किसान आंदोलन: खुद फना होकर असलियत देखने की कोशिश

जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई लाएगी, वह सुबह हमीं से आएगी

आवरण कथा - सुशान्त कुमार

आवरण कथा/ अबतक सैकड़ों लोग मारे गये हैं। कई को गायब कर दिया गया। पत्रकारों की गिरफ्तारी और उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया जा रहा है। उनकी रिहाई को लेकर आंदोलन और रिहाई इस आंदोलन में जान फूंक रहा है। 

विभिन्न राज्यों से लोग इस आंदोलन को समझने और आंदोलन को विस्तार देने के लिये दिल्ली सीमाओं में पहुंचने लगे हैं। पहली बार छत्तीसगढ़ से ‘छत्तीसगढ़ किसान मजदूर महासंघ’ के नेतृत्व में ज्ञानी बलजिंदर सिंह, अमरीक सिंह, दलबीर सिंह, सुखविंदर सिंह सिद्दधू, सुखदेव सिंह सिद्दधू के साथ तेजराम विद्रोही, नवाब जिलानी, एलडी ढाले, गजेन्द्र कोसले, सोनू पुरोहित सहित 100 किसानों का जत्था दिल्ली के सीमा पर पहुंच गया। 

खास बात यह कि निजी चार पहिया वाहनों के साथ किसानों का यह जत्था ट्रकों में माल की तरह लदकर जोखिम और दर्द के बीच दिल्ली पहुंच चुका था। मैंने इस जत्था के साथ चलना स्वीकार किया। ट्रक में माल की तरह अपने-आप को भरकर हम जब निकले वह 7 जनवरी का दिन था। स्थानीय मीडिया की सुख सुविधाओं वाली ट्रक से दिल्ली यात्रा की खबर के उलट किसान और मैं ट्रक के दु:खदायी हिचकोले के साथ हम सभी दिल्ली से लगे पलवल सीमा पर रात 11 बजे पहुंच चुके थे। वहां सुरक्षा बलों द्वारा हमें आगे बढऩे से रोक दिया गया। रायपुर के टाटीबंद गुरूद्वारा के सेवाभावी सरदारों ने जाने-आने का पूरा खर्चा उठाया।

सीमाओं में पहुंचने के बाद हमारे मेजबानों की खर्च में कुछ कमी आई। वहां हम सभी के लिये लंगड़ में चाय, नाश्ता, भोजन के साथ आवश्यक वस्तुओं में साबुन, तेल, शेम्पू, पेस्ट, ब्रश, जुराबों की व्यवस्था सभी के लिये मुफ्त में हो गई। हमने दो सीमाओं का अध्ययन किया। पलवल और सिंघु। दोनों ही सीमाओं में प्रदर्शनकारियों ने कोरोना के इस दौर में दूरियों को खत्म कर दिये थे। सेनेटाइजर और मास्क का उपयोग सिर्फ और सिर्फ मेडिकल से जुड़े लोग ही करते नजर आयें। शौचालय और स्नान के लिये पानी की काफी दिक्कते थी। महिलाओं को पेशाब और रजस्वला के दौरान इन्फेक्शन के शिकायतें हो रही थी। इसके अलावा कुछ लोगों को बुखार और सर्दी की शिकायतें थी। पानी के अभाव में हम कई दिनों तक नहीं नहाते थे। सभी लोग जो वहां जुटे थे या फिर पहुंच रहे थे सभी समझने लगे थे कि सरकार की नई कृषि कानून में - कहीं भी फसल को बेचने और किसी के द्वारा खरीदने और आवश्यक वस्तुओं की सूची से अनाज को बाहर कर देना किसानों के लिये आत्मघाती कदम था।

हम जब पहुंचे तब तक आंदोलन के दौरान ठंड और अन्य कारणों से लगभग 70 (रिपोर्ट लिखे जाने तक 160 से ज्यादा किसानों की मौत जिसमें महिलाये भी शामिल) से ज्यादा किसानों की मौत हो चुकी थी। एनसीआरबी की रिपोर्ट में किसानों की आत्महत्या के साथ सरकार प्रयोजित इन किसान हत्या को भी रिकॉर्ड में लेना चाहिये। 

हमने जो पाया इन किसानों का संघर्ष मुक्त भारत के इतिहास में अद्धितीय है। भोजन, आश्रय, कपड़े  और स्वच्छता के लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाओं की जरूरतें इस आंदोलन की धडक़न है। उनमें से युवा और बूढ़े जिनके साथ मैं बातचीत कर सकता था, उन्होंने कहा कि कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। सरकार में बैठे लोगों ने किसानों के इस संघर्ष का सामना करने के लिए अपनी रणनीति तैयार कर रखी है। उनमें से कुछ का कहना है कि बातचीत के दरवाजे हमेशा खुले हैं। कुछ अन्य लोग यह बताते हुए अडिग हैं कि तीनों कृषि बिलों के कार्यान्वयन पर कोई समझौता नहीं हो सकता है। कुछ अन्य अभी भी यदि आवश्यक हो तो इन पर विचार करने का वादा करते दिखे।

पलवल सीमा पर 9 तारीख को छत्तीसगढ़ के किसानों का जत्था पहुंच गया था। सुबह का समय एक भले मानुश द्वारा लगाये गये बॉयो टॉयलेट, वाशिंग मशीन और नहाने की व्यवस्था के साथ सब कुछ आसानी से निपट गया। सभी किसान एक दूसरे की लड़ाई में सहभागिता के लिये एक दूसरे का अभिवादन कर रहे थे। छत्तीसगढ़ के किसानों के नेता नवाब जिलानी को यहां मुख्य मंच से प्रतिनिधित्व का मौका मिला। एक किलोमीटर के दायरे में फैले आंदोलन के स्थल में एक बड़ा जुलूस निकलकर छत्तीसगढ़ के किसानों ने प्रदर्शन किया। सुबह मेरी मुलाकात रविदत्त सिंह से हो गई जो मध्यप्रदेश राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष हैं। उनका कहना है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष शिव कुमार कक्का हैं जो सरकार से बात करते हैं। कहते हैं कि 170 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। 26 लोग संसद भवन नंगे बदन पहुंच गये थे, जहां उनकी गिरफ्तारी हो गई थी।

