में है। बुराई इस बात में है कि एक व्यक्ति को अपने मां-बाप का नाम बताने में गर्व महसूस होता है तथा दूसरे व्यक्ति को अपने मां-बाप का नाम बताने में हीनता का बोध होता है।... इसलिए वास्तविक समाधान के लिए, हर हालत में, दलित के मन से हीनता की ग्रंथि समाप्त होनी है। वह दलित व्यक्ति अपने प्रतिद्वंद्वी से क्या लड़ेगा जो मात्र ‘चमार’ और ‘भंगी’ के शब्दों से डर गया है। दूसरे, वह आदमी समाज में किसी मतलब का नहीं है जो अपने बाप का और अपनी मां का नाम गर्व से नहीं ले सकता। संसार का कोई बच्चा अपने मां-बाप का नाम लेना नहीं छोड़ता है।’(देखें, दलित चिंतन का विकास- अभिशप्त चिंतन से इतिहास चिंतन की ओर, डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, 21-ए,  दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, प्रथम संस्करण - 2008, पृष्ठ-79-82)।

ऐसे में कवि की जाति को ले कर ‘संगठन’ नामक कविता में लिखी इन पंक्तियों का क्या किया जाए, जब ये लिखते हैं, ‘पासवान/पासवान के नाम पर/ रामविलास पासवान को/ एकमुश्त वोट दे देता है’ (पृष्ठ, 12-3) वैसे, क्या इन्हें अपनी इस कविता के शीर्षक से सवाल खुद से नहीं करना चाहिए? ऐसे ही कवि जब लिखते हैं, ‘ब्राह्मण मिलता है/ तो ब्राह्मण हो जाता है/ राजपूत मिलता है/ तो राजपूत हो जाता है... चमार मिलता है/ तो चमार हो जाता है’, पृष्ठ-47-8) बताया जा सकता है कि इस मिलने में कुछ भी गलत नहीं है, बशर्ते वह किसी के विरोध में ना हो। बताया यह भी जा सकता है कि इस मिलने में ही वैवाहिक संबंध होने हैं। तब इस मिलने पर किसी को एतराज नहीं होना चाहिए। उम्मीद है पंकज इस पर पुनर्विचार करेंगे। 

संग्रह की शीर्षक कविता ‘किस-किस से लड़ोगे’ इस की प्रतिनिधि कविता कही जा सकती है। यह कविता क्या कहती है? कवि किस-किस से लडऩे का आह्वान कर रहा है? फिर ये खुद किस-किस से लड़ रहे हैं? इन्होंने विभिन्न जातियों के नाम के साथ वाद जोड़ कर उन से लडऩे का आह्वान किया है। यहां बताया जाए, ब्राह्मण का तो कोई वाद है भी, लेकिन बाकी जातियों का कौन सा वाद चल रहा है? कवि ने लिखा है, ‘किस-किस से लड़ोगे यहां/ कोई यहां ब्राह्मणवादी है तो/ कोई यहां राजपूतवादी/ कोई यहां कायस्थवादी है तो/ कोई यहां कोयरीवादी, कुर्मीवादी/ कोई यहां यादववादी है तो/ कोई यहां बनियावादी/ कोई यहां जाटववादी है तो/ कोई यहां वाल्मीकिवादी खटिकवादी’,(पृष्ठ- 36)।

इस कविता में कवि से सवाल तो बनता ही है कि वह दलित कही जाने वाली जातियों जाटव (चमार) वाल्मीकि (भंगी) से लडऩे के लिए क्यों हुंकार लगा रहे हैं? दलित जो दुनिया की सब से ‘शरीफ कौम’ है, ये उस से क्यों लडऩा चाहते हैं? इसलिए कि दलित अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। फिर, इन से जाटववाद और वाल्मीकिवाद के बारे में भी पूछा ही जा सकता है।

