सिलगेर पर एक और जांच रिपोर्ट
सुशान्त कुमारछत्तीसगढ़ में बीजापुर जिले का सिलगेर गांव, एक साल से अधिक समय से जनआंदोलन का केंद्र बना हुआ है। स्पष्टतः यह इस दौर में सबसे लम्बा चलने वाली जन आंदोलन भी है। सिलगेर आंदोलन मूल रूप से कैंप का विरोध कर रहा है लेकिन माइनिंग कॉर्पोरेट्स के लिए यह आंदोलन गले की हड्डी जैसा है जो भारतीय राजसत्ता की बर्बर सैन्य निति "ऑपरेशन समाधान-प्रहार" से मोर्चा लेते हुए, कम्पनिओं द्वारा संसाधन की लूट के रास्ते में चट्टान बनकर खड़ा है। यह जनता द्वारा संचालित जन आंदोलन है जो की प्रतिरोध का प्रतिक बन चूका है।

सिलगेर आंदोलन एक स्थाई रूप से एक जगह अडिग रहते हुए, माइनिंग कारपोरेशन और राज्यसत्ता की खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करता रहा है और इसीलिए यह आंदोलन एक तरह से ज़मीन और संसाधन पर आधिपत्य और अधिकार का संघर्ष भी है जो निर्माणाधीन सड़क पर आंदोलनरत होकर कैंप और रोडों की श्रंखला को आगे बढ़ने से भी रोक रहा है। यह पारित रोड जिस पर सिलगेर के आदिवासी किसान आंदोलित हैं वह बैलाडिला और दंतेवाड़ा के खनिजों पर कॉर्पोरेट-नेता पुलिस गिरोह के आधिपत्य को मजबूत करने के लिए बनाई जा रही है।
जनता के आने जाने के लिए यह इलाका भले ही सुदूर और कठिन हो लेकिन लौह अयस्क जैसे तमाम खनिज इन सुदूर इलाकों से बहुत तेजी से जापान और अन्य जगहों पर पहुँच जाते है। कनवेयर बेल्ट से गुथी हुई पहाड़ियों से लोहे को किरंदुल रेल्वे स्टेशन में खड़ी माल गाड़ियों तक लाया जाता है। यह माल गाड़ियां किरंदुल से विशाखापटनम के रेल्वे लाइन पर तेजी से बढ़ते हुए, बस्तर के लोहे को विशाखापत्तनम के समुद्री तट तक पहुँचा देती हैं जहां से बस्तर की धरती का खनिज अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति मार्ग में पहुंचता है।
किरंदुल रेल लाइन, भारत की सबसे ज्यादा राजस्व उत्पन्न करने वाली रेल लाइनों में से एक है जिस पर हिताची द्वारा जापान निर्मित डीजल इंजन वाली माल गाड़ियां चलाई जाती हैं, निपुणता और कार्यक्षमता के लिए हिंसक और लूटेरी तरीके से खनन कर रही है जिन में से अधिकतम इलाके संवैधानिक तौर से संरक्षित इलाके हैं। हसदेव अरण्य जंगल में कोयले और दंतेवाड़ा में लौह खनन, छतीसगढ़। रायगढ़ / काशीपुर में बॉक्साइट का खनन, उड़ीसा।
लांजीगढ़ में बॉक्साइट का खनन, उड़ीसा जजपुर, कलिंगानगर, में लौह अयस्क का खनन, उड़ीसा। आर्सेलर मित्तल, जिंदल स्टील, कोहिनूर स्टील, भूषण स्टील ज्यूपिटर सिमेन्ट फैक्ट्री, आदि अन्य तमाम ऐसे कॉर्पोरेट घराने भी है जो कि संसाधनों की लूट-पाट की दौड़ में भागीदार हैं।
सिलगेर आंदोलन का महत्व और उसका असर इन सभी कारणों के वजह से बहुत ज्यादा है जिसको सत्ताधारी पक्ष, बड़ी कम्पनियां और मीडिया, स्वीकार नहीं करना चाहती और इसी कारणवश इस आंदोलन द्वारा उठाए गए प्रश्नों पर चर्चा कभी किसी बड़े मीडिया चैनल पर नहीं दिखती। सिलगेर आंदोलन ने सत्ता पक्ष द्वारा 'एरिया डॉमिनेशन' के माध्यम से कब्जा किए गए जल-जंगल-जमीन पर फिर से आदिवासियों के अधिकार को स्थापित करते हुए अपना बड़ा हिस्सा वापस प्राप्त किया है।
इस तरह के आंदोलन प्रणाली को दुनिया भर के तमाम आंदोलनों में देखा गया है जहां उग्र खनन के मामले रहे हैं। सिलगेर आंदोलन से थोड़ी दूर CRPF कैम्प है जो की सैकड़ों अर्धसैनिक बालों से भरा है, वही सैनिक जिन्होंने 5 आदिवासियों को एक साल पहले, आंदोलन के चलते गोली मारी; ऐसी परिस्थितियों में यह आंदोलन सिलगेर की जनता और राजसत्ता के वेतनभोगी सिपाहियों के बीच एक आर-पार की लड़ाई प्रतीत होती है।
इन अनगिनत रूपों के साथ ही साथ, सिलगेर एक विशाल जन आंदोलन का भी नाम है जो अधिकारों की लड़ाई के तमाम तरीके- जैसे की पदयात्रा, रैली, सरकार को ज्ञापन देना, मृतकों के परिवार के लिए मुआवजे की मांग करना, ग्राम सभा और PESA लागू करवाना, जैसे अन्य तरीके अपनाते हुए आगे बढ़ रहा है और बेचापाल एवं पुसनार जैसे 12 अन्य जगहों पर अपने जैसे आंदोलनों को उभरने और संघर्ष करते रहने के लिए प्रेरित कर रहा है।
साल भर से राजकीय दमन का सामना करते हुए लंबे संघर्ष से सिलगेर आंदोलन देश की मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन रहा है। एक स्थानीय आंदोलन होते हुए भी सिलगेर आंदोलन के सवाल और संघर्ष की प्रणाली का असर अन्य जगहों में काफी प्रभावशाली है। सत्तापक्ष के लिए उनके प्रभुत्व, जनता का शोषण और संसाधन की लूट के चेन में सिलगेर वह कमजोर कड़ी है जिसे मसलने की इच्छा का अंदाजा इस आंदोलन पर हो रहे दमन से लगाया जा सकता है।
लौह अयस्क खान, बैलाडीला घाटी
यह आदोलन सिलगेर में 12'3 मई 2021 को ग्रामीणों की सहमति के बिना CRPF कैम्प लगाने के विरोध में शुरू हुआ परंतु 17 मई 2021 को CRPF द्वारा आंदोलनकर्ताओं पर गोली चलाने की वजह से 4 लोग की मौत होने के बाद अधिक शक्ति और दृढ़ इच्छा के साथ एक व्यापक आंदोलन के रूप में उभरा।
सैन्य कैम्प और रोड
प्रभावित क्षेत्र में बनाए जाने वाले सैनिक कैंपों की तरह, सरकार द्वारा बस्तर में हर 2-3 किलोमीटर की दूरी पर अर्ध सैनिक बालों के कैंप बनाए जा रहे है। यह कैम्प कम समय में बनाए जाते हैं और कैम्प लगने के साथ ही यह तानाशाही हुकूमत के किले की तरह शासन का केंद्र बन जाते हैं और आसपास की हर चीज को अपने अनुसार नियंत्रित करते हैं, तुगलकी फरमान जारी करते हैं और पूरे क्षेत्र के सालों से चल रही नियमित जीवन को नष्ट करते हैं।
अर्धसैनिक बालों द्वारा प्रताड़ित किए जाने, हिरासत में लिए जाने और उनके द्वारा मारे जाने से बचने के लिए ग्रामीणों ने बड़े और चमचमाते सड़कों का प्रयोग करना बंद कर दिया है। इन बड़ी और चमचमाती सड़कों पर फौजी गाड़ियों, ट्रक और भयानक सन्नाटे के अलावा और कुछ नहीं मिलता है, घंटों तक नहीं; आसपास की जनता द्वारा इस्तेमाल न किए जाने पर भी इन सड़कों को बनाने पर भारी मात्र में पैसा खर्च किया जा रहा है
बीजापुर और सुकमा के सीमा पर तारेम और जगरगुंडा के बीच में आता है सिलगेर बासागुड़ा और तारेम होते हुए सड़क सिलगेर कैम्प तक बन चुकी है लेकिन यह रोड आगे जगरगुंडा तक नहीं बन पा रही है पर क्यों नहीं? जवाब है सिलगेर और सिलगेर की जनता का नही तोड़ा जानेवाला आंदोलन।
बस्तर और तमाम ऐसे क्षेत्रों में कैम्प और रोड का आपस में गहरा संबंध है, यह दोनों एक दूसरे के साथ ही आते हैं। पहले यह भारतीय राजसत्ता के 'ऑपरेशन ग्रीन हंट' का हिस्सा था और अब यह 'ऑपरेशन समाधान प्रहार' के तहत आगे बढ़ रहा है।
रोड बनाने वाले ठेकेदार से लेकर मजदूर और जरूरी वाहन संसाधन, सभी कैंपों के संरक्षण में रहते हैं और रोड बनाने की प्रक्रिया अर्ध सैनिक बलों की पहरेदारी में की जाती है। जिनके गाँव के जंगलों को काट कर रोड बनाई जाती है उन ग्रामीणों से कोई सहमति नहीं मांगी जाती। ग्रामीण इन सभी गतिविधियों को शांति के साथ दूरी से देखते हैं।
बस्तर के घने-हरे जंगलों के बीच में, जगह-जगह ग्रामीणों पर रोड और कैंपों को थोपा गया है जबकि आदिवासियों ने हमेशा कैंपों और बड़ी सड़कों का सख्त विरोध किया है। परंतु आज, विकास के नाम पर बनने वाले कैम्प, रोड और सैन्यीकरण के विरुद्ध में सिलगेर आंदोलन एक प्रतीकात्मक रूप लेते हुए अन्य इलाकों को सैन्यीकरण और कॉर्पोरेट लूट के खिलाफ संघर्ष बनाने के लिए प्रेरित कर रहा है।
