बैलाडीला पहाड़ी की लूट और आदिवासी आमने सामने

बस्तर में ग्राउंड जीरो से रिपोर्ट

सुशांत कुमार


यहां बस्तर में बस्तियां और लोग टूट टूट कर बिखर रहे हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि उनके बीच आज भी जिजीविषा बची है।अबूझमाड़ अब हमारे लिये शक्ति केंद्र के रूप में चर्चित होता जा रहा है, और अबुझपन बरकरार है। हत्या, गिरफ्तारी, बलात्कार, विस्थापन और देश से बेगाना होने की कहानी, कई जनजागरण अभियान से लेकर सलवा जुडूम तक के चीजें बस्तर के विषय हैं।अभी भी घनघोर जंगलों के बीच जहाँ हवा सीटी बजाती है, वहाँ के रहवासी आदिवासियों की हत्यारी विकास को चुन रखा है। यहां सभ्यता की बड़ी और निर्णायक लड़ाई लड़ी गई और लड़ी जा रही है। 'बस्तर' की आत्मा ढेर सारे खूनी सूचनाओ से भरी पत्रकारिता के विरुद्ध खड़ी है।

बस्तर की एक और सार्थक यात्रा पर निकल चुका था और पहले पड़ाव में 6 नवम्बर 2022 को एनएमडीसी लिमिटेड डिपोजिट नम्बर 14 एवं 14 एनएमजेड 2 के आयरन और माईन्स किरन्दुल द्वारा प्रस्तावित क्षमता विस्तार की लोक सुनवाई को स्थगित करना पड़ा। मालूम नहीं पेसा कानून और नियम के रहते इस तरह के जनसुनवाई का क्या औचित्य रह जाता है।

छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल, मेसर्स एनएमडीसी लिमिटेड डिपोजिट नम्बर 14 एवं 14 एनएमजेड ने क्षमता विस्तार हेतु लोक सुनवाई का आयोजन 6 नवम्बर, दिन रविवार को समय प्रात: 11:00 बजे, स्थानीय शासकीय हायर सेकण्डरी स्कूल विद्यानगर किरन्दुल, जिला दक्षिण बस्तर दन्तेवाड़ा में किया गया था।

गौारतलब है कि इस लोक सुनवाई में आदिवासियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करवाई साथ ही हजारों की संख्या में इसका मुखर ढंग से विरोध किया गया। इस वजह से लोक सुनवाई की कार्यवाही को स्थगित किया गया।

इसकी सूचना संयुक्त पंचायत जनसंघर्ष समिति (बैलाडिला क्षेत्र) दंतेवाड़ा, जिला पंचायत सदस्य, दंतेवाड़ा, जनपद सदस्य क्षेत्र क्रमांक-6 एवं 7, अध्यक्ष सर्व आदिवासी समाज, अपर कलेक्टर के साथ ग्राम पंचायत कोडेनार, समलवार, कडमपाल, चोलनार, गुमियापाल, हिरोली, मदाड़ी को भी सूचित कर दिया गया है। यह आदिवासियों की बड़ी जीत के रूप में देखी जा रही है। 

विशाखापट्नम रेलवे लाईन के दोहरीकरण का विरोध 

बस्तर के भीतर कोरे विकास का हर समय विरोध हुआहै। आज भी किसी ना किसी रूप में सरकार के षड्यँत्रकारी साजिशों का खुलासा हो रहा है। ग्राम पोंदूम के निवासी संजय पंत ने बताया कि दन्तेवाड़ा विशाखापट्नम रेलवे लाईन के दोहरीकरण कार्य का एक बड़ा हिस्सा दन्तेवाड़ा जिले से होकर गुजरता है। रेलवे लाईन के दोहरीकरण के लिए भूमि अधिग्रहण के अंतर्गत संबंधित भू-खंड़ो का विवरण, भूमि स्वामियों का विवरण, भूमि अधिग्रहण के बदले ग्रामीणों को दी गई मुआवजा राशि/क्षतिपूर्ति राशि का विवरण एवं इससे संबंधित सभी ग्राम सभा की बैठक या पत्र व्यवहार का विवरण सूचना का अधिकार के तहत जन सूचना अधिकारी, जिला दन्तेवाड़ा एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी, जिला दन्तेवाड़ा से मांगी गई थी। 

