‘प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता सुधा भारद्वाज के जेल के सबक और उनका भविष्य’

‘दक्षिण कोसल/द कोरस’ को सुधा भारद्वाज का पहला साक्षात्कार (अंतिम किस्त)

सुशान्त कुमार

 

सुधा मुझे कहती है कि पिछली गर्मियों में महामारी की एक क्रूर दूसरी लहर के दौरान उनकी यूनिट की 55 में से तेरह महिलाएं कोविड 19 से संक्रमित थीं। सुधा का कहना है कि बुखार और दस्त होने के बाद उन्हें जेल अस्पताल और फिर एक भीड़भाड़ वाले क्वारंटाइन बैरक में भेजा गया था।

एक अधिवक्ता के हैसियत से मुझे कहती है कि न्यायपालिका को हमारी जेलों में भीड़ कम करने पर अधिक गंभीरता से विचार करना चाहिए। यहां तक कि महामारी के दौरान भी अधिकांश लोगों को अपने परिवारों में लौटने के लिए अंतरिम जमानत (एक संक्षिप्त अवधि के लिए दी गई जमानत) कभी नहीं मिली। 

लंबी बातचीत में मेरे पाठकों को बोरियत ना होने के शर्त में कहना चाहती है कि भायखला जेल में वह अपना अधिकांश समय साथी महिला कैदियों के लिए दर्जनों कानूनी सहायता आवेदनों को लिखने में बिताया, जो अंतरिम जमानत की मांग कर रही थीं - कई टीबी, एचआईवी, अस्थमा और अन्य जो गर्भवती थीं। उनमें से किसी को भी बेल नहीं मिला, आंशिक रूप से क्योंकि अदालतों में जमानत के लिए बहस करने वाला कोई नहीं था।

वह कहती हैं कि अधिकांश साथी कैदियों को यौन कार्य, या मनुष्यों और नशीली दवाओं की तस्करी के मामलों में हिरासत में लिया गया था। अन्य भगोड़े गैंगस्टरों की पत्नियां, गर्लफ्रेंड और मां थीं।

सुधा याद करती है कि कैदियों के लिए वास्तव में कठिन समय था। अदालतों ने काम बंद कर दिया था, कैदियों के परिवार के दौरे की अनुमति नहीं थी, मुकदमे रुक गए थे। यह एक दयनीय समय था। वह यह भी मुझे कहती है कि विशेषकर बूढ़ों और बीमारी से पीडि़त लोगों को निजी मुचलके पर जमानत दी जानी चाहिए। पहले से ही भीड़भाड़ वाली जेलों के अंदर क्वारंटाइन का कोई मतलब नहीं है।

सुधा भारद्वाज ने भारत के कुछ सबसे गरीब लोगों के साथ काम किया है। सुधा ने कहा कि वह मुकदमे के दौरान गरीब कैदियों के लिए कानूनी सहायता की शर्मनाक स्थिति से स्तब्ध हैं, यह जेल की आबादी का एक बड़ा हिस्सा है।

 

रोजी रोटी के लिये भागदौड़ के बीच समय निकालते हुवे सुधा कहती है कि ‘कई कैदी अदालत में मिलने तक अपने वकीलों के नाम या फोन नंबर भी नहीं जानते हैं। खराब वेतन वाले वकील अपने मुवक्किलों से मिलने के लिए जेल भी नहीं आते हैं। कैदियों को लगता है कि इसका कोई फायदा नहीं है। एक कानूनी सहायता प्राप्त वकील केवल कुछ ही निजी खर्च उठा सकते हैं।’

सुधा का कहना है कि उन्होंने जेल में एक बैठक में भाग लिया जहां उन्होंने प्रस्ताव दिया कि कानूनी सहायता मुहैया करवाने वाले वकीलों को तीन महीने में एक बार जेल आना चाहिए, और ऐसे वकीलों को उचित भुगतान सरकार से मिलना चाहिए।

मुझसे अपने लंबी बातचीत में सुधा कहती है कि जब आप जेल जाते हैं, तो आप कई लोगों को आपसे ज्यादा दुखी पाते हैं। मुझे दुखी होने का समय नहीं मिला। मुझे अपनी बेटी से अलग होने के कारण अनिवार्य रूप से बुरा लगा।

