भूमिया गैंदसिंह और परलकोट का मुक्ति आंदोलन

‘द कारेस’ पर आदिवासी नेता गेंदसिंह पर विशेष

संकलन - दुर्गाप्रसाद ठाकुर

 

परलकोट बस्तर की सबसे पुरानी राजधानी मानी जाती है। प्राचीन काल में इसे राज्य का दर्जा मिला हुआ था और यह सप्त माडिय़ा राज्यों में से एक थी। जमींदारी का क्षेत्र चांदा से मिला हुआ था। ‘हल्बा जनजाति एवं उनके लोक संस्कृति’ नामक पुस्तक के अनुसार अमर बलिदानी शहीद गैंदसिंह का जन्म नारायणपुर के बम्हनी गांव में हुआ था। गेंदसिंह बचपन से ही चतुर सिंह के समान ताकतवर निडर बालक था। वह अपने सहपाठियों के बीच मुखिया के रूप में कार्य करते थे।

गैंदसिंह का वास स्थान

उसका विवाह बम्हनी में देहारी परिवार की लडक़ी के साथ हुआ। बम्हनी में कुछ वर्ष रहने के पश्चात उन्होंने कंगाली गढ़ में डेरा जमाया वहां कुछ वर्ष रहने के पश्चात आलरगढ़ में रहने लगे आलरगढ़ उन्हें रास नहीं आया। तब वह पलकोट में आकर बस गए। उनके 5 पुत्र हुए परलकोट में गेंदसिंह की उदारता, साहस, न्यायप्रियता की वजह से आदिवासी उन्हें राजा मानने लगे। गौरतलब है कि उन्होंने धीरे-धीरे अपने अदम्य साहस, चतुर निडरता, ताकतवर नेतृत्व कौशल का पकिचय देते हुवे परलकोट में विशाल किला और महल बनवाया। 

साल 1825 में गेंदसिंह के नेतृत्व में सुलग रहे परलकोट आंदोलन जसके माध्यम से अबूझमाड़ के आदिवासी लूट-खसोट और शोषण रहित समाज की रचना करना चाहते थे। मराठों और अंग्रेजों के शोषण और दमन नीति पर नियंत्रण रखने के लिए उनका अपना संघर्ष था और अंग्रेज अधिकारियों को पाठ पढ़ाने के लिए यह एक अभ्यास भी था। 

परलकोट के अबूझमाडिय़ों के आह्वान पर बस्तर के सभी अबूझमाडिय़ां 24 दिसंबर साल 1824 से उनका आंदोलन 4 जनवरी 1825 तक चांदा से अबूझमाड़ की पट्टी में फैल चुका था। वास्तव में ये नेता एक ऐसा सुनहरा संसार बनाना चाहते थे जो इनके मिथकीय हीरो ‘कर्ण’ के संसार से मिलता-जुलता हो।

सच तो यह है कि बस्तर में मराठों और ब्रिटिश अधिकारियों की उपस्थिति से इन्हें अपनी पहचान का खतरा उत्पन्न हो गया था तभी से ये आशंकित और उद्दग्न हो उठे थे। परदेशी सभ्यता से ये खतरा महसूस करने लगे थे। विवरण के अनुसार ये अपने बाणों और भालों को तभी से नुकीला बना रहे थे।

यह आंदोलन परलकोट जमींदार की प्रारंभिक स्थिति में उनका आक्रोश शोषकों के विरुद्ध था। जब उन्हें यह मालूम हुआ कि मराठा सेना इस पर कोई हस्तक्षेप नहीं कर रही है, तो वे अधिक आक्रामक हो गये। शीघ्र ही उन्होंने मराठा तथा अंग्रेज अधिकारियों पर भी घात लगाना प्रारंभ कर दिया।

