''जनता की वकालत''
‘दक्षिण कोसल/द कोरस’ को सुधा भारद्वाज का पहला साक्षात्कार (दूसरा किस्त)
सुशान्त कुमारपाठकों हम मशहूर अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज से बातचीत कर रहे हैं। सुधा भारद्वाज अपना मुकदमा खत्म होने तक मुंबई शहर नहीं छोड़ सकतीं। जमानत की शर्तें सुधा भारद्वाज को इस मुकदमे के अंत तक मुंबई छोडऩे से रोकती हैं। इस मामले में 2018 में उन पर जाति-आधारित हिंसा और माओवादियों के साथ कथित संबंधों का आरोप है। उन्हें अपने मामले पर बात करने की भी इजाजत नहीं है।

हम देखते हैं कि गरीबों को कानूनी सहायता प्रदान करने वाले उनके तीन दशक लंबे काम ने उन्हें न्याय की लड़ाई में कई लोगों के लिए आशा की किरण बना दिया है। उन्होंने इस बातचीत में भिलाई गोलीकांड के 19 महीनों के बाद, सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने पर ही, साथी नीलरतन घोषाल, भीमराव बागडे, शेख अंसार और मेघदास वैष्णव की छूटने की चर्चा की है।
एसीसी जामुल (आज लाफार्ज- होलसिम) में ठेकेदारी श्रमिकों के नियमितीकरण की एक आंशिक विजय का जिक्र किया है तथा निरंतर सडक़ की लड़ाई, और अंतरराष्ट्रीय यूनियनों की मदद से स्विट्जरलैंड में हुई चर्चाओं की बात की है, तो वहीं अपने को वरिष्ठ अधिवक्ता कनक तिवारी के साथ अंशकालिक सहयोगी के रूप में काम करना बताया है। उन्होंने कहा कि-‘तिवारी सर के पास मैंने बहुत कुछ सीखा, मुझे पूर्णकालिक वकील बनने के लिए भी उन्होंने ही प्रोत्साहित किया।’
वकील बनने से पहले मामलों की सुनवाई के दौरान किन - किन अड़चनों का सामना किया?
उन दिनों यूनियन को बहुत सारी कानूनी कार्यवाहियों से जूझना था। नियोगीजी की हत्या का मुकदमा, 1 जुलाई गोलीकांड के सम्बन्ध में गठित जांच आयोग में भागीदारी, सैंकड़ों आन्दोलनकारी साथियों पर लगे दर्जन-भर गंभीर अपराधिक मुकदमें, और फिर इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में 16 रिफरेन्स मुकदमों में यूनियन के पक्ष को रखना। उन दिनों मुझे वकीलों के साथ समन्वय का काम करना पड़ता था। जहां एक तरफ कुछ बहुत सकारात्मक अनुभव हुए - जैसे सुश्री नंदिता हक्सर, इंदिरा जैसिंग, वृंदा ग्रोवर, कामिनी जैसवाल और श्री सुजोय पॉल (वर्तमान में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के माननीय न्यायधीश) के साथ - जिनसे बहुत महत्वपूर्ण सीख, समझदारी और लगभग नि:शुल्क सहायता मिली; दूसरी और कई बार कड़वे अनुभव भी हुए।
कभी ऐसा भी हुवा होगा कि फीस ना देने के कारण उल्टे पांव लौटना पड़ा हो?
एक बार, बड़ी मुश्किल से चंदा करके इकट्ठे किये गए 30 हजार रूपए लेकर मै जबलपुर के एक वरिष्ठ वकील के पास साथियों को ले गयी थी, अगले दिन एक महत्वपूर्ण सुनवाई थी। उन्होंने बड़े रुष्ट अंदाज में कहा कि 50 हजार से एक रूपया कम लेने का सवाल ही पैदा नहीं होता और हमें बैरंग लौटना पड़ा। हमारे कई वरिष्ठ नेता और मजदूर साथी जेलों के सलाखों के पीछे थे। उनके लिए भी बार - बार जबलपुर उच्च न्यायलय और दुर्ग - राजनंदगांव जेलों के चक्कर काटने पड़ते थे। आखिर, गोलीकांड के 19 महीनों के बाद, सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने पर ही, साथी नीलरतन घोषाल, भीमराव बागडे, शेख अंसार और मेघदास वैष्णव छूट सके।
एक सामाजिक कार्यकर्ता से वकील बनने की दूरी कैसे पूरी की?