उन्होंने हमें बताया कि सक्षम अधिकारियों द्वारा दी गई जानकारी से यह स्पष्ट होता है कि रेलवे लाईन के दोहरीकरण से प्रभावित आदिवासियों की जमीन को जिला प्रशासन द्वारा सरकारी जमीन मान लिया गया है जबकि 4 गैर-आदिवासी व्यक्तियों के भू-खंडों को अधिग्रहित कर उन्हें मुआवजा/क्षतिपूर्ति राशि देने का प्रावधान किया गया है। भूमि अधिग्रहण से संबंधित ग्राम सभा की बैठकों या किसी भी प्रकार के पत्र व्यवहार के विवरण के संबंध में प्रथम अपीलीय अधिकारी बताया कि मुआवजा/क्षतिपूर्ति राशि के वितरण उपरांत पुन: आवेदन करने पर जानकारी दी जाएगी। जो कि हास्यास्पद है।

पंत ने यह भी कहा कि रेलवे लाइन के दोहरीकरण से प्रभावित आदिवासियों की यह मांग है कि इस आवेदन पत्र को प्राप्त करने के 10 दिनों के भीतर जिला प्रशासन द्वारा सक्षम प्राधिकारियों के माध्यम से आदिवासियों को उन नियमों से अवगत कराया जाए जिनका उपयोग करके उनकी जमीन को सरकारी जमीन माना गया। हालांकि गैर आदिवासियों की जमीन को मुआवजा/क्षतिपूर्ति राशि देने के योग्य माना गया। 

प्रभावित आदिवासियों की यह मांग भी है कि उन्हें उन परिस्थितियों से अवगत कराया जाए जिसके तहत जिला प्रशासन द्वारा उनके ग्राम सभा की बैठक एवं अन्य पत्र व्यवहार की जानकारी अभी नहीं दी जा रही है। 

उन्होंने चेताया कि इस पत्र को प्राप्त करने के 10 दिनों के भीतर यदि जिला प्रशासन द्वारा प्रभावित ग्रामवासियों की मांगंों को पूरा नहीं किया तो अगले दिन उनके नेतृत्व में प्रभावित आदिवासियों द्वारा आंवराभाटा रेलवे फाटक, दन्तेवाड़ा में रेल रोको तथा कलेक्टर परिसर दन्तेवाड़ा का घेराव किया जाएगा। साथ ही यह भी अवगत कराया है कि इस दौरान दन्तेवाड़ा जिले में किसी भी प्रकार की कानून व्यवस्था या अप्रिय स्थिति निर्मित होने पर इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी दन्तेवाड़ा जिला प्रशासन एवं पुलिस बल की होगी। उनके इस पत्र के समर्थन में सैकड़ों ग्रामीणों ने दस्तख्त और अंगूठा लगाया है। 

बैलाडीला की कहानी

इस तरह के कई जानकारी ना जाने क्यों सरकारी दफ्तरों में बंद पड़े हैं। इतिहास के जानकारों के अनुसार बस्तर के बैलाडीला में 1065 ईस्वी में चोलवंशी राजा कुलुतुन्द ने पहली बार यहां के लोहे को गलाकर अस्त्र शस्त्र बनाने का कारखाना लगाया था।

यहां से बने हथियारों को बैलगाड़ियों से तंजाउर भेजा जाता था, बहुत बड़ी मात्रा में निर्मित हथियारों के बल पर चोलवंशियों ने पूर्वी एशियाई देशों में 11वीं शताब्दी के मध्यकाल में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था।

लौह अयस्क खनन के लिये नन्दराज पर्वत सहित समूचे बस्तर की खुदाई सदियों से होते आ रही है, बस्तर का लोहा, बस्तर का हीरा, बस्तर की वन सम्पदा सबके काम आई, यहां के लड़ाकुओं ने 10 बड़ी लडाईयां लड़ी, अकूत धन संग्रह किये गये और कीर्तिमान के तमगे और कप सब संग्रहालय में सुरक्षित हैं। बस्तर का आदिवासियों को लूटते लूटते उनके अधमरे शरीर को आज चील कौओं के खाने के लिए छोड़ दिया गया है। सहनशीलता की पराकाष्ठा होती है, इन आदिवासियों ने इस लूट और भय को भेदते हुए उनके तमाम शक्तिशाली सैनिकों के खिलाफ रक्तिम विद्रोहों में शामिल होना नहीं छोड़ा है।

