छत्तीसगढ़ में पेसा कानून के तहत नियम नहीं बना 

छत्तीसगढ़ पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) नियम, 2022 में विसंगतियां

द कोरस टीम

 

ग्राम स्वराज की परिकल्पना के तहत दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में 90 के दशक में दो बड़े बदलाव हुए. उदारीकरण की नीति आई और ग्राम स्वराज की परिकल्पना की गयी. एक ओर उदारीकरण की नीति के तहत देश के कई कानूनों में शिथिलता लाते हुए उद्योग धंधों को बढ़ावा देने के नाम पर कठोर नियमों में बदलाव किए गए और दूसरी ओर इस देश में सत्ता का विकेंद्रीकरण किया गया. जिसके तहत 1992 में 73वां संविधान संशोधन अधिनियम लाया गया और उसमें जैसे केंद्र में लोक सभा है, राज्य में विधान सभा है, उसी प्रकार गांव में ग्राम सभा को जगह दी गई. इसके साथ ही ग्राम सभाओं को शक्ति दी गई कि गाँव के स्तर पर ग्रामसभा सभी तरह के कामकाज को अपनी परंपरा के अनुसार करने के लिए सक्षम है. गांधी जी के सपनों का ग्राम स्वराज को पूरा करने के लिए सबसे निचले स्तर पर पंचायती राज व्यवस्था के माध्यम से सशक्त ग्राम सभा की परिकल्पना की गई और संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची के 29 विषयों को ग्राम पंचायत स्तर पर या ऐसा कहें कि ग्रामीण विकास की अवधारणा को लेकर ग्राम सभा को सशक्त करने के लिए सौंपा गया.

संवैधानिक व्यवस्था

पंचायती राज व्यवस्था देश में 1993 में लागू की गई लेकिन ग्राम स्वराज की स्थापना के लिए जो प्रावधान संविधान में अनुच्छेद 243 (ड) के रूप में जोड़ा गया उसमें कहा गया कि पंचायती राज व्यवस्था पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में लागू नहीं होगी. इसका मतलब स्पष्ट है कि पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था जैसी कोई भी व्यवस्था पहले से नहीं थी इसलिए वहां पर यह लागू नहीं हो सकती है और यदि लागू करना है तो भारत सरकार को इसके लिए अलग से कानून बनाकर उसको विस्तारित करना पड़ेगा.

अपवादों और उपन्तारणों के साथ लागू 

1993 की पंचायती राज व्यवस्था को पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में भी विस्तार करने की बात संविधान के अनुच्छेद 243 (ड) के पैरा 4 के उप पैरा (ख) में कही गई है. उसमें कहा गया है कि यदि संसद चाहे तो अपवादों और उपन्तारणों के साथ उसे विस्तारित कर सकता है. इसका मतलब है कि पंचायती राज व्यवस्था अनुसूचित क्षेत्रों में सशर्त लागू होगी. संविधान के भाग 9 के अपवादों और उपान्तरणों (पेसा की धारा 4) के साथ लागू करने की बात संविधान का अनुच्छेद 243M (4) (b) में निर्देशित है, जो पाँचवी अनुसूची के पैरा 5(1) से लिया गया है. मतलब पंचायत कानून की साधारण सरंचना से अनुसूचित क्षेत्रों की विकेन्द्रित प्रशासनिक व्यवस्था अलग होगी जिनका रूढीजन्य विधि, सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं तथा सामुदायिक संसाधनों की परंपरागत प्रबंध पद्धतियों के अनुरूप होना आवश्यक है। इसका अर्थ है कि संघ तथा राज्य सरकार के सारे कानूनों को अनुसूचित क्षेत्र में संशोधन कर लागू करना होगा.

इसी के तहत 24 दिसंबर 1996 को पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 देश के सभी अनुसूचित क्षेत्रों में लागू किया गया. जिसे हम पेसा कानून के नाम से जानते हैं. यहां पर गौर करने वाली बात यह है कि आज 25 साल बाद भी इस कानून के क्रियान्वयन को देखेंगे तो यह सही तरीके से नहीं हो पाया है. ऐसे समय में इस कानून को लागू करने के लिए अभी 2022 में नियम बनें हैं. इसका क्रियान्वयन कैसे होगा यह बहुत बड़ा सवाल है। क्योंकि सभी कानून जो पेसा की धारा 4 से असंगत है, को पहले संशोधित कर लागू करना होगा. क्योंकि पेसा कानून के 1996 में लागू होने के बाद उसकी धारा 5 के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों में जो कानून प्रवृत थे उन्हें पेसा में दिए गए अपवाद और उपान्तरण के अनुसार एक साल के भीतर सुधारते हुए संशोधन के साथ लागू किया जाना चाहिए था. लेकिन असल में हम देखते हैं कि आबकारी अधिनियम, पंचायत राज अधिनियम, भू - राजस्व संहिता इत्यादि गिने चुने 5-6 कानूनों के अधिनियम/नियम में ही संशोधन किए गए और बाकी को नहीं सुधारा गया.

पेसा कानून

संविधान की 11वीं अनुसूची में 29 विषय हैं, उन 29 विषयों को पंचायत के माध्यम से गांव में क्रियान्वयन करना है. ऐसे में आप समझ सकते हैं कि कितने कानूनों में बदलाव की आवश्यकता है और जो आज तक नहीं हुए हैं. पेसा ग्राम स्वराज की स्थापना के लिए महती भूमिका निभाने वाला कानून है जिसका नियम अभी 8 अगस्त 2022 को अधिसूचित हुआ है. भारत की अधिकांश जनसंख्या गांव में बसती है. वहां पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और ग्रामीण विकास को ध्यान में रखते हुए यह यह कानून आने वाले समय में बहुत अहम भूमिका निभाने वाले हैं.