उन्होंने बताया कि 26 जनवरी को दिल्ली जायेंगे और तिरंगा झंडा फहराया जाएगा। कानून पर कहते हैं कि पिछले साल मक्का 1800 रुपये में बिका अब 800 रुपये में बिक रहा है। गेंहू पिछले साल 2200 रुपये में बिका अब 1400 रुपये में बिक रहा है। उस दिन तक पलवल के लोगों ने 7 लाख रुपये इकट्ठे कर लिये थे और तमाम खर्च के बाद 4 लाख रुपये मौजूद थे। गांवों से आटा सब्जी पहुंच रहा है। मुसलमानों की बस्ती से सब्जी और दूध पहुंचने लगे हैं। ग्वालियर से गुरूद्वारा का लंगर आ पहुंचा है।  

आरएसएस से ताल्लुक रखने वाले शिव प्रसाद कक्का कहते हैं कि उनका मूलमंत्र है ऋण मुक्ति पूरा दाम। वे कहते हैं कि 180 गैर राजनीतिक संगठन इससे जुड़े हैं। 75 प्रतिशत सांसद किसानों के पुत्र हैं। उनका कहना है कि यह जाति, धर्म, सम्प्रदाय, पंथ तथा राजनीतिक पार्टियों से अलग विभिन्न स्वतंत्र संगठनों का एक संयुक्त मोर्चा है। उन्होंने योगेन्द्र यादव के संगठन को अलग रास्ता दिखाता बताया। वे कहते हैं कि 19 धाराओं में से एक भी काम का नहीं है। आंदोलन लंबा चलेगा। सरकार से बातचीत में बाहरी दबाव की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी। 

राजू पांडेय कहते हैं कि सरकार को बताना चाहिए कि 28 फरवरी 2016 को वर्ष 2022 तक किसानों की आय दुगुनी करने के उनके वादे का क्या हुआ? 2016 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 17 राज्यों में किसानों की औसत वार्षिक आय 20 हजार रुपए हैं। यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मात्र 1700'800 रुपए मासिक आय में किसान अपना घर किस तरह चलाता होगा। 

देवेन्द्र शर्मा ने एक अध्ययन द्वारा यह बताया था कि 1970-2015 की अवधि में सरकारी कर्मचारियों की आय 120'50 गुना बढ़ गई जबकि कंपनियों में कार्यरत सामान्य स्तर के कर्मचारियों की आय 3000 गुना तक बढ़ती देखी गई। बहरहाल किसानों की आय वर्ष 2022 तक दुगुनी करने हेतु 10 प्रतिशत सालाना की कृषि विकास दर चाहिए थी किंतु कृषि विकास दर 2016'7, 2017'8 और  2018'9 में 6.3 फीसदी, 5.0 फीसदी और 2.9 फीसदी रही है। जबकि 2019-20 के लिए यह 2.8 प्रतिशत है। अंदाजा लगा लीजिये क्या इसी तरह बढ़ेगा किसानों की आय?

आखिरकार आंदोलन का कुम्भ सिंघु पहुंचे

गतिरोध और ट्रक से छूटते- छाटते 10 जनवरी को आखिरकार देशव्यापी किसान आंदोलन का कुम्भ सिंघु बॉर्डर में पहुंच ही गये। सुबह जहां गाड़ी खड़ी थी वह स्थान गंदगियों के अंबार से पटा हुआ था। हजारों लोगों के लिये सिंघु की सीमा निस्तारी के लिये मुश्किल होता जा रहा है। अद्भुत आंदोलन है कोई एक मुख्य केंद्र बिंदु इस आंदोलन में नजर नहीं आता है। एक साझा लड़ाई नजर आती है। पहली बार देखा कि सिख समाज तन, मन और धन से इस आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। 5'8 डिग्री सेल्सियस की कडक़ड़ाती ठंड में आंदोलन में लोग भागीदार हो रहे हैं। एक मुख्य मंच से पूरे आंदोलन का संचालन हो रहा है। एक और मंच पीछे के हिस्से में लोगों को आंदोलन से जोड़े हुये है। कुछ एक लंगरों को छोड़ आंदोलन में दोस्त और दुश्मन का भेद नहीं हैं। 

पंजाब के गुरूदासपुर के रहने वाले गगनदीप सिंह ने बताया कि ये कानून किसानों के लिए फांसी का फंदा है। जबतक जीत नहीं जाते यहां से घर के लिये वापसी नहीं करेंगे। अगर कानून इतना ही अच्छा है तो सरकार हमें समझा क्यों नहीं पा रही है? छत्तीसगढ़ के किसानों का जत्था जिसे पलवल हरियाणा में रोक लिया था वह पिछले 10 जनवरी के रात 10 बजे सुरक्षा बलों को चकमा देते हुये बेरिकेट्स को पार करते हुए रात 2 बजे सिंघु सीमा के बड़े आंदोलन के कुम्भ में पहुंच गई। सिंघु का बाजार पूरी तरह आंदोलन के समर्थन में बंद है।

लगभग 22 किलोमीटर का क्षेत्र आंदोलन से पटा हुआ है। स्थानीय सारे एटीएम में से पैसे डालने बैंक ने बंद कर दिये हैं। सिंघु सीमा पर छत्तीसगढ़ के आदिवासी नेता सुरजू टेकाम कहते हैं कि दिल्ली के सिंघु सीमा पर जब पुलिस के भेष में प्रदर्शनकारी किसानों पर हमलों कर रहे थे तब गोदी मीडिया समाचार एडिट कर आत्मरक्षा पर जवाबी कार्रवाई कर रहे किसानों को टीवी चैनलों में दिखाकर आंदोलन को बदनाम और कुचलने की साजिश रच रहे थे। शांत किसान आंदोलनों पर अब तक सारे तोडफ़ोड़ की कोशिश बीजेपी और आरएसएस द्वारा अंजाम दिया जा रहा है। किसान नेता सुदेश टीकम का कहना है कि कुछ लोगों द्वारा आंदोलन को छोड़ जाने से आंदोलन खत्म नहीं हो रहा है बल्कि और तेजी के साथ फैल रहा है।