लंगोटी तो अब विदेशियों और देशी हुकमरानों के कैमरों में कैद है जो बच गया वह हमारे आपके मोबाईल में लुंगी के रूप में तन को ढकते उकेर आई है। किन्तु देख क्या रहा हूं जो लोग कहते हैं कि संघर्ष का फल मीठा होता है इनके हाथ कुछ भी तो नहीं आया? फल तो दूर खाली कटोरा भी नहीं?

आज के बस्तर के आदिवासी भी बैलाडीला में पाए जाने वाले पत्थरों से लोहा निकालने में सिद्धहस्त हैं। उनके सभी औजार स्थानीय लौह अयस्क से ही निर्मित होते आ रहे हैं। यदि आप भोपाल में मानव संग्रहालय आते हैं तो उन आदिवासियों के द्वारा लोहा निर्माण की विधि और इससे बने कलात्मक कृतियों से भी रू-ब-रू हो सकते हैं।परंतु विशाल पैमाने पर वहां तथा उसके आस-पास सैकड़ों किलोमीटर तक फैले तराई में जहां आदिवासी रहते हैं के बीच लौह अयस्क के उत्खनन एवं निर्यात की कुछ अलग ही कहानी लूट और साम्राज्य स्थापित करने से जुड़ा हुआ है। यह भी जानकारी लिख लीजिए कि 19वीं शताब्दी के आरंभ में आगरिया आदिवासियों के कम से कम 441 परिवार घरेलू भट्टियों में आयरन ओर से इस्पात बनाने का काम करते करते मरते खपते चले आ रहे हैं।

बैलाडीला की पहाड़ियों में प्रचुर मात्रा में उच्चतम कोटि के लौह अयस्क के खुले भंडार हैं, बताते चले यह छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित है। आदिवासियों के कुर्बानियों के बीच खड़ा इस औद्योगिक क्षेत्र के दो प्रमुख नगर हैं। पहला किरन्दुल और दूसरा बचेली। जहां आदिवासी दूर-दूर तक नजर नहीं आते। 

आज से वर्षों पहले लिखा गया था कि बैलाडीला पहाड़ बैल के डीला के आकार का होने के कारण इस नाम से पुकारा जाता है लेकिन मुझे ऐसा क्यों लगता है कि यह डीला कुछ वर्षों बाद नहीं लिखा जाएगा क्योंकि उस समय यह दिखेगा ही नहीं और सिर्फ बचा रहेगा बैला।डीला बड़ी-बड़ी विदेशी मशीनों के उत्खनन के बाद उजाड़ मैदान में त्राही मचाते नजर आएंगे। यह पहाड़ समुद्र की सतह से 4133 फीट ऊंचा है। इस पहाड़ के ऊपर दो रेंज बराबर मिली हुई चली गयी हैं जिनके बीचों बीच साफ नैसर्गिक मैदान हैं। यहां से तीन बड़ी नदियां निकलती हैं जिनके किनारे किनारे बेंत का सघन जंगल हमें आकर्षित करता है।

मार्च 1960 में भारत सरकार एवं जापानी इस्पात मिलों के संघठन के मध्य अनुबंध के तहत बैलाडीला से 40 लाख टन एवं किरिबुरू (उड़ीसा) से 20 लाख टन कच्चे लोहे का निर्यात जापान को किया जाना तय हुआ। इसके लिए आवश्यक था कि बैलाडीला के चयनित भंडार क्रमांक 14 के रूप में चिन्हित क्षेत्र में आवश्यक विकास तथा संयंत्रों की स्थापना की जावे। 

इन बुनियादी सुविधाओं के निर्माण के लिए जापान की सरकार ने आवश्यक भारी उपकरण, तकनीकी सहायता तथा धन राशि उपलब्ध कराई जिसका समायोजन निर्यात किए जाने वाले लौह अयस्क को कोड़ी के मोल लूट कर ले जाना था। योजना का क्रियान्वयन राष्ट्रीय खनिज विकास निगम के द्वारा किया गया। उन दिनों अखबार में खबर थी कि लौह अयस्क के निर्यात किए जाने के लिए पूरा खर्च जापान वहन कर रही है और वह 20 वर्षों तक वहां के अयस्क का दोहन करेगी। 