साल भर से गैर कानूनी हिरासत, झूठे मुकदमे, हत्याओं, उत्पीड़न और तमाम राजकीय दमन का सामना करते हुए भी सिलगेर आंदोलन अब तक अटूट और अडिग साबित हुआ है और इस प्रक्रिया में सिलगेर ने देश की आदिवासी जनता को हुंकार भरते हुए आवाज भी दी है और एक रास्ता भी दिया है व्यापक जन-संघर्ष का रास्ता। 11'2 मई 2021 की रात को CRPF के जवान सिलगेर आए और उन्होंने रोड के किनारे, गाँव की 10 एकड़ खेतिहर जमीन पर कैंप बनाना शुरू कर दिया। कैम्प के लिए जमीन को कानूनी प्रक्रिया PESA के अंतर्गत ग्रामसभा की अनुमति के बगैर, जबरन लिया गया।
13 मई 2021 को ग्राम सभा के सदस्यों के साथ ग्रामीण कैंप के पास गए और अधिकारी गण से बिना ग्राम सभा की सहमति के कैम्प बनाने के विषय पर बातचीत करने एवं अपना विरोध प्रकट करने की कोशिश की। ग्रामीणों और ग्रामसभा सदस्यों को CRPF द्वारा पीटे जाने पर, दूसरे दिन 14 मई को कैम्प के विरोध में बड़ा जन सैलाब इकट्ठा हुआ।
27 मई 2021 को विरोध करने के लिए कैम्प की तरफ बढ़ रही एक विशाल रैली पर CRPF ने गोलीबारी की जिसमें सिपाहियों की गोलियों से तीन लोगों की मौत हुई। प्रशासन ने मारे गए लोगों को माओवादी बताते हुए यह दावा किया की तीनों मृतक आदिवासियों के बीच में छुपकर CRPF पर हमला कर रहे थे जिसके कारणवश सिपाहियों ने गोली चलाई।
तीन मारे गए लोगों में कवासी वाघा उम्र 37 साल, कोरसा भीमा उम्र 32 साल और उईके मुरली उम्र 22 साल है। पुनेम सोमली नमक एक गर्भवती महिला को गोलीबारी से हुई भगदड़ में गहरी चोट आने के कारण, 18 मई को उनकी मृत्यु हो गई। मरने वाले ग्रामीणों के अलावा 18 ग्रामीण घायल हुए जिन में से 11 लोगों को सुकमा फील्ड अस्पताल और 7 लोगों को बीजापुर जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया।
न्यायिक जांच की मांग करते हुए, ग्रामीण आदिवासियों ने शहीद आदिवासियों के मृतक शरीर को हजारों आंदोलित आदिवासियों के बीच में रखते हुए संघर्ष को जारी रखा। कुछ दिन बाद, 22 मई 2021 को जब टोलेरवती गाँव के मीडियम मासा अपने 2 दोस्तों के साथ CRPF कैंप के निकट आम इकट्ठा कर रहे थे तब सिपाहियों ने उन्हें गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।
निरंतर हो रही हत्याओं से क्रोधित होती आंदोलित जनता के दबाव में आकर छत्तीसगढ़ सरकार ने मैजिस्टीरीअल जांच का निर्देश पारित किया परंतु अबतक कोई न्याय नही मिला है। कुछ महीने आगे आंदोलन ने छत्तीसगढ़ दिवस (1 नवंबर) मनाने के लिए एक विशाल जन सभा का आयोजन किया जिस में हजारों आदिवासियों और राज्य एवं पूरे देश से दर्जन संगठनों ने हिस्सा लिया।
इसी जनसभा से वापस जाते हुए 55 आदिवासियों को - जिनमें अधिकतम महिलाएं और बच्चे थे, उन्हें CoBRA, CRPF और छतीसगढ़ STF की जॉइन्ट स्क्वाड ने चिंतलनर पुलिस थाने के अंतर्गत मोरपल्ली गाँव के पास हिरासत में ले लिया। बाकियों को छोड़ते हुए, 8 लोगों को आर्म्स एक्ट और इक्स्प्लोसिव सब्सटेन्स ऐक्ट लगा कर माओवादी करार करते हुए जेल भेज दिया गया।
19 जनवरी 2022 को 9 नवजवान लोगों का एक समूह, जिसमें 7 पुरुष और 2 महिलाएं थी, वह छत्तीसगढ़ की गवर्नर अनुसुइया उईके से मिलने के लिए रायपुर की ओर निकले तभी उन्हें सिलगेर से 150 किलोमीटर दूर कोंडागाँव बस स्टॉप पर रोक लिया गया, बस से घसीट के निकाला गया और उनके सारे कागजात जब्त करते हुए उन्हें कोविड क्वॉरन्टीन के नाम पर अवैध हिरासत में रखकर प्रताड़ित भी किया गया। सभी लोगों को जनता के विरोध के बाद ही छोड़ा गया।
तब से अबतक कैंपों के खिलाफ चल रहा यह सिलगेर आंदोलन, तमाम राजकीय दमन का सामना करते हुए 14 महीने पूरे कर रहा है और यह आंदोलन अब एक व्यापक मुहिम के रूप में बदल चुका है जिसका दायरा अब कैंप बनाने की नीति को भी अपने निशाने पर लेकर आ चुका है जिसमें 'फॉरवर्ड आपरेशनल बेसेज़' के नाम पर हर 2-3 किलोमीटर पर कैंप बनाए जा रहे हैं।
इस आंदोलन में एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है की इस आंदोलन ने एक आदिवासी मंच को जन्म दिया जिसका नाम 'मूलवासी बचाओ मंच' रखा गया। इस मंच का अपना झण्डा और अपनी कार्यकारिणी है जोकि सिलगेर के साथ साथ अन्य सभी कैंपों और रोड विरोधी आंदोलनों का संघर्ष में नेतृत्व कर रहा है। यह एक महत्वपूर्ण पहलू है क्योंकि यह बस्तर के इलाकों में एक नए तरह के जन आंदोलन के ढांचे की तरफ संकेत कर रहा है।
शहादत की पहली बरसी
सिलगेर आंदोलन के एक साल होने तथा आंदोलित आदिवासियों की शहादत की पहली बरसी पर मूलवासी बचाओ मंच द्वारा इस "ऐतिहासिक मौके को याद करने के लिए 15'7 मई, 2022 को एक विशाल जनसभा का एलान किया। जनसभा का एलान होने के बाद 'फोरम अगेन्स्ट कोरपोरटाइजशन एण्ड मिलिटराइज़ेशन' द्वारा नई दिल्ली से सिलगेर जाने के लिए एक 'सालिडैरीटी टीम गठित करने का प्रयास शुरू हुआ, जिसके तहत तमाम लोकतात्रिक अध्यापकों, लेखकों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, वकीलों, छात्रों, किसान और मजदूर नेताओं को आमंत्रित किया गया। अंततः 8 लोगों की एक टीम का गठन हुआ।
15 मई 2022 को लगभग 10 बजे, टीम रायपुर पहुँच गई और गीदम तक जाने के लिए बस से सफर शुरू किया। गीदम दांतेवाड़ा जिले का एक शहर है जो कि नैशनल हाइवे 63 पर, जगदलपुर से 65 किलोमीटर की दूरी पर है। रास्ते में टीम को खबर मिली की बीजापुर कलेक्टर के पास सिलगेर के जनसभा की सूचना देने के बावजूद, लोकतान्त्रिक कार्यकर्ताओं तथा पत्रकारों को सिलगेर जाने से रोक कर वापस भेज दिया गया है।
आगे टीम 2 हिस्सों में बट गई, पहली टीम में 6 लोग और दूसरी टीम में 2 लोग थे। पहली टीम एक SUV कार में सिलगेर के लिए 16 मई को सुबह 11 बजे आगे बढ़ी, जबकि दूसरी टीम मोटर साइकिल पर कच्ची सड़कों पर चलते हुए जंगलों और गाँव से होते हुए सिलगेर की तरफ आगे बढ़ी।
पहली टीम लगभग 1 बजे तक बीजापुर पार करते हुए 11 किलोमीटर आगे चिन्ना कोड़ेपल कैम्प के पास पहुंची जहां पर उसे CRPF के 168 वें बटालियन के सिपाहियों द्वारा रोक दिया गया। टीम के सदस्यों जिनमें 3 महिलाएँ थी, उन्हें घने जंगल के बीच वाहन से उतारने को कहा गया जहां सिपाहियों के अलावा दूर दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था। फौजी दस्ते में एक भी महिला पुलिस या सिपाही नहीं थी। सभी सदस्यों के दस्तावेज़ लिए गए, नाम लिखवाए गए और सभी की तस्वीरें लेकर बीजापुर में बैठे 'उच्च अधिकारियों' को भेजा गया।
कुछ समय बाद टीम को सूचित किया गया कि 'उच्च अधिकारियों' ने सुरक्षा कारणों के वजह से टीम को आगे प्रस्थान करने से वर्जित कर दिया है। सदस्यों ने अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेते हुए आग्रह किया कि देश के किसी भी कोने में चल रहे लोकतान्त्रिक आंदोलन में हिस्सा लेना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। CRPF ने टीम की बात को ध्यान न देते हुए बीजापुर कलेक्टर से अनुमति लेने की सलाह दी। टीम ने बीजापुर वापस जाकर कलेक्टर से मिलने की कोशिश भी की लेकिन कलेक्टर विषय पर चर्चा किए बिना आधिकारिक दौरे पर चले गए।
