भूमकाल, गुंडाधूर और बस्तर
विनोद सावस्वाधीनता संग्राम के दिनों में छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों को छोड़कर बस्तर के वनांचल में जो संग्राम छिड़ा वह तो सीधे सीधे उनकी आर्थिक आय और जीविकोपार्जन के स्रोतों के छीने जाने से उठी पेट और भूख की लड़ाई थी. अधिकारियों ठेकेदारों की मिली भगत से एक क्रूर शिकंजा हमेशा यहाँ के माडिया, मुरिया, हल्बी, भतरी, गोंड कहलाने वाले प्रकृति मानवों के गले में कसता रहा है. ऐसे अनेक उधमों और ज्यादतियों ने इन वनांचलों के आदिवासियों को ‘करो या मरो’ की स्थिति में ला खड़ा किया था. उत्तर छत्तीसगढ़ में उठे ऐसे विद्रोह का नेतृत्व उनके आदिवासी नेता वीरनारायण सिंह ने किया था तो दक्षिण छत्तीसगढ़ यानि बस्तर वनांचल में उठे विद्रोह की लगाम को यहाँ के अनेक आदिवासी नेताओं के केन्द्रीय नेतृत्व में गुंडाधूर ने सम्हाल लिया था.

समय का पहिया घूमता रहा. मुग़ल काल में भी बस्तर की अस्मिता अक्षुण्ण रही. मगर 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में कंपनी-सरकार की दस्तक ने बस्तर की नींद हराम कर दी. बस्तर के आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन पर बार बार खतरा मंडराता दिखा. इसकी पीड़ाजनक अभिव्यंजना भतरी बोली की अधोलिखित लोकोक्ति में मिलती है ‘एथा गुड़-गुड़ बस्तर डुला (बंदूक की गडगडाहट से बस्तर कांप उठा).
1774 से 1910 के दरम्यान बस्तर ने दस बार संघर्ष की भेरी फूंकी. सन 1774 के भूमकाल से लेकर 1910 का भूमकाल बस्तर के क्रमिक संघर्ष, जिजीविषा और दुस्साहस की रक्तरंजित गाथा है. इस परिदृश्य में महात्मा गाँधी का आगमन और अहिंसा का नवाचार भूमकाल के बाद की घटना है. (पृष्ठ'05). भूमकाल यह शब्द बस्तर के संग्राम को शाब्दिक अभिव्यक्ति देता है. इस विद्रोह को इतिहासकारों ने ‘भूमकाल’ संज्ञा दी है. गुंडाधूर और बस्तर के आदिवासियों पर बीती लोमहर्षक गाथा इतिहास में ‘भूमकाल’ के नाम से जानी जाती है.
‘बस्तर आज भी तलाशती है उस महान क्रान्तिकारी गुंडाधूर को’ ग्रंथ के लेखक संकेत डहरे संभवतः अकेले आदिवासी इतिहासकार हैं. इस बलिदान कथा को लिखते समय वे दर्प से भरकर यह उद्घोष भी करते हैं कि ‘मुझे गर्व है कि मैं आदिवासी हूं.’ वे लिखते हैं - महान भूमकाल विद्रोह (1910 ई.) बस्तर में हुआ एक व्यापक एवं बड़ा आंदोलन है. भूमकाल का अर्थ भूकम्प या भूमि का कम्पन होता है। इस विद्रोह के प्रमुख नेता थे - गुण्डाधुर, डेबरीधुर, कुँवर बहादुर सिंह, बाला प्रसाद, दुलार सिंह, नाजिर।
इनमें गुंडाधूर एक उम्दा रणनीतिकार नेता थे. राजा और अंग्रेज के खिलाफ गुण्डाधुर ने अलग-अलग जनजातियों से नेता चुन कर पूरे बस्तर को एक धागे में बांध दिया. गुंडाधूर के विश्वसनीय साथियों ने संगठन बनाये ताकि अलग अलग स्थानों से विद्रोह का नेतृत्व वे कर सकें. इन्होंने गांव-गांव जा कर लोगो को एकत्रित किया. विरोध चिन्ह के रूप में डारा-मिरी को उपयोग किया गया, जिसमें आम की टहनी पर लाल मिर्च को बांध दिया जाता था। वस्तुतः लाल मिर्च क्रांति यानि हथियारबंद क्रांति के प्रतीक के तौर पर गांव गांव में पहुंचाई जा रही थी जिस प्रकार 1857 की क्रांति में रोटी और कमल पहुंचाए जा रहे थे. (यह भी कह सकते हैं कि यह लाल मिर्च आज के वाम आंदोलनों के लाल सलाम की तरह विद्रोह का नारा गुंजा रहा था).
ये सारे सदस्य जमकर सक्रिय हो गए. पुसपल के बड़े बाजार में बाहरी व्यापारियों को मारा गया, पूरा बाजार लूट लिया गया और आदिवासियों में बंटवा दिया गया. गुण्डाधुर ने ऐसे बहुत बाजारों को लुटवा कर बंटवा दिया. तब दक्षिण-पश्चिम बस्तर गुण्डाधुर के समर्थकों के कब्जे में आ गया. नेतानार का एक साधारण युवा अद्भुत संगठन कर्ता सिद्ध हुआ. ये बात अंग्रेजो तक पहुंच चुकी थी, अंग्रजो में सैन्य टुकड़ी के साथ कप्तान गेयर को राजा और दीवान की मदद के लिए भेजा. राजा, पंडा बैजनाथ और गेयर ने सभी आदिवासियों को शांत करने की नीतियां बनाई जिसमें विश्वासघात हुआ.
