प्रोफेसर रजनी मुर्मू के एक फेसबुक पोस्ट से देशभर में बवाल
आदिवासी महिला बनाम पितृसत्ता?
सुशान्त कुमारहमारा देश 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र हुआ। इसी दिन देश में संविधान लागू हुवा। भारत में बरसों से निवास कर रहे आदिवासी समाज को गणतांत्रिक समाज कहा जाता है। लेकिन उनकी रूढ़ी प्रथाओं को लेकर उसी तरह बरसों से सवाल उठाये जा रहे हैं। झारखंड की प्रोफेसर रजनी मुर्मू ने सात जनवरी को अपने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि सोहराय पर्व मनाने के बहाने आदिवासी लडक़े, लड़कियों के साथ यौन उत्पीडऩ करते हैं। इसे बंद होना चाहिए। मुर्मू अपने फेसबुक वॉल पर प्रखरता से आदिवासी तरक्कियों पर लिखते आ रही है और अब परिणाम यह है कि गणतांत्रिक आदिवासी समाज के लिये वह महिला आंखों की किरकिरी बन गई है।

झारखंड के संताल परगना इलाके से पुरूषवादी गालीगलौच, सामाजिक बहिष्कार की धमकी पूरे भारत में फैल चुकी है। बीते एक पखवाड़े से मुर्मू की तीखी प्रतिक्रियाओं से बवाल मची हुई है। गोड्डा कॉलेज (गोड्डा कॉलेज, सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय (एसकेएमयू) के अंतर्गत आता है) में समाजशास्त्र की असिस्टेंट प्रोफेसर रजनी मुर्मू ने आदिवासी समाज में व्याप्त पुरुषवादी मानसिकता और उसके रूप पर अपना क्षोभ व्यक्त किया है।
रजनी मुर्मू ने सात जनवरी को किए अपने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि सोहराय पर्व मनाने के बहाने आदिवासी लडक़े, लड़कियों के साथ यौन उत्पीडऩ करते हैं। इसे बंद होना चाहिए। उनकी प्रतिक्रियाओं पर आदिवासी समाज फ़ेसबुक पोस्ट पर छात्र उनकी बर्खास्तगी की मांग पर कर रहे है। उन्हें धमकियां मिल रही है। यहां तक उनके खिलाफ एफआईआर और समाज से बहिष्कृत करने की बात तक हो गई है।
पोस्ट के मुताबिक, ‘संताल परगना में संतालों का सबसे बड़ा पर्व सोहराय बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है। पिता-पुत्री सभी आपस में नृत्य करते हैं। जिसमें हर गांव अपनी सुविधानुसार 5 से 15 जनवरी के बीच अपना दिन तय करते हैं। ये त्योहार लगातार 5 दिनों तक चलता है। इस त्योहार की सबसे बड़ी खासियत स्त्री और पुरूषों का सामुहिक नृत्य होता है। इस नृत्य में गांव के लगभग सभी लोग शामिल होते हैं. मां-बाप के साथ बच्चे मिलकर नृत्य करते हैं।’
‘पर जब से संताल शहरों में बसने लगे तो यहां भी लोगों ने इस त्योहार के दिन को कम कर के एक दिवसीय सोहराय कर दिया। खासकर के सोहराय मनाने की जिम्मेदारी सरकारी कॉलेज में पढऩे वाले बच्चों ने उठाई। मैंने दो बार एसपी कॉलेज दुमका का सोहराय अटेंड किया है। जहां मैं देख रही थी कि लडक़े शालीनता से नृत्य करने के बजाय लड़कियों के सामने बदतमीजी से ‘सोगोय’ करते हैं।’
सोगोय एक संताली शब्द है, जिसका मतलब सामूहिक नृत्य होता है। इसमें केवल लडक़े हिस्सा लेते हैं। लड़कियों के सामने ताली बजाते हुए नाचते हैं। ये केवल संताल इलाके में किया जाता है।
वो आगे लिखती हैं, ‘सोगोय करते करते लड़कियों के इतने करीब आ जाते हैं कि लड़कियों के लिए नाचना बहुत मुश्किल हो जाता है। सुनने को तो ये भी आता है कि अंधेरा हो जाने के बाद सीनियर लडक़े कॉलेज में नई आई लड़कियों को झाडिय़ों की तरफ जबरदस्ती खींच कर ले जाते हैं और आयोजक मंडल इन सब बातों को नजरअंदाज कर चलते हैं।’