परिस्थितियों के अनुसार, टीम ने एक विडिओ स्टेटमेंट जारी कर सिलगेर जाने पर रोक की निंदा करते हुए शासन / प्रशासन से टीम को सिलगेर जाकर आंदोलन में शामिल होने की अनुमति देने की मांग की। इसके बाद टीम धरना देने की तय्यारी के साथ वापस चित्रा कोड़ेपल कैम्प के नाके की तरह बढ़ी हालांकि तमाम लोकतान्त्रिक पत्रकारों और कार्यकर्ताओं तथा जनता के विरोध के कारण, कुछ ही घंटे में बस्तर आई० जी० सुनदरराज पट्टिलीनगम ने यह स्पष्ट किया की किसी भी कार्यकर्ता या पत्रकार को सिलगेर जाने से नहीं रोक जा रहा है- चेकिंग तो 'रूटीन एक्सर्साइज़' है सभी को सिलगेर जाने की अनुमति है। इसके बाद टीम को चिन्ना कोडेपाल से सिलगेर की तरफ आगे बढ़ने दिया गया।
सुरक्षा बलों के अनुसार, चेक पॉइंट को पार करके आगे बढ़ने का मतलब है बेहद ही 'संवेदनशील क्षेत्र' या 'माओवादी इलाके में दाखिल होना। किसी क्षेत्र को इस तरह चिह्नित करने के पीछे भारतीय राजसत्ता की मानसिकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। जो बस्तर सहित छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बंगाल, झारखंड, आदि राज्यों के घने जंगलों वाले इलाकों को 'रेड कॉरीडोर' बोलते हुए पूरी इलाके को राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा घोषित करती है।
टीम ने जो कुछ भी देखा वह युद्ध स्तर की तैयारी से कम नहीं था बड़ी संख्या में सुरक्षा बालों की तैनाती, कुछ-कुछ किलोमीटर की दूरी पर फौजी कैम्प, टाटा और महिंद्रा जैसी बड़ी कॉम्पनियों द्वारा निर्मित विशालकाय बख्तरबंद गाड़ियां (माइन प्रोटेक्टेड वेहिकल्स), ऑटोमैटिक बंदूकों पर ग्रिनेड लोन्चर (UGBL) लगे हुए हथियारों से लैस सिपाही; ऐसा प्रतीत हो रहा था की आप छत्तीसगढ़ में न होकर युद्ध ग्रसित जाफना, लाओस या कॉम्बोडिया में हों।
धरना स्थल की झलक
चित्रा कोड़ेपाल पार करने के बाद टीम लगभग 8 कैंपों को पार करते हुए अब उस विवादित कैम्प के पास पहुँच गई थी जो की 'सिलगेर में हैं। रोड के दूसरी तरफ, कैम्प के लगभग सामने ही, सत्ता और सशस्त्र बालों को चुनौती देते हुए खड़ा है शहीद स्मारक । कांक्रीट सीमेन्ट से बना यह हरे रंग का स्मारक, आंदोलन के 5 शहीदों की याद में बनाया है जिसके ऊपर एक हरे रंग का झण्डा लहलहाता रहता है। स्मारक पे सभी 5 शहीदों के नाम लिखे गए है ताकि वह और उनका संघर्ष न भूला दिया जाए।
कैम्प के सामने खड़ा यह शहीद स्मारक ऐसा प्रतीत होता है जैसे की वह शहीद एलान करते हुए आंदोलन के नारे को बुलंद कर रहे हों- ‘जान देंगे, पर जमीन नहीं'। शहीद स्मारक के ऊपर लगे हरे झंडे पर कटार और कुल्हाड़ी है जो कि आदिवासी जीवनशैली और संघर्ष का प्रतीक है हालांकि दूर से देखने पर यह चिन्ह कटार और हथौड़े की तरह प्रतीत होता है- यह कहना मुश्किल हैं। की यह समानता दर्शाने के पीछे कोई स्पष्ट कारण है या नहीं।
सिलगेर देखने में जंगल के बीच समतल इलाके में बसा हुआ एक गाँव है जहां घरों को चिड़ियों के दाने की तरह, बिखेर दिया गया हो- एक दूसरे से काफी दूरी पर टीम को कोई भी गाँव ऐसा नहीं दिखा जो कि जंगल से अलग हो, यहाँ सब कुछ जंगल में ही है, दरअसल यह जंगल है जिसे एक कच्ची सड़क चीरती है और पक्की सड़क बनकर जगरगुंडा तक पहुंचना चाहती है पर पहुँच नहीं पा रही। टीम कच्चे रोड पर चलते हुए स्टेज के पास पहुंची, पहुंचते-पहुंचते काफी देर शाम हो चुकी थी और दिन का कार्यक्रम समाप्त हो चुका था।
यह कच्ची सड़क स्टेज के पास आने तक इतनी खराब हो जाती है की मोटर साइकिल और भारी इंजन वाले वाहन के अलावा इनपर कुछ नहीं चल सकता। लेकिन यह रोड हमेशा ऐसी नहीं थी। टीम को सिलगेर जाकर पता चल की पहले यह कच्ची सड़क चलने योग्य थी लेकिन सलवा जुडूम के आतंक से गावों का विस्थापन हुआ और यह सड़क इस्तेमाल तथा मरम्मत न होने के कारण बिगड़ती गई।
राज्य समर्थित सलवा जुडूम द्वारा यह स्तिथि बनाने में राजसत्ता को कोई आपत्ति नहीं थी परंतु अब वह इस सड़क को बनाना चाहते है- केवल इस क्षेत्र का सैन्यीकरण करके संसाधनों को लूटने के लिए। धरती पर जनसभा स्थल पर टीम की मुलाकात रघु मिडियम से हुई जो की सिलगेर के मूलवासी बचाओ मंच के अध्यक्ष है।
रघु ने हमको मंच के अन्य सदस्यों से मिलवाया और दूसरे दिन के कार्यक्रम की जानकारी दी। टीम को मंच के लोगों द्वारा धरना स्थल पर ले जाया गया जहां बड़े बड़े तिरपाल को पूरे जगह में, इमली और आम के पेड़ के नीचे बिछा कर रखा गया है। एक बड़ी सी फूस की बनी झोपड़ी में राशन रखने और खाना पकाने की रसोई के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। महिला और पुरुष समान रूप से, आए हुए अतिथियाँ को खाना-पीना देने, जरूरी सामान और सामग्री को इकट्ठा करने और समेटने, खाना बनाने आदि जैसे कामों में लगे हुए हैं।
धरना स्थल पर पहली टीम का दूसरी टीम से मिलाप हुआ जो जंगलों और गाँवों के कच्चे रास्ते से होते हुए सिलगेर पहुंची थी। दूसरी टीम ने भी देखा कि सीआरपीएफ की कई रोड ओपनिंग पार्टियां, अंदरूनी इलाकों में सड़कों के निर्माण में शामिल थीं। बुलेट प्रूफ गियर में सीआरपीएफ के 40-50 सशस्त्र कर्मियों की एक टीम लैंडमाइन डिटेक्टरों का उपयोग करके दोनों ओर से सड़कों के निर्माण की रक्षा कर रही थी।
हमें बताया गया है कि आखिरी दिन के कार्यक्रम में सुबह में प्रदर्शन स्थल से सीआरपीएफ शिविर के सामने बने शहीद स्मारक तक मार्च किया जाएगा। फिर दोपहर में, देश भर से विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ताओं और नेताओं द्वारा संबोधित एक सार्वजनिक बैठक और सिलगेर के सांस्कृतिक ब्रिगेड द्वारा सांस्कृतिक प्रदर्शन किया जाएगा। मार्च की दूरी लगभग 6 किलोमीटर तक है। उस रात हम उन तिरपाल की चादरों में पेड़ों के नीचे सोए, वे सभी नीले थे। 17 मई 2022 को, जंगलों में, सुबह जल्दी शुरू हुई है। सुबह 5 बजे रहे हैं और लोग पहले से ही नाश्ते को तैयार करने के लिए अपने हिस्से का काम करने में लग गए हैं।
खनन निगम और संसाधन
नन निगमों और राज्य के लिए, लोगों के प्रतिरोध के कारण, यह लंबे समय से स्पष्ट है कि केवल अपनी बड़ी मशीनरी के साथ खनन ब्लॉकों तक पहुंचना और खनन जारी रखना आसान नहीं होगा। इसलिए, माओवादी आंदोलन का मुकाबला करने और विकास के लिए शांति बनाए रखने के नाम पर सुरक्षा तंत्र का एक जटिल जाल तैयार किया जा रहा है, जैसा कि समय-समय की सरकार द्वारा परिकल्पित किया गया।
हमें यह पता चला कि छत्तीसगढ़ में पिछले 5 वर्षों में लगभग 60 शिविरों का निर्माण किया गया है। इंडियन एक्सप्रेस में 27 अप्रैल, 2022 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, सात जिलों में तीन साल से भी कम समय में 42 शिविर लगाए गए हैं। इन सात जिलों में सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा शामिल हैं, जहां सीआरपीएफ और पुलिस शिविरों के निर्माण के खिलाफ कई विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। सिलगर एंटी-कैंप आंदोलन, जो अर्धसैनिक शिविरों के खिलाफ संघर्ष के एक वर्ष को चिह्नित कर रहा है, इन शिविर विरोधी आंदोलनों का मशाल धारक बन गया है।
