प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता सुधा भारद्वाज की ‘जेल यात्रा’ 

‘दक्षिण कोसल/द कोरस’ को सुधा भारद्वाज का पहला साक्षात्कार (पांचवां किस्त)

सुशान्त कुमार

 

1 फरवरी को राज्यसभा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सांसदों ने प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को एक पत्र लिखा है, जिसमें कहा गया है कि हम मीडिया और साइबर-फोरेंसिक विशेषज्ञ रिपोर्टों पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त करना चाहते हैं, जिसमें संकेत मिलता है कि भारतीय नागरिकों पर अवैध साइबर हथियारों से हमला किया गया है। इन हमलों में न केवल जासूसी शामिल है, बल्कि सबूतों का निर्माण और रोपण भी शामिल है, वरिष्ठ लेखक, कार्यकर्ता और वकील अब यलगार परिषद/भीमा कोरेगांव मामले में ‘अपमानजनक दस्तावेजों’ के आधार पर तीन साल से अधिक समय से जेल में हैं। 

सांसद इलामाराम करीम, थरमंतस बैद्य सहित 19 सांसदों ने लिखा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध विशेषज्ञों ने दिखाया है कि ये दस्तावेज नेटवायर मैलवेयर के माध्यम से उनके कंप्यूटरों में साजिशन बाहर से लगाए गए थे और ‘पेगासस’ द्वारा हमला किया गया था। हाल ही में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने इसकी पुष्टि भी की है कि भारत सरकार ने इजरायली रक्षा फर्मों के साथ 2 बिलियन डॉलर के सौदे के हिस्से के रूप में सार्वजनिक धन का उपयोग करके ‘पेगासस स्पाइवेयर सिस्टम’ खरीदा था। 

सांसदों ने प्रधानमंत्री के नाम पत्र में लिखा है कि इस प्रकार इन साइबर हथियारों के उपयोग में निगरानी और गुप्त रूप से आपत्तिजनक दस्तावेजों के रोपण दोनों के आरोप शामिल हैं। यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और भारतीयों के मौलिक अधिकारों के लिए इन साइबर हथियारों का क्या अर्थ है, इस बारे में बेहद गंभीर चिंता पैदा करता है। उनके खिलाफ साइबर हथियारों के इस्तेमाल की अदालती जांच के लिए यलगार परिषद मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने वर्षों तक मुकदमें में देरी करते हुए जमानत का विरोध करने के लिए गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के अत्यधिक व्यापक प्रावधानों पर भरोसा किया है, साथ ही आरोपियों के पूछने के प्रयासों का कड़ा विरोध किया है। 

सांसदों ने लिखा है कि भीमा कोरेगांव मामले में साइबर हमलों और सबूतों के रोपण के संबंध में खुलासे को देखते हुए यह उचित और न्यायसंगत है कि भीमा कोरेगांव मामले में यूएपीए के तहत गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं को कम से कम जमानत तो दी ही जानी चाहिए। हालांकि आपकी सरकार के निर्देशों पर एनआईए ने जमानत का  विरोध करती रही है। हम आपसे आग्रह करते हैं कि इस घोर अन्याय को दूर करने के लिए तत्काल उपचारात्मक उपाय करें जब तक कि उनके खिलाफ मामले वापस नहीं ले लिए जाते।

खबरों की मानें तो सीपीआई (एम), सीपीआई, डीएमके, कांग्रेस, राजद, एलजेडी, केरल कांग्रेस(एम), मुस्लिम लीग के सांसदों ने पीएम को पत्र लिखकर भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किए गए वरिष्ठ लेखक, वकील, कार्यकर्ताओं और व्यक्तियों पर लगाये गये आरोप संदिग्ध हैं और सबूतों के आधार पर तत्काल रिहा करने के लिए कहा है। 

सुधा भारद्वाज ने मुझे बताया कि उनका जन्म 1961 में अमेरिका के मैसेच्यूसेट्स प्रांत के शहर बोस्टन में हुआ था। उनके माता-पिता उस समय अपनी पोस्ट-डॉक्टोरल पढ़ाई के लिए अमेरिका गए हुए थे। वह जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के कैंपस में बढ़ी हुई, जहां पर उनकी मां प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कृष्णा भारद्वाज ने भारत लौटने के बाद बहुत समय तक पढ़ाती रहीं।

छत्तीसगढ़ की जेलों के बारे में आपने सुन रखी हैं, यहां के जेल और महाराष्ट्र के जेलों में क्या फर्क है?