सोहराय आदिवासी इलाकों में मनाया जानेवाला एक प्रमुख त्योहार है. इसमें भाई-बहन के रिश्ते को सेलिब्रेट किया जाता है। इस दौरान घर, गाय-बैल, फसलों आदि की पूजा की जाती है।
रजनी मुर्मु ने ‘द कोरस/दक्षिण कोसल’ को बताया कि पोस्ट के बाद उनके खिलाफ दुमका थाने में सनहा दर्ज कराई गई है। दर्ज करानेवाले में स्थानीय छात्र नेता श्यामदेव हेम्बरोम, राजीव बास्की और प्रेमराज हेम्बरोम सहित कई अन्य शामिल हैं। उन्हें नौकरी से हटाने के लिए सिदो-कान्हू मुर्मू यूनिवर्सिटी की वीसी सोना झरिया मिंज को 300 छात्रों ने ज्ञापन दिया है।
रजनी मुर्मू ने बताया कि उनके खिलाफ शिकायत दर्ज हुई है। वो आगे बताती हैं, ‘पोस्ट लिखने के बाद सात तारीख के बाद लगातार धमकाया जा रहा है और उनके साथ खड़ी आदिवासी महिलाओं को भी निशाने में लेकर उनकी तस्वीरें लगाकर सोशल मीडिया में ट्रोल किया जा रहा है और भद्दी भद्दी गाली-गलौच का इस्तेमाल किया जा रहा है।’
वो बताती हैं, साल 2018 और 19 में वह दुमका कॉलेज के सोहराई समारोह को अटेंड करने गई थी। जहां इस तरह की हरकतों को उन्होंने देखा। इस साल भी ये समारोह आयोजित हो रहा था, तो मैंने अपनी बात रखी। इसकी शिकायत अधिनस्थ अधिकारियों को की है।
पुरूष आदिवासियों ने इन मामलों को कभी नहीं उठाया
दुमका की जानी मानी कवयित्री निर्मला पुतुल ने ‘द कोरस/दक्षिण कोसल’ को बताया कि ‘महिला आखिरकार महिला होती है, गलत चीजों के खिलाफ उठाया गया उनका कदम सही है। आदिवासी पुरूषों ने क्या कभी महिला के समर्थन में इन मामलों को उठाया है। ’ ‘सिर्फ सोहराई ही नहीं, अन्य पर्व-त्योहार के दौरान भी हमने ये चीजें देखी हैं। लडक़ी की मर्जी की बात हो तो कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन मर्जी न होने पर भी कई बार लड़कियां इसका विरोध नहीं कर पाती हैं। पुरुषवादी सोच रजनी के मामले के बाद समाज में उभर कर आया है। लेकिन इसे कब तक छिपाया जाएगा।’
सामाजिक बहिष्कार अर्थात बिटलाहा
रजनी मुर्मू के खिलाफ ‘बिटलाहा’ की बात कही जा रही है। स्थानीय संथाल समाज में ‘बिटलाहा’ का मतलब होता है सामाजिक बहिष्कार। इसकी मांग करनेवाले श्यामदेव ‘द कोरस/दक्षिण कोसल’ को कहते हैं कि रजनी मुर्मू कॉलेज और संस्कृति के खिलाफ बोली है। सोहराय बड़ा पर्व है। सोशल मीडिया में हमारे निमंत्रण पत्र को टैग कर ऊल जलूल लिखना, उस पर इस तरह की बातचीत उचित नहीं है। केवल मेरे कहने भर से बिटलाहा नहीं हो जाएगा। इसका निर्णय समाज के लोग मिलकर करेंगे। उनके गांववालों ने भी उन्हें अलग कर दिया है। श्यामदेव का कहना है कि एक ग्राउंड रिपोर्ट तैयार करने की जरूरत है जिसमें वस्तुस्थिति आ जायें। वह कहते हैं कि मैं और कोई उनके खिलाफ ना ट्रोल किया है और ना ही गालियां दी है।
ये पहला मामला नहीं है जब रजनी मुर्मू को अपने कहे या लिखे का विरोध का सामना करना पड़ रहा हो। इससे पहले साल 2018 में पाकुड़ कॉलेज में भी एक समारोह के दौरान उन्होंने विरोध किया था। इसके बाद उनका तबादला एसपी कॉलेज में कर दिया गया था। आधे अधूरे कपड़ों में लड़कियों को नृत्य करवाया जा रहा था।
आदिवासी समुदाय में भी पितृसत्ता मजबूत जड़ बनाए हुए है। इस पर देश के जाने माने हस्तियों ने चिंता जाहिर की हैं। इस वक्त कई लोग रजनी मुर्मू के खिलाफ हैं तो कई आदिवासी उनके समर्थन में भी खड़े हुए हैं। रजनी कहती है कि कॉलेज के सिनियर छात्रों पर मेरे द्वारा लगाये गये यौन शोषण के आरोप से अगर उनके मान को हानि पहुंची है तो बेशक वो मुझ पर मानहानि का केस कर दें...
