‘छत्तीसगढ़’ में न आ पाने का दर्द’
‘दक्षिण कोसल/द कोरस’ को सुधा भारद्वाज का पहला साक्षात्कार
सुशान्त कुमार‘सुधा भारद्वाज’ यह नाम छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश के संघर्षशील लोगों के बीच अपनी अलग पहचान रखती हैं। उन्हें अब ‘भीमा कोरेगांव मामले’ में देश के साथ पूरी दुनिया जानने लगी है। मशहूर अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता सुधा जेल से 9 दिसम्बर को रिहा होती है। तीन साल और तीन महीने से अधिक समय तक कठोर जेलजीवन के बाद उन्हें महाराष्ट्र की भायकला जेल से रिहा कर दिया जाता है। उनकी रिहाई के लिये संघर्षों की एक लंबी फेरहिस्त है। सुप्रीम कोर्ट के बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा 1 दिसंबर को दी गई डिफॉल्ट जमानत पर रोक लगाने की राष्ट्रीय जांच एजेंसी की याचिका को खारिज करने के बाद यह कदम उठाया गया है। देश में नामचीन मानवाधिकार तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं, आदिवासियों तथा मेहनतकश वर्ग के बीच सुधा की रिहाई का खासा महत्व है और तीन साल बिना सुनवाई के जेल में रखने पर सवाल भी उठाये जा रहे हैं। विशेष एनआईए अदालत ने जमानत की कड़ी शर्तों के तहत 60 वर्षीय सुधा को जेल से छूटने के बाद सभी ने कयास लगाना शुरू कर दिया था कि सुधा अगर मीडिया से मिलती तो क्या कहती?

जैसा कि आपने देखा है वह जेल से छूटते ही मीडिया को हाथ दिखाकर अभिवादन किया है। वास्तव में उन्हें छत्तीसगढ़ सहित देश के सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं और पत्रकारों से बात ना करना पीड़ादयक लग रहा है। और खासकर उनके कर्मभूमि छत्तीसगढ़ राज्य में ना आना उन्हें हर रोज कचोटता है। जेल से रिहाई के बाद लंबे प्रयासों के बाद ‘दक्षिण कोसल/द कोरस’ से उन्होंने लंबी बातचीत की है। हमने यहां उनके बातचीत को धारावाहिक प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। उनके बातचीत को हम चार भागों में प्रकाशित करेंगे। इस कड़ी में वह ‘शंकर गुहा नियोगी’ के संघर्षों के साथ शहीदों और सांस्कृतिक कर्मी फागुराम, कलादास और कौशल्या दीदी का वोह गीत ‘मोर छत्तीसगढ़ के माटी रे संगी चन्दन जैसे महान, ए भुइयांला लूटत हावे पूंजीपति बेइमान’ को भी याद करती है। उनसे इस महत्वपूर्ण बातचीत की कड़ी में ‘छत्तीसगढ़’ में न आ पाने का दर्द’ से आप सभी सुधी पाठकों को रूबरू करवा रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में लड़ी बड़ी लेकिन जेल से छूटने के बाद ‘छत्तीसगढ़’ ना आने के दर्द को आप कैसे अभिव्यक्त करेंगी?
सवा तीन साल बाद जेल से निकली हूं, आजादी की खुशी तो जरूर है; पर यह आजादी बहुत अधूरी लग रही है। खास तौर पर छत्तीसगढ़ न आ पाने की पीड़ा ऐसी है, जैसे अपने ही देश में एक रिफ्यूजी बन जाना!!
पीछे मुढ़ते हुवे छत्तीसगढ़ में मेहनतकशों की बीच अपनी संघर्षमय जिंदगी को कैसे याद करती हैं?