इसी तरह के पैटर्न का पालन महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में एक अन्य खनिज समृद्ध क्षेत्र, सुरजागढ़ पहाड़ी के मामले में किया गया है जो वास्तव में बस्तर के दंडकारण्य जंगलों के साथ एक सन्निहित श्रृंखला बनाता है। सरकार ने सुरजागढ़ पहाड़ियों के चारों ओर एक समानांतर प्रणाली का निर्माण किया, अर्धसैनिक शिविरों की स्थापना की और विशेष रूप से प्रशिक्षित पुलिस अधिकारियों और सीआरपीएफ की अतिरिक्त बटालियनों को तैनात किया। बुर्गी कंडोली (2015), हेदारी कैंप (2015), अलाडांडी (2016'7), कोटामी (2016'7), येलची (2017) और बरगी पिपाली (2018) कुछ शिविर हैं जो सुरजागढ़ पहाड़ियों के आसपास बने हुए हैं।
झारखंड के पार्श्वनाथ पहाड़ियों के आसपास लातेहार, गढ़वा, सरायकेला, चाईबासा और गिरिडीह जैसे विभिन्न जिलों में भी ऐसे शिविर बनाए गए हैं। झारखंड के पारसनाथ हिल्स के आसपास गिरिडीह जिले के पीरटांड़ प्रखंड के ढोलकट्टा, टीसफुली, पर्वतपुर, बनपुरा, पांडेयडीह में शिविर लगाने के विरोध में लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। इससे पहले, रघुवर दास की भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार के कार्यकाल के दौरान, इस क्षेत्र में 12 शिविर स्थापित किए गए थे।
मधुबन गांव की मूल निवासी इलिसा ने शिविरों का विरोध करने के कारण के बारे में बात करते हुए कहा, "सरकार का कर्तव्य हमें शिक्षित करना और हमें एक अच्छी स्वास्थ्य प्रणाली प्रदान करना है। सरकार सड़कों का निर्माण करने और हमारी कृषि भूमि को उचित सिंचाई प्रदान करने में विफल रही है। ऐसे शिविर लगाकर सरकार जल, जंगल, जमीन पर हमारा हक छीनना चाहती है। लेकिन हम इस तरह के शिविरों की अनुमति देने के बजाय मर जाएंगे, " न्यूज क्लिक ने लिखा ।
यह विषय इतना पेचीदा है की जितना खंगालते जाओ उतने ही पहलू सामने आते हैं। सिलगर विरोधी शिविर आंदोलन शुरू होने के बाद, बस्तर के 3 जिलों के विभिन्न हिस्सों में 12 अन्य शिविर विरोधी आंदोलन अंकुरित हुए हैं। बस्तर में कई सारे छावनी विरोधी आंदोलनों चल रहे हैं जिनमें से निम्न कुछ स्थानों की सूची प्रस्तुत-
1. सिलगेर, 2. बेचापाल, 3. पुखार, 4. एल्मागोंडा, 5. एम्पुरम, 6. पोटाली, 7. टेटेम, 8. नाहोदी, 9. करेंपुरा, 10. मिनपा, 11. मन्कापाल, 12. गोमपाड़, 13. बाना, 14. सिंगाराम 15. बेचाघाट।
कांकेर में 38 सरपंचों सहित 50 निर्वाचित पंचायत सदस्यों ने पखांजूर और कोयलीबेड़ा में सीमा सुरक्षा बल के शिविरों की स्थापना के विरोध में इस्तीफा दे दिया, जहां 45 किलोमीटर तक फैली सड़क का निर्माण किया जा रहा है। नारायणपुर के अबूझमाड़ क्षेत्र के धौदई गांव में भी चौड़े रास्तों के निर्माण और काडेमेटा में आईटीबीपी शिविर की स्थापना के साथ-साथ छोटे. डोंगर गांव में अमदई घाटी पहाड़ी के खनन पट्टे को जायसवाल नेको कंपनी को आवंटित करने के खिलाफ 4000 से अधिक ग्रामीणों का कड़ा विरोध हुआ है।
अमदई घाटी को आदिवासियों द्वारा पवित्र माना जाता है, इसी तरह, गंगालूर गांव में हजारों ग्रामीणों ने बेचपाल में अर्धसैनिक शिविरों के निर्माण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, जहां दो लेन की सड़क बनाई जा रही है।
छावनी का विरोध
लोगों ने लगभग 7 बजे इकट्ठा होना शुरू कर दिया, दर्जनों लोग घूम रहे थे, सांस्कृतिक मंडली अपने गीतों का पूर्वाभ्यास कर रही थी और आपस में चर्चा कर रही है, रसोई की ड्यूटी पर लोग भोजन तैयार कर रहे है और कुछ लोग झील (तालाब) और ट्यूबवेल पर स्नान करने के लिए जा रहे हैं। लाउडस्पीकरों पर घोषणा करके ग्रामीणों को मार्च के लिए इकट्ठा होने के लिए बुलाया जा रहा है- लोग धीरे-धीरे एक समय में सैकड़ों की संख्यान में आ आ कर इकट्ठा होना शुरू कर देते हैं।
ऐसा अनुशासन है कि मार्च के लिए इकट्ठा होने की घोषणा होने के आधे घंटे के भीतर, लोग शामिल होने लगे। हर कोई इस बड़े दिन के लिए तैयार है, कुछ लोग संभावित राजकीय दमन के बारे में भी चिंतित हैं, जबकि आदिवासी लोग अपनी सांस्कृतिक मंडली और मूलवासी बचाओ मंच के नेताओं के साथ आगे बढ़ रहे हैं, उनके चेहरे पर तनाव के कोई संकेत नहीं हैं। निश्चित रूप से यह सलवा जुडूम और ऑपरेशन ग्रीन हंट के दौरान क्रूर राज्य दमन के खिलाफ लंबे संघर्ष और वर्षों के प्रतिरोध का ही नतीजा है जिसने उन्हें लोहे जैसा मजबूत करके, किसी भी खतरे के लिए लचीला बना दिया है और अपने जल जंगल जमीन के लिए लड़ने के लिए निर्धारित किया है।
लोग लाइन में लग रहे हैं, कोई भी किसी का रास्ता नहीं काट रहा है और हजारों की इस मार्च में कोई एक-दूसरे को धक्का नहीं दे रहा है। मूलवासी बचाओ मंच के अनुसार, 3 दिवसीय समारोह में 1000 से अधिक गांवों के 48,503 लोगों ने भाग लिया। यह पूछे जाने पर, कि वे विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने वाले लोगों की सही संख्या कैसे जानते हैं, उन्होंने कहा कि उन्हें प्रत्येक गांव के प्रमुख से जानकारी मिलती है कि कौन और कितने लोग इस कार्यक्रम में भाग लेंगे, ताकि गिरफ्तारी या हिरासत में लेने की कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना होने की स्थिति में रिकॉर्ड रखा जा सके।
"ना लोकसभा ना विधानसभा, सबसे ऊपर ग्राम सभा" “जान देंगे पर जमीन नहीं”, “बस्तर से पुलिस शिविरों को हटाओ, बस्तर में नरसंहार बंद करो”, “जंगलों में ड्रोन हमले करना बंद करो”, “सरकेगुडा - एडेसेमेट्टा शहीदों को न्याय दो” जैसे नारों के साथ विशाल जन सैलाब आगे बढ़ रहा है। लगभग एक किलोमीटर लंबी रैली में हजारों आदिवासियों के नारों से पूरा जंगल गूंज उठा। जहां तक आंखें ठीक से देख सकती हैं, वहाँ तक हजारों की संख्या में लोग चींटियों की तरह, अपने मिशन पर चल रहे हैं।
मार्च शिविर स्थल पर पहुंचा, बैरिकेड लगाए गए हैं और सीआरपीएफ के जवानों के हाथों में यूजीबीएल के साथ परिष्कृत असॉल्ट राइफलों है और बैरिकेड के आसपास कॉन्सर्टिना तार बिछाए गए है। नहीं, वे लाठी-डंडे या आंसू गैस की बंदूकें लिए नहीं खड़े हैं, इसके बजाय वे अपने घातक हथियारों को चमका रहे हैं। प्रशासन की तरफ से कैमरा मैन हैं, जो भीड़ को सामने से रिकॉर्ड कर रहे हैं, शायद एक रिकॉर्ड रखने और बाद में पहचानने के लिए प्रताड़ित करने के लिए।
एक "क्रांतिकारी ” गीत
सांस्कृतिक स्कृतिक मंडली ने बैरिकेड्स पर अपना प्रदर्शन शुरू किया, गीतों ने सैनिकों और पुलिस कर्मियों से आह्वान किया कि शोषणकर्ता का पक्ष त्यागकर, देश के संघर्षरत, उत्पीड़ित और शोषित लोगों के साथ खड़े हों। गीत की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:
सुनो जवानो, प्यारे साथियो
सुनो, भारत के इतिहास को देखो रे!
सुनो, जनविरोध नीतियों को छोड़ो रे!
सुनो, जनसंघर्षो से नाता जोड़ो रे!
ज़ाहिर तौर पर गीत की पंक्तियाँ इतनी मजबूत और अधिकारियों तथा नौकरशाहों के लिए इतनी खतरनाक हैं कि वे प्रयास कर रहे हैं कि प्रदर्शन को रोकें क्योंकि वे इसे "क्रांतिकारी" मानते हैं। किसी को भी आश्चर्य होगा कि क्या किसी चीज़ का क्रांतिकारी होना गैर-कानूनी और अपराधपूर्ण है? क्या क्रांतिकारी कविता या साहित्य, सत्ता के लिए खतरा है? अगर यह एक विश्वविद्यालय का परिसर होता तो हमें हैरानी होती, क्या राज्य सभी को फैज अहमद फैज, हबीब जालिब, यश मालवीय के छंदों को पढ़ने से रोकेगा?