पिछले 27 सालों में अभी तक ग्राम पंचायत को ग्रामसभा से बड़ा माना जाता रहा है लेकिन ऐसा नहीं है. ग्राम सभा सर्वोपरि है. पंचायत, ग्रामसभा की कार्यपालिका होगी और उनके द्वारा लिए गए निर्णय व अनुमोदन का क्रियान्वयन करेगी. लेकिन यह बात ग्रामसभा को ही नहीं पता है और उसमे जागरूकता की कमी हैं. इस जागरूकता की कमी के चलते पंचायत उच्च स्तर की संस्थाओं के माध्यम से निर्देशित और संचालित होती है जो कानून के विपरीत है. पेसा कानून की धारा 4 में स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारतीय संविधान के भाग 9 में किसी बात के होते हुए भी राज्य का विधान मंडल उस भाग के अधीन कोई भी कानून नहीं बनाएगा जो उस के (क) से (ण) तक की विशेषताओं से असंगत हो. इसके तहत विधान सभा में बनने वाले सभी कानून जो अनुसूचित क्षेत्र में लागू होने वा होंगे उन सभी कानूनों को बनाने के लिए या बनाने से पहले अनुसूचित क्षेत्रों के ग्राम सभाओं से परामर्श/सहमती लेना अनिवार्य है.

5वीं अनुसूची

मध्य भारत के राज्यों में सबसे बड़ा अनुसूचित क्षेत्र वाला राज्य छत्तीसगढ़ है, जहाँ के भू-भाग का करीब 60 प्रतिशत भाग अनुसूचित क्षेत्र है. इन 27 सालों में पंचायती राज व्यवस्था के माध्यम से जो विकास अनुसूचित क्षेत्रों में होना था वह नहीं हुआ है. त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में ग्राम सभा को जो निर्णय लेने के अधिकार थे उस अधिकार को कम किया जा रहा है. यह इसलिए हो रहा है क्योंकि नियम में स्पष्टता का अभाव है. तब सवाल खड़ा होता है क्या ऐसा नियम आ जाने से ग्राम सभाएं सशक्त हो सकेंगी? यह आने वाला समय ही बताएगा. जिस तरीके से पंचायती राज व्यवस्था को लागू किया गया वह गांव में व्यवस्था बनाने के बजाय उसे बिगाड़ने वाली व्यवस्था बनते जा रही है. ऐसे में सवाल खड़े होता है कि आने वाले समय में व्यवस्थाएं सुधरेगी क्या? जिस तरीके के जागरूकता होनी चाहिए वह आज भी नहीं है.

यह सच्चाई है कि गाँव गणराज्य की मूल चेतना विकास की दौड़ में अनदेखी रह गयी है. वहां टकराव जैसी स्थिति बनती गयी है. आदिवासी इलाको में स्थानीय परंपरागत सामाजिक आर्थिक व्यवस्था और राज्य औपचारिक तंत्र के बीच की विसंगति गहराती गयी है जिसका मुख्य कारण है आदिवासी इलाकों में 5वीं अनुसूची के प्रावधानों का ईमानदारी से अमल ना करना. आदिवासी इलाकों के परंपरागत व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए तथा लोकतान्त्रिक विकास के लिए 5वीं अनुसूची के प्रावधानों का पालन तथा राज्य सत्ता से जुड़े नेतृत्व, विभागीय अधिकारी एवं कर्मचारीगण, पंचायत सदस्यों को इस पेसा कानून एवं नियम को आत्मसात करने के लिए बड़ा कदम उठाना होगा तथा गाँव के लोगों को भी इस परिवर्तनकारी बदलाव को समझना होगा. लोग ग्रामसभा की गरिमामयी भूमिका का एहसास करें और आत्मविश्वास के साथ अपनी व्यवस्था का संचालन अपने हाथ में लेंगे तभी समाज के शोषण में कमी, समाज का सशक्तिकरण और आर्थिक विकास आदिवासी मानक परंपरा के अनुरूप हो सकेगा और राज्य की व्यवस्था के बीच गहराती विसंगति और बढ़ते टकराव में कमी आएगी.

प्रशासन और नियंत्रण

संविधान की पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों, जो प्राचीन रीति-रिवाजों और प्रथाओं की एक सुव्यवस्थित प्रणाली के माध्यम से अपने प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन करते हैं। और अपने निवास स्थान में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन को संचालित करते हैं, के प्रशासन और नियंत्रण के सम्बन्ध में पेसा कानून में प्रावधान किया गया है। इस सामाजिक परिवर्तन के युग में आने वाली चुनौती का सामना करने के लिए आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक - आर्थिक परिवेश को छेड़े या नष्ट किए बिना उन्हें विकास के प्रयासों की मुख्यधारा में शामिल करने की अनिवार्य आवश्यकता महसूस की गई है. अनुसूचित क्षेत्र में ग्राम सभाओं और पंचायतों को लोगों की परंपराओं और रीति-रिवाजों को सुरक्षित और संरक्षित करने का अधिकार दिया गया है, उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संसाधन और विवाद समाधान और स्वामित्व के प्रथागत तौर - तरीके, गौण खनिज, लघु वन उपज का स्वामित्व आदि के सम्बन्ध में प्रावधान किये गए हैं.

पेसा का प्रभावी क्रियान्वयन क्यों जरुरी

पेसा का प्रभावी क्रियान्वयन न केवल विकास लाएगा बल्कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में लोकतंत्र को भी गहरा व मजबूत करेगा। इससे निर्णय लेने में लोगों की भागीदारी में वृद्धि होगी। पेसा आदिवासी क्षेत्रों में अलगाव की भावना को कम करेगा और सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग पर बेहतर नियंत्रण स्थापित करेगा। पेसा से जनजातीय आबादी में गरीबी और अन्यत्र स्थानों पर पलायन कम हो जाएगा क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण और प्रबंधन से उनकी आजीविका और आय में सुधार होगा। पेसा पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में शोषण को कम करेगा क्योंकि वहां की ग्राम सभाएं उधार पर लेन-देन एवं शराब की बिक्री खपत पर नियंत्रण रख सकेगी एवं गांव बाजारों का प्रबंधन करने में सक्षम होगी। पेसा के प्रभावी क्रियान्वयन से भूमि के अवैध हस्तान्तरण पर रोक लगेगी और आदिवासियों की अवैध रूप से हस्तान्तरित भूमि वापस किया जा सकेगा. सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि पेसा परंपराओं, रीति रिवाजों और गाँव की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण के माध्यम से सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देगा।

पेसा कानून और पेसा वर्तमान नियम में फर्क

पेसा कानून (धारा 4 ख) गाँव को नए सिरे से परिभाषित करते हुए कहता है कि आवास या आवासों के समूह जहाँ समाविष्ट समुदाय अपनी परम्पराओं से अपने क्रियाकलापों का प्रबंध करता है। अर्थात आम तौर पर छोटा समूह जो आपस में जुड़ा हुआ होता है। ऐसे गाँव के लोग स्वयं गाँव बनाने की प्रक्रिया करेंगे, जिसको सरकारी व्यवस्था अपने कागजात में दर्ज कर मान्य करेगा.