यह लगभग 1996 की आसपास की बात थी। मजदूर साथियों ने सुझाव दिया, ‘दीदी, आप इन वकीलों के लिए इतनी जानकारी इकठ्ठा करती हो, हम लोग भी चंदा करके मुश्किल से फीस जुटाते हैं, और फिर भी कोई भरोसा नहीं रहता कि ये कब पलट जाएं, आखिर उद्योगपति तो उन्हें मुह मांगा दाम देने को एक पैर पर खड़े हैं... इससे अच्छा तो आप ही वकील बन जाओ!!’ इसी समय मेरी नन्ही बिटिया ने भी मेरे जीवन में प्रवेश किया था। उसे बड़ा करने के साथ - साथ मैंने वकालत की पढ़ाई की, और साल 2000 में, 40 साल की उम्र में मैंने वकालत की डिग्री हासिल की। लगभग इसी समय मैं भिलाई में एसीसी जामुल के लेबर कैंप में रहने लगी।
मेहनतकशों के बीच पैरवी एक चुनौती है, कोर्ट में अपने पक्ष को रखने के लिये सबूतों को इकट्ठा करने में मेहनत करनी पड़ी होगी?
भिलाई में ट्रेड यूनियन का काम और लेबर कोर्ट में मजदूरों के प्रकरणों की पैरवी चल रही थी। मजदूर वर्ग मेहनतकशों का एक ऐसा तबका है जिसने पिछले एक सदी में निरंतर संघर्ष कर अपने पक्ष में कानूनों का एक ढांचा तैयार किया है। पर ये कानून ठेकेदारी श्रमिकों के लिए बिरले ही काम आते हैं। सबसे पहले तो इन मजदूरों के पास, दशकों तक काम करने के बाद भी, अपने काम करने के कोई दस्तावेज नहीं होते हैं - जैसे नियुक्ति पत्र, हाजिरी कार्ड, वेतन स्लिप इत्यादि।
ऐसे मजदूरो के लिए यूनियन बनना भी बहुत मुश्किल है; यूनियन का पंजीकरण होने से पहले ही, उसके सदस्यों को काम से निकाल दिया जाता है। ठेकेदारी श्रमिक हर कारखाने में सबसे कठोर, सबसे खतरनाक काम करते हैं, सबसे कम वेतन पाते हैं। तथाकथित ‘संगठित क्षेत्र’ में ये ‘असंगठित श्रमिकों’ की ही स्थिति में रहते हैं। इनकी पैरवी करते समय मैंने पहले तो यह सीखा कि साथियों से घुल - मिलकर उनको खूब ध्यान से सुनो। वे ही बातो-बातों में, अपने काम के विषय में गैर-कागजी या कुछ अनोखे किस्म के सबूत देंगे।
गवाहों की रक्षा और एसीसी जामुल में श्रमिकों के नियमितीकरण का जिक्र करेंगे?
मुकदमें में शामिल साथियों, खासकर गवाहों की रक्षा बड़े सचेतन रूप से करनी पड़ती है। उन्हें धमकियां मिलती हैं, उनपर हमले होते हैं, और काम से तो निकाला जाता ही है। अगर कहीं जीत होती भी थी, जैसे 25 वर्ष बाद एसीसी जामुल (आज लाफार्ज- होलसिम) में ठेकेदारी श्रमिकों के नियमितीकरण की एक आंशिक विजय हुई, तो वोह भी कोर्ट के साथ-साथ, निरंतर सडक़ की लड़ाई, और अंतर-राष्ट्रीय यूनियनों की मदद से स्विट्जरलैंड में हुई चर्चाओं के माध्यम से हुई।
झूठे मामलों में फंसाये गये श्रमिकों - आदिवासियों को कैसे बचाती थी?
जैसे जैसे मुकदमे उच्च न्यायालय में पहुंचते गए, मैं भी उच्च न्यायालय में जाने लगी। वहां यह लगा कि ये कठिनाइयां केवल मजदूरों के कानूनी संघर्षों में होता हो ऐसा नहीं है। जनता को अधिकार देने वाले तमाम कानूनों - जैसे श्रम कानून, वन अधिकार कानून, दलित अत्याचार विरोधी कानून, घरेलु हिंसा कानून, पर्यावरण रक्षा कानून, मनरेगा, सूचना का अधिकार... आदि का अमलीकरण बड़ी ढिलाई से होता है। पर जब जनता, इन अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संगठित होकर मैदान में उतरती है, तब ‘लॉ एंड आर्डर’ की स्थिति बन जाती है। धारा 144 और 151 सीआरपीसी से लेकर अनेक गंभीर झूठे मुकदमों में नेताओं और कार्यकर्ताओं को फंसाया जाता है और इन कानूनों का अमल बड़ी सख्ती से किया जाता है। तब तक मैं वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कनक तिवारी की अंशकालिक सहयोगी के रूप में काम कर रही थी। तिवारी सर के पास मैंने बहुत कुछ सीखा, मुझे पूर्णकालिक वकील बनने के लिए भी उन्होंने ही प्रोत्साहित किया।
क्या कानूनी मदद से समाज के बुनियाद में बदलाव किये जा सकते हैं?
