लता मंगेशकर : उनके गीतों पर टिप्पणियों की जंग

  कैलाश दहिया

 

भारतीय सिने जगत को अपनी आवाज से चमत्कृत करती रही सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर का 6 फरवरी, 2022 को निधन हो गया। निश्चित ही यह देश के लिए दुख की घड़ी थी। देश में दो दिन का राजकीय शोक भी घोषित किया गया। यह एक स्वस्थ परंपरा है। उम्मीद है, इस परंपरा को बिना किसी जाति और धर्म भेद के आगे भी ध्यान में रखा जाएगा। लता जी के निधन पर देश के हर वर्ग के लोगों की तरफ से श्रद्धांजलि दी गई है। बावजूद इस के, कुछ आपत्तियां भी आई हैं। मराठी दलितों और पिछड़े वर्ग के कुछ लेखकों ने अपनी असहमतियां भी प्रकट की हैं।

पता लगता है, लता मंगेशकर ने बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर पर लिखे गाने को अपनी आवाज देने से इंकार कर दिया था। यह खबर मराठी समाचार पत्र 'लोकमत' में 21 अगस्त, 2019 को प्रकाशित हुई थी, जिस में 'लता मंगेशकरांनी आंबेडकरांचे गाणे गायले नाहीं : रविचंद्र हडसणकर' ( Lata Mangeshkar did not sing Ambedkar's song : Ravichandra Hadasankar) शीर्षक से लिखा गया है:

"भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांच्यावरील एक तरी गाणे गान सम्राज्ञी लता मंगेशकर यांनी गावे अशी महाकवी वामनदादा कर्डक आंतरिक इच्छा होती। त्यातूनच वामनदादा आणि मी लतादीदींना  भेटण्यासाठी गेलो। त्यांनी जेवण दिले। मात्र, गाणे काही गायले नाही। प्रसिद्ध कवी नामदेव ढसाल, राजा ढाले यांनी प्रयत्न केले, तरीही गाणे काही गायले नाही। तेव्हा वामनदादांनी 'तम्ही दगडांचीज गाणी गा, माणसाची गाणी नका गाऊ' अशा शब्दांत नाराजी व्यक्त केल्याची आठवण प्रसिद्ध कवी डॉ. रविचंद्र हडसणकर यांनी सांगितली।" (1)

इस का हिंदी अनुवाद एक मराठी मित्र ने कुछ यूं किया है - "भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर इनके ऊपर कम से कम एक गीत गान सम्राज्ञी लता मंगेशकर को गाना चाहिए था। ऐसी महाकवि वामनदादा कर्डक की दिल से इच्छा थी। इस लिए मैं और वामनदादा लता दीदी से मिलने गए थे। उन्होंने खाना खिलाया। पर गाना नहीं गाया। प्रसिद्ध कवि नामदेव ढसाल, राजा ढाले इन्होंने भी प्रयास किए पर फिर भी उन्होंने गाना नहीं गाया। इस पर वामनदादा द्वारा "आप सिर्फ पत्थरों के गीत गाओ इंसानों के मत गाओ" ऐसे शब्दों में अपनी नाराजगी जाहिर की थी। ऐसी  एक याद कवि डॉ. रविचंद्र हडसणकर द्वारा बताई गई।"

इस बात पर लता जी के निधन पर महार दलितों ने अपनी नाराजगी जताई और उन के गाने के क्षेत्र में योगदान को ही अस्वीकार कर दिया। वैसे, इसे मूढ़ता ही माना जाना चाहिए। यह किसी गायक-कलाकार की स्वतंत्रता मानी जानी चाहिए कि वह किस पर गाता या काम करता है। कोई इस बात के लिए एम. एफ. हुसैन की आलोचना नहीं कर सकता कि उन्होंने डॉ. अंबेडकर का चित्र नहीं बनाया। बेशक, इस से लता मंगेशकर और हुसैन की पारंपरिक सोच और सामाजिक प्रतिबद्धता का पता लगता है।

लेकिन यह आलोचना का कोई तार्किक आधार नहीं है। अगर लता मंगेशकर ने डॉ. अंबेडकर पर लिखे गाने गा दिए होते तो क्या वे बड़ी बन जातीं? बेशक उन का कद और भी बड़ा बन जाता, लेकिन दलितों को इस आधार पर उन की आलोचना का अधिकार नहीं मिल जाता। सवाल यह है कि लता मंगेशकर ने बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर पर लिखित गाने क्यों नहीं गाए?