कहें तो मैं उनको वकील भी उपलब्ध करा दूं...
उनको पता चल जायेगा कि एक औरत जब आरोप लगाती है तो कोर्ट क्या फैसला सुनाती है..
बाकी आरोप तो मैं आगे और लगाने वाली हूं...?
छेड़छाड़ तो मैंने बहुत छोटी बात लिखी थी... इन छात्रों का इतिहास संथाल स्त्रियों का सामूहिक हत्याओं का रहा है... जिसका जिक्र तो मैंने किया ही नहीं है...
रजनी लिखती है कि प्रशांत कुमार हेम्बरोम जो एमबीए करके किसी कम्पनी में अच्छे पोस्ट पर मुम्बई में नौकरी कर रहें हैं... हम उम्मीद करते हैं कि एक व्यक्ति जब पढ़ लिख लेता है तो महिलाओं के प्रति भी संवेदनशील होता है... मुम्बई जैसे महानगरों में रहकर भी इसकी मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है... ये ‘संथाल परगना सोना दिसोम’ फेसबुक पेज पर लगातार अलग अलग आईडी से बोलने वाली महिलाओं की फोटो लगा लगा कर गंदी गंदी गालियां दे रहा है...। वह लिखती है कि इसकी कम्पनी का पता मिल जाए तो हम उसकी वहां भी शिकायत कर सकते थे... कोई पता उपलब्ध करा सकते हैं तो प्लीज बताइये... ऐसे पढ़े लिखे लोग आदिवासी समाज को तबाह कर देंगे...
नीलिमा चौहान लिखती है कि अपने यहां रिवाज है बोलने वाली स्त्रियों के चाल चलन, नाते रिश्तों, घर परिवार, अतीत वर्तमान, दोस्त समर्थक स्त्रियों के बारे में भाषिक हिंसा करने कराने का, साथी रजनी मूर्मू के साथ भी वही आजमाया जा रहा है। बाहर के लोग नहीं अपने ही इलाके और वर्ग के लोग यह कर रहे हैं। सोशल मीडिया के हर मंच के इस्तेमाल से ट्रोलिंग की जा रही है उनके खिलाफ। उन स्त्रियों के भी लिए यह सब किया जा रहा जो इन ट्रोल करने वाले समुदाय की हैं पर रजनी के साथ , स्त्री की अस्मिता के साथ, सच के साथ खड़ी हैं। हैरानी नहीं के कोई भी बोलती स्त्री आंख की किरकिरी होती है चाहे वह आदिवासी स्त्री हो या तथाकथित उन्नत समाज की।
रजनी मूर्मू लगातार महिला अधिकारों पर लिखती आ रही है वह कहती है कि ‘किसी महिला को एक व्यक्ति विशेष के द्वारा ‘डायन’ घोषित नहीं किया जाता है। बल्कि सुनुम चावले पांजा के द्वारा पूरे गांव के लोग किसी महिला को ‘डायन’ घोषित करते हैं और उसके लिए सजा तय करते हैं। युगों युगों से ऐसी विधि के द्वारा ही ‘डायन’ घोषित करते हैं। इसलिए यह डायन और अंधविश्वास के साथ ही एक रूढ़ी प्रथा है।
अर्थात पुरा समुदाय मिलकर एक औरत को डायन घोषित करता है...