जानकारों के अनुसार जून 1963 में वहां कार्य प्रारंभ किया गया और 7 अप्रैल 1968 को सभी प्रकार से पूर्ण हुआ। लौह अयस्क का निर्यात इसके पूर्व से ही प्रारंभ हो गया था। अब इन पहाड़ियों में चीन से निर्मित सॉवेल काम कर रहे हैं। यहां पाए जाने वाला लौह अयस्क फ्लोट ओर कहलाता है अर्थात जो सतह पर ही मिलता हो और जिसके उत्खनन के लिए जमीन का उत्खनन कर अंदर नहीं जाना पड़ता। 

अब बात आती है उसके निर्यात की। अनुबंध हुआ कि लौह अयस्क समुद्री मार्ग से ही जाएगा। बैलाडीला के लिए निकटतम बंदरगाह विशाखापट्नम था। सड़क मार्ग से अयस्क की ढुलाई लगभग असंभव बात थी। इसलिए बैलाडीला के तलहटी से विशाखापट्नम को जोड़ने के लिए 448 किलोमीटर लंबे रेलमार्ग के निर्माण का भी प्रावधान परियोजना में शामिल किया गया। यही सबसे बड़ी चुनौती भी रही। भारत के सबसे पुरानी पूर्वी घाट पर्वत श्रृंखला को भेदते हुए लाइन बिछानी थी। 

पर्वत श्रृंखला  को भेदना आसान नहीं क्योंकि पूर्वी घाट पर्वत श्रृंखला की चट्टाने क्वॉर्ट्साइट श्रेणी की थी और वर्षों के मौसमी मार से जर्जर हो चली थीं। ऊंचाई भी 3270 फीट, कदाचित विश्व में इतने अधिक ऊंचाई पर ब्रॉड गेज की रेल लाइन की परिकल्पना अपने आप में अनोखी थी। इसके लिए दंडकारण्य बोलंगीर किरिबुरू रेलवे प्रॉजेक्ट  परियोजना बनाया गया।

जापान के साथ करार के तहत 20 लाख टन लौह अयस्क किरिबुरू (उड़ीसा) से भी निर्यात किया जाना था इसके लिए तीन नये रेल लाइनों की आवश्यकता थी परंतु जहां तक बैलाडीला का सवाल है, इसके लिए विशाखापट्नम से 27 किलोमीटर उत्तर में कोत्तवलसा से किरन्दुल तक 448 किलोमीटर लंबी लाइन बिछानी थी। लूट को आसान करने वाले इंजीनियरों ने असंभव को संभव कर दिखाया वह बहुत ही कम समय में। इस तरह 87 बड़े बड़े पुल जो अधिकतर 8 डिग्री की मोड़ लिए और कुछ तो 150 फीट ऊंचे खम्बों पर बने, 1236 छोटे पुलिए, 14 किलोमीटर से भी लम्बी सुरंगें।

सबसे बड़ी कठिनाई थी कार्य स्थल पर भारी उपकरणों को पहुंचाना। यहां तक  लोहे और सीमेंट को भी ले जाना भी दुष्कर ही था। कार्य प्रारंभ हुआ था 1962 में और 1966 में यह रेलवे लाइन तैयार हो गयी। लौह अयस्क की ढुलाई 1967 में प्रारंभ हुई। इस पूरे परिश्रम की लागत थी मात्र 55 करोड़ और आज होता तो 5500 करोड़ लगते। इस बीच पर्यावरण की रक्षा को नजरअंदाज किया गया। बड़ी तीनों नदियां प्रदूषित हो गई हैं।

कई आदिवासी प्रजाति खत्म होने के कगार पर है। जैव विविधता विनाश के चरम सीमा में पहुंच चुके हैं। विशाखापट्नम से बैलाडीला (किरंदुल) रेल मार्ग को (कोत्तवलसा- किरंदुल) लाइन कहा गया था। आजकल विशाखापट्नम से एक्सप्रेस रेलगाड़ी चलती है। सितम्बर 1980 से यह रेल मार्ग विद्युतिकृत है, जब की भारत के महत्वपूर्ण लाईने भी विद्युतिकृत नहीं हुई थीं। ऊंचे पहाड़ियों पर से गुजरने के कारण भू परिदृश्य अद्वितीय है।