इस कविता की अंतिम पंक्ति किसी भी लिहाज से सही नहीं कही जा सकती, ‘इंसानियत का ताज गिरा रखा है/ आदमी बने भी तो बने कैसे/ सबने ऐसे-ऐसे वादों का मल खा रखा है।’ (पृष्ठ- 37) पूछा जा सकता है, ये ऐसे क्यों लिख रहे हैं? ये दलितों से क्यों लड़ रहे हैं? कहीं ये वर्णवादियों से गुहार तो नहीं लगा रहे, देखो मैंने केवल आप को ही नहीं गरियाया है मैं तो दलितों को भी गरिया रहा हूं। क्या दलित इन्हें या इन की जाति को कुछ कह रहे हैं? कवि को पता ही होगा कि व्यक्ति के विचार की अंतिम परिणति किसी न किसी वाद में ही होती है। अच्छा होता ये अपनी जाति और उस के दुख-दर्द की कविता रचते। 

वैसे, इन की इस कविता सहित अन्य कविताओं को इन के दलितों के प्रति दृष्टिकोण के रूप में पढ़ा जा सकता है। इन में ये दलितों को गरिया रहे हैं। फिर, अब तो ब्राह्मण ही झट से दूसरों को ब्राह्मणवादी कह देता है। कवि को ध्यान रखना चाहिए कि कोई वाद ही पूर्ण रूप से धर्म के रूप में सामने आता है। इस रूप में इन की इस कविता को ब्राह्मण, मुसलमान और ईसाई के वाद के वैचारिक आग्रह या द्वंद के रूप में आना चाहिए था। बाकी के वाद महज कोरी कल्पना ही हैं। इसी कड़ी में बताया जा सकता है कि अगर कवि आजीवक के रूप में सामने आते तो इन की कविता के स्वर कुछ और ही होते।

तब ये किसी भी तरह की कुंठा, आक्रोश और शिकायत से बाहर आ कर ऐसी कविता रच पाते जो मानवतावाद की नई ऊंचाइयों को छूती। वैसे, इन्हें यह भी बताना चाहिए था कि इन की लड़ाई किस वाद के खिलाफ है। इन का विरोधाभास अगली ही कविता में सामने आ जाता है जब ये कहते हैं ‘लडऩा जरूरी है’।

अब क्या किया जाए? ‘हेडलेस पोइट्री’ नामक कविता की चार पंक्तियों देखी जा सकती हैं, ‘एक रविदासिये चमार ने कहा/ कि हम रविदासिये जो होते हैं/ वे चमारों में ब्राह्मण होते हैं/ और बाकी चमार अस्पृश्य’, (पृष्ठ-20) पता नहीं कवि ने किस से सुन कर ऐसी पंक्तियां लिखी हैं! सर्वप्रथम तो आज तक किसी चमार ने खुद को ब्राह्मण नहीं कहा बल्कि वह ऐसा कह ही नहीं सकता। क्योंकि, चमार और ब्राह्मण अलग जाति, धर्म परंपरा और नस्ल का मामला है। ये दो समानांतर रेखाओं की तरह हैं।

कवि जो रविदासिये चमार के नाम पर मनगढ़ंत लिख रहे हैं, क्या इन्होंने सुना और पढ़ा नहीं कि खुद सद्गुरु रैदास या रविदास क्या कहते हैं? सद्गुरु रैदास ने ‘खलास या खलस चमार’ की हुंकार लगाई है। उन्होंने तो यहां तक कहा है -

     ‘चाम के घोड़ा चाम के हाथी। 
     सभी चमार कुटुंब के साथी।।’

(देखें, महान आजीवक - कबीर, रैदास और गोसाल, डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज नई दिल्ली- 110002, प्रथम संस्करण - 2017, पृष्ठ- 498) और सदगुरु रैदास की इस वाणी को कवि कैसे भूल गए, जब वे कहते हैं - 
     

     ‘सब में एक राम जोति, 
      एकहि सिरजनहार।
      रैदास राम सबन में, 
      बाम्मण हुइ कि चमार।।
                       (वही, पृष्ठ- 498

अब पूछा जाए, ऐसे महान सद्गुरु के बालक खुद को ब्राह्मण क्यों कहेंगे? बावजूद इस के अगर कोई चमार खुद को ब्राह्मण कहता है तो समझ जाइए वह अक्करमाशी की श्रेणी में ही आना है।