पता लगता है, 'लताजी की दादी जी श्रीमती येशुबाई मूल रूप से गोवा राज्य के मंगेशी गांव में स्थित एक मंदिर में एक देवदासी थीं। अब वर्तमान समय में यह देवदासी समाज गोमांतक मराठा समाज के रूप में जाना जाता है, चूंकि इनके पिता दीनानाथ एक देवदासी के पुत्र थे, इसलिए इन्हें अपने पिता पंडित गणेश भट्ट नवाथे हर्डीकर, जो उस मंदिर के पुजारी थे, का सरनेम हर्डीकर नहीं मिल सकता था। इसलिए दीनानाथ ने मजबूर होकर अपना सरनेम मंगेशकर रख लिया।

दीनानाथ की पहली पत्नी श्रीमती नर्मदा का किसी कारणवश जल्दी ही निधन हो गया, इसलिए उन्होंने उनकी छोटी बहन शेवंती से शादी कर ली, उन्हीं श्रीमती शेवंती देवी से उन्हें लता, आशा, मीना, उषा चार बेटियां और एक हृदयनाथ मंगेशकर नामक पुत्र का जन्म हुआ।'(2) अब जाना जाए, जिस का जन्म देवदासी परंपरा में हुआ हो वह मोरल परंपरा में पैदा हुए और मोरल परंपरा के पक्षधर बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के गीत क्यों गाएगी?

वैसे, इस देवदासी परंपरा को बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के माध्यम से समझा भी जा सकता है। 'यह बात 16 जून, 1936 की है। गेल ओमवेत ने अपनी पुस्तक 'अंबेडकर : टुवार्डस एन एनलाइटेनड इंडिया' में इस घटना का हवाला इस प्रकार दिया है- "बम्बई में कमतीपुरा (कमाठीपुरा) वेश्यावृत्ति का केंद्र था। यह ज्यादातर दलित स्त्रियों का केंद्र था जो देवदासी प्रथा के द्वारा इस पेशे में झोंक दी गई थीं। वह लड़कियां मुरलिस और जोगतिन के रूप में जानी जाती थीं जो देवों को अर्पित कर दी जाती थीं। वे पवित्र वेश्याएं कही जाती थीं।

इन  स्त्रियों ने जून के महीने में एक बड़ी कॉन्फ्रेंस के बाद अपनी एक मीटिंग बुलाई। उन्होंने बैठक में तय किया कि वे अंबेडकर को बुलाएंगी। यह दावा करते हुए कि वे भी धर्मांतरण करने के बारे में सोच रही हैं उन्होंने अपनी बैठक में तय किया कि वे अंबेडकर को बुलाएंगी। इस के लिए अंबेडकर सहमत हो गए और 16 जून, 1936 को दामोदर हाल में एक मीटिंग की गई। लेकिन जब वहां अंबेडकर ने सार्वजनिक रूप से ऐलान किया कि उन की वेश्यावृत्ति महार जाति के लिए शर्म की बात है और उन्हें वेश्यावृत्ति के धंधे को बिलकुल छोड़ देना चाहिए तो वहां हंगामा खड़ा हो गया और वे औरतें अंबेडकर को  सरापती और चिल्लाती हुई गलियों में उतर गईं।'(3)

अब सवाल यह है, ऐसे व्यक्ति के सम्मान और प्रेम में लिखे गीतों को देवदासी परंपरा में पैदा हुई कोई गायिका क्यों गाएगी? बावजूद इस के पता लगता है, लता मंगेशकर बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर से प्रत्यक्ष रूप से मिल भी चुकी थीं। अपने 14 अप्रैल, 2020 के ट्विट में लता जी ने लिखा है- "नमस्कार, भारतीय संविधान के जनक महामानव भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी की जयंती पर मैं उनको कोटि कोटि वंदन करती हूं। मैं उनको प्रत्यक्ष रूप से मिल सके यह मेरा सौभाग्य है।" यह मानने में किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए कि यह ट्वीट इन्होंने अपनी पूर्व में की गई गलती को सुधारने के लिए ही किया हो।