बताया यह भी जाता है कि यह गाड़ी अरकू घाटी (फूलों की घाटी) से जब गुजरता है तो सांस थम सी जाती है। यहीं बोर्र गुहालू नाम की विख्यात गुफा भी है जिसके अन्दर बिजली से प्रकाश की व्यवस्था की गयी है। इसी नाम का स्टेशन भी है। बताया जाता है कि विशाखापट्नम में जापान के जहाज लंगर डाले खड़े रहते थे। किरंदुल से लौह अयस्क रेलगाड़ी में पहुंचता और सीधे जहाज के गोदी में डिब्बे उलट दिए जाते। एक जहाज में आठ रेलगाड़ियों का माल समा जाता था।

बात हमने बैलाडीला के लौह अयस्क से शुरू की है तो इसके उत्खनन के बाद विशाखापट्नम में एक इस्पात संयंत्र का स्थापना कर लौह अयस्क से इस्पात निर्माण के कार्य पूरे किए गए। जापान को पहुंचाने के बाद बैलाडीला क्षेत्र के लौह भंडार का पूरा उपयोग एक अकेले संयंत्र के बूते के बाहर है, इसलिए बस्तर के विकास का नाटक करते हुए 14000 करोड़ रुपयों के निवेश से जगदलपुर के समीप नगरनार में एक एकीकृत इस्पात संयत्र की स्थापना किया गया। 

लूट के लिये लंबी पाइपलाइन का निर्माण

इस कहानी को पलटते हुए लूट की दूसरे अध्याय की आवरण कथा को भी सुन लीजिए। एस्सार ने 2006 में ही बस्तर के बैलाडीला से विशाखापटनम तक 267 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन का निर्माण किया है। दुनिया की दूसरी सबसे लंबी पाइपलाइन के सहारे हर साल 80 लाख टन लौह अयस्क के चुरे की ढुलाई की जा रही है। कुछ आंकड़े बताते हैं कि प्रतिदिन 22 हजार टन लौह अयस्क इन्द्रावती नदी के पानी के दबाव से विशाखापट्टनम पहुंचाया जाता है।

अब लौह अयस्क बाहर जाएगा ही जाएगा साथ ही हमारी जीवनदायिनी नदियों की पानी भी लूट लिए जा रहे हैं। जानकारों की माने तो पाइपलाइन के लिए 8.4 मीटर चौड़ाई की जरुरत थी, लेकिन एस्सार कंपनी ने 20 मीटर की चौड़ाई में सारे पेड़ काट डाले। कई पेड़ कई सौ साल पुराने बताए जा रहे हैँ। हां इस बीच एस्सार वाले बैलाडीला से लौह अयस्क को चूर्ण के रूप में (पानी के साथ) पाइप लाइन के माध्यम से विशाखापट्नम पहुंचाने मे सफल रहे हैं।

1997 के एक दूरसंवेदी अध्ययन में वन क्षेत्र घटने की पुष्टि हुई है। स्थानीय जल स्त्रोत शंखिनी और डंकिनी नदियां प्रदूषित हो गई है, शंखिनी तो अब लाल पानी कहलाने लगी है। फिर भी, इसके किनारे बसे करीब 100 गांवों के लोगों के दैनिक जरूरतों के लिए नदी का जल ही एकमात्र आधार है। कई गांव के लोग इस नदी में डूबकर आवागमन करते हैं। लगभग चार दशकों से एनएमडीसी बैलाडीला खदानों से निकला कचरा सीधे शंखिनी में बहा देता है। 

लिहाजा नदी में गहरे लाल रंग का पानी बहता है। नदी की धारा आगे बढ़ने और किनारों पर कचरा बैठ जाने से पानी का रंग कुछ हल्का मटमैला लाल होता जाता है। पहले निकला कचरा और कीचड़ बांध के पास जमा होते होते काले रंग के पठार में बदल गया है, वन पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक इलाके के कई प्राकृतिक जल स्त्रोतों की धारा बदल गई है। कई हेक्टेयर की खेती और जंगल बरबाद हुए हैं शंखिनी और डंकिनी नदियों के पास के 65 गांव प्रभावित हुए हैं।