हो सकता हैं कि वे यही चाहते हों कि शोषण और दमनकारी सत्ता के ख़िलाफ़ लोगों के उनके प्रतिरोध की अभिव्यक्ति को दबा दिया जाए। उनके लिए संसाधनों की लूट और अस्तित्व ही छीन लेना काफी नहीं है, वे चाहते हैं, हर साहित्य को जलाना और हर उस गीत पर प्रतिबंध लगाना जो लोगों को एक नई सुबह की आशा देता है, एक उम्मीद जोकि आमजन की जीत के लिए, शोषण और दमन के ख़िलाफ़ संघर्ष का नेतृत्व कर सकता है।
लेकिन जब तक लोग दृढ़ता से विरोध कर रहे हैं, निश्चित रूप से वे इतनी आसानी से यह सब नहीं कर सकते, और यह संघर्ष ही वह वजह है की हजारों आदिवासियों के सामने खड़े होकर सांस्कृतिक मंडली, प्रतिरोध के गीतों को प्रस्तुत कर रही है।
जैसा कि बर्टोल्ट ब्रेख्त लिखते हैं "क्या अंधेरे के दौर में गीत गाए जाएंगे? हाँ, अंधेरे के दौर में अंधकार के बारे मे गीत गाए जाएंगे", वैसे ही सिलगेर की सांस्कृतिक मंडली भी, सबसे परिष्कृत हथियारों और गैजेट्स से लैस सशस्त्र अर्धसैनिक बलों के सामने खड़े होकर कॉरपोरेट लूट के खिलाफ, शिविरों के खिलाफ, मुसलमानों और दलितों पर हो रहे हिंदुत्वादी हमले के खिलाफ प्रतिरोध के गीतों का प्रदर्शन कर रही है।
अर्धसैनिक बलों को यह अत्याधुनिक हथियार और गैजेट उन्हें केंद्र सरकार द्वारा स्पेशल सेंट्रल असिस्टेंस (एसआईएस) योजना के नाम पर दिए जाते हैं।
बस्तर में इन अर्धसैनिक शिविरों का निर्माण भी इसी तरह की योजना के तहत किया जा रहा है, जिसे स्पेशल इंफ्रास्ट्रकचरल स्कीम (एसआईएस) के नाम से जाना जाता है, जो केंद्र से राज्य सरकारों को माओवादियों से सामना करने के लिए एक विशेष सहायता की तरह है।
अप्रैल 2022 में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा को लिखित में सूचित किया कि पिछले 5 साल के दौरान सिक्युरिटी रिलेटेड इक्स्पेन्डीचर (एसआरई) योजना के तहत वामपंथी उग्रवाद प्रभावित राज्यों को 1,623 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं, स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम (एसआईएस) के तहत विशेष बलों (एसएफ) और विशेष खुफिया शाखाओं (एसआईबी) और 250 पुलिस स्टेशनों को मज़बूत बनाने के लिए 371 करोड़ की परियोजना कमज़ोर वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों को 2017 से मंजूरी दी गई है। मंत्री ने कहा, "पिछली SIS / FPS योजना में, केंद्र सरकार ने 400 फोर्टिफाइड पुलिस थानों के निर्माण और राज्यों में पुलिस के बुनियादी ढांचा के उन्नयन के लिए 1,180 करोड़ रुपये से अधिक जारी किए।
जाहिर है केंद्र और राज्य स्तर की सरकारों की दिलचस्पी, आदिवासी लोगों के हित में क्षेत्र को "विकसित" करने के बजाए, कॉर्पोरेट लूट ट के खिलाफ किसी भी प्रतिरोध को कुचलने के लिए पूरे क्षेत्र का सैन्यीकरण करने में ज़्यादा है। हालाँकि, इन क्षेत्रों का जितना अधिक सैन्यीकरण होता है, जनता का प्रतिरोध कॉरपोरेट लूट और सैन्यीकरण के ख़िलाफ़ उतना ही अधिक होता है।
सिलगेर शिविर विरोधी आंदोलन
लोग अब बैरिकेड्स से हटकर हरे रंग में रंगे शहीद स्मारक की ओर मुड़ गए है। पांचों शहीदों के नाम अंकित हैं, एक नाम अंकित नहीं है क्योंकि जब बच्चा मरा तो मां के गर्भ में था, इस दुनिया को भी नहीं देख पाया, जिस दुनिया को बेहतर बनाने के लिए उसकी मां संघर्ष कर रही थी। उसके साथ बच्चे की भी मृत्यु हो गई, राज्य के दमन के द्वारा माँ के कोख में मारे गए कई बच्चों की संख्या में एक बढ़त और हो गई।
जनता "उर्स भीमा जोहार लो!", "पुणम सोमली जोहार लो!", "उइके पांडु जोहार लो!", "कवासी वाघा जोहर लो!" और "मिडियम मासा जोहार लो!" जैसे नारे लगा रही है। शहीदों के लिए इज्जत और प्यार ऐसी है कि पूरी भीड़ शहीदों के स्मारक के आसपास घेरे में खड़ी है और उनके नारे इतने ऊंचे हैं कि उन्हें मीलों दूर से सुने जा सकते है।
अपने नारे जारी रखते हुए यह मार्च अब वापस लौट रहा है। जैसा कि हमने देखा, सड़क के इस हिस्से में कई निर्माणाधीन पुल हैं जो अधूरे रह गए हैं। चौड़ी सड़क बनाने के लिए पुलिस कई बार प्रयास कर चुकी है। लोग वापस धरण स्थल के पास पहुँच रहे है और अब कुछ आराम और भोजन के बाद जनसभा का अंतिम सत्र दोपहर में शुरू होगा।
सड़कों के खिलाफ भाषण
रविंद नेताम, मनीष कुंजाम, बेला भाटिया, सुदेश टीकम, सुरजू टेकाम जैसे सामाजिक एवं राजनैतिक कार्यकर्ता, पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता तथा अन्य लोग इस तीन दिवसीय कार्यक्रम के निष्कर्ष को देखने के लिए उपस्थित हैं। मुख्य मंच मिट्टी से बने एक ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया, जिसके ऊपर लकड़ी और फूस के छप्पर की संरचना है। पूरा क्षेत्र, जहां बैठकर जनता को वक्ताओं को सुनना है, एक विशाल झोपड़ी हॉल की तरह बनाया गया है, जिसकी छत पेड़ों की शाखाओं और पत्तियों से बनी है, जो लकड़ी के द्वारा खंभे के रूप में टिकाया गया है। कोई तंबू नहीं, कोई स्टील की छड़ नहीं। कुछ स्पीकर, कुछ कुर्सियों और सोलर पैनलों के अलावा, जो माइक को बिजली प्रदान करने के लिए हैं, सब जंगल से ही है।
राजनांदगांव के आदिवासी किसान नेता सुदेश टीकम ने लोगों को संबोधित करते हुए बताया कि कैसे कांग्रेस और बीजेपी ने छत्तीसगढ़ के संसाधनों का दोहन करने के लिए बड़े कॉरपोरेट घरानों से हाथ मिलाया है और आदिवासियों का जल-जंगल जमीन छीनने की कोशिश कर रही है। सिलगर और हसदेव विरोध प्रदर्शन जैसे मजबूत जन आंदोलनों के निर्माण की आवश्यकता के बारे में बोलते हुए, उन्होंने इन जन आंदोलनों की एकता पर जोर दिया, जो शोषणकारी व्यवस्था से मोर्चा लेने के लिए महत्वपूर्ण है ।
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और फोरम अगेंस्ट कॉरपोरेटाइजेशन एंड मिलिटराइजेशन (FACAM) के सदस्य, सरोज गिरी ने वर्तमान परिदृश्य में सिलगर शिविर विरोधी आंदोलन के महत्व के बारे में बताया। उनका मानना है की अर्धसैनिक बलों को लाने एवं कॉर्पोरेटिकरण के खिलाफ आंदोलनों को कुचलने के लिए सड़क और शिविर बनाए जा रहे हैं। उन्होंने कहाँ की छत्तीसगढ़ के संसाधनों की लूट तथा खनन निगमों द्वारा पर्यावरण और आदिवासी संस्कृति के विनाश के खिलाफ, सिलगर और इस तरह के कई आंदोलन दिवार के तरह है।
उन्होंने कहा कि आदिवासी लोग इस संघर्ष में अकेले नहीं हैं क्योंकि यह संघर्ष केवल बस्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका दायरा बहुत व्यापक है और हर जगह के लोग इस विशिष्टता से सीख रहे हैं। उन्होंने कॉर्पोरेटिकरण के खिलाफ संघर्षों के बारे में प्रचार करने में फोरम अगेन्स्ट कॉर्पोरेटाइज़ेशन एण्ड मिलिटराइज़ेशन (FACAM) की प्रतिबद्धता को दोहराया और कहा कि सैन्यीकरण के खिलाफ आदिवासी लोगों के संघर्षों ने हमारे अन्दर इस मुद्दे पर बोलने की भावना को फिर से जीवंत कर दिया है।
शहीदों के परिवारों ने आगे आकर, राज्य के द्वारा मुआवाजे को लेके चल रहे दुष्प्रचार को खारिज करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें अपने प्रियजनों की हत्या के लिए प्रत्येक को 10,000 रुपये की पेशकश की गई थी। हत्या के लिए जिम्मेदार सीआरपीएफ जवानों के खिलाफ जांच और कार्रवाई की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि उचित कार्रवाई के बाद ही वह एक एक करोड़ रुपये का मुआवजा स्वीकार करेंगे।
उन्होंने इस राज्य के द्वारा चलाये जा रहे दुष्प्रचार को भी खारिज कर दिया कि माओवादी उन्हें धमकी दे रहे है कि वे राज्य से कोई मुआवजा नहीं लेंगे। गौरतलब है कि 17 मई, 2021 की फायरिंग में 3 लोगों की हत्या के बाद सीआरपीएफ ने दावा किया कि मारे गए लोग 'माओवादी' थे जिन्होंने सीआरपीएफ के जवानों पर हमला करने की कोशिश की।
जिसके बाद सुरक्षाबलों ने फायरिंग की. यहाँ ये सवाल उठता है कि अगर पैसों में मापा जाये तो क्या इंसान की जान महज 10,000 रुपये के रूप में मापी जा सकती हैं, क्या सैनिकों के लिए किसी आदिवासी को मारना इतना आसान है। CRPF का दावा है कि वे "माओवादी" थे जिन्होंने सैनिको पर हमला किया था? अगर इन क्षेत्रों में CRPF के ट्रैक रिकॉर्ड को देखें तो उत्तर स्पष्ट है !