सुधा का कहना है कि उन्होंने अपना समय महिला कैदियों के बच्चों के लिए गाने गाने, जेल में कई तरह के कार्यों में अपना समया बिताया। इसके साथ ही एडवर्ड स्नोडेन, विलियम डेलरिम्पल और नाओमी क्लेन की पुस्तकों सहित काफी बहुत अच्छी पुस्तकों को पढऩे में गुजारा। उन्हें महामारी के चरम पर जेल पुस्तकालय में अल्बर्ट कैमस की ‘द प्लेग’ की एक अच्छी प्रति मिली।

लेकिन एक अनुभव जो वह कभी नहीं भूल पाएगी, जब उन्होंने यह खबर सुनी कि भारत मार्च 2020 में कोरोना वायरस को धीमा करने के लिए बंद हो जाएगा। वह बताती है कि अचानक जेल में बदलाव आया। कैदी भूख हड़ताल पर चले गए, नाश्ता और दोपहर का भोजन छोड़ दिया। वे कह रहे थे कि -‘हम यहां मरना नहीं चाहते हैं। चलो घर चलते हैं और वहीं मर जाते हैं।’ कुछ समय बाद आखिरकार वे शांत हो गए जब जेल अधीक्षक ने उन्हें बताया कि जेल के बाहर भी कोई भी वायरस से वास्तव में सुरक्षित नहीं है।

वह दार्शनिक अंदाज में मुझे बताती है कि इससे पता चलता है कि उनका जीवन और अस्तित्व कितना अनिश्चित था। उन्होंने कहा कि मैंने कैदियों को इससे अधिक डरा हुआ और रिहा होने की इच्छा रखते हुए कभी नहीं देखा।

 

छत्तीसगढ़ में लंबे वक्त तक वकालत और अब जेल के पीछे के हालातों को कैसे पाती हैं?

जब मैं जेल गई तब तक मैंने करीब 18 वर्षों से वकालत की थी। फिर भी सलाखों के पीछे इन तीन सालों ने मुझे हमारी न्याय व्यवस्था के बारे में बहुत कुछ सीखाया। इसका वर्ग-विभेदी पहलू तो मै पहले से ही जानती थी जब से मैंने मजदूर साथियों की वकालत शुरू की थी। और हां - जेलों में ज्यादातर गरीब लोग ही हैं, जो होशियार और महंगे वकील नहीं लगा सकते। (हालांकि आजकल फ्रॉड के मामलों में बहुत सी मध्यम वर्गीय औरतों को भी गिरफ्तार किया जा रहा है।) चोरी के मामलों में आज भी पारधी समुदाय के लोगों को बेरहमी से मार - पीट कर जेलों में लाया जाता है - चाहे उनके खिलाफ सबूत रहे या नहीं।

अक्सर मैले -कुचैले कपड़ों वाली, अलग भाषा बोलती और निरक्षर, नाक -पोंछते बच्चों को ढोने वाली इन महिलाओं के साथ जेल में भी भेद - भाव किया जाता है -  सब उनसे हटकर रहते हैं, उन्हें बैरक में बाथरूम के पास जगह दी जाती है, वे अपने आपस में ही खाना खाते हैं। 

क्या जेलों में बांग्लादेशी और विदेशी कैदी भी हैं, उनके मामलों के निपटारे पर कुछ बतायेंगे?

बहुत-सी बांग्लादेशी महिला कैदी हैं। इन्होंने तो कोई जुर्म किया ही नहीं होता, सिवाय बॉर्डर नाम की एक लकीर पार करने का। वे हमेशा बहुत मेहनती रहती हैं। चूंकि उनका बाहर ना परिवार है ना वकील को देने के लिए पैसे, इसलिए वे अधिकतर कोशिश करती हैं कि गुनाह कबूल करें और 1 - 2 साल की सजा भुगत कर वापस अपने देश भेजी जाएं। पर तब तक उन्हें जेल के गैरवैतनिक मजदूर ही समझा जाता है। दूसरे देशों से आने वाले जो विदेशी हैं - जो अधिकतर लैटिन अमेरिका या अफ्रीका से होते हैं और ड्रग संबंधी केसों में होते हैं - उन्होंने अपनी एकता के बल पर, और अपने झगड़ालू स्वभाव से डराकर, काफी सहूलियत प्राप्त कर लिए हैं, पर बांग्लादेशी इन सहूलियतों के लिए ‘विदेशी’ में नहीं गिने जाते।

क्या वेश्यावृत्ति के मामलों में भी महिलायें जेलों में कैद हैं?