सरकार पांच-छह लेयर में जो कंटीले तारों और बड़े-बड़े किलों की घेराबंदी कर रहे हैं उससे आंदोलन खत्म नहीं होकर अन्य राज्यों में तेजी के साथ फैलेगा। छत्तीसगढ़ में भी अन्य संगठनों से अलग किसान महासंघों से कॉमन प्रोग्राम पर बातचीत और सुलह के साथ 6 फरवरी चक्काजाम के राष्ट्रीय आह्वान को पूरा किया जाएगा। दिल्ली पहुंचे छत्तीसगढ़ के परलकोट किसान कल्याण संघ के मुखिया पवित्र घोष ने कहा कि 27 के बाद किसान आंदोलन के भविष्य में एक नया मोड़ आ गया है। गाजीपुर और टीकरी बॉर्डर पर लोग घरों से लौट रहे हैं। यूं ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब सरकार को झूकना पड़ेगा। छत्तीसगढ़ में भी किसान महासंघों के साथ मिलकर देशव्यापी किसान आंदोलन को तेज करने की कोशिश हो रही है। छत्तीसगढ़ में आंदोलन तेज करने के लिये आने वाले सप्ताह में नया किसान आंदोलन प्रदेश में देखने को मिलेगा। 

लिहाजा इस तरह लगातार लोगों की आवाजाही दिल्ली से अन्य प्रदेशों में लगी हुई है। अखिल भारतीय स्तर पर सरकारी गतिरोध के बावजूद आंदोलन दिन प्रतिदिन विशाल रूप लेता जा रहा है। 

काले कानूनों को रद्द करने की लड़ाई नकाफी तो नहीं

सिंघु से छत्तीसगढ़ के किसानों का जत्था वापस लौट चुकी है। यह वापसी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के करण नहीं है बल्कि पंजाब और हरियाणा के किसानों के द्वारा दिखाई गई नई आजादी की लड़ाई का जज्बा है। छत्तीसगढ़ से पहुंचे किसानों का कहना है कि वे विभिन्न जिलों में जाकर नई किसान आंदोलन को जन्म देंगे और सरकार द्वारा लादी गई तीनों काले कानूनों को रद्द करवाने काम करेंगे। 

सिंघु में खाने पीने के लिये लंगर की पर्याप्त व्यवस्था है। आवश्यक दैनिक वस्तुओं की मुफ्त में वितरण किया जा रहा था। दूध, गाजर का हलवा, मक्के की रोटी और सरसो का साग के साथ क्रीम,  घी वाली जलेबी, गन्ने की खीर, खिचड़ी, लंगर में दाल, चावल और रोटी, चाय, कॉफी, फल, गुड़-फल्ली की पापड़ी जैसे खाद्य पदार्थों की पूरी व्यवस्था थी। आधार कार्ड पर किसान मॉल में जरूरत के वस्तुयें उपलब्ध थी। समारोह में काजू किसमिस का वितरण हो रहा था। गर्म पानी के लिये अलग से लंगर की व्यवस्था थी। पुस्तकों की दुकान लगी हुई थी। कई स्टॉल पुस्तकों के लाईबे्ररी का था। कुछ स्थानों में स्थानीय बच्चों को पढ़ाया जा रहा था। कई सारे स्टाल के लोग बातचीत करने से कतरा रहे थे। एक मेडिकल स्टॉल का व्यक्ति मेरे द्वारा किसानों को दवाई क्यों दिये जा रहे हैं जैसे सवाल किये जाने पर नाराज हो गया और मेरे मोबाइल के आंकड़ों की जांच करने लगा और अंत में गलतफहमी पर माफी भी मांगा। 

गौरतलब बात यह कि वर्तमान किसान आंदोलन को सभी जातियों का समर्थन प्राप्त है। जाति संरचना में सबसे निचली पायदान पर स्थित पिछड़ी जातियां भी इस आंदोलन के पक्ष में है। लेकिन क्या यह सही समय नहीं है कि हम किसान समुदाय के बीच के जातीय व वर्गीय मुद्दों के साथ आजादी की नई लड़ाई के जिम्मेदारियों को भी पूरा करें।  किसानों के संकट पर जितनी बाते इस समय हो रही है, शायद ही पहले कभी हुई हो। आर्थिक मामलों के जानकार मनीष आजाद कहते हैं कि पंजाब के पिछड़ी जातियों का संगठन जमीन प्राप्ति संघर्ष समिति इस आंदोलन का हिस्सा है और उसकी इस मांग पर वर्तमान किसान आंदोलन के नेतृत्व को गौर करना चाहिए कि पिछड़ी जातीय संगठनों को प्रतिनिधित्व देने से और उनकी  कुछ सीमित मांगों को आंदोलन से जोडऩे पर पिछड़ी जातियों की इस आंदोलन में हिस्सेदारी गुणात्मक रूप से बढ़ जाएगी और वह मुक्ति के मार्ग में आगे निकल जायेगा।  इसके असर की कल्पना आप इसी बात से कर सकते हैं कि पंजाब में दलित आबादी 32 प्रतिशत के आसपास है। जबकि उनके पास महज 3.2 प्रतिशत जमीन है। वहीं हरियाणा में दलित आबादी 20 प्रतिशत है, जबकि खेती की जमीन उनके पास महज 2 प्रतिशत है। यानी लगभग सभी दलित भूमिहीन है। लगभग ऐसी ही स्थिति पूरे देश की है।