नया नेतृत्व और नई रणनीति
मूलवासी बचाओ मंच के सदस्य ज्यादातर युवा पुरुष और महिलाएं हैं जिनकी उम्र 25 साल से अधिक नहीं है और अपने संकल्प को लेके बहुत समर्पित और अडिग हैं। यह सलवा जुडूम का सामना करने वाले वह युवा हैं जिन्होंने कम उम्र में सलवा जुडूम के द्वारा अपने परिवार के किसी व्यक्ति या अपने गांव के किसी व्यक्ति की हत्या या बलात्कार को देखा है।
गंगलूर से मूलवासी बचाओ मंच की नेत्री शांति पुनेम यौन हिंसा के विरोध में सक्रिय रही हैं तथा यौन उत्पीड़न के मामलों का विवरण देने में विभिन्न तथ्य खोज टीमों की सहायता की है। इसके चलते वह बहुत कम उम्र से राज्य दमन का सामना कर रही है। शांति की उम्र बमुश्किल 25 वर्ष है और वह हिंदी में पारंगत है, जिससे वह क्षेत्र के मुद्दों को अन्य कार्यकर्ता और पत्रकार के सामने संवाद करने में सक्षम हैं।
मुलवासी मंच के कुछ लड़के और लड़कियां बीजापुर और सुकमा जैसे शहरों में पढ़े हैं और हैं अपने अधिकारों को लेके अच्छी तरह से वाकिफ हैं और अधिकारियों के साथ व्यवहार की पेचीदगियों के बारे में जानते हैं।
शिविरों का विरोध करने के कारणों के बारे में बताते हुए, सिलगेर के मुलवासी बचाओ मंच के नेता रघु मिडियम ने हमें बताया “इन शिविरों का निर्माण सिलगेर के ग्रामीणों की कृषि भूमि को जबरदस्ती अधिग्रहण करके किया जा रहा है; जबकि PESA और संविधान की 5वीं अनुसूची से यह साफ है आदिवासी छेत्र में किसी भी तरह के विकास काम के लिए वहाँ की ग्रामसभा से मंजूरी लेना अनिवार्य है। इन शिविरों में बड़ी संख्या में बल आते हैं और वे ग्रामीणों पर अत्याचार करते हैं।
महिलाओं का यौन उत्पीड़न और बलात्कार भी किया जाता है, लोगों को अवैध रूप से हिरासत में लिया जाता है और खनन कंपनियों के खिलाफ किसी भी विरोध को इन्हीं ताकतों द्वारा कुचल दिया जाता है; वे यहां हमारी रक्षा करने के लिए नहीं बल्कि लूटने के लिए हैं उनका सिर्फ एक ही मकसद है की हमारे जल-जंगल-जमीन को खनन कंपनियों को सौंप देना "। लोगों की मांगों पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, "हम शिविर नहीं चाहते; हमें स्कूल और अस्पताल चाहिए, इस क्षेत्र में बहुत कम स्कूल हैं और वह भी बहुत दूर।
यहाँ अच्छी चिकित्सा सुविधाएं भी नहीं हैं हमें चिकित्सा के लिए बीजापुर तक सफर करना पड़ता है, इसलिए हमें अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था और शिक्षा सुविधाओं की आवश्यकता है"। रघु अभी 22 साल के हैं और उन्होंने इंटर की पढ़ाई पूरी की है। रघु साक्ष देने वालों में हैं की कैसे सलवा जुडूम और ऑपरेशन ग्रीन हंट की अवधि के दौरान राज्य एवं उसके द्वारा समर्थित मिलिशिया ने क्रूरता की थी। रघु की अपनी बहन के साथ बलात्कार किया गया।
आज की दुनिया में बिरसा मुंडा, गुंडाधूर और कोमाराम भीम कैसे होते ? उनके द्वारा जल-जंगल-जमीन पर आदिवासियों के अधिकार के लिए किए गए संघर्ष, और आज, संसाधनों की लूट के खिलाफ अपने जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए आदिवासियों द्वारा छेड़े जा रहे संघर्षों मे क्या अंतर है? शांति पुनेम रघु मिदियाम और हजारों अन्य आदिवासियों द्वारा लड़े जा रहे संघर्षों में तथा बिरसा और गुंडाधूर के संघर्षों मे यही अंतर जान पड़ता है की पहले शोषक ब्रिटिश उपनिवेशवादी थे जबकि आज के शोषक अडानी, जिंदल और टाटा जैसे भारतीय कॉरपोरेट हैं जिनको साम्राज्यवादी शक्तियों का समर्थन है।
आज के समय में अमेरिका, जापान आदि की विदेशी पूंजी के खिलाफ लड़ाई में गुंडा धुर और बिरसा मुंडा, रघु और शांति जैसे हजारों संघर्षरत आदिवासियों के रूप में नई सीख दे रहे हैं कि कैसे बड़े निगमों और शक्तिशाली दमनकारी राज्य के खिलाफ संघर्ष की जानी चाहिए। आज के आदिवासी, विशेष रूप से युवा, तकनीकी उपयोग के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं जो आंदोलन के विचारों और मुद्दों को एक नए स्तर पर प्रचारित करने में मदद कर रहे है। मूलवासी बचाओ मंच द्वारा जारी किया गया वीडियो आमंत्रण ऐसा ही एक उदाहरण है।
संघर्ष का यह तरीका सलवा जुडूम और ऑपरेशन ग्रीन हंट के दौरान आदिवासियों द्वारा किए जाने वाले संघर्ष के तरीके से बिल्कुल अलग है। पहले, महत्वपूर्ण शहरी केंद्रों पर बड़ी रैलियां और विरोध प्रदर्शन होते थे जो की मुख्यतः एक दो दिन तक चलते थे। लंबे और टिकाऊ धरना प्रदर्शन का मौजूदा मॉडल इस क्षेत्र के लिए नया है।
संघर्ष का यह रूप हमने शाहीन बाग में सीएए-एनआरसी- एनपीआर विरोधी आंदोलन के दौरान देखा, जहां हजारों लोग एक महत्वपूर्ण स्थल पर एकत्र हुए और महीनों तक अपना धरना जारी रखा। किसान आंदोलन ने शाहीन बाग के 'चक्का जाम' मॉडल को आगे बढ़ाया और दिल्ली के आसपास सिंधू बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर और गाजीपुर बॉर्डर पर 3 महत्वपूर्ण राजमार्ग प्रवेश बिंदुओं को अवरुद्ध कर दिया।
सिलगेर आंदोलन तब शुरू हुआ जब किसान आंदोलन मध्य में था और सिलगेर के आदिवासी ग्रामीणों ने संघर्ष की समानता की ओर इशारा करते हुए किसान आंदोलन के प्रति एकजुटता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन जमीन को कॉरपोरेटों द्वारा हड़पे जाने से बचाने के लिए किसानों का संघर्ष है, ठीक उसी तरह सिलगेर आंदोलन आदिवासी क्षेत्र में शिविरों के निर्माण, खनिज संसाधनों के खनन के लिए भूमि हड़पने और जल-जंगल-जमीन के विनाश के खिलाफ आदिवासियों का संघर्ष है।
इसके चलते किसान आंदोलन के कुछ नेताओं ने भी सिलगेर के लोगों के साथ एकजुटता व्यक्त की। सिल्गर कैंप विरोधी आंदोलन ने अधिक दमनकारी वातावरण में, पूरी तरह से अलग ढाँचे के आधार पर लंबे जन आंदोलन के नमूने को लागू किया, जहां बड़े पैमाने पर मीडिया ब्लैकआउट के चलते राजकिया दमन होने पर भी बहुत कम रिपोर्ट किया जाता है।
किसान आंदोलन और सीएए-एनआरसी- एनपीआर विरोधी आंदोलन, हालांकि कॉर्पोरेट मीडिया द्वारा बदनाम किया जा रहा था, परन्तु जनहित एवं लोकतान्त्रिक मीडिया चैनलों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मीडिया घरानों द्वारा व्यापक रूप से कवर और प्रचारित किया गया था। 26 जनवरी 2021 की 'ट्रैक्टर परेड' के ठीक बाद सिंधू, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डर से मीडिया हर पल की रिपोर्टिंग न कर रहा होता तो क्या होता?
इसी तरह 15 दिसंबर 2019 को यदि नागरिक समाज, मीडिया घराने और बड़े पैमाने पर लोग जामिया नहीं पहुंच पाए होते या दिल्ली पुलिस मुख्यालय में बड़ी संख्या में विरोध करके तुरंत जवाब नहीं दिया होता, तो जामिया कैंपस की घेराबंदी कब तक जारी रहती और छात्रों के साथ कैसी क्रूरता की जाती; कोई केवल अनुमान लगा सकता है और आभारी हो सकता है कि ऐसा नहीं हुया।
लेकिन जब बस्तर जैसी जगहों की बात आती है तो सूचना का प्रवाह एक विशेषाधिकार बन जाता है जो आदिवासी लोगों को नहीं मिलाता। प्रेस की स्वतंत्रता एक काल्पनिक शब्द बन जाती है और जो "स्वतंत्रता" प्रेस को मिलती है वो केवल पुलिस, खनन अधिकारियों और समझौता किए गए राजनेताओं की कथा प्रकाशित करने की मिलती है। अपने आप मे अनूठा और हजारों ग्रामीणों की सामूहिक लामबंदी के साथ एक साल तक जारी रहने के बावजूद, सिल्गर कैम्प विरोधी आंदोलन पर मीडिया का बहुत कम ध्यान आकर्षित हुआ।
इसका कारण है कि राज्य जानबूझकर इन क्षेत्रों की वास्तविकताओं को बाहर आने से रोकने की कोशिश कर रहा है, जमीन पर काम करने वाले पत्रकारों को धमकाता है और परेशान करता है जिससे वह सूचना ब्लैकआउट कर पाए। यह सूचना ब्लैकआउट लोगों पर क्रूर राज्य दमन को अंजाम देने में मदद करता है, जो किसी बाहरी पर्यवेक्षकों और गवाहों के बिना राज्य द्वारा अपने लोगों पर किए गए युद्ध से कम नहीं है।
दी जेनोसाईडल वेपन: ऑपरेशन समाधान - " प्रहार"
ज्य लंबे समय से नक्सलवाद से "निपटने" के अपने दृष्टिकोण में 'लोहे की मुट्ठी' का उपयोग कर रहा है और इस पूरी अवधि में रा सलवा जुडूम, ऑपरेशन ग्रीन-हट, झारखंड में ऑपरेशन एनाकोंडा, मिशन 2016, मिशन 2017, आदि, जैसी विभिन्न नरसंहार नीतियां देखी गई हैं। यह सभी माओवादी आंदोलन से प्रभावित क्षेत्रों के "विकास" का मार्ग प्रशस्त करने के लिए इन क्षेत्रों से आंदोलन का सफाया करने का दावा करती हैं।
हालांकि, इन क्षेत्रों में अर्धसैनिक शिविरों का निर्माण और सड़कों का नेटवर्क " वामपंथी उग्रवाद " का मुकाबला करने के नाम पर भारी सैन्यीकरण करके लोगों के प्रतिरोध को कुचलने और संसाधनों की कॉर्पोरेट लूट का मार्ग प्रशस्त करने के लिए राज्य की नीति का एक हिस्सा है।