पेसा कानून सरंचनागत रूप से सुझाया है कि पंचायत, ग्रामसभा की कार्यपालिका के रूप में कार्य करेगा एवं पंचायत व्यवस्था, ग्रामसभा की शक्तियां और प्राधिकार को अपने हाथ में नहीं ले सकता है। (पेसा की धारा 4 द).

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ के पेसा नियम को देखें तो कहा जा सकता है कि पेसा कानून के तहत नियम नहीं बना है। इसलिए की नियम कानून के अनुरूप बनाया जाता है ना कि उसके विपरीत जा कर.

पेसा नियम बनाने के पहले छत्तीसगढ़ में प्रचलित सारे कानूनों को संशोधित कर विधानसभा में अनिवार्य रूप से पारित करना होगा। छत्तीसगढ़ के पंचायत राज अधिनियम 1993 में संशोधन सबसे पहले करना होगा। यह कार्य नहीं किया गया तो पेसा कानून के तहत नियम कैसे चल पायेगा? छत्तीसगढ़ में यह कार्य नहीं किया गया है। अभी संशोधन करना बाकी है. (पेसा की धारा 4 एवं 5).

अनुसूचित क्षेत्र के सभी जिलों में स्वशासी जिला परिषद् के जैसे जिला सरकार बनायीं जानी है. संविधान की 11वीं अनुसूची के अंतर्गत सारे 29 विषयों से संबधित विभागीय राशि, कर्मचारी तथा कार्य (Funds, Functions, Functionaries) को जिला सरकार को हस्तांतरित करने हैं. इस हेतु राज्य विधान सभा में कानून ला कर पारित करना अनिवार्य है। (पेसा की धारा 4 ) यह कार्य नहीं किया गया है, तो पेसा नियम कैसे चलेगा या कैसे कानून सम्मत होगा?

साथ ही यह नियम कब से लागू होगा इसमें संशय है क्योंकि ग्राम सभा अध्यक्ष का चयन पंचायत के प्रथम सम्मेलन के बाद करना है. मतलब अगले पंचायत चुनाव तक अध्यक्ष का चयन करने के लिए इन्तजार करना होगा जो कानून सम्मत नहीं है.

नियम 2 (2) : ग्राम: इसमें कहा गया की ऐसा गाँव, जिसमे साधारणतया आवास या आवासों का समूह अथवा छोटा गाँव या छोटा गाँव का समुह होगा, गठित किया जायेगा. इस हेतु जो समुदाय परम्पराओं और रुढ़ियों के अनुसार अपना कार्यकलापों को प्रबंधित कर रहा है, वह एक सामूहिक प्रस्ताव पारित कर गाँव बन सकता है, जिसे सरकारी व्यवस्था के तहत कागज़ में दर्ज किया जायेगा. लेकिन इसी बात को पेसा नियम के अध्याय-2 के कंडिका 4.2 में जिस तरह लिखा गया है कि, "कोई भी मोहल्ला या पारे की जनसंख्या जो मूल पंचायत की जनसँख्या का 1/3 या 100 जो अधिक हो, एक नया गाँव बनाने हेतु प्रस्ताव पारित कर सकता है कह कर पेसा कानून की धारा 4 (ख) का स्पष्ट हनन किया है, इसलिए कि पेसा कानून पारंपरिक गाँव को मान्यता दिया है, जिसमें पंचायत की जनसंख्या से कोई लेना देना नहीं होता है। ऐसा करने से पेसा कानून की मंशा के अनुरूप स्वशासी गाँव न हो कर सरकारी सुविधा के लिए एक क्षेत्र का निर्माण होगा।

नियम 2 (3): ग्रामसभा: अध्याय', परिभाषाएं की कंडिका 3 में ग्रामसभा की परिभाषा दी गयी हैं, “ऐसा निकाय जो ग्राम स्तर पर या उसके ऐसे भाग में, जिसके लिए उसका गठन किया जायेगा" कहा गया है. लेकिन अध्याय-2, नियम 5 ( 1 ) कहा गया है. परन्तु आवश्यकतानुसार ग्राम या ग्रामों के समूह के लिए एक से अधिक ग्राम सभाओं का गठन किया जा सकेगा." यह पेसा कानून के विरुद्ध है। ग्रामों के समूह के लिए कैसे एक से अधिक ग्रामसभाओं का गठन किया जा सकेगा यह समझ के बाहर हैं.

नियम 2 (5):लघु जल निकाय:“गाँव की सीमा सरचनाएं आएगी जिसकी क्षेत्रफल 10 हेक्टेयर तक होगा. " यह परिभाषा, वन अधिकारों की मान्यता कानून, 2006 में दिए गए अधिकारों का हनन है जिसमे स्पष्ट लिखा गया की गाँव की पारंपरिक सीमा में आनेवाले सारे संसाधन तथा सीमा से लगा हुआ जलागम क्षेत्र, जलस्रोत" पर ग्राम सभा का अधिकार होगा (RoFRA की धारा 5). उस क्षेत्र को सीमित करना वन अधिकार कानून तथा पेसा कानून 4(घ) एवं धारा 4(ढ) का हनन है। 

नियम 2 (6):साहूकार: छत्तीसगढ़ साहूकारी अधिनियम 1934 को संविधान की 5वीं अनुसूची पैरा 5 (2)(क) (ख) (ग) के अनुसार सुसंगत करते हुए संशोधन करना होगा, अर्थात साहूकारी में समस्त निजी सरकारी लेनदेन को शामिल करते हुए अनुसूचित क्षेत्र में भू-हस्तांतरण किसी भी हालत में नहीं होगा यह सुनिश्चित करना है, जो नियम में नहीं किया गया है।