पंजाब में जमीन प्राप्ति संघर्ष समिति पंचायत जमीन पर पिछड़ी जातियों के हक के लिए लड़ रहा है। यानी जो अधिकार उसे कानूनन मिले हुए है, उस पर कब्जे के लिए उसे कठिन संघर्ष करना पड़ रहा है। 1961 में पारित एक कानून के मुताबिक पंचायत जमीन का 33 प्रतिशत वहां के दलितों के लिए आरक्षित है। लेकिन लगभग सभी गांवों में जाट सिख पंचायत जमीन से एक इंच भी जमीन दलितों को नहीं देते। इसके लिए वे सभी तरह के हथकंडे अपनाते है। हरियाणा में भी कमोवेश ऐसी ही स्थिति है। कल्पना कीजिये यदि इस आंदोलन में नेतृत्व यह ऐलान कर दे कि दलितों को पंचायत जमीन में उनका वाजिब हक दिया जाएगा तो पिछड़ी जातियां इस आंदोलन को नई आजादी की लड़ाई में बदल देंगे। और आंदोलन की जड़े काफी गहरी हो जाएगी। सरकार के नये पैतरों के साथ संयुक्त मोर्चे में नेतृत्व को लेकर सन्देह तो बरकरार है।

खेती के संकट में जमीन का सवाल मुख्य सवाल है। पंजाब और हरियाणा में भी जमीन का सवाल एक बड़ा सवाल है। यदि हम जाति के संदर्भ में देखे तो हरियाणा में 24 प्रतिशत जाट किसानों के पास कुल 86 प्रतिशत जमीन है, जबकि 20 प्रतिशत दलितों के पास महज 2 प्रतिशत। वहीं अगर पंजाब की बात करें तो हरित क्रांति के कारण पंजाब इस वक्त जमीन वितरण के मामले में भारत का सबसे असमानता वाला समाज है। यह असमानता जाति और वर्ग दोनों स्तर पर दिखती है। यहां तक कि गांव के गुरुद्वारे में भी यह जातीय असमानता साफ़ नजऱ आती है। यह भी कि सेवा पर आधारित यह आंदोलन जिस तरह सभी आंदोलन को तेज कर लोकतंत्र को सब्सिडी दे रही है यह अमीरी, गरीबी जातीय और धर्म वर्ग से ऊपर नजर आता है। 

मनीष लिखते हैं कि आर्थिक आंकड़ों में कहें तो यहां का गिनी- कोएफिशिएंट 0.82 है, जबकि पूरे भारत मे यह 0.75 है। (गिनी-कोएफिशिएंट  का मतलब पूर्ण समानता और 1 का मतलब पूर्ण असमानता)। जाहिर है, कृषि संकट के केंद्र में अभी भी जमीन का सवाल है, और दलित संकट के केंद्र में भी जमीन ही है। कोरोना काल मे जब बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश के किसान वापस लौट रहे थे, तो पंजाब- हरियाणा के जाट पंचायतों ने वहाँ के दलितों को पुरानी मजदूरी पर उनके खेतों में काम करने के लिए बाध्य कर बंधवा बना लिया था और दलितों के बहिष्कार की धमकी दी थी। वह घाव अब भी हरा है। बावजूद इसके उनका पूरा समर्थन इस आंदोलन को है।

दरअसल यह आंदोलन कृषि के अंदरूनी वर्ग-अंतर्विरोधों पर न होकर कृषि बनाम देशी विदेशी पूंजी के अंतर्विरोध पर है। लेकिन आंदोलन की आग में जाति और असमानता की बेडिय़ों को पिघलाना जरूरी है। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान हमने यह मौका बार बार गवांया है। आज यदि आंदोलन की रीढ़ छोटे और मध्यम जाट सिख व जाट अपना हृदय बड़ा करके पिछड़ी जातियों के मुद्दे को इस आंदोलन से जोड़ पाते है, और कम से कम सार्वजनिक जमीन पर दलितों के कानूनी हक पर अपने स्वामित्व को छोडऩे का एलान कर देते है तो यह आंदोलन समाज के हासिये की तबके के लिए जोतने वालों को ही जमीन के आंदोलन में बदलने के साथ जातीय और वर्गीय भेद खत्म करने की स्वतंत्रता की लड़ाई में बदल जायेगी। कमेटी और कमीशन के केंद्र जबतक जमीन का समूहीकरण और राष्ट्रीकरण के सवालों का हल नहीं करता तबतक वर्तमान किसान आंदोलन अधूरा ही रहेगा। अगर इसे हम आंदोलन की धुरी के रुप में ले तो वर्तमान आंदोलन की जड़ें इतनी गहरी हो जाएंगी कि यह लड़ाई मजदूर, किसान और मजलूमों की जीत बनकर तानाशाही सरकार को बार बार डराएगी।

भगत सिंह का विशाल कट आउट

सिंघु बॉर्डर के मुख्य मंच के पास भगत सिंह का विशाल कट आउट लगा हुआ है। भगत सिंह लिखते हैं, असल क्रांतिकारी सेनाएं गांव और कारखानों में हैं, यानी किसान और मजदूर। लेकिन हमारे बुर्जुवा (पूंजीपति) नेता उन्हें कभी संगठित नहीं करेंगे। एक बार ये सोये हुए शेर जाग गए फिर तो ये बुर्जुवा नेताओं के लक्ष्य से भी बहुत आगे निकल जायेंगे...। 

14 जनवरी को कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की कई सीमाओं पर बैठे किसानों का आंदोन 50वें दिन में प्रवेश कर चुका था और कड़ाके की ठंड के बाद भी ठटे हुए हैं। वहीं सुप्रीम कोर्ट द्वारा कृषि कानूनों की समीक्षा के लिए कमेटी बनाने के बाद 15 जनवरी को होने वाली बैठक पर अनिश्चितता का माहौल है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी के एक सदस्य भूपिंदर सिंह मान ने खुद को कमेटी से अलग कर लिया है। 