वैसे, बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर पर लिखित गाने को इंकार कर देने की लता मंगेशकर की बात समझ में आती है। यह भी पता लगता है लता मंगेशकर ब्राह्मणी विचारों की समर्थक थीं। असल में, ये कभी समझ ही नहीं पाईं कि वह जिन विचारों का समर्थन कर रही हैं वही जारकर्म की व्यवस्था के पैरोकार हैं। जारकर्म की इसी व्यवस्था में देवदासी प्रथा और वेश्यावृत्ति की प्रथा पनपती है। ऐसे में किसी भी व्यक्ति को जारकर्म की व्यवस्था के खिलाफ लड़ना होता है। लेकिन, इसे किसी कलाकार की सीमा समझना चाहिए कि वह अपनी कला में सिरमौर हो सकता है, वैचारिक प्रक्रिया बिल्कुल अलग बात है।

वैचारिक प्रक्रिया में बड़े-बड़े लेखक - साहित्यकार ही पिस जाते हैं, तब किसी गायक-गायिका की बात करने का कोई तुक नहीं बनता। लेकिन लता जी अंतिम समय तक अपने पिता को याद करती रही हैं। पता लगता है ये  अपने आखिरी समय में पिता की रिकार्डिंग सुन रही थीं, इसी शीर्षक से एक अखबार में छपी खबर नहीं बताया गया है, 'अस्पताल में लता आखिरी समय में पिता दीनानाथ मंगेशकर को याद कर रही थीं। दीनानाथ नाट्य गायक थे।  

उन्होंने दीनानाथ की रिकॉर्डिंग्स और ईयरफोन मंगवाए। वे रिकॉर्डिंग सुन रही थीं।'(4) दरअसल, यह उन के मन के भीतर तक पिता के प्रति धंसी स्मृति को दर्शाता है। यहां पितृसत्ता विरोधियों पर सवाल ही सवाल बनते हैं। यहां पूछने वाली बात यह है, अगर लता मंगेशकर इस मुकाम तक नहीं पहुंचती और गुमनाम गायकों की तरह गाती रही होती तो क्या देवदासी प्रथा से उभर पातीं ?

उधर, प्रभाष जोशी ने लता जी के बारे में लिखा है, 'मेरे मन में लता मंगेशकर कुरबानी से जुड़ी हुई हैं। मुझे लगता है कि तेरह वर्ष की उम्र भर से गाने वाली इस महिला ने मां-बाप का वियोग सहा। अपने भाई बहनों को पाल पोस कर बड़ा किया। अविवाहित रहीं। अपना जीवन संग्राम क्षत्राणी की तरह अपने गाने से लड़ते हुए जीता।'(5) बात तो जोशी जी ठीक ही लिख रहे हैं, लेकिन पता नहीं क्यों ये लता जी को क्षत्राणी बता रहे हैं? ये उन्हें ब्राह्मणी क्यों नहीं लिख पाए? वैसे भी देखा जाए तो देवदासी प्रथा (कु-प्रथा) में पैदा होने वाली संतानों में ब्राह्मण पुजारियों का ही रक्त प्रवाहित होता है। इस का अर्थ है जोशी जी सब कुछ जानते हुए जान-बूझकर प्रक्षिप्त लिख रहे हैं।

लता मंगेशकर के निधन पर पिछड़े वर्ग के लेखकों की तरफ से आए फेसबुक, ट्विटर आदि के माध्यम से इन के दिमाग को समझने में मदद मिलती है। दिलीप सी. मंडल ने लता जी के निधन पर कई फेसबुक पोस्ट डालीं, जिन में इन्होंने इन के देवदासी परिवार से आने, बाबासाहेब के सम्मान में गाने से इनकार करने को लेकर लिखा। उन्होंने तो यहां तक लिख दिया, 'मंदिरों में यौन शोषण के लिए बनाई गई देवदासी प्रथा पर ज्यादातर राज्यों में पाबंदी है।