गेंदसिंह ने की थी छापामार युद्ध की शुरूआत 

मराठों और अंग्रेज अधिकारियों के बाद बस्तर में बसे हुए विदेशी उनके आक्रोश के लक्ष्य बने। चांदा से संलग्न क्षेत्र में इनका बहुत अधिक मुक्ति आंदोलन फैला हुआ था। एगन्यू ने 1 जनवरी 1825 तथा 4 जनवरी 1825 के अपने पत्र में उक्त आंदोलनों को विद्रोह निरूपित करते हुए लिखा है कि साल भर चलनेवाले इस विद्रोह के कारण इस अंचल में भुखमरी की स्थिति पैदा हो गयी है। धनु, बाण, कुल्हाड़ी तथा भाला लेकर ये हजारों की संख्या में एक साथ निकलते हैं तथा लोगों के घरों को जलाकर रक्तरंजित हाथों से वापस लौटते हैं। एगन्यू की पहल पर जब चांदा से सेना आ गयी तो, इन विद्रोहियों ने छापामार युद्ध प्रारंभ कर दिया था।

महिलाओं के साथ 500 से 1000 की संख्या में ये इकठ्ठे होते थे और दूर से ही मराठा सेना पर अपनी कुल्हाडिय़ां चमकाते। मराठा सेना जैसे ही पास आती, ये जंगलों में छिपकर घात लगाकर वार करते थे। ये पहाडिय़ों तथा पेड़ों पर चढक़र नगाड़ा बजाते थे,जिससे अबूझमाडिय़ों की सेना चारों ओर से आकर मराठों की सेना को घेरकर उन पर बाणों की बौछार करती थी। अबूझमाडिय़ां धावड़ा वृक्ष की टहनियों को विद्रोह के संकेत के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजते थे। पत्तों के सूखने के पहले वर्ग-विशेष को विद्रोहियों के पास जाने की हिदायत थी। इस प्रकार पूरे माड़ अंचल में आंदोलन की चिंगारी फैल चुकी थी। 

मराठों तथा अंग्रेजों को सिखाया सबक  

गैंदसिंह और उनके साथियों पर जो मुकदमा चला था, उसके आधार पर विद्रोहियों के क्रियाविधि को समझा जा सकता है। पराधीनता से मुक्ति के लिए किस हद तक उनका आक्रोश फूटा था? जब ये किसी मराठा या अंग्रेज को पकड़ते थे, तो उसका बोटी-बोटी काट डालते थे। विद्रोह का संचालन अलग-अलग टुकडिय़ों में मांझी लोग करते थे। रात्रि में सभी आंदोलनकारी किसी गोटुल में एकत्र होते थे और वहीं से अगले दिन का कार्यनीति सुनिश्चित किया जाता था।

इनके मुक्ति आंदोलन का मुख्य लक्ष्य मराठा सरकार द्वारा लगाए गए टैक्स का विरोध तथा अंग्रेजों के दमन से मुक्ति पाना था। इनका विरोध इस बात पर भी था कि बस्तर के राजा को जमींदार की स्थिति में लाकर बिठाया दिया गया तथा बस्तर के पुराने जमींदारों की अस्मिता पर प्रहार किया गया था। गांव के शोषणकर्ता ठेकेदारों को पकडक़र ये मार डालते थे। ये उन लोगों को नहीं सताते थे, जो उन्हें बराबरी का दर्जा देते थे। इनके प्रति असम्मान जताने वाला प्रत्येक इनकी सूची में होता था, जिसे ये समाप्त कर देते थे।

परलकोट विद्रोह अबूझमाडिय़ों का विदेशी सत्ता को धूल चटाने के लक्ष्य से शुरू हुआ था। यह बस्तर को गुलामी से मुक्त कराने का प्रयास था। विद्रोह की तीव्रता को देखते हुए एगन्यू ने 4 जनवरी साल 1825 को चांदा पुलिस अधीक्षक कैप्टेन पेव को निर्देश दिया, ताकि आंदोलन को दबाया जा सके। 