नियम 5 (2): “नया ग्रामसभा गठन हेतु विद्यमान ग्रामसभा के 50% से अधिक कोरम" में संकल्प पारित करने के सन्दर्भ में ग्रामसभा के महिला सदस्यों का स्थान निश्चित न करना कानून की अवहेलना है।

नियम 5 (5) नए ग्रामसभा का गठन के संबंध में विहित अधिकारी को 'विनिश्चय करने का अधिकार देना पेसा कानून के स्वशासी चरित्र के विपरीत है. नए गाँव के गठन में कोई शिकायत का निराकरण ग्रामसभाओं की सम्मिलित सभा में लिया जा सकता है जिसके लिए विहित अधिकारी संयुक्त ग्रामसभा का आयोजन करते हुए भूमिका निभाएंगे. जब अधिकारीयों के हाथ में निर्णय लेने की क्षमता होगी तो गाँव या ग्रामसभा कभी भी कानून सम्मत स्वशासी नहीं हो सकता है।

नियम 6 (क): इस नियम में  जिस तरह भाषा का सरंचना किया गया है वह पूर्णतः पेसा कानून की विपरीत है। जब पेसा कानून की धारा 4 राज्य सरकार को पेसा असंगत कोई विधि-नियम आदेश नहीं बनाने के लिए आदेशित किया है, तो राज्य सरकार जब तक सारे कानून नियम आदेश नहीं सुधार लेता है तब तक ग्रामसभा राज्य द्वारा गलत विधि - नियम आदेश को मान्य क्यों करे? इसलिए छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 को पहले पेसा सुसंगत करना अनिवार्य है। साथ ही ग्राम सभा स्वायत्त हैं जो कि कानून और नियम से चलेगी ना कि राज्य के साधारण और विशेष आदेश से इसलिए ऐसा लिखना पेसा कानून के विपरीत है.

नियम 6 (2): भूमि के अनाधिकृत निर्माण तथा अतिक्रमण के संबंध में छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 में विद्यमान प्रावधान के अनुसार अनाधिकृत निर्माण तथा अतिक्रमण के संबंध में कब्जा हटाने के लिए पंचायत सक्षम है तथा आवश्यकता पड़ने पर वह तहसीलदार/अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) से सहयोग लेता है. विद्यमान अधिनियम में जब शक्ति दी गयी है तो इस नियम में उस शक्ति को घटाना कानून के विरुद्ध है।

नियम 6 (9): भूमि के अन्य संक्रमण तथा विधि विरुद्ध संक्रमित भूमि के प्रत्यावर्तन के संबंध में भू-राजस्व संहिता का धारा 170(ख) 2(क) में विद्यमान प्रावधान के अनुसार ग्रामसभा भूमि प्रत्यावर्तन के लिए अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) को आदेशित करेगा एवं ग्रामसभा के आदेश के 3 महीने में अनुविभागीय अधिकारी उस निर्देश का पालन करते हुए कार्यवाही करते हुए कब्ज़ा वापस दिलवाएगा। विद्यमान नियम में जब अनिवार्यता का प्रावधान है तो इस नियम में परामर्श शब्द का उपयोग करना कानून विरुद्ध है।

नियम 6 (11) : “योजना बना सकती है" के स्थान पर "बनाएगी" लिखना चाहिए जो कानून सम्मत होते हुए सरकारी विभागों के द्वारा उसके पालन को अनिवार्य करेगा.

नियम 7 (1): "ग्रामसभा अपने अध्यक्ष का निर्वाचन करेगा" लिखा है. जब ग्रामसभा अपनी पारंपरिक व्यवस्था का

अनुसरण करते हुए कार्य करेगा जहाँ चुनाव की कोई व्यवस्था नहीं है, तो निर्वाचन शब्द उपयोग न करते हुए पारंपरिक व्यवस्था को मान्य करना कानून सम्मत है। (पेसा कानून की धारा 4(क) एवं 4 (घ))

नियम 7(4): "बहुमत" शब्द का ग्रामसभा स्तर पर उपयोग करना ऐसा कानून का हनन है।

नियम 7 (5): जब पेसा कानून ग्राम स्तर पर पारंपरिक व्यवस्था को मान्य करने की बात करता है तो अध्यक्ष का पद चक्रानुक्रम में आरक्षित करने का कोई औचित्य नहीं है. यह राज्य सरकार द्वारा ग्रामसभा (ग्राम सरकार) जैसे संवैधानिक प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र पर अतिक्रमण है, जो गैर कानूनी है।

नियम 8(1): ग्राम पंचायत का सचिव जब ग्रामसभा का सचिव होगा तो ग्रामसभा कैसे संविधान सम्मत (पेसा कानून की धारा 4 घ) स्वशासी एवं संप्रभु होगा? अतः यह प्रावधान गैर संवैधानिक है। ग्रामसभा, ग्राम संसद है। भारत की संवैधानिक संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था में संसद की व्यवस्था स्वशासी है। अतः ग्राम संसद स्वयं अपनी व्यवस्था करेगी। यह नहीं होगा तो ग्रामसभा के ऊपर कार्यपालिका का नियंत्रण ही होगा, जिसकी पेसा कानून इज़ाज़त नहीं देता है। ग्राम पंचायत का सचिव सरकार नियुक्त कर सकती है जिसका काम होगा कि ग्राम सभा के सचिव के साथ समन्वय स्थापित कर कार्य करे.

नियम 9 : ग्राम सभा के दस्तावेज़ को ग्राम पंचायत में रखने से विक्रेंदिकरण होने की बजाए केंद्रीकृत व्यवस्था जो बनी हुई है वो जारी रहेगी। भारत का संसदीय लोकतान्त्रिक ढांचा' में विधान सभा/संसद का कार्यालय 'सचिवालय' में न होकर स्वतंत्र होता है. संविधान में दिए गए शक्ति का विभाजन (separation of power) के सिद्धांत का यहाँ पर अनुसरण नहीं किया गया.