साल 1998 में बैलाडीला से दूर रावघाट में नई खदान का प्रस्ताव पेश किया गया है। मंत्रालय ने कहा कि इससे 1000 हेक्टेयर घना वन क्षेत्र उजड़ जाएगा। कंपनी को रावघाट की खदानों की बेतहाशा जरूरत थी क्योंकि दल्ली राजहरा में उसको अपनी खदानों का भंडार तेजी से खत्म हो रहा था। इसलिए उसने एक नई योजना पेश की जिसमें एक नई तकनीक ड्राबेनेफिकेशन संयंत्र लगाने की बात थी। राज्य सरकार ने भिलाई इस्पात संयंत्र को रावघाट में खुदाई के लिए अपनी आधिकारिक मंजूरी जनवरी 2007 में दे दीॅ है। जैवविविधता योजना की एक पहल में बैलाडीला पहाड़ियों को जैवविविधता सघन क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की गई है। इसका यह भी मानना है कि एनएमडीसी को उजाड़े गए क्षेत्र में जैवविविधता के पुनर्जीवित और बाकी बचे इलाकों के संरक्षण का जिम्मा उठाना चाहिए। 

खदान वाले क्षेत्र में खनन का काम बंद करने और हरियाली के संरक्षण के लिए वन रोपण की योजनाएं चलाई गई लेकिन कंपनी ने गुलमोहर और यूक्लीपटस के पौधे रोपे, जो यहां के लिए विजातीय है। 

पहले भी हुवे कई आंदोलन

25 हजार आदिवासियों ने शुक्रवार यानी 7 जून 2019 को छत्तीसगढ़ के बस्तर में बैलाडीला पहाड़ियों में एनएमडीसी को आवंटित एक लौह अयस्क खदान के खिलाफ जंगी विरोध प्रदर्शन किया था। नक्सल प्रभावित बस्तर के दंतेवाड़ा जिले में एनएमडीसी को बैलाडीला डिपॉजिट '3 आवंटित किया गया था। राज्य द्वारा संचालित लौह अयस्क खननकर्ता क्षेत्र में किरंदुल तथा बचेली यंत्रीकृत खानों का संचालन करता है। विश्वस्तरीय लौह अयस्क भंडारों से संपन्न बैलाडीला पहाड़ियों का एक बड़ा हिस्सा माओवादियों के मजबूत प्रभाव में रहा है। एनएमडीसी ने 2008 में छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम (सीएमडीसी) के साथ एक संयुक्त उद्यम का गठन किया। नई इकाई एनसीएल (एनएमडीसी-सीएमडीसी) ने 2015 में पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त की, जो खदान के पट्टे क्षेत्र में फैले हुए खदान से 10 मिलियन टन  लौह अयस्क का था 413.74 हेक्टेयर में। डिपॉजिट '3 में उच्च श्रेणी के स्टील बनाने वाले कच्चे माल का 326 मिलियन टन का विशाल भंडार है।

एनसीएल ने खदान के विकास और संचालन के लिए निजी कंपनियों से प्रस्ताव आमंत्रित करते हुए एक वैश्विक निविदा मंगाई। बोली में भाग लेने वाली 10 कंपनियों में से, अदानी एंटरप्राइजेज (एईएल) को सफल बोलीदाता के रूप में चुना गया और दिसंबर 2018 में खनन ठेकेदार के रूप में नियुक्त किया गया। बताया जाता है कि नंदराज पहाड़ी और पिट्टोड रानी के इस विशालकाय कच्चा लोहा से परिपूर्ण पहाड़ में 35 करोड़ टन कच्चा माल मौजूद है जिसे उत्खनन करने के लिए एनएमडीसी और सीएमडीसी के साथ बड़े पूंजीपति अदानी तत्पर हैं। बताया जाता है कि 80 पंचायत के लोग इस पहाड़ जिसे हम एनएमडीसी की भाषा में डिपोजिट 13 कहते हैं बचाने के लिए अपने घर से राशन पानी इंधन के साथ पहुंचे थे। 413 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला 326 मैट्रिक टन कच्चा लोहा जो दुनिया का सबसे अच्छा कच्चा लोहा में गिनती होती है उसके उत्खनन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है।