फिर भी देश में दो लाख से ज्यादा देवदासियां हैं। लता मंगेशकर जी के सम्मान में अगर सरकार देवदासियों के बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा और स्कॉलरशिप का कोई कार्यक्रम लाए तो यह लता जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।'(6) अब मंडल जी से ही पूछा जाए, तब इन का वेश्यावृत्ति से उत्पन्न बच्चों के बारे में क्या ख्याल है? यह उन की गिनती भी कर लेते।

फिर, ये अक्करमाशियों की भी गणना कर लें। अब अगर सरकार जारज संततियों को स्कॉलरशिप देना शुरू कर देगी तो जारों की तो बांछें खिल जाएंगी। तब गरीबों को कुछ भी मिलने से रहा। असल में, मंडल समेत सभी को पता रहना चाहिए देवदासी, वेश्यावृत्ति और ना-तलाक की व्यवस्था मानव सभ्यता कोढ़ हैं। ये बुरी परंपराएं जितनी जल्दी खत्म होंगी मनुष्यता उतनी ही तेजी से आगे बढ़ेगी।

सवाल यह भी है, इन्होंने देवदासियों के बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा या स्कॉलरशिप का अनुरोध सरकार से करने की बजाय है उस व्यवस्था से क्यों नहीं किया जो देवदासी बनाती है और उन से बच्चे पैदा करती है? सरकार ने तो देवदासी-प्रथा पर पाबंदी लगाई ही है। असल में देवदासियों के बच्चों (जितने भी हैं) की शिक्षा वगैरह का इंतजाम उन मंदिरों और उन के पुजारियों की संपत्ति से किया जाना चाहिए जिन्होंने इन्हें यह पैदा किया है।

ऐसे ही, प्रमोद रंजन ना जाने क्यों कलाकारों को बौद्धिक की श्रेणी में रख रहे हैं! इन्होंने अपनी 7 फरवरी, 2022 की फेसबुक पोस्ट में लिखा, 'दुनिया में आज तक किसी विचारहीन कलाकार ने इतिहास में स्थान नहीं बनाया है, चाहे वह अपने जीवन काल में कितना भी महान क्यों न रहा हो।' ना मालूम इन्हें किस ने समझा दिया कि लता मंगेशकर विचारहीन कलाकार थीं! बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर पर लिखित गाना गाने से इनकार करना उन की वैचारिकता को नहीं दर्शाता क्या? देखा जाए तो कलाकारों की दुनिया में लता जी सब से ज्यादा कट्टर वैचारिकता लिए हुए थीं। फिर, क्या 'जय भीम नमो बुद्धाय' वैचारिकता का मामला नहीं है?

ऐसे तो कल को ये हर उस को विचारहीन कह देंगे, जो 'जय भीम नमो बुद्धाय' नहीं बोलता। इन से उम्मीद है कि ये और गहरे में डुबकी लगाएंगे। प्रसंगवश, यहां बताया जा रहा है, व्यक्ति परंपरा विशेष, जिसे धर्म भी कहा जाता है, उस में पलता बढ़ता है। और यही परंपरा किसी की वैचारिकी  होती है। लता मंगेशकर द्विज जार परंपरा में पली-बढ़ी हैं और उसी के अनुसार उन की बातों का जिक्र हुआ है। वे केवल एक गायिका ही नहीं थीं बल्कि एक विचार विशेष का प्रतिनिधित्व करती थीं। उन्हें 'विचारहीन' कहना खुद को ही धोखा देना है।

लता मंगेशकर के केस में एक बात और समझनी चाहिए। इन की तरह के जो व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेते हैं ब्राह्मण उन्हें पल भर में ब्राह्मण घोषित कर देता है। इस के विपरीत ऐसों को शूद्र या दलित कहकर अपमानित करने का चलन है। लेकिन, आजीवक चिंतन ने इस की हर तरह की तिकड़म पर रोक लगाई है। बताना यही है कि लता मंगेशकर द्विज जार परंपरा में पैदा हुईं थीं, जिन की प्रसिद्धि के चलते ब्राह्मण आज उन्हें ब्राह्मण कहकर गौरवान्वित हो रहा है, तभी तो देवेश त्रिपाठी ने लिखा है, 'दिलीप  मंडल की ब्राह्मणों को लेकर कुंठित सोच का शिकार लता मंगेशकर को बनना ही था। आखिर, वह भी तो ब्राह्मण परिवार से ही थीं।'(7)

