हिजाब विवाद: किसने क्या कहा?
सुशान्त कुमारहिजाब मामले में फिलहाल दखल देने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया है। गुरुवार को हाईकोर्ट ने स्कूल कॉलेजों में छात्राओं के हिजाब पहनने पर अंतरिम रोक लगाई थी। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से इस आदेश पर रोक की मांग की थी। लेकिन चीफ जस्टिस ने एनवी रमना की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह साफ कर दिया कि फिलहाल वह सुनवाई हाईकोर्ट में ही चलाए जाने के पक्ष में है. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को यह सलाह भी दी कि वह एक स्थानीय मामले को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश न करें।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने हिजाब विवाद पर सुनवाई करते हुए गुरुवार को आदेश दिया था कि अंतिम आदेश तक छात्रों के लिए किसी भी धार्मिक प्रतीक की अनुमति नहीं है। अदालत के इस अंतरिम आदेश के बाद अब स्कूल-कॉलेजों में हिजाब और भगवा गमक्षा दोनों का उपयोग बंद करना होगा। मुख्य न्यायाधीश रितु राज अवस्थी, न्यायमूर्ति कृष्णा एस. दीक्षित और न्यायमूर्ति खाजी जयबुन्नेसा मोहियुद्दीन की तीन सदस्यीय पीठ ने अंतरिम आदेश दिया। समाचारों के अनुसार मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘हम हिजाब विवाद के मामले में अंतरिम आदेश देना चाहते हैं। हम हर दिन मामले की सुनवाई करेंगे।’
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कहा कि कर्नाटक सरकार को 1983 के कर्नाटक शिक्षा अधिनियम के अनुसार वर्दी पर नियम बनाने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि वर्दी पर नियम कॉलेज विकास समिति (सीडीसी) और स्कूल विकास और प्रबंधन समिति (एसडीएमसी) द्वारा तैयार किए जा सकते हैं। अनुच्छेद 25(1) के अनुसार हिजाब पहनना एक धार्मिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि सिखों को गुप्ती (खंजर) ले जाने की अनुमति है और उन्हें हेलमेट पहनने से छूट दी गई है।
सच्चाई क्या है?
कर्नाटक में मुस्लिम छात्राएं हिजाब पहनती रही हैं और कक्षाओं में भाग लेती रही हैं। लेकिन अब वहां हिजाब पहने मुस्लिम छात्राओं को स्कूल मे नहीं आने दिया जा रहा। भगवा स्कार्फ पहने और जय श्री राम के नारे लगा रहा लडक़ों के झुंड कॉलेज में छात्राओं के आने का विरोध कर रहे हैं। अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाने और डराने-धमकाने के लिए जानबूझकर नारे लगाने वाले आक्रामक युवा लडक़ों की भीड़ कॉलेजों के बाहर दहशत का माहौल खड़ा कर रही है और दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक ताकतों भाजपा और संघपरिवार द्वारा नफरती अभियान फैलाया जा रहा है। राज्य सरकार मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा के अधिकार की रक्षा के अपने संवैधानिक कर्तव्य के तहत हस्तक्षेप करने की बजाए खुद इस भेदभावपूर्ण अभियान का हिस्सा बनी हुई है। हिजाब पहनना या न पहनना भारत के संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार है। केवल इस आधार पर मुस्लिम छात्राओं को पढ़ाई से महरूम रखना गैरकानूनी, असंवैधानिक और अस्वीकार्य है। इस समय कर्नाटक में छात्र समुदाय के बीच उनकी वार्षिक परीक्षाओं के ठीक पहले तनाव की एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो गयी है जिससे पढ़ाई में रुकावट और और खासकर मुस्लिम लड़कियों के शैक्षिक अवसरों पर प्रतिकूल असर पड़ा है। ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन मुस्लिम छात्राओं के अधिकारों का समर्थन करता है और भाजपा सरकार की नफरती राजनीति की कड़ी निंदा व विरोध करता है।
ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन के अध्यक्ष अधिवक्ता बाबासाहेब वावलकर तथा अधिवक्ता महासचिव चंद्रकांत बोजगर कर्नाटक की भाजपा सरकार ने अपनी सांप्रदायिक - विभाजनकारी राजनीति के तहत ‘समानता, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाडऩे वाले’ कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने का आदेश फिर से जारी किया। सरकार ने कर्नाटक शिक्षा अधिनियम, 1983 के 133 (2) को लागू किया, जिसमें कहा गया था कि छात्रों को कॉलेज विकास समिति या पूर्व-विश्वविद्यालय कॉलेजों के प्रशासनिक बोर्ड की अपीलीय समिति द्वारा चुनी गई पोशाक पहननी चाहिए, जो पूर्व-विश्वविद्यालय शिक्षा के अंतर्गत आते हैं। और यदि कोई गणवेश तय नहीं किया गया है, तो ‘समानता, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था को भंग करने वाले कपड़े नहीं पहने जाने चाहिए’।
सरकार द्वारा नियमों मे बदलाव किए जाने के बाद नियोजनबद्ध तरीके से अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाने और डराने-धमकाकर सभी जगह हिजाब के विरोध की शुरुवात की जा रही है। लिए इस विवाद को तेजी के साथ आक्रामक ढंग से सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा है। अब भाजपा शासित 18 राज्यों मे इसी तरह के कानून लागू करने के मांग करके असुरक्षा और उन्माद का माहौल तैयार किया जा रहा है। इस वर्ष कई राज्यों मे चुनाव हैं और अगले साल कर्नाटक मे अगले साल चुनाव होने वाले हैं। चुनावों मे वोट की राजनीति और संस्कृतिक वर्चस्ववाद और ध्रुवीकरण के लिए आरएसएस और भाजपा की ओर से अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिम समुदाय पर पर हमले किए जा रहे हैं।
संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक संवैधानिक
संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक संवैधानिक अधिकार, अनुच्छेद 21-ए के तहत शिक्षा के अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है। इसी तरह, अनुच्छेद 15(1) और 15(2) अनुमति नहीं देते हैं कि जन्म स्थान, धर्म, लिंग, जाति आदि के आधार पर कोई भी भेदभाव किया जाए। संविधान कहता है कि किसी को भी सार्वजनिक स्थानों में प्रवेश करने से नहीं रोका जाना चाहिए। अनुच्छेद 29(2) राज्य सरकार द्वारा सहायता प्राप्त संस्थानों में धर्म के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता है। शिक्षा का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और इसके साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता।
अधिवक्ता वावलकर तथा चंद्रकांत बोजगर ने कहा कि कर्नाटक में मुस्लिम छात्राओं के उत्पीडऩ की निंदा करता है और राज्य सरकार से मुस्लिम लड़कियों की सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने की मांग करता है। सभी देशवासियों को बिना किसी धार्मिक भेदभाव के शिक्षा, रोजगार और सभी नागरिक अधिकारों का अधिकार है। विभाजनकारी सांप्रदायिक कट्टरपंथी बयानबाजी, सोशल मीडिया पर नफरती पोस्ट और दहशत की राजनीति करके देश की शांति, भाईचारा, एकता और अखंडता के लिए खतरा खड़ा करने वालों पर सख्त कारवाई करके शिक्षा संस्थाओं के धर्मनिरपेक्ष और निर्भय माहौल को बहाल करने की मांग ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन द्वारा की जाती है।