येरवडा जेल एक केन्द्रीय जेल था। यहां नियमों में काफी सख्ती थी। बहुत दिनों पहले जब एक ‘मटका क्वीन’ आरोपी थी, तब सुना था कि कई कुंडेवाली और कांस्टेबल भी प्रतिबंधित सामानों  को कचरे के साथ अन्दर लाते हुए पकड़े गए थे, पर हमारे रहते हुए ‘झड़ती’ (यानी तलाशी लेने) में बड़ी सख्ती थी। चप्पल भी कैंटीन से ही लेने पड़ते थे, और जब मेरे साइज के उपलब्ध नहीं थे, तो काफी मशक्कत के बाद हवाई चप्पल बाहर से मिल सके। औरतें कैंटीन से खरीदकर बहुत तम्बाकू खाया करती है, पर उन्हें बीड़ी सिगरेट नहीं मिलती थी, जबकि पुरुषों को जेल में यह सब कैंटीन में मिला करता है। महाराष्ट्र की जेलें हमारी छत्तीसगढ़ की जेलों से अधिक व्यवस्थित हैं, विशेषकर कैंटीन का सिस्टम होने के कारण घर वालों को बिस्किट, नमकीन, बीड़ी आदि नहीं लाकर देना पड़ता (जिसमें से नम्बरदारों को अपना हिस्सा काट लेने का मौका मिलता है)। हां, कैंटीन की खरीद-फरोख्त निश्चित ही कमीशन रुपी भ्रष्टाचार का स्रोत होता होगा।

 

जेलों में आप पैसे नहीं रख सकतें, वहां करेंसी का चलन कैसे होता है?

एक तरह से, वर्ग विभाजित समाज से पैदा इन जेलों में, हमारे पी.पी.सी. (प्रिसनर्स पर्सनल कैश) अकाउंट में आने वाली रकम से हम जो ‘कैंटीन’ लिया करते हैं, वही जेल की ‘करेंसी’ रहती है। पैसे वाले कैदी अपने बैरक की ड्यूटी दूसरे से करवाते हैं और उन्हें कैंटीन देते हैं, इसी प्रकार कपड़े धोने या बाल्टियां ढोने के लिये भी उन्हें कोई गरीब कैदी मिल जाती है, जिसे तम्बाकू या बिस्किट देकर काम कराया जाता है। कैंटीन के बदले थोड़ा बहुत ब्यूटी पार्लर की सेवा भी करायी जा सकती थी!! खैर हम लोग तो इन सब से अलग थे और अपना काम खुद ही किया करते, शोमा दीदी भी आर्थराइटिस की गंभीर शिकायत के बावजूद अपना काम खुद किया करती है। हम लोग रोजाना दूध और अंडा मंगाते और उसे बांट के खाते, यह भी निजी पैसे से लेना पड़ता था। हां, जो कैदी टीबी या एचआईवी या गंभीर कुपोषण के शिकार थे, उन्हें जेल की तरफ से अंडा, पांव और दूध दिया जाता।

क्या भायखला जेल में भी अंडरट्रायल कैदियों से परिश्रम (काम) करवायें जाते हैं?

जब एन.आई.ए. ने हमारा केस अपने हाथ में लिया, तो हम येरवडा से भायखला जेल, मुंबई लाये गए।  यहां का वातावरण काफी अलग था, चूँकि यह एक अंडरट्रायल जेल है, जहां ज्यादातर बंदी थोड़ेे समय रहकर छूट जाते हैं। यहां हमें बैरक में रखा गया था, जहां हमें अब सामान्य कैदियों की तरह भीड़-भरे बैरक में किसी तरह अपने लिये एक ‘लादी’ (फर्श पर 2.5&5.5 की स्ट्रिप) सुरक्षित रखने का जद्दोजहद जारी रखनी पड़ता था। मुझे जिस बैरक में भेजा गया था, उसमें 56 कैदी थे जबकि कैपेसिटी 35 की बताई जाती थी। बैरक में कामवालियों का राज चलता था। यह वो कैदी थे, जिन्हें टॉयलेट साफ करने, बाहर के दालान और बाथरूम साफ करने के लिए करीब 1200'600 का पगार मिलता था।