अब इन त्रिपाठी महोदय से जानना है कि इन का 'अक्करमाशी' के लेखक के बारे में क्या विचार है? हमने तो उन्हें भी सनातनधारियों को सौंप दिया है। अब ये उन्हें ब्राह्मण बनाए या क्षत्रिय, ये जानें। लेकिन, हमारा तो कहना है, ब्राह्मण को अपनी जारज संततियों को उन के वैध अधिकार भी देने चाहिए। इस में उत्तराधिकार में संपत्ति का मामला सब से ऊपर है। जान लीजिए, जिस दिन यह हो गया उसी दिन से जारज संतानें पैदा होनी बंद हो जाएंगी।

एक अन्य बड़ा सवाल जो इस पूरे प्रकरण से जुड़ा है। पूछा जा सकता है, दीनानाथ मंगेशकर के जैविक पिता यानी ब्राह्मण पुजारी गणेश भट्ट नवाथे हर्डीकर की पत्नी सब कुछ जानते हुए भी पुजारी के साथ सोती रही होंगी और उस से बच्चे पैदा करती रही होंगी! क्या इसे उदर पूर्ति के लिए साथ सोना नहीं कहेंगे? 

उधर पता लगा है, गुलबर्गा विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में अपने एक भाषण में मराठी दलित लेखिका सुजाता पारमिता ने 'लता ताई को दलित और देवदासी परिवार से बताया था। वहीं यह भी कि उनके पिता भी देवदासी मां की संतान थे।'(8) इन लेखिका महोदया के कथन पर माथा ही पीटा जा सकता है। इसे कहते हैं अपने सिर मुसीबत आप लेना। एक लता मंगेशकर के बहाने इन्होंने सारी देवदासियों और उन के अक्करमाशियों को दलितों के सिर मढ़ दिया।

पता नहीं दलितों में कैसे-कैसे लोग लेखक बन जाते हैं! देवदासियों और अक्करमाशियों को दलित मानने की परंपरा मराठी दलित लेखन में न जाने कहां से आई है? इधर तो अक्करमाशी के लेखक को ही सिद्ध किया जा चुका है कि वह दलित नहीं द्विज है। ऐसे ही 'छोरा कोल्हाटी का' के बारे में प्रमाणित किया जा चुका है।

बताइए, दलितों में कैसे-कैसे लेखक- लेखिकाएं बन जाते हैं? इन्हें बस बोलना-लिखना होता है, विचार-प्रकिया और दलितों की वास्तविक समस्याओं से इन्हें कोई मतलब नहीं होता। किसी ने सुजाता पारमिता को नहीं समझाया कि लता मंगेशकर देवदासी परंपरा से आती हैं।

जिस का का दलितों से किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं होता। ऐसे ही कुछ समय पहले  श्यौराज सिंह बेचैन कह रहे थे- "दलित साहित्य की साझा मुहिम विभिन्न धर्मों और  विभिन्न जातियों के शोषितों वंचितों आदिवासी और ओबीसी तथा बौद्धों के अलावा मुस्लिम दलित ईसाई दलित इन समाजों की स्त्रियां और अब थर्ड जेंडर दलित सबको साझा मंच पर लाने की चुनौती'' है।(9)

अब बताइए श्यौराज सिंह बेचैन और सुजाता पारमिता जैसों की लेखनी का क्या करें? यह दलितों के किस काम की है? दलितों से अपनी समस्याओं का तो हल होता नहीं, यह दूसरों की मुसीबत को अपने सिर लेने को आतुर हैं! क्या लता मंगेशकर दलितों की समस्याओं से लड़ने के लिए कभी सामने आईं? इन्हीं के गृह राज्य महाराष्ट्र में दलितों पर अत्याचारों की लंबी लिस्ट है।

पूछना यह है, लता मंगेशकर के देवदासी परिवार में पैदा होने पर उन का इस में क्या कसूर था? ऐसे ही किसी अक्करमाशी और वेश्या की संतान के लिए पूछा जा सकता है। यह पैदा होना ही नियति है, जो आजीवक चिंतन का केंद्र बिंदु है। यह नियति ही पुनर्जन्म को ध्वस्त करती है। यह नियति ही पैतृकता की पहचान में बदलती है।