ऐसे ही,कवि ने ‘संगठन’ नाम की एक कविता लिखी है। जिस में इन्होंने विभिन्न जातियों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अपनी रौ में बह इन्होंने इस फेहरिस्त में दलितों को भी कटघरे में खड़ा करने की असफल कोशिश की है। कविता कुछ इस तरह है, ‘ब्राह्मण/ ब्राह्मण के नाम पर/ हत्यारे को नायक कह देता है/ भूमिहार/ भूमिहार के नाम पर/ बूचर को दूसरा गांधी कह देता है/ राजपूत/ राजपूत के नाम पर/ बलात्कारी को क्लीन चिट देने लगता है/ कायस्थ/ कायस्थ के नाम पर/ भ्रष्टाचारी को संत कहने लगता है’(पृष्ठ '1) दलित के बारे में कवि लिखते हैं, ‘चमार/ चमार के नाम पर/ अछूतानंद को दलितों का सबसे बड़ा कवि मानने लगता है’ (पृष्ठ '2) देखा जा सकता है।

इस कविता में कवि चमारों पर कोई ऐसा आरोप नहीं लगा पाए जिस से इन्हें शर्मिंदा होना पड़े। चमार अगर चमार के नाम पर स्वामी अछूतानंद को अपना सब से बड़ा कवि मानते हैं, तो इस में किसी भी तरह का अपराधबोध क्यों हो? हर जाति अपने कवि-लेखकों को ढूंढती है। चमारों ने भी स्वामी अछूतानंद को ढूंढा है। फिर अछूतानंद किसी को क्या कह रहे हैं? अगर वे द्विज जातियों के अपराध बता रहे हैं, तो इस में गलत क्या है? खुद कवि ने लिखा ही है ब्राह्मण/ ब्राह्मण के नाम पर/ हत्यारे को नायक कह देता है/ भूमिहार/ भूमिहार के नाम पर/ बूचर को दूसरा गांधी कह देता है।’ कवि की इन पंक्तियों को पढ़ कर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत अपराधी की श्रेणी में आते हैं।

जबकि चमार अपने कवि की तलाश करते मनुष्य की श्रेणी में। ऐसे ही कवि अन्य दलित जातियों में कोई कमी नहीं ढूंढ पाए। बेशक, एक प्रचलित मुहावरे के तौर पर इन्होंने मान लिया है कि ‘मीणा/ मीणा के नाम पर/ आदिवासियों का सारा डकार जाता है’ (पृष्ठ'3) असल में, इस तरह की पंक्तियां केवल सुनी-सुनाई बातों की वजह से सामने आती हैं। कवि को इस पर ठहर कर सोचने की जरूरत है। वैसे, अगर जाति एक संगठन है तो भी इस में बुराई क्या है? 

कवि ने ‘वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं’ शीर्षक से एक कविता लिखी है, जिसमें कवि लिखते हैं- ‘वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं/ लेकिन ब्राह्मणों को ही कवि मानेंगे/ वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं। लेकिन ब्राह्मणों को ही पुरस्कार दिलाएंगे/ वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं/ लेकिन ब्राह्मणों को ही आलोचक मानेंगे/ वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं/ लेकिन...’ (पृष्ठ -58) यहां सवाल कवि से ही है। इन्हें बताना चाहिए कि वे कौन हैं जो ब्राह्मणवादी नहीं हैं लेकिन जिन का सारा समर्थन ब्राह्मणों के लिए रहता है।

काश इन्होंने महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर की इन पंक्तियों को सही से पढ़ा होता, जिन में लिखा गया है-‘बहस को सही जगह लाने के लिए और तर्क को उस की परिणति तक पहुंचाने के लिए इस देश में ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद में कोई फर्क नहीं करना चाहिए। ब्राह्मण चिंतन यही चाहता है कि ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद में फर्क किया जाए। तब वह असली सामाजिक और धार्मिक मुद्दों की तरफ से चिंतकों का ध्यान हटा कर आदर्श के बियाबान जंगलों में बहस करवाता है। ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद में फर्क करने का उसे बड़ा लाभ यह होता है कि वह दलितों में ब्राह्मणवाद खोज लेता है। तब सारी लड़ाई दलितों में ब्राह्मणवाद से लडऩे में उल्टी फेंक दी जाती है।