धीरे - धीरे मैंने, और मेरे साथ, अलग-अलग दौरों में कई सहयोगी साथियों ने, ‘जनहित’ नामक वकीलों का ग्रूप तैयार किया। इसके पीछे की सोच यह थी कि बजाय व्यक्तिगत ‘लीगल ऐड’ प्रदान करने के, यदि हम ‘ग्रुप लीगल ऐड’ प्रदान करे, तो हम न केवल आंदोलनों, यूनियनों, आदिवासी और दलित समुदायों, गांव समितियों को एक बेहद जरूरी सेवा प्रदान करेंगे, बल्कि समाज के बदलाव में भी एक ज्यादा ठोस भूमिका अदा कर पाएंगे। अपने लगभग 8 - 10 वर्ष के कार्यकाल में ‘जनहित’ आंदोलनों के एक मित्र और सहयोगी के रूप में खड़ा रहा। लोगों के सामूहिक चंदे से मिले न्यूनतम खर्च पर, हमने इमानदारी से, और यथासंभव अच्छे रिसर्च के सहारे, करीब 250 - 300 मुकदमे दायर किये। मेरे सहयोगी वकीलों को मैंने यथासंभव फेलोशिप दिलाया करती ताकि वे निश्चिंत होकर इस काम में निस्वार्थ भाव से जुड़ सके।
आपकी पैरवी से आदिवासी क्षेत्रों की सूरत में क्या बदलाव आयें हैं?
हमने अनेक गांवो के ग्रामवासियों को उनकी जमीनों के अंधाधुंध और अन्यायपूर्ण अधिग्रहण से लडऩे में मदद की; वहां खोदे जा रहे खदानों की वजह से या पावर प्लांट लगाने से हो रहे पर्यावरण नुकसानों का विरोध किया; बिना ग्रामसभाओं की सहमती के आदिवासी इलाकों में चल रहे प्रोजेक्टों पर प्रश्न उठाया। और इन लड़ाइयों के अगुआ नेताओं और कार्यकर्ताओं की अनेक बार जमानत कराई। इस प्रकार ‘कागज की लड़ाई’ और ‘सडक़ की लड़ाई’ - इन दोनों पैरों पर चलने में छत्तीसगढ़ के ग्राम वासियों की थोड़ी बहुत मदद की।
जेल से रिहाई के बाद सुधा भारद्वाज ने ‘दक्षिण कोसल/द कोरस’ से लंबी बातचीत की है। इस कड़ी में वह श्रमिकों आदिवासियों की पैरवी जैसे नंदिता हक्सर, इंदिरा जैसिंग, वृंदा ग्रोवर, कामिनी जैसवाल और श्री सुजोय पॉल (वर्तमान में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के माननीय न्यायधीश) के साथ - जिनसे बहुत महत्वपूर्ण सीख, समझदारी और लगभग नि:शुल्क सहायता की बात की है। तो दूसरी ओर वरिष्ठ अधिवक्ता कनक तिवारी के साथ अंशकालिक सहयोगी के रूप में काम करना बताया है। उन्होंने कहा कि -‘तिवारी सर के पास मैंने बहुत कुछ सीखा, मुझे पूर्णकालिक वकील बनने के लिए भी उन्होंने ही प्रोत्साहित किया। उनसे इस महत्वपूर्ण बातचीत की दूसरी कड़ी में ‘जनता की वकालत’ से आप सभी सुधी पाठकों को रूबरू करवा रहे हैं। आप तमाम सुधी पाठकों से आग्रह है कि आप इस साक्षात्कार के माध्यम से सीधे सुधा भारद्वाज जी से जुड़ सकते हैं। अपको करना इतना है कि अपनी प्रतिक्रियाओं को हमारे वेबपेज में इस साक्षात्कार के नीचे कमेंट बॉक्ट में भेज दें अथवा हमें ईमेल-abhibilkulabhi007@gmail.com तथा व्हाट्सएप नं 7828046252 के द्वारा हमें प्रेषित करें। हम कोशिश करेंगे कि आपके प्रतिक्रियाओं का जवाब भी हम सुधा भारद्वाज से पूछ सकें।
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