नियम 10 ( कंडिका 5): ग्रामसभा की वार्षिक बैठक ग्राम पंचायत के मुख्यालय में होने से ग्रामसभा का सिर्फ एक प्रतिनिधात्मक चरित्र होगा जो कि पेसा कानून में बताये गए प्रत्यक्ष लोकतंत्र के चरित्र के विपरीत है.

नियम 11 (कंडिका 3): तीसरी बैठक में भी कोरम की अनिर्वायता होनी चाहिए। ग्राम में कोई भी निर्णय बिना कोरम के होना पेसा की भावना के विपरित है एवं गैर कानूनी है। दो स्थगित बैठक के बाद कम से कम 25 प्रतिशत कोरम पूर्ती वन अधिकार (मान्यता) कानून 2006 में दिए गए आवश्यक कोरम पूर्ती के प्रावधान के विपरीत होगा. अतः यह गैर-कानूनी है.

नियम 12 (कंडिका 3) : गुप्त मतदान की बात की गई है। गांव में कभी भी गुप्त मतदान की प्रथा नहीं रही है। बहुमत द्वारा गुप्त मतदान व्यवस्था पारंपरिक न होने के कारण अपवादों और उपान्तरणों' सिद्धांत का हनन करती है और इसलिए पेसा सम्मत नहीं हो सकती है. बहुमत से फैसला लिया जा सकता है, परंतु उसमें भी कोरम होना जरूरी होना चाहिए। सर्वसम्मति नहीं होने तक निणर्य आगामी बैठक तक स्थगित रखने की परंपरा गांव में है। उसी को यहां अपनाते हुए लिखना चाहिए।

नियम 13 (कंडिका 2): कार्यवाही पंजी एवं उपस्थिति पंजी अलग - अलग संधारित किये जाने से कार्यपालिका की शक्ति, विधायिका (ग्रामसभा) पर निर्णायक होने की आशंका है जो प्रक्रियागत रूप से गलत है.

नियम 14 (कंडिका 1): पुनर्विचार हेतु इस कंडिका में 30 दिवस' का प्रावधान, नियम 12 कंडिका 4 में अगली बैठक में पुनर्विचार' के प्रावधान का उल्लंघन है. नियम 14 (कंडिका 2) में अपीलीय अधिकारी 'अनुविभागीय 'अधिकारी' को बनाना विधायिका (ग्रामसभा) पर कार्यपालिका का हस्तक्षेप है जो भारत के संसदीय लोकतंत्र का हनन है. ग्राम सभा में पुर्नविचार नहीं होने पर या ग्राम सभा के निर्णय से संतुष्ठ नहीं होने पर अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के समक्ष अपील करना एक गलत प्रथा को शुरू करना होगा। जो देश के किसी भी राज्य में नहीं है.

नियम 15 : विहित अधिकारी कार्यपालिका से संलग्न होने के कारण उचित कार्यवाही हेतु ग्रामसभा निर्देशित करेगी, न कि सूचित कर सकेगी.

नियम 16 (कंडिका 1): ग्रामसभा की संयुक्त बैठकः संयुक्त ग्रामसभा हर हालत में प्रतिनिधात्मक होने के कारण न वह पेसा सम्मत हो सकती है, न पारंपरिक हो सकती है. (कंडिका 3): संयुक्त ग्राम सभा का अध्यक्ष चुना जाना पेसा के पारम्परिक सिद्धांत का हनन होगा. (कंडिका 4): इस सभा में कोरम 33% अथवा 30 सदस्य का प्रावधान वन अधिकारों की मान्यता कानून के विपरीत है, अतः गैर कानूनी है..


नियम 19: कंडिका 4 ग्रामसभा के अध्यक्ष को RPMC के पदेन अध्यक्ष बनाये जाने का प्रावधान संसदीय लोकतान्त्रिक व्यवस्थागत सिद्धांत के विपरीत होगा.

नियम 21 : क्या यह बजट की उपलब्धता संविधान के अनुच्छेद 243 छ तथा अनुच्छेद 243 झ के तहत की जाएगी? यह स्पष्ट न होने के कारण यदि प्रचलित तरीके से की जाएगी तो यह पेसा सम्मत आर्थिक स्वायत्तता' के अभाव से कार्यपालिका के वर्चस्व से निरर्थक साबित होते हुए गैर संवैधानिक होगा. यही बातें नियम 22 के लिए भी लागू होगी.

नियम 22 ग्राम सभा द्वारा कार्यक्रमों, परियोजनाओं अथवा निर्माण कार्यों का अनुमोदन के बिंदु 1 में ग्राम सभा से सिर्फ पंचायत ही नहीं, सभी विभागों द्वारा सारे कार्य शुरू करने से पहले ग्राम सभा का अनुमोदन लिया जाना चाहिए।

नियम 23 : कंडिका 3 ग्रामसभा एवं ग्राम पंचायत कोष का संचालन सरपंच - सचिव के संयुक्त हस्ताक्षर से किया जायेगा. यह ग्राम सभा की स्वायत्ता पर कुठराघात हैं. साथ ही कार्यपालिका की शक्ति विधायिका (ग्रामसभा) के क्षेत्राधिकार पर अतिक्रमण करती है जो कि भारत के संसदीय लोकतान्त्रिक सरंचना का उलंघन है.

नियम 24: जब ग्राम पंचायत, ग्रामसभा का कार्यपालिका है, तो ग्रामसभा निर्देश देगी, न की 'परामर्श देगी. ग्रामसभा को पंचायत राज संस्थाओ को प्रत्यायोजित 29 विषयों से संबंधित विभागों के मैदानी कर्मचारियों के कार्यों पर नियंत्रण कर सकने एवं कार्यवाही हेतु संबंधित विभाग को निर्देश दे सकने के अधिकार स्पष्टता से दिए जाने चाहिए.