बहस की इस धुंध में ब्राह्मण बच कर साफ निकल जाता है।’ (देखें, कबीर - बाज भी, कपोत भी, पपीहा भी, डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली 110002, द्वितीय संस्करण - 2008, पृष्ठ'9) इस बात के प्रमाण इस कविता संग्रह में भरे पड़े हैं असल में उनकी कविताओं में ऐसी सोच चिंतन के अभाव में बनती है। कवि को बताना चाहिए कि वे ब्राह्मणवादी कौन हैं जो ब्राह्मणों को कवि मानते हैं, उन्हें पुरस्कार दिलवाते हैं, उन को पायलागू करते हैं वगैरह-वगैरह। कहीं वे ब्राह्मण ही तो नहीं जिन्होंने किसी वाद का मुखौटा ओढ़ रखा है। हां,  दलितों-पिछड़ों में से भी कुछ ब्राह्मण के गुलाम हो सकते हैं। पीछे कुछ साल ऐसे दलितों ने द्विज आलोचक नामवर सिंह को डॉ. आम्बेडकर पुरस्कार दिया ही था।

फिर, ब्राह्मणों से इतर तथाकथित उच्च जाति का होने के भ्रम के शिकार लोग भी साहित्य में मिल ही जाते हैं। जो ब्राह्मणों की चरण वंदना करते देखे जाते हैं। इन्हें भी ब्राह्मण का गुलाम ही कह सकते हैं। असल में, ‘वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं’ कविता के आखिर तक आते-आते कवि गड़बड़ा जाते हैं। जब वे कविता की हर दूसरी पंक्ति में साफ-साफ ब्राह्मण को चिह्नित कर रहे हैं तब अंतिम पंक्ति में भी ब्राह्मण ही आना चाहिए था। वहां ब्राह्मण के स्थान पर ‘ब्राह्मणवादियों’ कैसे हो गया?  इस कविता को कवि का वैचारिक विचलन ही माना जाएगा।

यह कविता कवि के रूप में तुतलाने का ही प्रमाण मानी जानी चाहिए। असल में, यह कविता पिछड़े वर्ग से आने वाले कवि साहित्यकार के विचलन को ही दर्शाती है। वैसे, इस कविता में पूछने का मन तो करता ही है कि वे कौन हैं जो ब्राह्मणवादी नहीं है, लेकिन ब्राह्मण को कवि- आलोचक मानते हैं? उधर, 22 अक्टूबर, 2022 को इसी कविता में केंद्रित मेरी फेसबुक पोस्ट पर मुसाफिर बैठा और पंकज चौधरी एक दूसरे पर ब्राह्मणवादी होने का आरोप लगाते रहे। अब क्या किया जाए?

मोटे तौर पर इस संग्रह को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला है जाति आधारित कविताएं और दूसरा है स्त्री विमर्श की कविताएं। स्त्री विमर्श को ले कर लिखी कविताओं ‘ये बदतमीज लड़कियां, ‘जैसा कि उसने कहा’, ‘यौन दासिया’ और ‘स्त्रीवादिनी’ शीर्षक से प्रमुख हैं। इन में ‘ये बदतमीज लड़कियां’ और ‘यौन दासियां’ महज सुनी- सुनाई बातों पर आधारित दिखाई पड़ती हैं। ‘यौन दासियां’ कविता जारकर्म समर्थक स्त्री की तरफ से कही जा रही बात पर आधारित लगती है। जिसे दलित विमर्श की प्रक्रिया में ध्वस्त किया जा चुका है।