बोकारो, झारखंड के वीरेंद्र कुमार बास्के ने 24 जनवरी को लिखा है कि आदिवासी समाज के अधिकांश लोग रुढि़वाद को सीने से लगाए बैठे हैं। रुढि़वाद से उन लोगों को इतना प्यार है कि उसे किसी भी कीमत पर छोडऩा नहीं चाहते हैं। चूंकि, उन लोगों के नजर में रुढि़वाद आदिवासियों के तथाकथित पहचान और अस्तित्व जो ठहरा!
आदिवासी समाज के रुढि़वाद भी गज़ब का है! न बदलने की रुढि़वाद! आबो दो सेदाय खोन नोंकागे!
कुछ भी हो जाए, पर हम बदलेंगे नहीं। रुढ़ ही रहेंगे। हम जहां हैं, वहीं रहेंगे। एक तरफ आदिवासी समाज पिछड़ापन का रोना रोते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ पिछड़ापन को (रुढि़वाद) सीने से लगाए बैठे हैं। मानो रुढि़वाद को न छोडऩे की कसम खा ली हो।
बास्के सही लगते हैं- वे कहते हैं कि -‘रुढि़वाद और परंपरा में क्या अन्तर है? बिना तर्क किए /सही और ग़लत का तर्क किए बिना पीढ़ी दर पीढ़ी किसी प्रथा/परंपरा का अनुसरण करना ही रुढि़वाद है। कुछ अच्छे परंपराएं हैं, कुछ गलत परंपराएं भी हैं।’ कुछ परंपराओं में वैज्ञानिकता/सकारात्मकता है तो कुछ परंपराओं में नकारात्मकता भी है। सकारात्मकता परंपरा के निभाने से समाज में कोई दुष्प्रभाव नहीं होते हैं। जबकि कुछ ऐसे रीति-रिवाज या प्रथा है, जिसे समाज पर बुरा असर पड़ता है। ऐसी परंपरा को गलत परंपरा या रुढ़िवाद कहते हैं।
ज्योति थानवी लिखती है कि स्त्रियां यंहा एफबी पर कुछ पका कर पोस्ट डालें, थोड़ा सज-धज कर तस्वीर डाल दें, कुछ दुखी हों तो कोई कविता साझा कर दें। बस यंहा तक पितृसत्ता का ईगो हर्ट नहीं होता। पर आप जैसे ही कोई सच कह दें, कुछ राजनैतिक कह दें, पितृसत्ता पर प्रश्न दाग दें, तब आप के चरित्र से ले कर आपकी प्रोफेशनल दक्षता और आपके पारिवारिक सरोकार सब अचानक प्रश्नसूचक निगाहों के घेरे में आ जाते है। कुछ ऐसा ही हुआ है मित्र रजनी मूर्मू के साथ। कारण साफ है सच असहज करता है।
मूर्मू द्वारा फेसबुक में लगाया गया पोस्ट
संताल परगना में संतालों का सबसे बड़ा पर्व सोहराय बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है... जिसमें हर गांव अपनी सुविधानुसार 5 से 15 जनवरी के बीच अपना दिन तय करते हैं... ये त्योहार लगातार 5 दिनों तक चलता है... इस त्यौहार की सबसे बड़ी खासियत स्त्री और पुरूषों का सामुहिक नृत्य होता है... इस नृत्य में गांव के लगभग सभी लोग शामिल होते हैं... मां बाप से साथ बच्चे मिलकर नाचते हैं...
पर जब से संताल शहरों में बसने लगे तो यहां भी लोगों ने एक दिवसीय सोहराय मनाना आरंभ किया... खासकर के सोहराय मनाने की जिम्मेदारी सरकारी कॉलेज में पढऩे वाले बच्चों ने उठाई...
मैंने दो बार एसपी कॉलेज दुमका का सोहराय अटेंड किया है... जहां मैं देख रही थी कि लडक़े शालिनता से नृत्य करने के बजाय लड़कियों के सामने बत्तमीजी से ‘सोगोय’ करते हैं... सोगोय करते करते लड़कियों के इतने करीब आ जाते हैं कि लड़कियों के लिए नाचना बहुत मुश्किल हो जाता है... सुनने को तो ये भी आता है कि अंधेरा हो जाने के बाद सिनियर लडक़े कॉलेज में नयी आई लड़कियों को झाडिय़ों की तरफ जबरजस्ती खींच कर ले जाते हैं... और आयोजक मंडल इन सब बातों को नजरअंदाज कर चलते हैं...