अब तक लगभग 3 लाख पेड़ इन अनुसूचित क्षेत्र में काट लिए गए हैं। सात दिनों तक चली इस आंदोलन में 200 आदिवासियों का स्वास्थ्य खराब हो चुका था। इस ज्वाइंट वेंचर में एनएमडीसी और सीएमडीसी के बीच 51 अनुपात 49 का शेयरहोल्डर है। एक आधिकारिक बयान में कहा गया कि उत्खनन और खदान विकास का ठेका अदानी एंटरप्राइजेस को माइन डेवलपर-कम-आपरेटर (एमडीओ) के रूप में काम करने के लिए दिया गया है। राज्य के स्वामित्व वाली एनएमडीसी ने 7 जून को कहा कि बैलाडीला लौह अयस्क डिपॉजिट'3 को एक संयुक्त उद्यम के तहत विकसित किया जा रहा है, जबकि यह स्पष्ट है कि इसका खनन पट्टा अदानी एंटरप्राइजेज को हस्तांतरित नहीं किया जाएगा जो परियोजना के लिए एक खान-डेवलपर-सह-आपरेटर है। 

अदानी की कंपनी अदानी इंटरप्राईजेज प्रा. लि. के द्वारा लौह-अयस्क का उत्खनन करने के लिए 2,000  पेड़ों को काटकर, जलाते हुए राख में तब्दील कर दिया गया। अदानी कंपनी ने 25,000 पेड़ों को काटने के लिए सरकार से अनुमति हासिल कर ली थी। यह संख्या सिर्फ बड़े पेड़ों की है। 

छोटे-छोटे पेड़ और पौधों को नहीं गिना गया है। इन्हें कौन गिनेगा? क्या इनके अस्तित्व को नकारना सही है? यदि सभी पेड़-पौधों को गिना जायेगा तब यह संख्या लाखों में होगी। यह सोचनीय बात है कि जब खनन कार्यों के लिए सरकार हजारों पेड़ों को कटवाती है और कारपोरेट घरानों को जंगल उजाड़ने की अनुमति देती है तब उसे वैध कहा जाता है। लेकिन जब जंगलों की रक्षा करने वाले आदिवासी अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पेड़ काटते हैं तब सरकार उसे अवैध करार देती है और पेड़ काटने वाले आदिवासियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल में डाल देती है। ऐसी दोहरी मापदंड क्यों है? जबकि हकीकत यह है कि जिन इलाकों में आदिवासी रहते हैं वहीं जंगल बचा हुआ है। इस आंदोलन के दौरान अनुमान लगाया गया कि राज्य द्वारा संचालित राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) को प्रतिदिन लगभग 12 करोड़ रुपये का नुकसान हुवा है क्योंकि कंपनी को आवंटित एक खदान के विरोध में आदिवासियों की हड़ताल के बाद छत्तीसगढ़ की परियोजनाओं पर परिचालन ठप हो और बाद में इस योजना को बंद करना पड़ा। 

यहां की पहाड़ियां आदिवासियों के लिये देवता का घर
 
आदिवासियों के लिये डिपोसिट 13 हो या 14 इन पहाड़ियों का उनके लिए धार्मिक महत्व है क्योंकि यह उनके देवता का घर है। आदिवासी इस बात पर अड़े थे कि वे किसी भी कीमत पर खदान को उनके मांगो के ना मानने तक नहीं शुरू होने देंगे। कई लोगों ने घटनास्थल पर पहुंचने के लिए 50 किलोमीटर की यात्रा की। अदानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (एईएल) को खनन ठेकेदार के रूप में नियुक्त किया गया था। एनएमडीसी और छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम (सीएमडीसी) के संयुक्त उपक्रम एनसीएल को डिपॉजिट के लिए खनन पट्टा जारी किया गया था। 

बाद में राज्य सरकार ने परियोजना से संबंधित कार्यों को तत्काल रोकने का आदेश जारी किया। इसने पेड़ों की अवैध कटाई की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। सरकार ने 2014 में आयोजित ग्राम सभा की जांच करने का आश्वासन दिया था कि ग्रामीणों ने उस ग्राम सभा को नकली करार दिया है। अधिकारियों का कहना है कि ग्राम सभा ने 10 मैट्रिक टन प्रतिवर्ष खदान के विकास के लिए सहमति दी थी। 