क्या कवि को इस बारे में पता नहीं होना चाहिए? फिर, ‘जैसा कि उसने कहा’ कविता में कवि गवाही देते हैं कि उसे/बहुत/ बहुत/ बहुत/ बहुत/ बहुत चाहिए/ सोना/ चांदी/ हीरा/ जवाहिरात/ और नीलम नहीं/ बल्कि पति का संग-साथ/ और पति जब थक जाए/ तब फिर दूसरे का संग- साथ/ और दूसरा भी जब थक जाए/ तब फिर तीसरे का संग-साथ...’ (पृष्ठ - 63) यहां सवाल यह है कि यह थकना क्या होता है? फिर ऐसी स्त्री को कौन रोक रहा है जिसे एक, दो, तीन नहीं ढेरों मर्द चाहिए। ऐसी स्त्री अपने पति को तलाक देकर दूसरे से विवाह करे। उस से उब जाए तो दूसरे, तीसरे,  चौथे से यानी जब तक वह थक ना जाए। बिना तलाक के ऐसे सेक्स को ही जारकर्म कहते हैं। इस कविता के माध्यम से कवि ने जारिणी के चेहरे से नकाब उठा दिया है।

स्त्रीवादिनी कविता के माध्यम से कवि ने उस स्त्री के चेहरे से आवरण हटाया है जो जारकर्म की दुंदुभि बजाती घूमती है। दलित विमर्श अर्थात आजीवक चिंतन में इस की पहचान जारिणी के रूप में की गई है। डॉ. धर्मवीर ने ‘तीन द्विज हिंदू स्त्रीलिंगों का चिंतन’ में इन की खोज खबर ली है। जारिणी ‘विवाह और परिवार नाम की संस्थाओं को/ बेडिय़ा मानती हैं वे’ (पृष्ठ-67)  ‘ये बदतमीज लड़कियां’ कविता स्त्रीवादिनी का ही विस्तार कही जा सकती है। कवि ने लिखा ही है, ‘और जिसकी देह जितनी ज्यादा आजाद/ जीवन की राहों पर वह उतनी ही आबाद/ और घर की जंजीरे उतनी ही कमजोर।’  

(पृष्ठ-55) फिर, ‘ये बदतमीज लड़कियां ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के नाम पर मार दी जाती हैं और बहुत बार बहुमंजिला अपार्टमेंट से कूद कर आत्महत्या की शिकार हो जाती हैं। वैसे, ये अपने पार्टनर की हत्या में संलिप्त भी पाई जाती हैं। यह भी बताया जा सकता है, ‘ये बदतमीज लड़कियां’ गर्भवती होने पर संतान को कूड़े के ढेर पर फेंक देती हैं। एक समाचार के अनुसार, ‘पूर्वी दिल्ली के न्यू अशोक नगर इलाके में सोमवार सुबह एक युवती ने नवजात  शिशु को जन्म देन के बाद तीसरी मंजिल से नीचे फेंक दिया। बच्चे की मौत हो गई।..

युवती नोएडा की एक कंपनी में काम करती है और यहां अपने पिता के साथ रहती है। वह शादीशुदा नहीं है। समाज में बदनामी के डर से उसने बाथरुम की खिडक़ी से बच्चे को फेंक दिया।’ (देखें, दर्दनाक - मां ने नवजात को तीसरी मंजिल से फेंका, हिन्दुस्तान, दिल्ली संस्करण, 10 जनवरी, 2023, पृष्ठ ') अब इस पर कवि का क्या कहना है? ऐसा लगता है इन्होंने यह कविता द्विज कवि के बहकावे में लिखी है। 

कवि ने ये बदतमीज लड़कियां के बारे में सही ही लिखा है ‘और घर की जंजीरे उतनी ही कमजोर।’ (पृष्ठ -55) वैसे, यहां जंजीरे शब्द का प्रयोग सही नहीं कहा जा सकता। दरअसल, स्त्रीवादिनियां घर-परिवार के विरोध में ही यहां-वहां मंचों पर लफ्फाजी करती दिखती हैं। हां, इन्हें घर के फायदे पूरे चाहिए।