मैं 25 वर्ष की उम्र में कामरेड शंकर गुहा नियोगी के जीवंत मजदूर-किसान संगठन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (छमुमो) से जुड़ी, और 30 वर्षों से अधिक समय, मैं पहले दल्ली - राजहरा और बाद में भिलाई - उरला - टेडेसेरा औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूरों के -‘संघर्ष और निर्माण’ में शामिल रहीं। वहां के मजदूर बस्तियों में रहते हुए, उनके रोजमर्रे के खट्टे - मीठे अनुभवों के साथ एक होते हुए, ऐसा लगता था जैसे मैं यूनियन की गोद में पलकर बड़ी हो रही हूं, परिपक्व हो रही हूं। आज मैं, 60 साल की उम्र में, जो कुछ भी हूं, मेरे मजदूर साथियों -बहनों और भाईयों - ने ही गढक़र बनाया है।
निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण उस दौर के बीच छमुमो के तूफानी दौर में उठे संघर्षो का विश्लेषण कैसे करती हैं?
1990 - 1993 के बीच, भिलाई आन्दोलन की उन तूफानी सालों को याद करती हूं पहली बार वहां के ठेकेदारी मजदूरों के बीच यूनियन का बनना। ‘छोटी छोटी नदियां मिलकर समुद्र बनेंगी’ के पर्चे के साथ भिलाई औद्योगिक क्षेत्र के तमाम कारखानों से हजारों मजदूरों का वो बिल्ला पहन कर सडक़ों पर निकलना - ‘उद्योगपतियों, समय की पुकार को पहचानो, संघर्ष या समझौता हम तैयार हैं!!’ 9 सूत्रीय मांग पत्र के दिए जाने से मची खलबली, जिसमें मात्र बुनियादी श्रम कानूनों को लागू करने की बात ही तो थी। बाद में कामरेड नियोगी ने छोटे उद्योगपतियों को राहत देकर, मुख्य लड़ाई 5 बड़े उद्योगिक घरानों - सिम्पलेक्स, बी.ई.सी., बी.के, केडिया और भिलाई वायर्स के 16 कंपनियों के खिलाफ केन्द्रित किया था।
भिलाई में श्रमिक संघर्ष के बाद मशहूर श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी की हत्या कर दी जाती है, संघर्ष के साथ हार-जीत का आंकलन कैसे करती हैं?
याद आता है वह कू्रर दमन का दौर - 4200 मजदूरों का काम से निकाला जाना; मजदूर नेताओं और कार्यकर्ताओं पर वो जानलेवे हमले। सिम्पलेक्स उरला के गेट से तलवार-धारी गुंडों का निकलकर धरने पर बैठे तीन साथियों को सांघातिक चोटे पहुंचाना। नियोगीजी का 50,000 हस्ताक्षरों से युक्त ज्ञापन और जख्मी साथियों के साथ भारत के राष्ट्रपति से मिलना... वापसी में भोपाल में, भाजपा के मुख्यमंत्री सुन्दरलाल पटवा का उनसे मिलने से इनकार करना। और फिर 14 दिन बाद... 28 सितम्बर 1991 को उनकी गोली मारकर हत्या। एक अद्भूत मजदूर नेता के जीवन दीप का बुझना, दल्ली और भिलाई का आंसुओ में डूब जाना।
मजदूरों का वो विशाल विरोध... मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा को रोकने के मजदूरों के दृढ़ संकल्प से घबराकर, शासन द्वारा उद्योगपतियों से चर्चा करवाने की लंबी नौटंकी, जिसमें से अंतत: वे ही भाग खड़े हुए। 25 मई से लेकर 1 जुलाई 1992 तक, 4200 मजदूरों के परिवारों का वोह खुले आसमान के नीचे भिलाई में जगह - जगह डेरा डालना। पहले नौतपे की भीषण गर्मी में, और फिर बरसते पानी में।
1 जुलाई के रेल रोको सत्याग्रह में, मात्र बातचीत शुरू करने की मांग को लेकर रेल पटरी पर बैठे, वे सैंकड़ों महिला, पुरुष, बच्चे। 9 बजे से लेकर शाम 4:30 बजे तक किसी भी जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी का न आना, अंतत: नेताओं को कंट्रोल रूम बुलाकर कहना कि अब मजदूरों को हटाओं वर्ना... नेताओं के वापस पहुंचकर मजदूरों को संबोधित करने से पहले ही, आंसू गैस का छोड़ा जाना, लाठी चार्ज होना, और बच्चों को लेकर सरपट भागते मजदूरों को 1-2 किलोमीटर तक दौड़ाकर गोली मारना। 17 मजदूरों की वोह शहादत।
इन झंझावतों के 35 वर्षों बाद भी यह संघर्ष अधूरा है क्या अब भी न्याय की उम्मीद बाकी हैं?