13 जनवरी को देशभर में किसानों ने कृषि सुधार कानूनों की प्रतियां जलाई। कृषि सुधार कानूनों का विरोध कर रहे किसान संगठनों ने 13 तारीख को पूरे देश में इन काननों की प्रतियां जलायीं। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की यहां जारी विज्ञप्ति के अनुसार आंदोलन के 49वें दिन किसानों ने अलग-अलग राज्यों में इन तीनों कानूनों की प्रतियां जलायीं और उन्हें रद्द करने पर जोर दिया। 

12 जनवरी को भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने तीनों कृषि क़ानूनों पर रोक लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कृषि क़ानूनों के लागू होने पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। पिछले साल बने इन क़ानूनों को लेकर विभिन्न किसान संगठन पिछले महीने से दिल्ली सीमा पर धरने पर बैठे हैं। अदालत ने साथ ही इस संबंध में आगे वार्ता के लिए एक समिति गठित कर दी है। इस समिति में बीएस मान, प्रमोद कुमार जोशी, अशोक गुलाटी और अनिल धनवंत सदस्य होंगे।

सुनवाई के दौरान अदालत ने अपनी शक्ति प्रदर्शित करते हुऐ कहा है कि प्रदर्शनकारी किसान सहयोग करे। कोर्ट ने कहा ‘कृषि क़ानूनों पर जारी गतिरोध को दूर करने के मक़सद से एक समिति गठित करने उन्हें कोई भी शक्ति नहीं रोक सकती’।

सिंघु सीमा में एकजुट किसानों ने कहा यह आधी जीत है पूरी जीत के लिये तीनों कानूनों को रद्द करना होगा तबतक प्रदर्शन जारी रहेंगे। इस दौरान 12 जनवरी को मेधा पाटकर से मुलाकात हुई। वह भारत की प्रसिद्ध समाज सेविका के रूप में जानी जाती हैं। उन्हें ‘नर्मदा घाटी की आवाज़’ के रूप में पूरी दुनिया में जाना जाता है। गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित मेधा पाटकर ने ‘सरदार सरोवर परियोजना’ से प्रभावित होने वाले लगभग 37 हज़ार गांवों के लोगों को अधिकार दिलाने की लड़ाई लड़ी हैं। उन्होंने महेश्वर बांध के विस्थापितों के आंदोलन का भी नेतृत्व किया। अरूंधती रॉय जैसी लेखिका उनकी निकट सहयोगी रही हैं। वह किसान आंदोलन की नब्ज टटोलने में लगी हुई थी। 

किसान आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

11 जनवरी को किसानों के आंदोलन का आज 47वां दिन था। नए कृषि कानून रद्द करने समेत किसान आंदोलन से जुड़ी दूसरी अर्जियों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने सरकार से कहा कि जिस तरह से प्रक्रिया चल रही है, उससे हम निराश हैं। हमें नहीं पता कि सरकार की किसानों से क्या बातचीत चल रही है। सीजेआई ने सरकार से दो टूक कहा कि आप कृषि कानूनों पर रोक लगाएंगे या हम कदम उठाएं? सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कमेटी बनाने के लिए नाम मांगे हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कल तक नाम सौंप दिए जाएंगे। ऐसे में बिना आदेश पास किए ही आज की सुनवाई खत्म हो गई।

8 जनवरी को किसानों की सरकार के साथ आठवें दौर की बात हुई थी, लेकिन इस बातचीत में भी कोई समाधान नहीं आया, क्योंकि केंद्र ने विवादास्पद कानून निरस्त करने से इनकार कर दिया। 15 जनवरी को नौवें दौर की बात होना तय किया गया। इस बीच किसान नेताओं ने कहा कि वे अंतिम सांस तक लड़ाई लडऩे के लिए तैयार हैं और उनकी ‘घर वापसी’ सिर्फ ‘कानून वापसी’ के बाद होगी।

आइए जानते हैं किसान आंदोलन और कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के महत्वपूर्ण पक्ष-

चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने कहा कि जिस तरह से सरकार इस मामले को हैंडल कर रही है, हम उससे खुश नहीं हैं। हमें नहीं पता कि आपने कानून पास करने से पहले क्या किया? पिछली सुनवाई में भी बातचीत के बारे में कहा गया, क्या हो रहा है?

अदालत ने कहा, ‘हम किसान मामलों के एक्सपर्ट नहीं हैं, क्या आप इन कानूनों को रोकेंगे या हम कदम उठाएं। हालात लगातार बदतर होते जा रहे हैं, लोग मर रहे हैं और ठंड में बैठे हैं। वहां खाने, पानी का कौन ख्याल रख रहा है?’

सीजेआई ने कहा, ‘हम किसी का खून अपने हाथ पर नहीं लेना चाहते हैं। लेकिन हम किसी को भी प्रदर्शन करने से मना नहीं कर सकते हैं। हम ये आलोचना अपने सिर नहीं ले सकते हैं कि हम किसी के पक्ष में हैं और दूसरे के विरोध में।’

चीफ जस्टिस ने कहा कि आप हल नहीं निकाल पा रहे हैं। लोग मर रहे हैं। आत्महत्या कर रहे हैं। हम नहीं जानते क्यों महिलाओं और वृद्धों को भी बैठा रखा है। खैर, हम कमेटी बनाने जा रहे हैं। किसी को इस पर कहना है तो कहे।