स्त्री को लेकर कवि ने जो कविताएं लिखी हैं उन कविताओं में इन का विरोधाभास साफ पढ़ा जा सकता है। एक तरफ वे ‘ये बदतमीज लड़कियां’ कविता में देह की स्वतंत्रता का बखान करते दिखाई पड़ते हैं, वहीं जारिणी के चेहरे से नकाब उठाते हुए ‘जैसा कि उसने कहा’ कविता लिख देते हैं। ऐसे ही ‘स्त्रीवादिनी’ नामक कविता में  जारकर्म समर्थक स्त्री ही आरक्षण विरोधी स्त्री के रूप में सामने आई है। कवि को इस कविता के लिए हार्दिक धन्यवाद। असल में ये कविताएं स्त्री विमर्श की कड़ी में लिखी गई हैं। हां, ये बदतमीज लड़कियां कवि की जबरन लिखी गई कविता जान पड़ती है। कवि को इस से बचना चाहिए था।

संग्रह में एक भी कविता बलात्कार के विरोध में नहीं दिखाई पड़ी। जबकि बलात्कार और बलात्कारी का विरोध दलित कविता और स्त्री दलित कविता का प्रमुख स्वर है। बेशक कवि ने बलात्कारी को ले कर जो तंज कसा है वह बिल्कुल सही है, ‘बलात्कारी है तो क्या हुआ/ अपनी जाति का है’,(पृष्ठ-77) वैसे, कवि ने स्त्री विमर्श के नाम पर क्षत्रिय-ठाकुर विमर्श के बारे में बता दिया है। अरे भाई! ठाकुर या द्विज अपनी स्त्री से कैसा व्यवहार करते हैं वही बता देते। दलित विमर्श ने इन सनातनियों की तथाकथित सती हत्या प्रथा, भू्रण हत्या, बाल विवाह, ना-तलाक, जारकर्म आदि कुरीतियों की पोल खोल कर रख दी है। विधवा के पुनर्विवाह की मनाही तो स्त्री विमर्श का इतना बड़ा आयाम है कि जिस में द्विज व्यवस्था भरभरा कर ढह जाती है। कवि की दृष्टि पता नहीं इस ओर क्यों नहीं गई? 

पंकज के कविता संग्रह पर पिछड़े वर्ग से आने वाले समीक्षक डॉ. कमलेश वर्मा ने हास्यास्पद टिप्पणी की है, ये लिखते हैं, ‘इस संग्रह की कविताओं में करीब 50 जातियों का जिक्र हुआ है। ये भारत की जाति-व्यवस्था के वैविध्य को प्रकट करती हैं। इतनी सारी जातियों का उल्लेख अब तक हिंदी के किसी भी कवि ने नहीं किया है।...जाति के प्रश्न पर कबीर सर्वाधिक मुखर हैं। उन्होंने जातियों का उल्लेख करते हुए हिंदी के किसी भी कवि से ज्यादा कविताएं लिखी हैं।... मगर कबीर की कविताओं में इतनी सारी जातियां का उल्लेख नहीं मिलता है। पंकज चौधरी इस विषय पर लिखने वाले दुर्लभ कवि हैं।’ (देखें, कमलेश वर्मा की दिनांक 03 दिसंबर, 2022 की फेसबुक पोस्ट) हद है!

इन्होंने कबीर साहेब को जातियों का जिक्र करने वाला कवि मान लिया है! कैसा दिमाग पाया है? जातियों के उल्लेख करने को कविता माना जा रहा है! अगर समीक्षक महोदय को जातियों की संख्या ही गिननी थी तो ये मंडल कमीशन की रिपोर्ट को ही पढ़ लेते हैं। अगर इन की मानें तो मंडल कमीशन तो कविता की बड़ी किताब हो जाएगी। समीक्षक महोदय को इतनी समझ भी होनी ही चाहिए कि कैसे-कब जातियों की संख्या बढ़ाई गई है। एक ही जाति से बीसियों-पचासियों उपजातियां बनाने का खेल किस ने किया है? वैसे, यह किसी से छुपा नहीं है। इसीलिए बताया जा रहा है चमार इस देश की सब से बड़ी जाति है।

इस में से सैकड़ों उपजातियां बना दी गई हैं। जाटव इस का नवीनतम उदाहरण है। फिर, चमार जाति को हर राज्य में नया नाम दे दिया गया है। और, इस से भी बड़ी आपत्तिजनक बात, समीक्षक महोदय ने कबीर साहेब को कवि मान लिया है। पता नहीं किस के सीखाए में हैं?