अन्याय अगर न्याय के खिलाफ हो तो आवाज उठाना अधिकार है आपके इस लड़ाई में इस्तेकबाल करते हैं सलाम मजबूती से लड़े!
इलीन लकड़ा लिखती है कि ...मुझे लगता है, शब्द से बढक़र भावना है और इनके अनकहे अभिव्यक्ति को समझ पाना बाहर के लोगों के लिए मुश्किल है। यही भोले भाले लोग तो बेहतरीन जीवन जीते हैं। दूसरे इंसान पर आसानी से भरोसा करना अगर अच्छी बात नहीं है तो इंसान को इंसान के साथ कैसे व्यवहार करना है यह अन्य तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग और जाति (अन्य लोगों तो छोड़ दीजिए) के लोगों से सीखना अनुचित लगता है। शहर में रह रहे ज्यादातर लोग सरवाईवल के लिए भ्रष्ट हो गए हैं उनमें से शायद मैं भी हूँ। क्या गांव के पिछले पीढ़ी के लोगों की तरह जीना अब संभव है? पता नहीं।
इसका मतलब गांव में पितृसत्तात्मक नहीं है मत सोचियेगा। ब्राह्मणवाद की तरह पितृसत्तात्मक सोच भी समाज में पीडिय़ों से निहित है। गांव में अभी भी छुआछूत मानते हैं, कुछेक समाज को नीच मानते हैं। और हमारी मांए ही घर का काम और खेत का काम संभालती हैं। बच्चों को जन्म देती हैं और अंतहीन प्यार भी वही करती है। उसे ही डाइन कहकर हत्या की जाती है।
इन मुद्दों को उठाने वाले अब ट्रोल किये जाते हैं, सामाजिक बहिष्कार की बात होती है। भद्दी भद्दी गालियां पड़ती है।
रजनी मूर्मू अपने वॉल में लिखती है कि मैंने जिस मामले में पोस्ट लिख कर लोगों को सच्चाई से वाकिफ कराने की कोशिश की थी, वह अब हल्के भयभीत मोड़ लेने लगा है। यह झूठ होगा यदि मैं कहूँ कि मुझे इसका अंदेशा नहीं था। एक महिला होने के कारण उत्पीडऩ और ऑब्जेक्टिफिकेशन इतने करीब से देखा है कि बचपन से खुद से यही सवाल करती आई हूँ कि ‘क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहूँगी?’। आपके पास बोलने का अवसर और मंच है और आप सुविधाजनक चुप्पी चुनें या तारीफ के कसीदे पढ़ें, बजाय इसके कि आप बदलाव हेतु सामाजिक समस्याओं की तरफ ध्यान आकृष्ट कराएं तो आप एक हिपोक्रिट से बढ़ कर और क्या हैं?
हम जिस समाज में रहते हैं उसका ट्रेंड यही है कि यदि उसकी खामियों और खास कर लड़कियों/औरतों की समस्याओं पर मुखर होकर बात की जाए तो लोग बोलने वाले मुँह पर कैसे भी एक टेप चढ़ा देना चाहते हैं। वह टेप कभी उसके सामाजिक बहिष्कार के रूप में तो कभी आर्थिक बहिष्कार के रूप में सामने आता है। इसी कड़ी का नवीन उदाहरण है कॉलेज में छात्रों द्वारा मेरे निलंबन की मांग करना।
हर विक्टिम के पास वह मानसिक और आर्थिक सपोर्ट सिस्टम नहीं होता कि वह अपनी कहानी खुले तौर पर साझा कर सके। लड़कियों की बुली होने को लेकर, हाशियाकरण को लेकर, इतनी इनसिक्योरिटीज हैं कि उन पर अपने अनुभव साझा किए जाने का जबरन दबाव नहीं बनाया जा सकता। ऐसे में उनके आगे आने हेतु एक स्वस्थ स्पेस के निर्माण की बजाय छात्र-नेता यह कैसा संदेश देना चाह रहे हैं? क्या कोई पीडि़ता विरोध और निरस्त करने के ऐसे माहौल में खुद को अभिव्यक्त करने में कभी सुरक्षित महसूस कर पाएगी?