चीफ जस्टिस ने कहा कि हम कानून वापसी की बात नहीं कर रहे हैं, हम ये पूछ रहे हैं कि आप इसे कैसे संभाल रहे हैं। हम ये नहीं सुनना चाहते हैं कि ये मामला कोर्ट में ही हल हो या नहीं हो। हम बस यही चाहते हैं कि क्या आप इस मामले को बातचीत से सुलझा सकते हैं। अगर आप चाहते तो कह सकते थे कि मुद्दा सुलझने तक इस कानून को लागू नहीं करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘हमें आशंका है कि किसी दिन वहां (सिंघु बॉर्डर) हिंसा भडक़ सकती है। (और इस तरह हिंसा को अंजाम दिया ही गया) इसके बाद साल्वे ने कहा कि कम से कम आश्वासन मिलना चाहिए कि आंदोलन स्थगित होगा। सब कमेटी के सामने जाएंगे। इस पर सीजेआई ने कहा कि यही हम चाहते हैं, लेकिन सब कुछ एक ही आदेश से नहीं हो सकता। हम ऐसा नहीं कहेंगे कि कोई आंदोलन न करे। यह कह सकते हैं कि उस जगह पर न करें।

सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा है कि बहुत बड़ी संख्या में किसान संगठन कानून को फायदेमंद मानते हैं। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि हमारे सामने अब तक कोई नहीं आया है जो ऐसा कहे। इसलिए, हम इस पर नहीं जाना चाहते हैं। अगर एक बड़ी संख्या में लोगों को लगता है कि कानून फायदेमंद है तो कमेटी को बताएं। आप बताइए कि कानून पर रोक लगाएंगे या नहीं। नहीं तो हम लगा देंगे।

एजी केके वेणुगोपाल ने कोर्ट को बताया- ‘2000 किसान प्राइवेट पार्टियों के साथ पहले ही करार कर चुके हैं। अब ऐसे में कृषि कानूनों पर रोक लगाने से उनका भारी नुकसान होगा। ‘सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा- ‘सरकार किसानों की समस्याओं की हर पहलू से विचार कर रही है। आपका ये कहना है कि सरकार मामले को ठीक से हैंडल नहीं कर रही, बहुत कठोर टिप्पणी है।’ इस पर सीजेआई ने कहा- ‘ये तो आज की सुनवाई में हमारी ओर से दिया गया सबसे तथ्यपूर्ण बयान है।’

सीजेआई ने कहा, ‘ऐसे अहम कानून संसद में ध्वनि मत से कैसे पास हो गए। अगर सरकार गंभीर है तो उसे संसद का संयुक्त सत्र बुलाना चाहिए। हम एक कमेटी बनाने का प्रपोजल दे रहे हैं। साथ ही अगले आदेश तक कानून लागू नहीं करने का आदेश देने पर भी विचार कर रहे हैं।’ अब कमेटी ही बताएगी कि कानून लोगों के हित में हैं या नहीं। अब इस मामले को कल फिर सुना जाएगा, कमेटी को लेकर भी कल ही निर्णय हो सकता है।

टीकरी बार्डर पर अरूंधती रॉय

11 जनवरी को विख्यात लेखिका और सामाजिक-कार्यकर्ता अरुंधती रॉय ने दिल्ली में टीकरी बार्डर स्थित किसान आन्दोलन के संयुक्त दिल्ली मोर्चा से कल अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि इस आन्दोलन को हराया नहीं जा सकता क्योंकि यह जिंदादिल लोगों का आन्दोलन है। आप हार नहीं सकते। मैं आपको यह बताना चाहती हूं कि पूरे देश को आपसे उम्मीदें हैं। पूरा देश देख रहा है कि लडऩे वाले दिल्ली तक आ गये हैं और ये लोग हारने वाले लोग नहीं हैं।

इस आन्दोलन ने इस देश के एक-एक आदमी को, एक-एक औरत को समझा दिया है कि आखिर इस देश में हो क्या रहा है! हर चुनाव से पहले ये लोग आपके साथ खड़े होते हैं, आपसे वोट मांगते हैं और चुनाव खत्म होते ही ये जाकर सीधे अम्बानी, अडानी, पतंजलि और बाहर की बड़ी-बड़ी कम्पनियों के साथ जाकर खड़े हो जाते हैं।

राय ने कहा कि इस देश के इतिहास को देखें तो अंग्रेजों से आजादी लेने के बाद इस देश में कैसे-कैसे आन्दोलन लड़े जा रहे थे। जैसे 60 के दशक में लोग आन्दोलन कर रहे थे - जमींदारी खत्म करने के लिये, मजदूरों के हक के लिये। लेकिन ये सब आन्दोलन कुचल दिये गये।

बस्तर में नक्सली और माओवादी क्या कर रहे हैं, क्यों लड़ रहे हैं? 

अरूंधति कहती है कि जो आज आपके साथ हो रहा है या होने जा रहा है वह आदिवासियों के साथ बहुत पहले से शुरू हो गया था। बस्तर में नक्सली और माओवादी क्या कर रहे हैं, क्यों लड़ रहे हैं?  वे लड़ रहे हैं क्योंकि वहां आदिवासियों की जमीन और उनके पहाड़ और नदियां बड़ी-बड़ी कम्पनियों को दिये जा रहे हैं। उनके घर जला दिये गये। उन्हें अपने ही गांवों से बाहर निकाल दिया गया। गांव के गांव खत्म कर दिये गये। जैसे नर्मदा की लड़ाई थी।

अब वे बड़े किसान के साथ भी वही खेल खेलने जा रहे हैं। आज इस आन्दोलन में देश का किसान भी शामिल है और मजदूर भी। इस आन्दोलन ने देश को एकता का अर्थ समझा दिया है।

वह कहती है कि इस सरकार को सिर्फ दो काम अच्छे से करने आते हैं -एक तो लोगों को बांटना और फिर बांट कर उन्हें कुचल देना। बहुत तरह की कोशिशें की जा रही हैं इस आन्दोलन को तोडऩे, बांटने और खरीदने की; लेकिन यह हो नहीं पायेगा।

सरकार ने तो साफ-साफ बता दिया है कि कानून वापस नहीं लिये जायेंगे और आपने भी साफ कर दिया है कि आप वापस नहीं जायेंगे। आगे क्या होगा, कैसे होगा - इसे हमें देखना होगा। लेकिन बहुत लोग आपके साथ हैं। यह लड़ाई सिर्फ किसानों की लड़ाई नहीं है।