चेतनसिंह नायक ने साल 1910 को किया युद्ध का शंखनाद

आखिरकार मराठों और अंग्रेजों की सम्मिलित सेना ने 10 जनवरी 1825 को परलकोट को घेर लिया। गैंदसिंह बंदी बना लिए गए तथा 20 जनवरी 1825 को उन्हें परलकोट महल के सामने फांसी दे दी गई। अपने स्वाभिमान तथा मातृभूमि की रक्षा के लिए शहीद गैंदसिंह नायक को याद किया जाता है। इस वंश के अंतिम जमींदार चेतनसिंह नायक ने साल 1910 में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का शंखनाद किया था। बताया जाता है गांव में आंदोलन के दमन के लिए फौजी टुकड़ी को प्रवेश से रोकने के लिए अबूझमाड़ के आदिवासी धुंआ करके शहद के मधुमक्खियों को उद्वेलित करते थे। मधुमक्खियों के काटने से अंग्रेजी फौज के सिपाही अपनी प्राण रक्षा के लिए वापस भागने विवश हो जाते थे।  

बस्तर का इतिहास और गैंदसिंह

साल 1800 के पूर्व बस्तर को दो भागों में बांटा गया था- बस्तर जमींदारी और खालसा जमींदारी। इन्द्रावती नदी का दक्षिणी भाग बस्तर जमींदारी और उत्तरी भाग खालसा जमींदारी कहलाता था। इन जमीदारों तथा रियासतों में उनके छोटे-छोटे जमीदारियां गढ़ के रूप में शामिल थीं। खालसा जमींदारी में परलकोट भी वैसे ही हल्बा जमींदार गैंदसिंह के प्रभुत्व में था। साल 1901 में प्रशासनिक मूल्यांकन के आधार पर इस जमींदारी का क्षेत्रफल 640 वर्गमील का था, जिसमें गांवों की संख्या 165 और जनसंख्या 5920 थी। परलकोट नदियों और पहाड़ों से घिरा हुआ था। पहाड़ के ऊपर राजा का महल था अब वहां मात्र खंडहर के रूप में अवशेष हैं। बस्तर रियासत की राजधानी जगदलपुर था और रियासत का राजा उन दिनों महिपाल देव था, जो राजा भंजदेव का वंशज था। 

बस्तर रियासत के सभी जमींदार एवं खालसा जमींदारी के समस्त जमींदार या राजा जगदलपुर के राजा का प्रभुत्व स्वीकारते थे और उन्हें लगान या कर दिया करते थे। खालसा की भूमि राजा की स्वाधीन होती थी परन्तु जगदलपुर(बस्तर) के नियंत्रण में होते थे। बस्तर जमींदारी और खालसा जमींदारी का केन्द्र जगदलपुर थी। जगदलपुर का राजा ईस्ट इंडिया कम्पनी का आधिपत्य स्वीकार कर चुका था। वह बस्तर जमींदार और खालसा जमींदारों से कर या लगान वसूल कर ईस्ट इंडिया कम्पनी को जमा करते थे।

लार्ड वेलेजली ने सहायक संधि अपनाया   

अंग्रेज व्यापारिक कम्पनी के कर्मचारी साल 1785 से प्रशासक बन बैठे थे। धन कमाना उनका प्रमुख लक्ष्य था। गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज ने 1775 में नन्दकुमार बंगाली ब्राह्मण को फांसी पर लटका दिया। साल 1775 में ही अवध के बेगमों का धन लूट लिया गया। साल 1779-80 में चेतसिंह को फंसाया गया। लार्ड कार्नवालिस ने ईस्तमरारी बंदोबस्त लागू करके जमींदारों को हमेशा के लिए जमीन दे दिया और लगान भी निश्चित कर दिया गया। लार्ड वेलेजली ने सहायक संधि अपनाया। दक्षिण के राजा निजाम से सहायक संधि करके उसे अंग्रेजी कम्पनी के नियंत्रण में रखा गया। साल 1817'8 में महाराष्ट्र के पेशवा और नागपुर के भोंसलों का राज्य भी अंग्रेज गवर्नर जनरल के शासन में शामिल हो चुकी थी।