मूर्मू कहती है कि बोलती महिला तक समाज को कभी भी अच्छी नहीं लगती। सवाल करती, जवाबदेही माँगती महिला पर अंकुश लगाना कोई विस्मय की बात नहीं है। मैंने बहुत सोच-समझ कर, दृढ़ संकल्प हो कर त्योहार के नाम पर होती अभद्रता के विषय में लिखने का फैसला लिया था। मुझे हल्का भान इस बात का भी था कि तादाद में लोग मेरी बात नहीं मानेंगे क्योंकि उत्पीडक़ को क्लीन-चिट देने की आदत जो लग गई है। लेकिन यह याद रखा जाए कि प्रमाण की अनुपस्थिति, अनुपस्थिति का प्रमाण नहीं होता।
लोग कह रहे हैं मैं सोहराय जैसे पुनीत त्योहार की छवि खराब करने की कोशिश कर रही हूँ। जबकि मैं अपने समुदाय और उसके पर्वों की हितैषी के रूप में उसे और सुरक्षित व मजबूत बनाने की माँग कर रही हूँ। इस विषय में छात्र नेताओं का बात न करना और तिलमिला जाना यह बताता है कि वे अपने त्योहार का सम्मान नहीं करते और उसमें व्याप्त कुरीतियों का उन्मूलन नहीं चाहते। कोई भी व्यवस्था आदर्श नहीं होती और उसमें हमेशा बेहतरी की गुंजाइश होती है।
कई लोग मेरे पक्ष में भी लिख रहे हैं, बोल रहे हैं, मुझे मेसेज कर रहे हैं। मुझे खुशी है कि मैंने उन्हें वह प्रेरणा और स्पेस प्रदान किया कि जहाँ से वे भी अपनी दुविधाओं के बारे में बात कर सकें। मुझे गाहे-बगाहे तनिक डर भी लगता है पर आपका साथ मुझे बल देता है। जो भी यह पोस्ट पढ़ रहे हों उनसे अपील है कि सच के लिए और उत्पीडऩ के खिलाफ एकजुट हों। एक महिला की नौकरी छीनने की साजिश के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करें। दिनकर की पंक्ति के माध्यम से यही कहूँगी कि ‘जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध’। अब मेरी जीत और हार सिर्फ मेरी नहीं होगी।
आलोका कुजूर कहती है कि आदिवासी नारीवादी चिंतक प्रोफेसर रजनी मुर्मू ने फेसबुक पर जो सवाल सोहराय त्यौहार के बहाने होने वाली स्त्री हिंसा पर सवाल उठाया है। यह सवाल संथाल समुदाय में और उसके बाहर निकल कर एक बहस का मोड़ ले चुका है।
सोशल मीडिया में और व्हाट्सएप पर तरह तरह की बात गढ़ी जा रही हैं। जिसमें स्त्री हिंसा के सवाल को गौण करते हुए, रजनी मुर्मू द्वारा सवाल पर सहमति या असहमति के बहस चलाए बगैर सवाल को गौण करने के लिए राजनीतिक दल का नाम ठूंस दिया गया।
अब जब राजनीति दल का नाम लाया गया हैं तब यह भी सवाल उठता है कि जिसने रजनी को राजनीतिक दल (भाजपा) और उसके घटक एबीवीपी संगठनों से जोडऩे की कोशिश कर रहें हैं उससे भी पूछा जाना चाहिए कि वो किस राजनीति दल सें है। आप के पीछे कौन सी राजनीति ताकत है जो अपने ही समाज की लडक़ी को गलत साबित करने के लिए बाहरी राजनीतिक दल और घटक संगठनों के साथ नाम जोडक़र बिना प्रमाण के कह देते है।
यह भी पूछा जाना चाहिए कि तकनीकी युग में सोशल मीडिया ने समाज के छोटे बड़े सभी बहस को करने का एक प्लेटफार्म जरूर है पर उस प्लेटफार्म को यूज करने वाले कितने लोग स्त्री हिंसा को मानते है या कन्फूज हैं। सवाल आदिवासी स्त्री हिंसा से जूड़ा मसला है। लेकिन इसे अहम और पितृसत्तात्मक सोच, व्यक्तिवादी सोच ने मुद्दे से भटाकर इधर उधर कर रहें हैं।