वह तल्खी के साथ कहती है कि सरकार को अच्छा लगता है जब महिलायें, महिलाओं के लिये लड़ती हैं; दलित, दलितों के लिये लड़ते हैं;  किसान, किसानों के लिये लड़ते हैं; मजदूर, मजदूरों के लिये लड़ते हैं, जाट, जाटों के लिये लड़ते हैं। सरकार को अच्छा लगता है जब सब अपने-अपने कुंए में बैठकर कूदते हैं। लेकिन जब सब एक साथ हो जाते हैं तो उनके लिए बहुत बड़ा खतरा खड़ा हो जाता है।

उन्होंने आन्दोलनकारियों को बधाई देते हुये कहा कि उनके पास सिर्फ अम्बानी, अडानी या पतंजलि ही नहीं हैं बल्कि उनके पास इनसे भी ज्यादा खतरनाक चीज हैं और वह चीज है गोदी मीडिया।

अकेले अम्बानी के पास 27 मीडिया चैनल हैं। एनडीटीवी पर भी लोग सवाल उठा रहे हैं। वे भला हमें क्या खबर देंगे और क्या दिखाएंगे! मीडिया में सिर्फ और सिर्फ कोर्पोरेट का विज्ञापन है। वे हमें खबरें नहीं देंगे बल्कि हमें सिर्फ गालियां देंगे और अजीब-अजीब नाम देंगे। अब आप लोगों को भी समझ आ गया है कि आपके आन्दोलन में मीडिया का क्या रोल है। यह बहुत खतरनाक है। ऐसा मीडिया दुनिया में कहीं नहीं है। इस देश में चार सौ से ज्यादा चैनल हैं। जब देश में कोरोना आया तो इसी मीडिया ने मुसलमानों के साथ क्या-क्या नहीं किया? कितना झूठ बोला गया -कोरोना जिहाद, कोरोना जिहाद करके। अब आपके साथ भी वही काम शुरू करने की कोशिश की जा रही है। प्रचारित किया जा रहा है कि इतने लोग आ गये! बिना मास्क के आ गये!! कोरोना आ जाएगा!!!

यह सरकार जो भी कानून लाती है रात को ही लाती है। नोटबंदी आधी रात को, जीएसटी बिना बातचीत के, लॉकडाउन महज चार घंटे के नोटिस पर और किसानों के लिए जो कानून बनाये वे भी किसी से कोई बातचीत किये बिना बना दिये। किसी से भी कोई बातचीत नहीं की गई। पहले ऑर्डिनेंस ले आये अब कहते हैं चलो बातचीत कर लो। सारे  काम उलटे तरीकों से हो रहे हैं। बातचीत तो पहले होनी चाहिये थी।

सिंघु बॉर्डर में बेजवाड़ा विलसन से मुलाकात

10 जनवरी को सिंघु सीमा पर बेजवाड़ा विल्सन से मुलाकात हुई। उनसे बातचीत हुई। वे मानव अधिकार संगठन, सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) के संस्थापक और संयोजक में से एक हैं, जो मैनुअल स्कैवेंजिंग, निर्माण, संचालन और रोजगार के उन्मूलन के लिए अभियान चला रहे हैं। मैनुअल मैला ढ़ोने वाले जो 1993 से भारत में अवैध हैं। एसकेए में उनके काम, एक समुदाय द्वारा संचालित आंदोलन द्वारा मान्यता प्राप्त है जिसने उन्हें नामित किया है। 27 जुलाई 2016 को, उन्हें रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

यह खेती नहीं नई आजादी की लड़ाई है

आज देश का किसान केन्द्र की मोदी सरकार द्वारा थोपे गये तीन कृषि संबंधित काले कानून सहित कई मांगों को लेकर पिछले कई महीने से सडक़ों पर है। देश के करीब पांच सौ संगठनों ने संयुक्त किसान मोर्चा बनाकर 26 नवम्बर 2020 को दिल्ली कूच का आह्वान किया था, जिसके बाद लाखों किसानों ने 41 दिन से कडक़ड़ाती ठंड में दिल्ली के पांच बॉडर्स सिंधू, टीकरी, गाजीपुर, अटोहा-पलवल व शाहजहांपुर में अनिश्चितकालीन पड़ाव डाल रखा है। इसके साथ दूरदराज के राज्यों में जिला मुख्यालयों पर अनिश्चितकालीन धरना देकर किसान बैठे हैं, किसानों के आन्दोलन को देश भर के मजदूरों, युवाओं, छात्रों, छोटे व्यापारियों, वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और समाज के सभी तबकों का समर्थन मिल रहा है।

छत्तीसगढ़ में भी यह आन्दोलन जन आन्दोलन का रूप ले लिया है। कई दौर की वार्ता के बाद भी सरकार कार्पोरेट घरानों के दवाब में कानूनों को वापस लेने को तैयार नहीं हुई जैसा कि कृषि मंत्री के बयान से सिद्ध होता है कि कानून वापस होने पर कार्पोरेट घरानों का सरकार से विश्वास उठ जाएगा।

बताया जा रहा है कि कानून किसानों को मुक्त बाजार उपलब्ध करायेंगे, किसान अपना उत्पादन देश में कहीं भी बेच सकता है जहां अच्छा भाव मिले, परन्तु सच्चाई इसके उलट है क्या है ये काले कानून और कैसे इन कानूनों से न केवल किसान बिल की देश का मजदूर और आम उपभोक्ता प्रभावित होगा। एक दो वर्ष क्रूर मण्डी से ज्यादा रेट भी दे सकती है परन्तु धीरे-धीरे मण्डी बंद हो जाएगी और उसके बाद क्या होगा? पहला कानून कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य विधेयक 2020 में क्रूर यानि मण्डी व्यवस्था से बाहर एक खुली प्राईवेट मण्डी होगी जो वड़े-बड़ व्यापारियों का एकाधिकार होगा जो बाद में मनमर्जी के रेट पर किसानों का उत्पादन खरीदेंगे और गुणवत्ता की कमी निकाल कर खरीद से मना भी कर सकते हैं उन पर कोई नियंत्रण भी नहीं होगा। सरकारी खरीद बंद होने पर खाद्यान्न सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाएगी।