आदिवासियों की चिंता कितनी जायज

देश के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। लोग भीषण गर्मी से तबाही झेल रहे हैं और सत्ताधीश विकास के नाम पर जंगलों को पूंजीपतियों को सौंपते जा रहे हैं। सत्ताधीशों को तथाकथित विकास के नामपर जंगलों को उजाड़े देते रहेंगे तो वह दिन दूर नहीं जब तापमान 50-55 डिग्री के पार चला जायेगा और हमारे पास तड़प-तड़पकर मरने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचेगा। 

हमारे देश में जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा को बचाने के लिए संघर्षरत आदिवासियों को विकास विरोधी कहा जाता है। लेकिन अभी यह समझने की जरूरत है कि यदि आदिवासी प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए संघर्षरत हैं तो वे न सिर्फ आदिवासी समुदाय और प्रकृति को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं बल्कि धरती और जीवन का भविष्य उनके संघर्ष पर टिका हुआ है। इसलिए अब उन्हें विकास विरोधी बोलने के बजाय हमें उनके संघर्ष का हिस्सा बनना चाहिए। 

आंदोलन के दौरान एनएमडीसी को प्रतिदिन 12 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा था, कंपनी को 35-40 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ सरकार भी प्रति दिन 10 करोड़ रुपये का घाटा उठा रही है, जो एनएमडीसी से रॉयल्टी के रूप में और जिला खनिज फाउंडेशन (डीएमएफ) से कमा रही थी। 

विकास के नामपर पेड़ों को काटने, जंगलों को उजाड़नेऔर पहाड़ों को बेचकर पूंजीपति, सत्ताधीश और नौकशाहों का खजाना भरने के लिए हमारे दिमाग में यह डाल दिया गया है कि विकास करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जरूरी है। देश में ऐसा मान्यता स्थापित कर दिया गया है। इतना ही नहीं प्रकृति के साथ जीने वाले आदिवासियों को असभ्य, जंगली और पिछड़ा कहा जाता है तथा जो लोग कांक्रीट के जंगलों में रहते हैं उन्हें सभ्य, शिक्षित और विकसित। इसलिए बहुसंख्य लोग पेड़ काटने, जंगल उजाड़ने और पहाड़ों को तोड़ने पर सवाल नहीं उठाते हैं और पर्यावरण पर होने वाले असर के बारे में भी बात नहीं करते हैं। जबकि हकीकत यह है कि विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन हो रहा है। देश के जिन आदिवासी बहुल क्षेत्रों से अरबों रुपए का लौह-अयस्क, बाक्साईट, कोयला, इत्यादि निकाला जा रहा है उन क्षेत्र के लोगों को अपनी आजीविका के लिए संषर्घ करना पड़ रहा है और जंगल भी खत्म हो रहा है। 

विकास के नाम पर जंगलों को उजाड़ने का आंकड़ा भयावह है। 1980 से 2018 तक विकास के नामपर 26,194 परियोजनाओं के लिए 15,10,055.5 हेक्टेयर जंगलों  को उजाड़ा गया है। इसमें सबसे ज्यादा आश्चर्य करने वाली बात यह है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र से चैम्पियन आफ अर्थ पुरस्कार जीतने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में 2014 से 2018 तक 2,347 परियोजनाओं के लिए 57,864.466 हेक्टेयर जंगलों को विकास नामक दानव के हवाले कर दिया गया। इतना ही नहीं 2019 में अबतक 954 परियोजनाओं के लिए 9,383.655 हेक्टेयर जंगलों को विकास की बली बेदी पर चढ़ाया जा चुका है एवं अभी और कई जंगलों और पहाड़ों को विकास के नाम पर उजाड़ने की तैयारी चल रही है। भारत सरकार का ह्यवन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय देश में मौजूद जंगलों और पहाड़ों को पूंजीपतियों को सौंपने के लिए निरंतर प्रयासरत है। 

ग्राउंड जीरो से रिपोर्ट भाग - 1
 


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