1910 की इस महान घटना में न गुण्डाधुर मारे गए न पकड़े गए, अंग्रेजी फाइल यह कह कर बंद कर दी गयी कि कोई बताने के लिए समर्थ नहीं है कि गुंडाघुर कौन और कहां है? बस्तर के जंगल के चीखते सन्नाटे आज भी अपने पुत्र गुण्डाधुर का इंतज़ार कर रहे हैं. इन्द्रावती के तट पर उसका शौर्य, प्रभामंडल सिरजता है. भले ही भूमकाल – मुरिया राज का सपना पूरा नहीं हुआ. उसकी कथा किसी भी दरबारी, भाट या चारण ने उसकी प्रशस्ति नहीं लिखी और न ही चरित रचा, लेकिन लोकगायकों ने मुक्तकंठ से उसकी विरुदावली गायी है हल्बी भतरी के लोकगीतों में.
बस्तर के जाने माने लेखक लाला जगदलपुरी बताते थे कि ‘गुंडाधूर प्रभुतावादियों से अपनी साहसिक लड़ाइयों के कारण भय और आतंक के ऐसे परिचायक हो गए थे कि बस्तर में एक लम्बे अर्से तक माँ अपने रोते किलकते बच्चे को यह कहकर चुप करातीं थीं कि ‘चुप होता है या बुलाऊं गुंडाधूर को.’
1910 में गुंडाधूर को पकड़ने दस हजार रुपयों के ईनाम की घोषणा ब्रिटिश सरकार द्वारा हल्बी, भतरी, गोंडी में मुनादी करवाई गई थी. आज यही गुंडा बस्तर का लीजेंडरी फिगर है स्वतंत्र चेतना का एक उद्घोषक और महानायक है.
गुंडाधूर के काल्पनिक चित्र को बस्तर के आदिवासी जनों ने अपनी श्रद्धा का आस्पद बनाया है. इस रंगीन चित्र में वह एक सुगठित शरीर वाले नौजवान का शरीर है जिसके दाहिने हाथ में खड्ग है. उसके बांये हाथ में बस्तर के वनोपज के फूल हैं. हाथ और बाजुओं में चाँदी के सफ़ेद कड़े पहने हुए हैं. गले में रंगीन सूतों के हार हैं. सिर में सफ़ेद साफा बांधे हुए है. उसके ऊपर बांस की टोकरीनुमा टोपी सदृश्य दिखाई देता है जिसमें से रंगीन फुनगे झांक रहे हैं.
इनके अतिरिक्त और भी चित्र व मूर्तियाँ हैं जिनमें बस्तर के ख्यातिलब्ध चित्रकार मूर्तिकार बंशीलाल विश्वकर्मा के पहले काल्पनिक चित्र व मूर्ति को अधिक स्थापना मिली है जो अधिक तपा हुआ चित्र जान पड़ता है. धुरवा लोक-गीतकार सुफल द्वारा गुंडाधूर पर रचित लोकगीत में इस नायक को लेकर किए गए वर्णन को आधार बनाकर बंशीलाल विश्वकर्मा ने पहला चित्र बनाया था.
देश के अन्य प्रदेशों के इतिहासकारों द्वारा लिखे भारतीय स्वाधीनता संग्राम में 1555 से 1950 तक जो 57 अधिवेशन हुए उनमें से एक भी मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ में नहीं हुए. नागपुर में दो अधिवेशन हुए थे. अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जिन 26 विद्रोहों का उल्लेख हुआ है वे इन प्रदेशों के नहीं हैं. जबकि आदिवासी विद्रोहों में भी पश्चिमी घाट के भील विद्रोह, झारखण्ड के कोल विद्रोह, बिहार-बंगाल के संथाल और मुंडा विद्रोहों की चर्चा है पर छत्तीसगढ़-बस्तर के रक्तरंजित लम्बे भूमकाल और आदिवासी विद्रोह का कोई उल्लेख नहीं है.
1857 की महान क्रांति के केंद्र में झाँसी, मेरठ, कानपुर जैसे कुछ नगर छाए रहे हैं. पर पहले सक्रिय होने वाले गांव-जंगलों के वीरनारायण सिंह के आदिवासी विद्रोहों का जिक्र नहीं है. भगतसिंह, चंद्रशेखर, मंगल पाण्डेय, बटुकेश्वर दत्त, टीपू सुल्तान जैसे महान शहीदों के बीच राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ के शहीद सपूतों का कोई नाम लेवा नहीं था. इनके प्रमुख वचन एवं नारे रेखांकित नहीं किए गए हैं. तब इस और इन जैसी छटपटाहट भरी आकांक्षाओं की महिमा को व्यक्त करते हैं डा. सुधीर सक्सेना का यह ग्रंथ ‘छत्तीसगढ़ में मुक्तिसंग्राम और आदिवासी’ छत्तीसगढ़ के अध्येता इतिहासकारों के पूर्ववत प्रयासों को और भी अधिक गति व बल देता है.
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