लार्ड हेस्टिंग्ज ने सुधार के नाम पर रैयतवाड़ी प्रथा लागू किया और छत्तीसगढ़ (वर्तमान) के समस्त गढ़ों को अपने नियंत्रण में ले लिया। छत्तीसगढ़ पर शासन करने के नीयत से अनेक मेजर और अधिकारी नियुक्त किये गये जिनमें '. एडमड्स हैरिट- साल 1818, 2. मेजर एगन्यू-  21 जुलाई 1818 से 1826, 3. केप्टन हन्टर - साज 1826 से कुछ समय, 4. केप्टन सेंडस - साल 1826 से 1828, 5. केप्टन विल्किन - साल 1829, 6. केप्टन क्राफ्ट - साल 1830 तक।

मेजर एगन्यू के कार्यकाल में परलकोट का जमींदार गैंदसिंह थे। भोपालपट्टनम में - यादव राव जमींदार थे, मानपल्ली में- बाबूराव जमींदार थे, आरामपल्ली जमींदारी में - वेंकटराव जमींदार थे। 

बस्तर रियासत में बस्तर जमींदार और खालसा जमींदार में आवागमन का पूर्ण अभाव था। आवागमन और आयात-निर्यात का मुख्य साधन बैलगाडिय़ां थीं। बस्तर जमींदारी और खालसा जमींदारी के लाख, धूप, मोम, गोंद, सींग, चावल, तिखुर,  गुड़, सागौन की लकड़ी, रेशम, कोआ आदि का संग्रहण जगदलपुर में हुआ करता था और भोपालपट्टनम एवं रायपुर मार्ग से निर्यात किये जाते थे।

नमक, नारियल,  मसाला, अफीम, कागज, गोल मिर्च, कपड़े, गेहूं आदि रायपुर से आयात किये जाते थे। निजाम रियासत से कपड़े, तम्बाकू, अफीम आदि बस्तर में आयात होते थे। क्रय का मूल्य चावल या कौडिय़ों से दिया जाता था। ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार 20 कौडिय़ों का मूल्य 1 बोरी, 12 कौडिय़ों का मूल्य 1 दोगानी और 12 दोगानी का मूल्य 1 रूपया होता था।

जमींदार गैंदसिंह जगदलपुर के राजा के अधीन था, वह अपनी जमींदारी से लगान वसूल कर जगदलपुर नरेश के पास जमा करता था। साल 1823-24 में जगदलपुर नरेश को भूमि कर नहीं मिल पाया। उसने अंग्रेज अधिकारी मेजर एगन्यू को इसकी शिकायत कर दी। गैंदसिंह अंग्रेजी प्रशासन से पहले से ही नाराज था,क्योंकि-

1. आदिवासी जमींदारी से वनोपज, चावल, गुड़, रेशम, कोआ बाहर निर्यात होते थे, उसका उचित मूल्य हल्बा, माडिय़ा, गोंड़ आदि जनजातीय लोगों को नहीं मिलता था।

2. क्षेत्र में रैयतवाड़ी बन्दोबस्त लागू करके किसान एवं जमींदारों का अधिकार छिन लिया गया था।

3. किसी भी जमींदार को अन्य जमींदार से मित्रता करने या किसी के विरुद्ध लड़ाई का अधिकार नहीं था।

4. आवागमन की असुविधा के कारण अबूझमाडिय़ां लोगों में एवं हल्बा जाति के लोगों में संगठन नहीं बन पाया था।