असल में कवि की जिद दलित कवि होने की है। लेकिन, दलित कविता तो कोई जन्मजात दलित ही लिख सकता है। इसीलिए कवि की कविताएं ऊपर-ऊपर चक्कर काटती दिखाई देती हैं। हां, जहां इन्हें दलितों की तरह तिरस्कृत किया गया लगता है वहां इन का दर्द कुछ-कुछ दलित कविता को स्पर्श करने लगता है। लेकिन वहां भी कवि की कविता व्यंग और क्षोभ में बदल जाती हैं, कवि लिखते हैं, ‘यह सवाल/ अंतत: दाग ही दिया/ मुझ पर उसने कि/ किस जाति से हो’,(पृष्ठ- 86) इस कविता का अंत कवि ने कुछ यूं किया है, ‘भारत का आरंभ भी/ इसी सवाल से हुआ होगा/ और भारत का अंत भी/ इसी सवाल से होगा’, (पृष्ठ- 87) लेकिन, यहां बताया जा सकता है, दलित कविता ऐसे सवालों को पीछे छोड़ कर बहुत आगे बढ़ गई है। यह तो यहां तक आ पहुंची है, अब दलित यानी आजीवक कविता ऐसे आती  है -   
     

     जाति पहले जाएगी,
     कहीं भी जाएं आप।
     जाति बताने में नहीं,
     शर्म की कोई बात।।

ऐसे लगता है, अब हमारे पिछड़े वर्ग के लोगों से ब्राह्मण ने जाति पूछनी शुरू कर दी है। क्या कवि को पता नहीं कि जाति की स्वीकृति ही जातिवाद का अंत है। जातिवादी के मुंह पर करारा तमाचा है जाति की स्वीकृती। जाति की स्वीकृति से जातिवादी विलुप्त हो जाता है। उम्मीद है कवि आगे से ध्यान रखेंगे।

असल में, अपनी कविताओं के माध्यम से कवि दलित विमर्श का हिस्सा बनना चाहते हैं, लेकिन वह दलित विमर्श से बच कर चले हैं। इस बचने के क्रम में कविता के स्वर संदिग्ध और मद्धिम हो जाते हैं। यूं, पंकज चौधरी की कविताएं उस बच्चे की तरह हैं जो बोलना सीखने के क्रम में तुतलाने लगता है। इस तुतलाने में कवि की दृष्टि धुंधलाने लगती है। इस धुंधलके में वे जाति के विरोध पर उतर आते हैं। अंत में ये ‘कम्युनिज्म’ की दुहाई देने लगते हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि कवि को अंतत: एक विचार श्रृंखला में डुबकी लगानी होगी अन्यथा बोलने के स्थान पर तुतलाहट ही बढ़ती चली जानी है। 

कवि दलित कविता से सुर मिलाने की कोशिश करते दिखना चाहते हैं। लेकिन, इन के पास दलितों को दिया गया दुख, पीड़ा, घृणा, छुआछूत, अस्पृश्यता, बलात्कार जैसी अमानवीयता का दर्द नहीं है। दलितों को इसे सदियों से झेलना पड़ा है। ऐसे में इन की कविता उपदेश और सलाह बन कर रह जाती है। कवि गैर दलित जातियों के साथ-साथ दलित जातियों को भी प्रवचन देते दिखाई पड़ते हैं। यह कहने में भी किसी तरह की कोई हिचक नहीं है कि यह कविता संग्रह दलितों के विरोध में आया है। पता नहीं कवि में इतना दलित विरोध कहां से आया है! यह बताने में किसी तरह की हिचक नहीं है। यह कविता संग्रह पिछड़े मन से निकला है, जिस में दलित विरोध भरा पड़ा है।

दरअसल, यह संग्रह कविता कम राजनीतिक मुहावरे की भाषा ज्यादा हैं। फिर, राजनीति में जैसा होता है, पाला कभी भी बदला जा सकता है।


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