पर वास्ताव में वे ही लोग जेल के ज्यादातर सुपरविजन का काम किया करते - बैरक में ‘जगह देना’, खाना बांटना, मनी आर्डर के रजिस्टर भरना, कोर्ट और मुलाकात के नाम पुकारना, वगैरह। हमारे समय में बहुत सी पढ़ी लिखी माध्यम वर्गीय लड़कियां भी जेल में थी, जो ज्यादातर छोटे-बड़े फ्रॉड या अन्य आर्थिक अपराधों में आई थी। वे भी कुछ काम जैसे - चिट्ठियां बांटना, दवाई बांटने में डॉक्टर की सहायता करना, कैंटीन से आने वाले दूध, अंडा, पांव बांटना, जेल की अनगनित रजिस्टरों (बांटे गए सेनेटरी नैपकिन, साबुन, शैम्पू की कैदिवार सूचियां) भरने का काम करती थी।

 

जेल में बंद औरतें अपने बच्चों की देख - रेख कैसे कर पाती हैं? 

औरतों के दो सर्किल थे। हम पहले में थे जो दो-मंजिला था उसमें 6 बैरक और एक ‘सेपरेट’ सिंगल कोठरियों का कक्ष था। यहां पर मानसिक या शारीरिक बीमार, जिन्हें बैरक में नहीं रखा जा सकता था, या फिर थोड़े से वीईपी भी - जैसे रिया चक्रवर्ती या इन्द्राणी मुखर्जी या कुछ समय के लिए प्रज्ञा ठाकुर! दूसरे सर्किल में बच्चा बैरक था। बच्चों वाली औरतें 6 साल की उम्र तक बच्चों को अपने पास रख सकती हैं, फिर उन्हें बाहर परिवार के पास या फिर संस्था में भेज दिया जाता है। बच्चों को सभी महिलाओं का भरपूर प्यार मिलता है, महिला रक्षकों का भी, और कुछ छोटे बच्चे तो चूमा- चाटी से परेशान हो जाते हैं! उन्हें खिचड़ी, मूंग दाल, अंडा , दूध और थोड़ा तेल लगा कर बनायी हुई छोटी - छोटी रोटी मिला करती थी। वे भी लेकिन जेल की ही भाषा बोलते थे - ‘टोटल’, ‘बंदी’, ‘भत्ता’... बहुत से तो जेल ही में पैदा हुए थे। उन्हें कभी-कभी उनकी खुद की माएं, उनकी शैतानी से तंग आकर खीज में पीट देती पर बाकि उन पर हाथ नहीं उठाते थे।

जेल में अराजकता और वार्डनों के बारे में कुछ बताएंगे?

जेल में हर चीज के लिए लाइन लगती है - खाना, टॉयलेट, कैंटीन, दवाखाना ... और हर लाइन में झगड़े होते हैं, गाली गलौच भी खूब होती हैं। पर पुरुष जेलों में जितनी हिंसा होती है, उससे कम होती है। भायखला जेल में 2017 में एक बहुत गंभीर घटना हुई थी। मंजू शेट्टी नामक एक सजायाफ्ता महिला को येरवडा जेल से वार्डन बनने के लिए लाया गया था। उसकी सजा के कुछ ही महीने बाकी थे। उसकी जबान जरा तेज थी और कैंटीन का अंडा बांटने में एक दिन कुछ विवाद हुआ था। उसे महिला आरक्षकों ने ऑफिस के बगल के एक कमरे में ले जाकर बेतहाशा पीटा। उस समय बाकी औरतें लाइन लगाकर अपने भत्ता ले रही थीं। मंजू को अधमरी हालत में ही रक्षक ऊपर बैरक में घसीटते हुए ले गए। वह चिल्लाती और वे उसे मारते, कुछ प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उसके गुप्तांगों में भी डंडा डाला गया। बंदी के बाद उसने किसी की मदद से टॉयलेट जाना चाहा और वहीं दम तोड़ दिया। औरतों ने चीख पुकार मचाकर डॉक्टर और जेलर को बुलवाया, उसे अस्पताल ले जाया गया, पर बहुत देर हो चुकी थी। 

मंजू शेट्टी के मौत के बाद जेल में कैद बंदियों में इसकी क्या प्रतिक्रियाएं रही?