छत्तीसगढ़ में यूनियन बनाने के अधिकार के लिए, ठेकेदारी प्रथा समाप्त करने और जीने लायक वेतन के लिए लड़े गए इस वृहद् संग्राम में छत्तीसगढिय़ां मजदूरों के साथ - केरल के प्रदीप कुट्टी, बंगाल के असीम दास, यूपी के केशव गुप्ता, बिहार के लल्लन चौधरी - इन सबने भी प्राणों की आहूति दी थी।
और फिर इस पूरे औद्योगिक विवाद का, 16 मुकदमों के रूप में रिफरेन्स होने के बाद, कानूनी कार्यवाही की लम्बी सुरंग में घुसना। आज, 35 वर्ष बाद भी, मजदूरों को हाई कोर्ट से न्याय की आशा है...
और भी यादें जो आपको छत्तीसगढ़ आने के लिये खींचे ले आता है?
पर याद सिर्फ संघर्षों की ही नहीं आती। याद आता है रात-भर ठिठुरते हुए, पहले ‘नवा अंजोर’ (दल्ली राजहरा की सांस्कृतिक मंडली) और बाद में ‘भुइया के चिराग’ (बीरगांव की सांस्कृतिक मंडली) की तरफ से ‘वीर नारायण सिंह’ के छत्तीसगढ़ी नाटक के मंचन को मुग्ध आंखों से देखना; (स्व) साथी फागुराम और कलादास के वे दर्द भरे छत्तीसगढ़ी गीतों की धुन, जिनमें मजदूरों-किसानों की जिंदगियों की खुशबू आती थी; याद आती है भिलाई और बीरगांव की मजदूर बहनों के साथ बितायी राते जिसमें हमने अपने सुख-दु:ख और रिश्तों की बातें साझा किये; याद आता है दिवाली तिहार में बस्ती के घर - घर जाकर मही में पकाए कुमड़ा-कोचई और सोहारी रोटी खाना; बच्चों का छेर-छेरा में मांगने का शोर; श्वेत जैतखाम्ब के पास पंथी नाचा के ढोलक की धुन; और कौशल्या दीदी का वोह गीत ‘मोर छत्तीसगढ़ के माटी रे संगी चन्दन जैसे महान, ए भुइयांला लूटत हावे पूंजीपति बेइमान’।
जेल से रिहाई के बाद लंबे प्रयासों के बाद ‘दक्षिण कोसल/द कोरस’ से उन्होंने लंबी बातचीत की है। इस कड़ी में वह ‘शंकर गुहा नियोगी’ के संघर्षों के साथ शहीदों और सांस्कृतिक कर्मी फागुराम, कलादास और कौशल्या दीदी का वोह गीत ‘मोर छत्तीसगढ़ के माटी रे संगी चन्दन जैसे महान, ए भुइयांला लूटत हावे पूंजीपति बेइमान’ को भी याद कर रही है। उनसे इस महत्वपूर्ण बातचीत की कड़ी में ‘छत्तीसगढ़’ में न आ पाने का दर्द’ से आप सभी सुधि पाठकों को रूबरू करवा रहे हैं। आप तमाम सुधी पाठकों से आग्रह है कि आप इस साक्षात्कार के माध्यम से सीधे सुधा भारद्वाज जी से जुड़ सकते हैं। अपको करना इतना है कि अपनी प्रतिक्रियाओं को हमारे वेबपेज में इस साक्षात्कार के नीचे कमेंट बॉक्ट में भेज सकते हैं।हमें ईमेल-abhibilkulabhi007@gmail.com तथा व्हाट्सएप नं 7828046252 के द्वारा हमें प्रेषित करें। हम कोशिश करेंगे कि आपके प्रतिक्रियाओं का जवाब भी हम सुधा भारद्वाज से पूछ सकें।
Add Comment