'नियम 25 ग्रामसभा एवं ग्रामपंचायत की स्थायी समितियां गठित कर कार्य करने से विधायिका एवं कार्यपालिका के बीच शक्ति का अंतर्विरोध होगा जो गैर संवैधानिक है. इसलिए ग्राम सभा की स्थायी समितियां ग्राम सभा के निर्णय पर कार्यवाही करेगी, जिसमे ग्राम पंचायत भी शामिल होगी, कहना ही उचित तथा पेसा कानून सम्मत होगा.

नियम 26: सीमित क्षेत्रफल (10 हेक्टेयर) पेसा कानून की धारा 4 (घ) तथा वन अधिकारों की मान्यता कानून की धारा 5 का घोर उलंघन है. साथ ही परामर्श' शब्द उपयोग कर उक्त धाराओं का मजाक बना दिया गया है जो गैर संवैधानिक होते हुए गैर कानूनी भी है. कंडिका 2 में वर्णित व्यवस्था कार्यपालिका का विधायिका की शक्तियों पर अतिक्रमण तो है ही, साथ ही पेसा कानून का धारा 4 (घ) एवं धारा 4 (ढ) तथा वन अधिकारों की मान्यता कानून की धारा 5 का घोर उलंघन है.

नियम 27 : (कंडिका 1) ग्राम सभा ही करेगी, न कि ग्रामसभा के परामर्श से की जाएगी. कार्यपालिका का कार्य, ग्रामसभा के निर्णय का पालन होता है. परामर्श शब्द उपयोग से प्रक्रिया उलटी हो जाती है. कार्यपालिका निर्णय लेने के समय ग्रामसभा से अगर परामर्श करेगी जो वह बाध्यकारी नहीं होगा. कंडिका 2 में वर्णित प्रक्रिया कार्यपालिका (कलेक्टर) के हाथ में जाने से वह प्रक्रिया न पेसा सम्मत होती है, न संसदीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था सम्मत होती है. विवाद की स्थिति में पारंपरिक न्याय व्यवस्था का उपयोग ही पेसा सम्मत होगा.

नियम 30 : कंडिका 2 में वन अधिकारों की मान्यता नियम, 2008 के नियम 2 (1) (घ) के साथ स्पष्टीकरण (1), (2), (3) का ज़िक्र होना आवश्यक है. कंडिका 4: लघुवनोपज के प्रसंस्करण के लिए स्वयं (जोड़ा जाना चाहिए) या कोई भी इकाई स्थापित करने की सहमति दे सकेगी.

नियम 31: लघु वनोपज को राष्ट्रीयकृत एवं अराष्ट्रीयकृत रूप में विभाजन करना पेसा कानून का धारा 4 (ड) (ii) तथा वन अधिकारों की मान्यता कानून की धारा 2(झ) में दी गयी गौण वन उत्पाद की परिभाषा तथा वन अधिकारों की मान्यता नियम 2 (1) (घ) तथा स्पष्टीकरण (1) (2) (3) का उलंघन है तथा ग्राम सभा का सभी वनोपज के स्वामीत्व के अधिकार के ठीक विपरित है.

नियम 32: कंडिका 1 स्पष्ट नहीं है. यह कहना कानून सम्मत होगा कि वन अधिकारों की मान्यता कानून की धारा 2 (क). 3 (1)(झ) एवं धारा 5, पेसा कानून की धारा 4 (घ) के अनुसार होगी. यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह धाराएं ग्रामसभा को न सिर्फ प्रबंधन का अधिकार देती है बल्कि गवर्नेस (प्रशासकीय) शक्ति तथा क्षमता संपन्न इकाई के रूप में प्रतिस्थापित करती है.

नियम 33. इस नियम पेसा की धारा 4(घ) तथा वन अधिकारों की मान्यता कानून की धारा 5 एवं नियम 4(1) (e) एवं नियम 4(1) (1) में ग्राम सभा को दिए गए वनों के प्रबंधन के अधिकार के विपरित है. कानून का तकाजा है की वन विभाग अपने वर्किंग प्लान को ग्रामसभा द्वारा बनाये गए वर्किंग प्लान के अनुरूप बनाएगा. इस हेतु वन विभाग को अपने कानून एवं नियम में संशोधन करना अनिवार्य है.

नियम 34 : जब सारे असंज्ञेय अपराध (non-cognizable अपराध) पर पेसा कानून की धारा 4(घ) ग्रामसभा द्वारा संचालित पारंपरिक न्याय प्रणाली को सक्षमता प्रदान करती है तो सम्बंधित वन अपराध, कानूनों तथा नियमों में आवश्यक संशोधन करते हुए पेसा सुसंगत बनाना पड़ेगा अन्यथा पेसा लागू नहीं किया जा सकता है. वन विभाग अनुसूचित क्षेत्र में स्वशासी व्यवस्था की कार्यपालिका के रूप में कार्य करेगा न कि विधायिका के भूमिका में होगा. ग्राम सभा की शांति एवं न्याय समिति को सिर्फ सूचना देने की बात लिखी गई है। इसमें शांति एवं न्याय समिति द्वारा सुने एवं निपटाए जा सकने वाले छोटे विवाद के बारे मे कोई जानकारी नहीं दी गई है, ना ही परिशिष्ट में लगाई गई है।

नियम 35 : कंडिका 3 “शासकीय अथवा सामुदायिक भूमि” वाक्यखण्ड का उपयोग पेसा कानून की धारा 4 (घ) तथा वन अधिकारों की मान्यता कानून की धारा 5 के अनुसार ग्रामसभा के क्षेत्राधिकार में आने के कारण इस हेतु छत्तीसगढ़ भू - राजस्व संहिता, 1959 तथा सम्बंधित वन कानूनों में संशोधन आवश्यक है. इस हेतु छत्तीसगढ़ सरकार को अनुसूचित क्षेत्र के भूमि संबंधित कानून को पेसा सुसंगत करने के लिए 'आंध्र प्रदेश अनुसूचित क्षेत्र भू - हस्तांतरण विनियम अधिनियम (संशोधित 1 /1970)' के अनुरूप कानून बनाना अनिवार्य है. अन्यथा नियम 35 में लिखी गयी विभिन्न टिकाओं का कोई अर्थ नहीं होगा. कानून में संशोधन करने के बाद आन्ध्र प्रदेश राज्य ने जैसे 'लैंड कंसोलिडेशन फण्ड' (संविधान के अनुच्छेद 275 परंतुक के तहत ) का गठन किया है वैसे ही छत्तीसगढ़ सरकार को प्रावधान करना होगा.