5. गैंदसिंह हल्बा जनजाति का अकेला जमींदार था इसलिए उसकी उपेक्षा होती थी।

6. अबूझमाड़ की संस्कृति एवं परस्परता को अंग्रेजों से खतरा था।

7. जमींदारों को सेना रखने या सिपाही पद में भर्ती करने की पूर्ण मनाही थी।

उपरोक्त कारणों से जमींदार गैंदसिंह जगदलपुर के नरेश से और अंग्रेज प्रशासन से नाराज था। उसने अपनी जमींदारी की सुरक्षा हेतु और आर्थिक क्षति को बचाने के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रशासक के विरुद्ध विद्रोह करने की योजना बना ली। उसने अबूझमाड़ में एकता व संगठन बनाना आरंभ कर दिया,अबूझमाड़ के लोगों में राजभक्ति की भावना जागी। नि:संदेह आदिवासी राजा को सर्वाधिक महत्व देते थे,राजा लौकिक शक्ति में सर्वोपरि होता था। अबूझमाडिय़ां पुरूष-स्त्रियां गैंदसिंह के योजना के अनुसार परलकोट में एकत्रित होने लगे। रमोतीन बाई भी महिलाओं का नेतृत्व कर रही थी। युद्ध के आधार'. तीर-कमान, 2. देवी-देवताओं की शक्ति, 3. मंत्र-तंत्र एवं मधुमक्खियां थी।

परलकोट में उनके राजमहल के सामने दे दी गई फांसी

संगठन एवं एकता बनने की भनक अंग्रेज अधिकारियों को लगी। अंग्रेज अधिकारियों ने पुलिस अधीक्षक एगन्यू को इसकी पूर्ण जानकारी दी। वह घबरा गया और मराठा सैनिक, चांदा के पुलिस अधीक्षक केप्टन पेव और अंग्रेज सैनिकों के द्वारा परलकोट घेर लिया। जमींदार गैंदसिंह ने अपनी जमींदारी की सुरक्षा, अपनी जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ाई की घोषणा कर दी। जमींदार सैनिकों के पास तीर-कमान ही अस्त्र-शस्त्र थे। अंग्रेज सैनिकों के विरुद्ध मंत्र-तंत्र से मधुमक्खियों का प्रयोग करते थे। अंग्रेज सैनिक और मराठा सैनिकों के आधुनिक अस्त्रों के सामने गैंदसिंह के सैनिक नहीं टिक सके।

जमींदार पकड़ लिया गया। अंत में उसे परलकोट में उनके राजमहल के सामने फांसी दे दी गई। परलकोट साल 1886 में प्रतापपुर तहसील व थाना था, जमींदार परलकोट सितरम में स्थानांतरित हुआ। आज परलकोट छत्तीसगढ़ राज्य के कांकेर जिला के पखांजूर तहसील में वीरान ग्राम के रूप में दर्ज है। केवल कुछ खंडहर (भग्नावशेष) और पुरातत्व की सामाग्री के साथ विलुप्त अवस्था में है फिर भी अमर शहीद गैंदसिंह नायक की वीरता और अपनी मिट्टी के प्रति उनमें कृतज्ञता की भावना को देश हमेशा-हमेशा याद रखेगा।    

गेंदसिंह का बलिदान बस्तर भूमि के हर एक व्यक्ति के लिए एक अविस्मरणीय विशाल अध्याय है। प्रत्येक बस्तरवासी का माथा इस तथ्य बोध से गौरवान्वित हो जाता है कि बस्तर जैसे पिछड़े आदिवासी बाहुल्य अंचल में स्वतंत्रता चेतना के प्रथम बीजारोपण गेंद सिंह बाऊ ने बोया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में बस्तर की ही नहीं वरन संपूर्ण छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद आदिवासी शहीद में इनकी गिनती होती है। इस विद्रोह को हम एक तरह से 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद भी कह सकते हैं।

20 जनवरी को प्रतिवर्ष अखिल भारतीय आदिवासी हल्बा समाज व अन्य समुदाय द्वारा हर गांव तथा गढ़ों में संभाग, ब्लॉक तथा राज्य स्तर पर गेंदसिंह शहादत दिवस के रूप में मनाया जाता है।


संकलनकर्ता 'गोंडवाना समय' के संवाददाता हैं और परालकोट क्षेत्र के चिखली में निवास करते हैं।


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