हिजाब प्रकरण और हाईकोर्ट का फैसला पर छात्र मोर्चा का बयान
कर्नाटक के एक स्कूल में मुस्लिम लड़कियों के हिजाब पहनकर प्रवेश करने पर प्रतिबंध मुस्लिम स्त्रियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित करने की एक घृणित कोशिश है। लंबे संघर्षों के बाद तमाम धर्मों व संप्रदायों से जुड़ी स्त्रियां पितृसत्ता की बेडिय़ों को तोडक़र थोड़ा- बहुत शिक्षण संस्थानों तक अब आना शुरू की हैं। इस तरह का तानाशाहीपूर्ण रवैय्या निश्चित रूप से मुस्लिम महिलाओं को शिक्षा से दूर करने व पितृसत्ता की गुलामी में धकेलने का ही काम करेंगे। हमारा संगठन उस मुस्लिम छात्रा को क्रांतिकारी सलाम पेश करता है जिसने भगवा गमछाधारी लम्पटों के ‘जय श्रीराम’ के आक्रामक नारे का जवाब बहादुराना ढंग से ‘अल्लाह-हु-अकबर’ का नारा लगाकर दिया। उस मुस्लिम छात्रा के ‘अल्लाह-हु-अकबर’ का नारा लगाने का विरोध वही लोग कर रहे हैं जो साम्प्रदायिक फासिस्टों द्वारा बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद वहां फिर से बाबरी मस्जिद के निर्माण की जनवादी मांग उठाने की बजाय स्कूल व अस्पताल बनाने की मांग कर रहे थे।
ऐसे ही लोगों को उस छात्रा में अपने धर्म के प्रति कट्टरता दिखाई पड़ रही है। जबकि यह उस छात्रा की एक स्वाभाविक व न्यायसंगत प्रतिक्रिया थी। जब हमला मुस्लिम होने की वजह से किया जाएगा तो जवाब भी मुस्लिम के रूप में ही मिलेगा। जहां तक मुस्लिम अल्पसंख्यकों के कट्टरता की बात है, बहुसंख्यकों की कट्टरता व उनके द्वारा अल्पसंख्यकों की अस्मिता पर लगातार बढ़ता हमला ही उसके लिए खाद- पानी का काम कर रहा है। असुरक्षाबोध से कट्टरता पैदा होती है। कर्नाटक हिजाब प्रकरण सिर्फ और सिर्फ आरएसएस- बीजेपी का एक नया हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिक एजेंडा है। जिसके माध्यम से वो कर्नाटक और दक्षिण भारत को भी हिंदुत्व की साम्प्रदायिक राजनीति की प्रयोगशाला बनाना चाहते हैं। स्त्रियों की शिक्षा के सवाल और पितृसत्ता से उनकी मुक्ति को लेकर इनके विचार व सरोकार किसी से छिपे नहीं है।
शिक्षण संस्थानों का काम वैज्ञानिक व तर्कपरक शिक्षा देना
इंकलाबी छात्र मोर्चा ने कहा है कि बुर्का, हिजाब या किसी अन्य धार्मिक प्रतीक का इस्तेमाल करने या न करने के बारे में निर्णय लेने का अधिकार सिर्फ उस महिला का है। इस आधार पर किसी को शिक्षा के अधिकार से वंचित करना तानाशाही है। इस बारे में कोई अपना विचार जरूर रख सकता है लेकिन उसे जबरदस्ती अपना विचार किसी पर थोपने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। शिक्षा से चेतना आती है। चेतना आएगी तो लड़कियां खुद सोचेंगी की उनके लिए क्या सही है और क्या गलत। अपने धार्मिक व सांस्कृतिक रीति- रिवाजों का पालन करना, अपने धर्म व संस्कृति के हिसाब से अथवा अपने मन- माफिक कपड़े पहनना हर व्यक्ति का बुनियादी जनवादी अधिकार है। स्कूल व शिक्षण संस्थानों का काम छात्र- छात्राओं को वैज्ञानिक व तर्कपरक शिक्षा देना है, ताकि छात्र- छात्राएं स्वयं सही निर्णय ले सकें। स्कूल व शिक्षण संस्थानों का काम यह तय करना नहीं है कि कौन क्या पहनकर पढऩे आएगा।