दूसरी चीज जो जेल जाने पर और भी अधिक साफ हुई वह यह कि अधिकांश लोग जो पकड़े जाते हैं वे अपराध की एक लम्बी कड़ी के सबसे कमजोर प्यादे होते हैं। बहुत सी औरतें ‘प्रिवेंशन ऑफ इम्मोरल ट्रैफिकिंग एक्ट’ यानी वेश्यावृत्ति सम्बन्धी कानून में पकड़ी जाती हैं। वेश्यावृति हमारे समाज का एक ‘ओपन सीक्रेट’ है - बराबर पुलिस को हफ्ता देकर चलाया जाता है. सिर्फ तब, जब कुछ ‘रिजल्ट’ दिखाना होता है, या फिर हफ्ता समय पर नहीं पहुंचता या बढ़ाया जाना हो, या फिर जब कोई नई खिलाड़ी पुलिस से आंख बचाकर धंधा शुरू करती हैं, तभी पकड़ी जाती हैं। ऐसी औरतों को, बदनामी के कारण, आज तक उनकी कमाई पर जीने वाला परिवार भी छोड़ देता है।

 

बंद कैदियों की रिहाई के लिये होने वाले विवेचनाओं का विश्लेषण कैसे करती हैं?

कैदियों से केवल उनके अपने-अपने इन्वेस्टीगेशन ऑफिसर यानी विवेचना अधिकारी के बारे में पूछिए, तो बेशुमार किस्से मिलते हैं। कितने पैसे मांगे गए ‘केस को ढीला करने के  लिए’, कितनों ने पैसे खाकर भी काम नहीं किया, कितनों ने दूसरे आरोपियों से पैसे खाकर उन्हें छोड़ दिया... भ्रष्टाचार तो पुलिस व्यवस्था के रग-रग में जहर की तरह व्याप्त है।

सुना है नशीली पदार्थों के तश्करी में जेलों से छूटना मुश्किल होता है?

महिला जेल में पुरुष जेलों की तरह गैंग या गैंग वॉर नहीं होते पर एक ग्रुप के रूप में एन.डी.पी. एस. (ड्रग निरोधक कानून) में पकड़े गए कैदी सबसे दबंग होते हैं। उनके पास पैसा काफी रहता है और उनको जमानत दिलाने वाले वकील भी कुछ खास या तय रहते हैं। चूंकि कानून सख्त है, तो अक्सर उन्हें तकनीकी आधारों पर जमानत मिलती है, जिसके लिए पुलिस के साथ सेटिंग करनी पड़ती है  - जैसे चार्जशीट देर से पेश करना, या फिर ड्रग के रासायनिक रिपोर्ट को पेश न करना आदि। ज्यादातर इनमें भी छोटी मछलियां ही पकड़ी जाती हैं, पर एक बार जब मैं दो एकदम पारंगत बहनों के साथ कोर्ट से वापस आ रही थी तो देखा कि गार्ड उनकी कितनी आव-भगत कर रहे थे, और वे कितने बेतकलुफ्फी से आते -जाते थानेदारों से बाते करते थे।

जेल में बंद कैदियों को मिलने वाली ‘लीगल एड’ की असलियत क्या हैं?

जेल में रहते हुए यह समझ आया कि ‘लीगल एड’ या विधिक सहायता की हमारी व्यवस्था कितनी नाकारा है। बहुत सी औरतों ने लीगल एड के वकीलों (जिन्हें वे भूलवश ‘सरकारी वकील’ कहती थी) के वकालतनामे पर अंगूठा / दस्तखत किया था, पर अक्सर उन्हें उस वकील का पूरा नाम, उसका नंबर, या उसका पता मालूम नहीं रहता था। वो उनसे संपर्क नहीं कर पाती थी। ये वकील भी मुव्वकीलों से मिलने नहीं आते थे। अक्सर वे कोर्ट से चार्जशीट उठा लेते और औरतों को उसमें लिखी बातों के बारे में बताते नहीं थे। इस प्रकार उन्हें आरोपी की अपनी कहानी, उसकी जरूरतें, या उसकी मुश्किलों के बारे में कुछ पता ही नहीं रहता था। ऊपर से कोरोना के समय तो करीब 1-2 वर्ष तक औरतों को कोर्ट भी नहीं ले जाया गया।

 

आप भी छत्तीसगढ़ मेें विधिक सहायता समिति से जुड़ी रही हैं, जेल में बंद लोगों के रिहाई के लिये इसका कितना महत्व है?