नियम 36: भूमि अधिग्रहण / शासकीय क्रय/हस्तांतरण से पहले ग्राम सभा की सहमतिः इसमें राज्य सरकार ने अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के साथ भद्दा मजाक किया है. नियम की हैडिंग में 'ग्रामसभा की सहमति' लिखकर asar 1 में प्रचलित सभी कानून / नीति के अंतर्गत 'ग्राम सभा से परामर्श' लिखना झूठ है तथा कंडिका 5 में कलेक्टर को अपीलीय अधिकारी (जो प्रचलित कानून से भू-अर्जन अधिकारी रहता है) बनाना ऐसा कानून की धारा 4 (घ) तथा वन अधिकारों की मान्यता कानून की धारा 5 एवं संवैधानिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था का घोर उलंघन है.

नियम 37 : भूमि की वापसी (कंडिका 3) में 'सूचना' के स्थान पर भू राजस्व संहिता की धारा 170 ख-2 (क) में उपयोग किये गए शब्द 'निर्देशित करेगी' लिखने से ग्रामसभा की गरिमा के साथ न्याय होगा. भू - राजस्व संहिता की धारा 170 ख राजस्व संहिता 2 (क) में निर्देश दिया जाता है, उसे यहाँ पर कम किया गया है जो कानून के विपरीत है. साथ ही धारा 170 ख -2 (क) (घ) के प्रावधान को नियम में लिखना था जिसे छोड़ दिया गया है.

नियम 38: परियोजना प्रभावित व्यक्तियों का पुनर्वास : इस हेतु प्रचलित कानूनों एवं नियमों में ऐसा सुसंगत संशोधन न करते हुए लागू करने से प्रक्रिया गैर कानूनी होगी. वन अधिकारों की मान्यता कानून की धारा 4(2) (ख) (ग) (घ) का ढांचा तथा LARR कानून की धारा 41-42 के अनुरूप पुनर्वास नियम बनाना चाहिए.

नियम 39: कंडिका 4 में प्राप्त राजस्व' का किस अनुपात में ग्राम सभा तथा त्रि-स्तरीय पंचायतों में बंटवारा होगा निश्चित न होने से कार्यपालिका की भूमिका निर्णायक होगी जो कि गैर संवैधानिक होगा.

नियम 40: शांति एवं सुरक्षा तथा विवाद समाधान: इस नियम में वर्णित ढांचा एवं विवरण पेसा कानून की धारा 4(घ) के स्वशासी अधिकार का उलंघन है. इसमें न पारंपरिक न्याय व्यवस्था- सरंचना को मान्यता है, न ग्राम न्यायलय के गठन की कोई रूप रेखा है. अतः सम्पूर्ण रूप से कानून के स्वशासी चरित्र का हनन है.

नियम 40 : ग्रामसभा द्वारा दंड : जब नियम परिशिष्ट-2 अनुसार दंड देने की प्रावधान रखेगा तो यह पारंपरिक न्याय व्यवस्था के औचित्य को नकारने जैसा होगा. शांति एवं सुरक्षा तथा विवाद समाधान में ग्राम सभा को परिशिष्ट-2 में सिर्फ 26 धाराओं के अधिकार दिए गए है जो कि भारत सरकार द्वारा जारी आदर्श पेसा नियम की 36 धाराओं से कम है। साथ ही इसमें वन और आबकारी अधिनियमों की धाराओं का कोई उल्लेख नहीं हैं जो पूर्व में विभाग द्वारा जारी प्राविधिक प्रारूप पेसा नियम में था. उसे जोड़े बिना ग्राम सभा के निर्णय लेने के अधिकार बहुत ही सीमित होंगे.

नियम 42 : गिरफ़्तारी की कार्यवाही: पुलिस से सम्बंधित कानूनों में संशोधन के बिना पेसा लागू करना निरर्थक प्रयास है. सारे असंज्ञेय (non-cognizable) अपराधों को पारंपरिक न्याय व्यवस्था अंतर्गत करने से ही न्याय व्यवस्था सरल एवं सफल होगी. इस सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों द्वारा बार-बार आग्रह किया जा रहा है. नागालैंड की कानूनी व्यवस्था सफल उदाहरण में से एक है.

नियम 43: नशीली पदार्थों पर नियंत्रणः नशीली पदार्थों पर नियंत्रण के लिए जो आबकारी अधिनियम में जो प्रावधन दिए गए है, उसको नियम में स्पष्ट नहीं किया गया है. विशेष कर अगर ग्राम सभा अगर कोई निर्णय पारित करती है तो उसका क्रियान्वयन आबकारी विभाग द्वारा कैसे किया जाएगा उसको ले कर कोई स्पष्टता नहीं है। साथ ही शासकीय मादक द्रव्यों के निकायों के बारे में भी प्रावधन स्पष्ट नहीं है कि ग्राम सभा उन पर कैसे कार्यवाही कर सकेगी। नशा मुक्ति हेतु ग्राम सभा क्या कार्यवाही कर सकेगी तथा आबकारी अपराधों का निराकरण कैसे कर सकेगी यह भी स्पष्ट नहीं है।

नियम 47 हाट-बाजार / हाटुम समिति / मार्केट समिति में ग्राम पंचायत को ग्राम के बाजारों तथा मेलों को प्रबंधित करने की शक्ति दी गई है वहीं नियम 48 में यही शक्ति ग्राम सभा की हाट-बाजार / हाटुम समिति / मार्केट समिति को दी गई है। दोनो में विरोधाभास है। छत्तीसगढ़ पंचायत ( ग्राम पंचायत क्षेत्र के भीतर बाजारों तथा मेलों का विनियमन) नियम, 1994 पेसा कानून आने से पहले लाया गया था इसलिए यह पेसा अनुरूप नहीं है. पेसा के अनुसार यह ग्राम सभा का अधिकार है। साथ ही नियम में बाजार के नियमों का उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना लगने की शक्ति का कोई जिक्र नहीं है।