वैसे तो हम शिक्षण संस्थानों में किसी प्रकार के ड्रेस कोड का विरोध करते हैं लेकिन अगर कोई संस्था किसी प्रकार का ड्रेस कोड तय भी करे तो वो बाध्यकारी नहीं होना चाहिए। यह व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा के खिलाफ है। व्यक्तियों की धार्मिक स्वतंत्रता का ध्यान रखा जाना चाहिए। कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी भी विषय पर अपना मत रखने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन वो अपना मत किसी पे थोपने का अधिकार नहीं रखता। भारत एक बहु धार्मिक व बहुसांस्कृतिक देश है। यहां अलग- अलग बोलियां हैं, भाषाएं हैं, खान- पान हैं, पहनावे हैं। सभी लोगों पर एक नियम थोपना तानाशाही के सिवाय और कुछ नहीं है। भारत का संविधान भी लोगों को धार्मिक व नागरिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। यह अलग है कि अब ये बातें सिर्फ संविधान के किताब की शोभा बढ़ाने से ज्यादा महत्व नहीं रखतीं।
मोर्चा जबरदस्ती रोकने के सख्त खिलाफ
छात्र मोर्चा का यह स्पष्ट मत है कि हिजाब, बुर्का, घूंघट, मंगलसूत्र, सिंधुर ये सब पितृसत्ता की निशानी हैं। हम इनके पक्ष में नहीं हैं। लेकिन हम इन सब चीजों से असहमत होते हुए भी अगर कोई स्त्री अपनी मर्जी से यह सब चीजें धारण करती है तो उसको जबरदस्ती ऐसा करने से रोकने के सख्त खिलाफ हैं। यहां मामला पूरी तरह से जनवाद का है। हालिया विवाद को सह देने वाले आरएसएस- बीजेपी जैसे फासीवादी संगठनों का इतिहास उठाकर देखें तो वो अपने जन्म से ही मुस्लिमों के खिलाफ साम्प्रदायिक उन्माद फैलाकर सत्ता तक पहुंचने की कोशिश करते रहे हैं। खासतौर पर 2014 में बीजेपी के केंद्र की सत्ता में आने के बाद से उसके मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक कार्यवाइयों में और तेजी आई है। इसके लिए वो रोज सीएए-एनआरसी, ट्रिपल तलाक, लव जिहाद, सार्वजनिक जगहों पर नमाज पढऩे, इस्लामिक पोशाक पहनने, अयोध्या-काशी-मथुरा व इतिहास की तमाम मनगढंत बातों जैसे नए- नए मुद्दे लाकर मुस्लिमों के खिलाफ बाकी जनता के मन में साम्प्रदायिक उन्माद भडक़ाते हैं।
असल में आरएसएस- बीजेपी का मुख्य एजेंडा भारत में ब्राह्मणवादी- सामंती पेशवा राज कायम करने की है। भले ही इसके लिए देश को साम्राज्यवादियों के अधीन ही क्यों न करना पड़े। ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दलाली करने का इनका इतिहास जगजाहिर है। देश को मिली झूठी आजादी और साम्राज्यवाद- सामन्तवाद विरोधी राष्ट्रीय व जनवादी क्रांति न होने की वजह से आज भी भारत एक अर्द्ध सामंती- अर्द्ध औपनिवेशिक देश बना हुआ है। लडक़े- लड़कियों को आज भी अपनी मर्जी से अपना जीवन साथी तक चुनने का अधिकार नहीं है।
वर्ण व्यवस्था - सती प्रथा के समर्थकों को इस्लाम में पितृसत्ता दिख रही