मैं स्वयं भी छत्तीसगढ़ की राज्य विधिक सहायता समिति में 3 वर्ष तक थी। यह सच है कि लीगल एड के वकीलों को बहुत ही कम दरों पर पेमेंट किया जाता था, और उस समय जस्टिस प्रीतिंकर दिवाकर की अध्यक्षता के दौरान इन दरों को बढ़ाने की कोशिश भी की गयी थी। इस स्थिति में उन वकीलों की लापरवाही समझ में आती है, पर यदि ऐसा ही स्थिति बना रही तो वह हमारे संविधान में प्रदत्त लीगल एड के बुनियादी अधिकार का एक भद्दा मज्जाक ही होगा।

उच्च न्यायालय में ‘महाधिवक्ता कक्ष’ से पैरवी में हमें क्या राहत मिल पाती हैं?

जब हम किसी भी उच्च न्यायालय के परिसर में जाते हैं तो वहां एक बहुत बड़ा, सर्व सुविधा-संपन्न महाधिवक्ता कार्यालय दिखता है। यहां कर्मचारी भी बहुत होते है  - ए.जी साहब, डिप्टी ए.जी, अडिशनल ए.जी, तमाम वरिष्ठ और कनिष्ठ सरकारी वकील इत्यादि। ये सब लोग राज्य या शासन की पैरवी करने के लिए रहते हैं। क्या इसके दसवें हिस्से के खर्च में लीगल एड का एक अच्छा ऑफिस, जिसमें 10 - 15 सक्षम पूर्णकालिक अधिवक्ताओं को आकर्षक वेतन देकर नहीं रखा जा सकता, जिनका काम होगा नागरिक की पैरवी करना? विशेषत: तब, जब वह राज्य शासन जैसे ताकतवर प्रतिद्वंदी से लड़ रहा हो?

झूठे मामलों में गिरफ्तारी, लंबी जेल यात्रा और अब जीवनयापन और भविष्य के लिये क्या कुछ सोच रखी हैं? 

आज मैं छत्तीसगढ़ से बहुत दूर मुंबई में रह रही हूं। लेकिन मैंने सोचा है कि जिस जज्बे से मैंने वहां के मजदूरों, किसानों, आदिवासियों के कानूनी हकों के लिए वकालत की थी, मैं यहां के जेलों में लम्बे समय से गरीबी के कारण अटकी महिलाओं की कानूनी मदद करुंगी। अभी मुझे अपने लिए जमानतदार खड़े करने हैं, घर ढूंढना हैं, और कुछ शोध कार्य आदि के जरिये से अपना जीवन निर्वाह भी करना हैं। पर महीने दो महीने में यह काम मैं शुरू कर पाऊंगी ऐसी मेरी दिली इच्छा और दृढ़ विश्वास हैं।

सुधा भारद्वाज ने एक आंकड़ा सुझाया है जिसमें -‘भारत की 1,306 जेलों में लगभग 4, 90,000 कैदी हैं, जिनमें से 69 प्रतिशत अपने मुकदमें शुरू होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। औसत अधिभोग दर 118 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को कोविड 19 के प्रसार को रोकने के लिए कुख्यात भीड़भाड़ वाली जेलों में कैदियों को मुक्त करने के लिए कहा है।’

जेल से रिहाई के बाद सुधा भारद्वाज ने ‘दक्षिण कोसल/द कोरस’ से लंबी बातचीत की है। इस अंतिम कड़ी में वह बातचीत के छठवें और अंतिम किस्त में जेल में फ्रॉड के मामलों में बहुत सी मध्यम वर्गीय औरतों के बारे में बता रही हैं, बांग्लादेशी कैदियों के बारे में बता रही हैं,  प्रिवेंशन ऑफ इम्मोरल ट्रैफिकिंग एक्ट के बारे में बात कर रही हैं, साथ ही वह ‘लीगल एड’ के साथ भविष्य के सपनों को दृढ़ता के साथ बुनते नजर आ रही है। उनसे इस महत्वपूर्ण बातचीत की छठवें और अंतिम कड़ी में ‘जेल के सबक और मेरा भविष्य’ से आप सभी सुधी पाठकों को रूबरू करवा रहे हैं। आप तमाम सुधी पाठकों से आग्रह है कि आप इस साक्षात्कार के माध्यम से सीधे सुधा भारद्वाज जी से जुड़ सकते हैं। अपको करना इतना है कि अपनी प्रतिक्रियाओं को हमारे वेबपेज में इस साक्षात्कार के नीचे कमेंट बॉक्ट में भेज दें अथवा हमें ईमेल- abhibilkulabhi007@gmail.com तथा व्हाट्सएप नं 7828046252 के द्वारा हमें प्रेषित करें। हम कोशिश करेंगे कि आपके प्रतिक्रियाओं का जवाब भी हम सुधा भारद्वाज से पूछ सकेंगे।


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