जसिंता केरकट्टा लिखती है कि आदिवासी समाज के भीतर कोई पुरुष भ्रष्टाचारी निकल जाय, बलात्कारी निकल जाय, हिंसक निकल आए, हत्यारा निकल आए तो भी मैंने ऐसे लोगों के खिलाफ़ इतनी ताकत से उनका विरोध करते किसी आदिवासी समुदाय को नहीं देखा, जितनी ताकत वे एक स्त्री के खिलाफ़ लगाते हैं। अगर मुखर स्त्री किसी नौकरी में हो तो सबसे पहले उसे आर्थिक रूप से तोडऩा इनका मूल मकसद हो जाता है. और क्या हो जो कोई नौकरी न करती हो? तो उसकी हत्या या मोब लिंचिंग करने से भी यह समाज पीछे नहीं हटेगा।
जसिंता कहती है कि सहायक प्रो. रजनी मुर्मू अपने समाज की कमियों को लेकर हमेशा मुखर रहीं हैं। हाल के दिनों में उन्होंने सोहराय पर्व को लेकर फेसबुक पर कोई छोटी टिप्पणी लिखी। अगर यह टिप्पणी कोई पुरुष लिखता तो सम्भवत: कोई इतना ध्यान भी नहीं देता। लेकिन उनकी टिप्पणी पितृसत्तात्मक समाज को चुभ गई है। संताल समाज के युवा छात्र नेता चाहते हैं कि रजनी मुर्मू जैसी कोई स्त्री फिर कभी आलोचना करने की हिम्मत न कर सके इसलिए वे उन्हें नौकरी से हटाए जाने की पुरजोर मांग कर रहे हैं। यह हर उस स्त्री की बात है जिसके पास अपना एक नजरिया है और जो अपनी बात कहना चाहती है।
आदिवासी समाज कहने को तो सामूहिकता और संवाद पर यकीन रखता है, लेकिन इसके भीतर जाकर देखें तो यह सामूहिकता दरअसल एक ऐसी भीड़ है जहां व्यक्ति को बोलने, आगे बढऩे की आजादी नहीं है। सामूहिकता के नाम पर लोग मिलकर एक दूसरे की टांग खींचकर उन्हें बर्बाद करने की जुगत में रहते हैं। जहां तक संवाद की बात है, संवाद तभी संभव है जब कोई दूसरे को सुन रहा हो।
आदिवासी समाज के भीतर ऐसे संगठन तैयार हुए हैं जो किसी को बर्दाश्त नहीं कर सकते। सुन नहीं सकते। आलोचनाएं और शिकायत को ठीक से सुनने वाले लोग और समाज किसी के बोलने/ आलोचना करने/ शिकायत करने के मकसद को देखते हैं। आलोचनाओं के पीछे बहुतों का मकसद बुरा नहीं होता। कुछ भड़ास निकालने के लिए शिकायत करते हैं तो कुछ के शिकायतों के पीछे सुधार की प्रबल इच्छा काम करती है। शिकायतों को उन मकसदों के आधार पर देखना चाहिए।
मामले में कवि अनुज लुगून लिखते हैं कि समाज में अगर आपराधिक प्रवृत्तियां पनप रही हों तो उनका तुरंत प्रतिरोध होना चाहिए। रजनी मूर्मू के जिस फेसबुक पोस्ट पर विवाद हो रहा है उसे मैंने गंभीरता से पड़ा है। रजनी मुर्मू ने सोहराय परब को लेकर कोई अभद्र टिप्पणी नहीं की है और न ही उसका अनादर किया है। उन्होंने सोहराय परब की परंपरा को लेकर कोई आपत्तिजनक बात नहीं कही है। वे तो खुद भी उस महा-उत्सव में शामिल होती हैं।
उन्होंने तो केवल एक कॉलेज में उस महा-उत्सव के आयोजन में घुस रही आपराधिक प्रवृत्ति पर सवाल उठाया है और आदिवासी लड़कियों की सुरक्षा पर चिंता जाहिर की है। हम सब जानते हैं कि आदिवासी समाज में परब-त्योहार शालीनता और सामूहिकता के साथ मनाया जाता है। कुछ लोगों की गलत प्रवृत्तियों की वजह से समाज का सौहार्द बिगड़ता है, उस पर चिंता करना जायज है। रजनी मुर्मू के खिलाफ कार्रवाई की जो माँग उठ रही है उससे मैं सहमत नहीं हूँ। मैं महिलाओं के ऊपर होने वाले किसी भी तरह के अपराध के विरुद्ध हूँ, और यह मैंने अपने पुरखों से सीखा है।
रजनी मुर्मू अपने वॉल में लिखती है कि हिंजला मेला से प्रसिद्ध हिंजला बुरू में न जाने कितनी संथाल लड़कियों की हत्या पत्थरों से कुच कर की जाती थी...