जो लोग लव जिहाद जैसे साम्प्रदायिक और पितृसत्तात्मक कानून लाकर दो बालिगों को अपना जीवनसाथी चुनने से रोकते हैं, जो वर्ण व्यवस्था और सती प्रथा का समर्थन करते हैं, जो महिलाओं को पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं देना चाहते, आज उन्हें सिर्फ इस्लाम में पितृसत्ता दिख रही है और वो खुद को मुस्लिम महिलाओं का हितैषी घोषित कर रहे हैं। जो लोग देश का मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री रहते हुए और संविधान की कसम खाकर भी एक धर्म विशेष के बाबा बने हुए हैं, पंडे- पुजारियों का वस्त्र पहनते हैं, दिन रात खुलेआम एक धर्म विशेष का प्रचार करते हैं आज वो मुस्लिम लड़कियों के हिजाब पहनकर स्कूल आने पर रोक लगा रहे हैं। इनकी घटिया राजनीति और मंसूबों को समझने व उजागर करने की जरूरत है। यह इनकी घृणित फासीवादी सोच ही है कि जो ये न खाएं वो कोई न खाए, जो ये न पहनें वो कोई न पहने।
आज जिस पैमाने पर इन्होंने जनता की जनवादी चेतना को कुंद करने का काम किया है वो अभूतपूर्व है। वो चाहे दलित हों, चाहे पिछड़े हों, चाहे महिलाएं हों सभी तबकों के एक हिस्से का साम्प्रदायिकरण करने में ये कामयाब हुए हैं। इसके लिए वो तमाम राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं, जिन्होंने अपने निहित स्वार्थों की वजह से अपने कार्यकर्ताओं व जनता की जनवादी राजनीतिक चेतना बढ़ाने की जगह उन्हें अपना पिछलग्गू बनाये रखने का काम किया है और आज भी कर रहे हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि आरएएस- भाजपा जैसे साम्प्रदायिक फासीवादी दल सिर्फ मुस्लिमों के दमन तक ही सीमित रहने वाले हैं वे बहुत भोले हैं। अगर इन पर लगाम नहीं लगाया गया तो कल को ये सिखों को पगड़ी नहीं बांधने देंगे, ईसाइयों को चर्च नहीं जाने देंगे, दलितों व महिलाओं को स्कूल नहीं जाने देंगे।
वैसे भी देश तो सिर्फ कहने के लिए ही धर्मनिरपेक्ष है। कौन नहीं जानता कि हमारे देश में शिक्षण संस्थानों से लेकर, थाना, कोर्ट- कचहरी और तमाम संस्थाएं ब्राह्मणवादी हिदुत्व के रंग में ही रंगे हुए हैं।
छात्र मोर्चा का कहना है कि आज राज्य मशीनरी सहित देश की तमाम संस्थाओं पर साम्राज्यवाद परस्त ब्राह्मणवादी हिंदुत्व फासीवादियों का कब्जा है। न्यायपालिका जिसे कथित तौर पर नागरिक अधिकारों का संरक्षक माना जाता है, इन तमाम मसलों पर उसकी चुप्पी किसी को हैरान करने वाली नहीं है। भारत की न्यायपालिका वास्तव में मनुपालिका है। इससे यह उम्मीद करना कि वो आपके जनवादी और नागरिक अधिकारों की हिफाजत करेगी खुद को धोखा देने के समान है। अनगिनत मामलों में इसका चरित्र स्पष्ट हो चुका है। आज जरूरत है कि देश में मुकम्मल जनवादी व धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के लिए क्रांतिकारी जन संघर्ष को तेज किया जाए और देश में चल रही नवजनवादी क्रांति को मजबूत बनाया जाए ताकि सभी वर्गों व संप्रदायों के जनवादी अधिकारों की गारंटी की जा सके।
हिजाब के लिए दलील देने वाले याचिकाकर्ताओं ने कहा कि छात्राओं के हिजाब पहनने में कोई बुराई नहीं है। हिजाब एक मौलिक अधिकार है और इससे दूसरों को कोई समस्या नहीं होती है, इसलिए उन्हें उसी रंग के हिजाब पहनने की अनुमति दी जानी चाहिए। वकील ने तर्क दिया, ‘छात्राओं को सडक़ों पर नहीं बिठाया जा सकता। कर्नाटक राज्य केंद्र सरकार को सबसे अधिक कर देता है. अधिकांश स्टार्टअप यहां आते हैं और ये कदम राज्य को बदनाम करेंगे। कपड़े, रंग और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए।
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