नियम 49 : इस सम्बन्ध में छत्तीसगढ़ साहूकारी अधिनियम, 1934 में संशोधन आवश्यक है जिस के तहत किसी भी स्थिति में अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति कि ज़मीन नीलामी या कुर्की से हस्तांतरीत नहीं हो, यह प्रावधान जोड़ा जाना चाहिए अन्यथा इस नियम का कोई अर्थ नहीं होगा. यह प्रावधान संविधान के 5वीं अनुसूची के पैरा 5 (2) (क) (ख) (ग) में वर्णित है. शांति एवं न्याय समिति साहूकारों के विरूद्ध क्या कार्यवाही कर सकेगी यह स्पष्ट नहीं है, विशेष कर ऐसी परिस्थिति में जब साहूकार ग्राम सभा के अधिकार क्षेत्र में नहीं रहता है या किसी नगरीय निकाय क्षेत्र में रहता है।

नियम 50: जैव विविधता सम्बंधित कानूनों को पेसा तथा वन अधिकारों की मान्यता कानून की धारा 5 के तहत सुसंगत करने के लिए राज्य सरकार को 5वीं अनुसूची के तहत विनियम (रेगुलेशन) की अनुशंसा करते हुए संशोधन करना पड़ेगा, नहीं तो यह निरर्थक साबित होगा. यह इसलिए जरूरी है कि संघीय सरकार इस सम्बन्ध में विद्यमान कानून में जैव विविधता को निजी हाथों में देने के लिए जो संशोधन कर रही है वह पेसा के विपरीत है.

नियम 55 : अधिनियम/नियमों में संशोधन- ऐसे अधिनियम/नियमों जो पेसा से असंगत है  में  संशोधन हेतु क्या प्रक्रिया अपनायी जाएगी यह स्पष्ट नहीं है। साथ ही ग्राम सभा को यदि लगता है कि पेसा की धारा 4 (क) के अनुसार के पंचायतों के बारे में कोई राज्य कानून रूढिजन्य विधि, सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं और समुदाय के संसाधनों की परम्परागत प्रबन्ध पद्धतियों के विरूद्ध है तो वह सरकार का ध्यान इस हेतु कैसे आकर्षित करेगी यह भी स्पष्ट नहीं है।

इसके अलावा पेसा नियम की कुछ धाराओं पर ध्यान दिया जाना शेष है 

पेसा की धारा 4 (घ) के अनुसार ग्राम सभा को विवाद निपटाने के रूढ़िजन्य ढंग का संरक्षण और परिरक्षण करने का अधिकार है। गाँव स्तर पर इस हेतु संरचना बनी हुई हैं जो की 12 गावं के समूह, 84 गांव के समूह आदि पर भी अलग-अलग क्षेत्र अनुसार विस्तारित है। इसे पेसा नियम में नही जोड़ा गया है। 

पेसा की धारा 4 (ज) के अनुसार जनपद और जिला स्तर पर ऐसे अनुसूचित जनजाति समुदाय जिनका प्रतिनिधित्व नहीं है, उनके नामांकन हेतु प्रक्रिया का उल्लेख नहीं  है।

पेसा की धारा 4 (झ) के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों में परियोजनाओं की वास्तविक योजना और उनका कार्यान्वयन राज्य स्तर पर समन्वित किया जाएगा प्रावधान के क्रियान्वयन हेतु कोई बिंदु नही जोड़ा गया है।

पेसा की धारा 4 (ड) और (ढ) के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों को ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान करना है जो उन्हें स्वायत्त शासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने में समर्थ बनाने के लिए आवश्यक हों एवं ऐसे राज्य विधानों में, जो पंचायतों को ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान करें जो उन्हें स्वायत्त शासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने में समर्थ बनाने के लिए आवश्यक हों, ऐसे प्रावधान जोड़े जाने हैं। इस हेतु स्पष्टता से कोई नियम में नही है। इस हेतु यह जोड़ा जाना अनिवार्य है कि “ ग्राम सभा को स्वशासी निगमित निकाय का दर्जा दिए जाने तथा उसके शाश्वत उत्तराधिकार एवं सामान्य पद मुद्रा होने, उसके नाम से वाद चलाये जाने तथा उसके नाम से उनके विरूद्ध वाद चलाया जाने, उसे चल या अचल संपत्ति अर्जित करने, धारण करने या अंतरित करने, संविदा करने तथा ऐसी समस्त अन्य बातों जो उसे अपने कर्तव्यों के पालन के प्रयोजन के लिए आवश्यक हो, की शक्ति होगी।"

पेसा की धारा 4 (ड) (vi) के अनुसार ग्राम सभा को सभी सामाजिक सैक्टरों में संस्थाओं और कृत्यकारियों पर नियन्त्रण रखने की शक्ति कैसे प्रदान की गई है यह नियम में स्पष्टत नहीं है।

• पेसा की धारा 4 (ड) (vii) के अनुसार स्थानीय योजनाओं पर और ऐसी योजनाओं के लिए जिनके अंतर्गत जनजातीय उपयोजनाएं हैं, संसाधनों पर नियन्त्रण रखने की शक्ति ग्राम सभा को प्रदान नहीं की गई है। 

पेसा की धारा 4 (ढ) के अनुसार राज्य विधानों में, जो पंचायतों को ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान करें जो उन्हें स्वायत्त शासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने में समर्थ बनाने के लिए आवश्यक हों, प्रावधान जोड़े जाने वक्त यह रक्षोपाय रखना है कि उच्चतर स्तर की पंचायतें, निम्न स्तर पर की किसी पंचायत की या ग्राम सभा की शक्तियां और प्राधिकार अपने हाथ में न लें। नियमों में इस हेतु कोई प्रयास नहीं दिख रहा है।

पेसा की धारा 4 (ण) के अनुसार जिला स्तरों की पंचायतों में प्रशासनिक व्यवस्थाओं की परिकल्पना करते समय संविधान की छठीं अनुसूची के पैटर्न का अनुसरण करने का प्रयास किया जाना था। यह प्रयास पेसा नियमों में नहीं दिखाई दे रहा है।


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