रजनी मुर्मू कहती है कि झारखंड में कुल 32 जनजातियां हैं। उसमें से संताल आदिवासियों की सबसे ज्यादा जनसंख्या है। जिसमें संतालों की अधिसंख्य जनसंख्या संथाल परगना में निवास करती है। एक तरह से संथालों का गढ़ है। वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री भी संथाल समुदाय से हैं (एक तरह से कहा जा सकता है कि यहां संथाल बाकि आदिवासियों का नेतृत्व करते हैं।) उस हिसाब से संथाल परगना में जो भी घटनाएं घटित होतीं हैं उसका प्रभाव बाकि आदिवासियों पर पड़ता है। आदिवासी महिलाओं को लेकर आदिवासी समाज जो स्टैंड लेता है वो काफी हद तक संथाल परगना से प्रभावित होता है।
पुरा झारखंड घुमने के बाद ये मैनें महसूस किया कि संथाल परगना बाकि महिलाओं के मामले में तुलनात्मक रूप से कही ज्यादा हिसंक रहा है। संगठित होकर प्रायोजित तरीके से महिलाओं को ‘समाज विरोधी’ काम करने के कारण जिस आक्रमकता और हिंसा के साथ सामाजिक रूप से मान्यता प्राप्त दंड दिया जाता है वो कहीं और देखने को नहीं मिलता है। और इस ‘समाज विरोधी’ कार्य के लिए संथाल लड़कियों को सजा देने में एसपी कॉलेज का आदिवासी छात्र नेतृत्व कहीं न कहीं परोक्ष अपरोक्ष रूप का नेतृत्व करता नजर आता है।
झारखंड के पत्रकार रूपेश कुमार सिंह ‘द कोरस/दक्षिण कोसल’ से कहते हैं कि ‘मैं इस बात से अनभिज्ञ था कि रजनी जी कभी एबीवीपी जैसे साम्प्रदायिक व फासीवादी संगठन की नेत्री रही है, फिर अभी की उनकी विचारधारा कहीं से भी संघ की विचारधारा से मेल नहीं खाती है। और फिर उनको जिस तरह से ट्रोल किया जा रहा है, वह कहीं से भी उचित नहीं है।’
लिहाजा रजनी मुर्मू कहती है कि अगर युवाओं को लगता है कि उनके साथ कुछ गलत हुआ है तो इसकी शिकायत उनको थाने में जाकर करनी चाहिए... न कि खुद ही कोर्ट खोलकर बैठ जाना चाहिए...
इधर सिद्धू कानू मुर्मू विवि दुमका की कुलपति सोना झरिया ने बताया कि इन्कवायरी चल रही है। कम्पलेंट इज अंडरप्रोसेस। वह आगे कहती है कि इस मामले को वह देशव्यापी मामला बनते हुवे नहीं देखती।
बहरहार रजनी मुर्मू के साथ जसिंता केरकट्टा, इलीन लकड़ा, आलोका कुजूर, खल्को, सुजिता इत्यादि को सोशल मीडिया में फोटो लगाकर ट्रोल किया जा रहा है। उन्हें गाली गलौच किया जा रहा है। थाने में एफआईआर दर्ज नहीं हो रहा है। पूरे मामले में महिला शिक्षिका को कॉलेज से बहिष्कृत करने में तुली हुई है। आदिवासियों के बीच रूढि़प्रथा के नाम पर पितृसत्ता अपनी पैठ बना कर आदिवासी गणत्रात्मक समाज को ध्वंज करने में जुटी हुई है।
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