2017 में शुरू किया गया ऑपरेशन समाधान प्रहार ऐसी ही एक नीति है जिसका उद्देश्य देश के लोगों पर बड़े पैमाने पर आक्रमण करना है। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, केंद्रीय गृह सचिव राजीव महर्षि, खुफिया ब्यूरो के निदेशक, राज्य पुलिस और केन्द्रीय अर्धसैनिक बालों के प्रमुखों की उपस्थिति में मई, 2017 के महीने में आयोजित एक समीक्षा बैठक में इस नीति का शुभारंभ किया।
इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, गृह मंत्री सिंह ने कहा, वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई सुरक्षा और विकास के मोर्चे पर एक समन्वित लड़ाई है जिसे अंत तक लड़ा जाना है और जीतना है। आप सभी से अधिक योग्य और सक्षम कौन हो सकता है? लैट यूअर एक्शन स्पीक फॉर इट्टसैलफ (अपने कार्य को स्वयं बोलने दें) ", यह बयान अपने आप में आंदोलन और क्षेत्र के लोगों द्वारा उठाए गए सवालों से निपटने के लिए राज्य के दृष्टिकोण के बारे में बहुत कुछ बताता है। गृह मंत्री की विकास की कल्पना सभ्य होने से अधिक सैन्यवादी है।
समाधान का विस्तार - 'स्मार्ट नेतृत्व आक्रामक रणनीति, प्रेरणा और प्रशिक्षण, कार्रवाई योग्य खुफिया जानकारी, डैशबोर्ड आधारित प्रमुख प्रदर्शन संकेतक और प्रमुख परिणाम क्षेत्र, दोहन प्रौद्योगिकी, प्रत्येक थिएटर के लिए कार्य योजना और वित्तपोषण तक पहुंच नहीं'। जाहिर तौर पर यह एक आक्रामक नीति है जोकि इन 'युद्ध के गलियारों' में अर्धसैनिक बलों का संचालन करने वाले शीर्ष सैन्य अधिकारियों के लिए एक कारगर हथियार है।
'स्मार्ट लीडरशिप' जैसे शब्द, एस०आर० पी० कल्लूरी या अभिषेक पल्लव जैसे लोगों को प्रतिनिधित्व करने का बढ़ावा देने की मानसिकता को दर्शाता हैं। इसका उद्देश्य हैं ऐसी महत्वाकांक्षी नेतृत्व का निर्माण करना जो लोन वराहू (दंतेवाड़ा एसपी अभिषेक पल्लव द्वारा तैयार की गई समर्पण नीति) जैसी क्रूर नीतियों को तैयार करने में सक्षम है, जो की लोगों पर दमन और माओवादियों के साथ युद्ध जीतने की राज्य द्वारा तयार की गई कहानी का पुरजोर समर्थन कर सके।
'आक्रामक रणनीति' भाग से राज्य की प्रकृति स्पष्ट हो जाती है जब राज्य, सेना से अधिक सक्रिय होते हुए सड़क परियोजनाओं में आक्रामकता दिखाने की उम्मीद करता है जिससे की माओवाद को खतम किया जा सके। सुरक्षा बलों से इस तरह की आक्रामकता की उम्मीद, आदिवासी लोगों पर बढ़ने वाले क्रूर दमन की तरह इशारा करती है, जो शिविरों और सड़कों के निर्माण का विरोध कर रहे हैं।
उनकी जमीन पर जबरदस्ती कब्जा कर लिया जा रहा है और उनके जल-जंगल-जमीन को नष्ट कर दिया जा रहा है। समाधान के माध्यम से, राज्य का लक्ष्य "आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों" से जानकारी एकत्र करने के साथ-साथ उन्हें "गुप्त सैनिकों" (शैडो इन्टेलिजन्स ऑफिसर) के रूप में तैनात करके 'कार्रवाई योग्य खुफिया जानकारी' (ऐक्शनबल इन्टेलिजन्स) हासिल करना है।
नतीजतन, राज्य आगामी वर्षों में अतिरिक्त 2542 टावरों के साथ 2343 नए मोबाइल टावरों की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध है, जो की इन 'गुप्त सैनिकों' के कार्य मे लाभदायक साबित होंगे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा काउंटर इनसर्जेंसी ऑपरेशंस में नागरिकों और आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद, इस तरह के "आत्मसमर्पित नक्सलियों" को जिला रिजर्व गार्ड और 'बस्तर फाइटर्स' जैसे सहायक बलों के रूप में भी शामिल किया जा रहा है।
इसके अलावा, इस नीति में 'हार्नेसिंग टेक्नोलॉजी' का अर्थ है विद्रोहियों की आवाजाही की निगरानी के लिए परिष्कृत हथियारों, जीपीएस और उपग्रह ट्रैकिंग, मानव रहित हवाई वाहनों (यूएवी या ड्रोन ) का उपयोग और तदनुसार संचालन तैयार करना। ड्रोन का उपयोग करने की इस बात की पुष्टि, बीजापुर और सुकमा जिलों के गांवों में हाल के हवाई हमलों और अप्रैल, 2021 में बीजापुर के गांवों पर हुए हवाई हमले से की जा सकती है, जिसे आदिवासी ग्रामीणों और माओवादियों ने ड्रोन हमला बोला है।
कीय पेरफोरमेंस इंडीकेटर (केपीआई) और प्रमुख परिणाम क्षेत्र (केआईए) ऐसे पैरामीटर हैं जिनके माध्यम से प्रत्येक मिशन या ऑपरेशन को हत्या अनुपात, हथियारों और गोला-बारूद के मामले में माओवादियों को झटका, आदिवासी जीवन शैली के विनाश और यौन उत्पीड़न के आधार पर आंका जाता है। संपूर्ण शब्दावली और नीति में माओवादियों का सफाया करने के लिए कॉर्पोरेट शैली की शब्दावली का उदार उपयोग शामिल है।
ऑपरेशन समाधान प्रहार की नीति, जिसे राज्य, माओवादी आंदोलन के लिए प्रति विरोधी के रूप में परिकल्पित करता है, 400 गढ़वाले पुलिस/अर्धसैनिक स्टेशनों के निर्माण की योजना को स्पष्ट करता है, जिसे फॉरवर्ड ऑपरेशनल बेस भी कहा जाता है। सिलगर, बेचाघाट, गंगलूर आदि जैसे विभिन्न धरना स्थलों द्वारा विरोध किए जा रहे अर्धसैनिक शिविरों का निर्माण ऑपरेशन समाधान की नीति के तहत किया गया है।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रोडों का जाल बिछाने का काम भी इस नीति के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है। रोड रिक्वायरमेंट प्लान ( RRP-I) और रोड रिक्वाइर्मन्ट प्लान फॉर लेफ्ट विंग इक्स्ट्रीमिस्ट ऐरिआज़ (आरसीपीएलडब्ल्यूईए), दो ऐसे योजनाएं है जिसके तहत इन सड़कों का निर्माण किया जा रहा है। विभिन्न स्थानों पर आदिवासी लोगों द्वारा विरोध का सामना कर रहे सड़क निर्माण भी उपरोक्त सड़क परियोजनाओं के तहत ही किए जा रहे हैं। राज्य ने कुल 17,600 किलोमीटर सड़क पारित की है, जिसमें से 9,343 किलोमीटर सड़क पहले ही बन चुकी है।
अप्रैल 2022 में, केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा को लिखित उत्तर में सूचित करते हुए कहा, "पिछले पांच वर्षों के दौरान एस०आर० ई० योजना के तहत वामपंथी उग्रवाद प्रभावित राज्यों को 1,623 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं । स्पेशल इन्फ्रास्ट्रक्चर स्कीम (एसआईएस) के तहत, विशेष बलों (एसएफ) और विशेष खुफिया शाखाओं (एसआईबी) को मजबूत करने के लिए 371 करोड़ रुपये और 250 गढ़वाले पुलिस स्टेशनों के लिए रु 620 करोड़ रुपए, 2017 से कमजोर वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों मे स्वीकृत किए गए हैं।
मंत्री ने कहा, "पिछली एसआईएस / एफपीएस योजना में, केंद्र सरकार ने 400 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशनों के निर्माण और राज्यों में पुलिस बुनियादी ढांचे के उन्नयन के लिए 1,180 करोड़ रुपये से अधिक जारी किए थे।" इसके अलावा, इन सड़कों के निर्माण के लिए केंद्र द्वारा राज्यों को विभिन्न सिक्युरिटी रिलेटेड इक्स्पेन्डिचर (एस०आर०ई०) और स्पेशल इंफ्रास्टरकचरल स्कीम (एस०आई०एस० ) के तहत धन आवंटित किया जा रहा है। केंद्र द्वारा स्पेशल सेंट्रल असिस्टेंस (एस०सी०ए०) योजना के नाम पर अतिरिक्त धनराशि भी उपलब्ध कराई जाती है।
यह उल्लेख करना उचित है कि क्षेत्र को "नक्सल मुक्त" माना जाने के बाद, 'विकास और सुरक्षा' व्यय के लिए हजारों करोड़ आवंटित करने वाली इन फैंसी योजनाओं को वापस ले लिया जाता है। जाहिर है, केंद्र और राज्य स्तर की सरकारें आदिवासी लोगों के हित में क्षेत्र को "विकसित" करने की तुलना में कॉर्पोरेट लूट के खिलाफ किसी भी प्रतिरोध को कुचलने के लिए पूरे क्षेत्र का सैन्यीकरण करने में अधिक रुचि रखती हैं।
इसके अलावा, सलवा जुडूम से लेकर ऑपरेशन ग्रीन हंट तक, राज्य इन क्षेत्रों की गंभीर वास्तविकताओं को सामने लाने के लिए जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों को परेशान करके एक ऐसा युद्ध छेड़ने में आमादा है जिसमे कोई गवाह ना हों। ये लोग जो, या तो जमीनी स्तर से राज्य दमन की घटनाओं को रिपोर्ट कर रहे हैं, आदिवासी लोगों को कानूनी सहायता प्रदान कर रहे हैं या जो राज्य के अत्याचारों के खिलाफ अभियान चला रहे हैं, उन्हें लगातार कठोर कानूनों के तहत मामलों में फसाया, धमकाया गया, हमला किया गया और उन्हें जेल में डाल दिया गया।
राज्य के कार्यों की वास्तविकता और विकास की धारणा को चुनौती देने वाली हर बात को राज्य व्यवस्था सामने आने से रोकना चाहती है। इन क्षेत्रों में राज्य के कार्यों की आलोचना को हटाने के इन प्रयासों के साथ-साथ "नक्सल विरोधी प्रचार" पर करोड़ों खर्च किए जाते हैं। सूचना को नियंत्रित करने के लिए, राज्य द्वारा कुछ पत्रकारों और समाचार पत्रों को खरीदकर केवल राज्य पक्ष की सूचना को प्रचलन में आने की अनुमति दी जाती है जिससे की आम जनता तक सिर्फ राज्य के पक्ष की सूचना ही पहुँचती है है।