लता जी का अंतिम समय तक भी अपने पिता के गायन को सुनना उन की पिता के लिए तड़प को दर्शाता है। उम्मीद है, कोई लता जी के देवदासी परिवार की पैदाइश पर सवाल नहीं उठाएगा। सवाल बनता है तो केवल उस व्यवस्था पर जो देवदासी जैसी कुप्रथा को जन्म देती है। इस कुप्रथा के खिलाफ तो युद्ध ही हो सकता है केवल।

लता जी जिस मुकाम तक पहुंची और इस के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया है उसे सलाम ही किया जा सकता है। इस में उन लोगों को भी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने इन्हें समर्थन और सहयोग दिया। बेशक गायन की दुनिया है ही ऐसी जिस में गीत, संगीत और गायक की त्रयी मिल कर कालजयी गाने को सामने लाते हैं। इसे किसी भी गायक का सौभाग्य समझना चाहिए जो उसे अच्छे गीतकार और संगीतकार  मिल जाएं। यही लता जी का भी सौभाग्य रहा।

देवदासी के पुत्र की संतान होने से किसी भी तरह से लता जी का सम्मान और योगदान कम नहीं हो जाता। लेकिन, दुख यह है कि इस देश में देवदासियों से पैदा हुआ पूरा समाज है इसे 'गोमान्तक समाज' के नाम से जाना जाता है। ऐसे ही प्राचीन भारत में गणिकाओं से उत्पन्न संतानों से समाज रहा है। फिर, भिक्षुणिओं के तो गर्भ गिरा दिए जाते थे। कबीर साहेब ऐसे ही समाज और इस के नियंताओं को फटकार लगाते हुए पूछते हैं- "गनिका के घर बेटा जाया, पिता नांव किस कहिए?"(10)

खैर, इन सब से इतर लता जी के भारतीय संगीत जगत में  योगदान के लिए विनम्र श्रद्धांजलि और नमन। लता जी के गाए गाने पहले भी अच्छे लगते थे और आज भी सुहाते हैं। आने वाली पीढ़ियां भी इन के गाए गाने गुनगुनाएगी। और हां, लता मंगेशकर बड़ी गायिका हैं, वे और भी बड़ी बन जातीं अगर इन्होंने बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर पर लिखे गाने गा दिए होते।                         


संदर्भ

1. www.lokmat.com/aurangabad)lata-mangeshkar-did-not-sing-ambedkar-song-ravichandra-hadasankar/

2. तुम्हारी आवाज बहुत पतली है! कहकर लता मंगेशकर को पहले नकार दिया गया था बॉलीवुड ने,  निर्मल कुमार शर्मा, हस्तक्षेप.कॉम, 07 फरवरी, 2022

3. तीन द्विज हिन्दू स्त्रीलिंगों का चिन्तन, डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली'10 002, प्रथम संस्करण : 2007, पृष्ठ- 49-50

4. आखिरी समय में पिता की रिकार्डिंग सुन रही थीं, दैनिक भास्कर, 07 फरवरी, 2022, पृष्ठ'

5. प्रभाष जोशी : 60 - शब्द और उनके सम्मान में कुछ और शब्द, लेखकगण, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली'10 002, प्रथम संस्करण : 1997, पृष्ठ- 169

6. Dilip C  Mandal की 08 फरवरी, 2020 की फेसबुक पोस्ट

7. सोशल मीडिया बड़ा आर्टिकल, देवेश त्रिपाठी, www.ichowk.in, 07, फरवरी, 2022

8. स्त्रीकाल पत्रिका के संपादक संजीव चंदन की 06 फरवरी, 2022 की फेसबुक पोस्ट

9. सभी शोषितों का साझा मंच होना चाहिए, श्यौराज सिंह बेचैन, कथादेश, एल-57बी, दिलशाद गार्डन, दिल्ली'10 095, सितंबर 2019, पृष्ठ-55

10. महान आजीवक कबीर, रैदास और गोसाल, डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरिया गंज, नयी दिल्ली '10002, प्रथम संस्करण : 2017, पृष्ठ-325


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