अगले दिन महिला कैदियों ने जमकर हंगामा किया। नाश्ता, खाना लिया नहीं। बाथरूम के दीवारों पर चढ़ कर नारेबाजी की। सम्बंधित आरक्षक पर तुरंत एफआईआर करने मांग की। उस वक्त जेल अधीक्षक पूना गए हुए थे - ‘मानव अहिकर’ का ट्रेनिंग लेने। जल्दी ही तमाम जेलों से अतिरिक्त गार्ड मंगाए गए। बड़े अधिकारियों ने कैदियों को बहलाने फुसलाने की खूब कोशिश की। पर वे तभी माने जब 10:30 बजे रात को तत्कालीन सर्कल-इन चार्ज और आरक्षकों पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया। पांच महिला जेल कर्मी आज भी ठाणे जेल में हंै, उनकी ट्रायल अब आरम्भ होने वाला है। मजे की बात है कि जब मैं भायखला में थी, कैदियों के खिलाफ जो उन दिनों काउंटर केस लगा था, उसकी चार्जशीट उन्हें दी जा रही थी। यह कोई संयोग नहीं कि वे वही कैदी थे जिन्होंने मूल प्रकरण में महिला आरक्षकों के खिलाफ गवाही दी थी।

 

क्या मंजू शेट्टी प्रकरण के बाद कैदियों के साथ मारपीट बंद हुई इसके अलावा मानसिक बीमार कैदियों के साथ कैसा व्यवहार होता है?

मंजू शेट्टी प्रकरण के बाद भायखला जेल में महिला आरक्षकों ने कैदियों पर हाथ उठाना बंद किया। पर एक तरह से उनकी ओर से यह काम कामवालियां करने लगीं। हफ्ते में एक दो बार तो घटना हो ही जाती है, जब कोई ज्यादा बहस करने वाली या ज्यादा सवाल करने वाली महिला उनके हाथों पिट जाती है। खासकर मानसिक रूप से अस्थिर कैदियों की हालत बड़ी खराब रहती है। अक्सर वे खुद भी किसी को उकसाने वाले काम कर देती हैं, या फिर किसी को भद्दी गालियां दे देती हैं। बस फिर क्या? पूरे बैरक की सारी औरतें ही उन पर टूट पड़ती हैं। उन्हें तब सेपरेट कोठरी में बेडिय़ां लगाकर बंद कर दिया जाता है। भायखला में बिताये डेढ़ साल में मैंने इस प्रकार के 3-4 मानसिक रोगियों को देखा है।

 

जेल से रिहाई के बाद सुधा भारद्वाज ने ‘दक्षिण कोसल/द कोरस’ से लंबी बातचीत की है। इस कड़ी में वह बातचीत के पांचवे किस्त में उन्होंने येरवदा-भायखला जेल, केंटीन, मंजुला शेट्टी प्रकरण और मानसिक रोगियों के बारे में बता रही है, उनसे इस महत्वपूर्ण बातचीत की पांचवी कड़ी में ‘मेरी जेल यात्रा’ से आप सभी सुधी पाठकों को रूबरू करवा रहे हैं। आप तमाम सुधी पाठकों से आग्रह है कि आप इस साक्षात्कार के माध्यम से सीधे सुधा भारद्वाज जी से जुड़ सकते हैं। अपको करना इतना है कि अपनी प्रतिक्रियाओं को हमारे वेबपेज में इस साक्षात्कार के नीचे कमेंट बॉक्ट में भेज देना है अथवा हमें ईमेल- abhibilkulabhi|@gmail.com तथा व्हाट्सएप नं 7828046252 के द्वारा हमें प्रेषित कर सकते हैं। हम कोशिश करेंगे कि आपके प्रतिक्रियाओं का जवाब भी हम सुधा भारद्वाज से पूछ सकें।


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