यह सूचना नियंत्रण, सार्वजनिक धारणा प्रबंधन का एक अच्छी तरह से तैयार किया गया तंत्र है जिसे राज्य, ऑपरेशन समाधान प्रहार के रूप में उपयोग कर रहा है ताकि खुद को उदार, हल चाहने वाला और विकास प्रेमी के रूप में प्रस्तुत किया जा सके, जो कि वास्तविकता में पतनशील, विकास-विरोधी और हिंसक है।
यह सार्वजनिक धारणा प्रबंधन माओवादियों तथा उनके नेतृत्व में जनता, या साधारण जनता एवं स्वतंत्र कार्यकरता को विकास विरोधी, राष्ट्र-विरोधी और यहां तक कि माओवादी समर्थक के रूप में चित्रित करने का कार्य करती है। इस तरह राज्य के कार्यों और नीतियों पर किसी बहस और आलोचना का स्थान नही रहता, जिससे लोगों द्वारा किसी भी स्वतंत्र जांच / आलोचना के लिए कोई जगह नहीं बचती है। परिणामस्वरूप, बड़े कारपोरेटों के हित में आदिवासी जनता को उनके जल जंगल जमीन से विस्थापित करने और बेदखल करने के लिए, राज्य को क्रूर दमन करने की खुली छूट मिल जाती है।
फोरम अगेंस्ट कॉरपोरेशन एंड मिलिटराइजेशन से राजवीर कौर ने हर कुछ किलोमीटर पर इन अर्धसैनिक शिविरों के निर्माण के पीछे ऑपरेशन समाधान प्रहार की भूमिका को पहचानने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि सिलगर जैसे शिविर विरोधी आंदोलन, संक्षेप में, ऑपरेशन समाधान प्रहार के खिलाफ भी एक आंदोलन हैं। उन्होंने कहा कि इस नीति के बारे में सिलगर में मूलवासी बचाओ मंच जैसे मंचों से बोलना बहुत महत्वपूर्ण है ताकि शिविर और ऑपरेशन समाधान, दोनों का समान रूप से विरोध किया जा सके।
राजवीर ने फोरम की ओर से बोलते हुए, जनता और लोकतान्त्रिक नागरिक समाज को समाधान - प्रहार के खिलाफ अभियान में हाथ मिलाने और सलवा जुडूम और ऑपरेशन ग्रीन हंट की तरह इसे हराने का आह्वान किया। छात्र कार्यकर्ता फ़िरोज़ आलम ने फोरम के सॉलिडेरिटी स्टेटमेंट को पढ़ा और अर्धसैनिक शिविरों, हवाई हमलों, नकली आत्मसमर्पणो, हत्याओं और यौन हिंसा के खिलाफ आंदोलन पर फोरम की समझदारी को दोहराते हुए, देश के लोगों के खिलाफ हो रहे कई अन्य अत्याचारों पर अपनी समझदारी को दोहराया। उन्होंने कॉरपोरेट लूट के खिलाफ लड़ने वाले लोगों पर क्रूर दमन और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष में शामिल होने और सैन्य अभियान समाधान - प्रहार के खिलाफ एकजुट होने के लिए फोरम के आह्वान को दोहराया।
टीम के सदस्य
मीना कंडासामी, लेखिका
सरोज गिरी, प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविधालय
संदीप राऊजी, पत्रकार, वर्कर्स यूनिटी
मीना कोटवाल, पत्रकार, द मूकनायक
शिव कुमार, अध्यक्ष, मज़दूर अधिकार संगठन
फिरोज आलम, विश्वविद्यालय छात्र फेडरेशन
एहतमाम उल हक, लॉयर्स अगेन्स्ट अटरोसिटीज़
राजवीर कौर, कार्यकर्ता, फोरम अगेन्स्ट कॉर्पोरेटाइज़ेशन एण्ड मिलिटराइज़ेशन
गृह मंत्रालय
केंद्रीय गृह मंत्री ने वामपंथी उग्रवाद प्रभावित राज्यों की समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की श्री राजनाथ सिंह ने सुरक्षा अभियानों में उपयोग के लिए 'समाधान' का नया सिद्धांत दिया।
केन्द्रीय गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने आज वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित दस राज्यों में वामपंथी उग्रवाद की स्थिति की समीक्षा की। बैठक में बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने भाग लिया। अन्य राज्यों का प्रतिनिधित्व राज्यों के वरिष्ठ मंत्रियों द्वारा किया गया था। इस अवसर पर राज्यों के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक भी उपस्थित थे।
केंद्र की ओर से गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए). गृह सचिव, खुफिया ब्यूरो के निदेशक और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। विकास पर दोपहर के सत्र के लिए, बिजली और नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा, रेलवे, नागरिक उड्डयन, सड़क परिवहन और राजमार्ग और संचार मंत्री मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उपस्थित थे। गृह मंत्री के विशिष्ट निर्देशों पर वामपंथी उग्रवाद से बुरी तरह प्रभावित 35 जिलों के जिला मजिस्ट्रेटों और पुलिस अधीक्षकों को भी अत्याधुनिक स्तर से जानकारी और प्रतिक्रिया प्रदान करने और उनकी समस्याओं को समझने के लिए आमंत्रित किया गया था।
सुबह के सत्र में सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई। गृह मंत्री ने वामपंथी उग्रवाद से लड़ने के लिए एक प्रचालनात्मक कार्यनीति 'समाधान' की प्रतिपादन की घोषणा की। इस रणनीति के तत्व स्मार्ट लीडर्शिप के लिए एस. आगरेसीव स्ट्रैटिजी के लिए ए. मोटवेशन एण्ड ट्रैनिंग के लिए एम. ऐक्शनेबल इन्टेलिजन्स के लिए ए. डैशबोर्ड आधारित प्रमुख परिणाम क्षेत्रों और प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों के लिए डी, हार्नेसिंग टेक्नोलॉजी के लिए एच, एक्शन प्लान फॉर ईच थीअटर के लिए ए और नो एक्सेस टू फाइनेन्सिंग के लिए एन।
बैठक के दौरान, राज्यों के महत्त्वपूर्ण मुद्दों और अनुरोधों में निम्नलिखित शामिल थे
क. सुरक्षा संबंधी व्यय (एसआरई), विशेष अवसंरचना स्कीम (एसआईएस) समेकित कार्य योजना (आईएपी) / अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता (एसीए), उग्रवाद रोधी और आतंकवाद रोधी (सीआईएटी) स्कूलों और सुदृढ़ पुलिस स्टेशनों जैसी बामपंथी उग्रवाद रोधी विशिष्ट स्कीमों को जारी रखना / फिर से शुरू करना।
ख. एसआरई योजना के अंतर्गत कुछ नए जिलों को शामिल करना ।
ग. अतिरिक्त केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) बटालियनों की तैनाती कुछ राज्यों ने केन्द्र द्वारा प्रदान की गई सीएपीएफ बटालियनों के लिए भुगतान से छूट की भी मांग की है।
घ. अधिकांश राज्यों ने प्रचालनों के लिए हेलीकाप्टर सहायता के लिए अनुरोध किया है। ङ) राज्य पुलिस और सीएपीएफ द्वारा आधुनिक प्रौद्योगिकी के उपयोग पर भी चर्चा की गई।
च. अंतरराज्यीय समन्वय, सूचना आदान-प्रदान, अंतरराज्यीय सीमाओं के साथ प्रचालनों के लिए संयुक्त कार्यबलों की स्थापना से संबंधित मुद्दों पर विचार विमर्श किया गया था।
छ. बिहार के मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि वामपंथी उग्रवादी समूहों की निधि प्रवाह का प्रभावी रूप से अवरुद्ध करने को सुनिश्चित करने के लिए धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है।
ज. 24 अप्रैल, 2017 को सुकमा जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के उपायों पर 35 सबसे बुरी तरह से प्रभावित वामपंथी उग्रवादी जिलों के एसपी के सुझावों के साथ विस्तार से चर्चा की गई थी।
विकास के मुद्दों पर सत्र के दौरान, निम्नलिखित बिंदुओं पर चर्चा की गई
क. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री ने सूचित किया कि पूर्व-निर्मित स्लैब और मृदा स्थिरीकरण जैसी विभिन्न नई प्रौद्योगिकियों की जांच की गई थी। राज्य इन प्रौद्योगिकियों के साथ सड़कों के निर्माण के लिए पायलट परियोजनाएं शुरू कर सकते हैं। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया है कि राज्य वामपंथी उग्रवाद वाले क्षेत्रों में वितरण के लिए किसी भी आवश्यकता को पेश कर सकते हैं।
ख. नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन मंत्री ने सूचित किया कि मंत्रालय वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों को कम लागत वाली ऊर्जा प्रदान करने के लिए कई सौर पार्क, सौर प्रकाश और सौर पंप योजनाएं शुरू कर रहा है।
ग. विद्युत मंत्री ने सूचित किया कि वामपंथी उग्रवाद वाले क्षेत्रों में गांवों का विद्युतीकरण दिसंबर, 2018 को लक्ष्य के रूप में रखते हुए युद्ध स्तर पर किया जा रहा है।
घ. माओवादी कोर क्षेत्र के मध्य में जगदलपुर में हवाई अड्डा बहुत जल्द चालू हो जाएगा।
ङ. मोबाइल टावरों की संस्थापना का चरण-II चरण-I के अनुभवों और समस्याओं को शामिल करने के बाद शुरू किया जा रहा है। च) रेल मंत्री ने बताया कि हाजीपुर- सगौली, गिरिडीह-कोडरमा, देवघर-सुल्तानगंज लाइन का कार्य पूरा होने वाला है।
अपने समापन भाषण में राजनाथ सिंह ने कहा कि यह बैठक बहुत ही उद्देश्यपूर्ण रही और प्रतिभागियों ने बहुत ही मूल्यवान सुझाव दिए जिन्हें गृह मंत्रालय ने नोट किया है। उन्होंने कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से इन मुद्दों पर प्रगति की निगरानी करेंगे। श्री राजनाथ सिंह ने वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में कुछ कठिनाइयों के बावजूद उपायुक्तों/पुलिस अधीक्षकों के रूप में युवा अधिकारियों द्वारा किए जा रहे अद्भुत कार्य की भी सराहना की।
Add Comment