दूसरा विधयेक अर्थात कृषक मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा करार कानून 2020 -इसे आसान शब्दों में कान्ट्रेक्ट फार्मिंग या अनुबंध खेती कहेंगे। इसमें एक बड़ी कम्पनी किसानों के साथ करार करेगी जो अपनी पसंद की फसल उगाने के लिए कहेगी। बीज खाद कीटनाशक भी वही बेचेंगे और फसल का दाम भी पहले तय कर देंगे, तो इसमें दिक्कत क्या है? अगर मार्किट रेट करार से ज्यादा है। कम्पनी अपने करार रेट पर ही खरीद करेगी परंतु अगर मार्किट रेट गिर जाता है तो कम्पनी क्वालिटी का बहाना बनाकर आपकी फसल खरीद से मना कर देगी जिसके खिलाफ आप मुकदमा भी नहीं कर सकते, भविष्य क्या होगा कहना मुश्किल है।

तीसरा विधयेक आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून 2020'955 के अन्दर जमाखोरी रोकने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम बनाया गया था जिसके तहत खाद्यान्न की वस्तुओं का एक सीमा से ज्यादा भण्डारण नहीं हो सकता था, नया कानून इस सीमा को समाप्त कर देगा जिससे बड़े बड़े पूंजीपति सस्ता उत्पादन खरीद कर सीमा से बाहर भण्डारण करेंगे और बाजार में बनावटी कमी दिखाकर मनमर्जी के दामों पर बचेंगे। इन तीनों काले कृषि कानूनों से सिद्ध होता है कि केन्द्र की मोदी सरकार ने अम्बानी, अदानी जैसे पूंजीपतियों को देश की कृषि पर कब्जा कराने के लिये कोरोना काल का समय चुना, जिसकी तैयारी कानूनों को लाने से पहले ही हो चुकी थी तभी तो अदानी ने देश में 2780 स्थानों पर 100 से लेकर हजारों एकड़ तक गोदाम बनाने के लिए जमीन ली है और निर्माण भी शुरू हो चुका है। पानीपत जिले के नोलथा गांव में सौ एकड़ जमीन पर अडानी का निर्माणाधीन गोदाम इसका उदाहरण है।

जब 9 जनवारी को देशव्यापी किसान आंदोलन के समर्थन में छत्तीसगढ़ किसान पहुंचे उनसे लगातार पुलिस और गुप्तचर एजेंसी जानकारियां बटोरने में लगी रही। लेकिन सरकार इन्हें आंदोलन स्थल तक नहीं पहुंचने दे रही थी। ये सारे किसान सरकार के तीन काले कानूनों का विरोध कर रहे हैं। आपको विदित हो कि सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि किसानों को रोका ना जाये लेकिन पुलिस सुप्रीम कोर्ट की बात नहीं मान रही है। इसी दिन ‘नई मीडिया हाउस - द कोरस’ के लिऐ राष्ट्रव्यापी किसान आंदोलन के संयोजक शिव कुमार कक्का सहित कई किसान नेतृत्वकर्ताओं से किसान आंदोलन के भविष्य पर लंबी बातचीत की है। 

हिमांशु कुमार कहते हैं कि हरियाणा में सरकार ने इंटरनेट बंद किया हुआ है। बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। बैंकों का काम ठप है। बिजनेस ठप हो गया है। पूरा हरियाणा परेशान है। मोदी और अमित शाह दावा करते हैं कि हमने जो कदम उठाया है उससे जनता का बहुत भला हुआ है और जनता बहुत खुश है। लेकिन इंटरनेट बंद कर देते हैं ताकि जनता अपनी बात वीडियो या सोशल मीडिया के माध्यम से बाकी की जनता तक न पहुंचा सके। सरकार ने कहा है कि अगर एमएसपी की गारंटी कर दी गई तो 80 लाख करोड़ रुपए का बोझ पड़ेगा। अगर सरकार 80 लाख करोड़ रुपया खर्च करती है तो बदले में उसे अनाज भी तो मिलेगा और यह 80 लाख करोड़ रूपया किसानों मजदूरों गांव वालों की जेब में जाएगा। किसान उस पैसे को बाजार में खर्च करेगा तो उद्योग धंधे चल पड़ेंगे और रोजगार बढ़ेगा। सरकार की टैक्स से आमदनी भी बढ़ जाएगी। पता नहीं यह सरकार देश का सत्यानाश करने पर क्यों तुली हुई है।

किसान आंदोलन के पक्ष में एक अपील

31 जनवरी को किसान आंदोलन के पक्ष में एक अपील जारी हुई है। जिसमें लिखा है-हम गणतंत्र भारत के लेखक, आर्टिस्ट और विभिन्न कलाओं से जुड़े लोग पिछले दिनों हुई घटनाओं से अत्यंत क्षुब्ध हैं। भारत देश कभी विश्व में इसीलिए विश्व गुरु माना गया था क्योंकि यहां शास्त्रार्थ की परंपरा थी, अपने प्रतिव्दंव्दी को हमेशा रचनात्मक उत्कर्ष का प्रतीक माना गया था। किंतु इधर कुछ समय से देश में जो वातावरण बन रहा है वह कतई लोकतांत्रिक नहीं है। हम चाहते हैं कि कृषि कानूनों की गुणवत्ता पर दोबारा निर्मम विचार हो। किसानों की बात ससम्मान सुनी जाए और कानूनों को रद्द किया जाए। 

हम इस समय साधारण किसानों की दुर्दशा पर आप सबका ध्यान खींचना चाहते हैं, जो पिछले 2 महीने से दिल्ली के भिन्न बार्डरों पर कडक़ ठंड में बैठे हैं। प्राय: हर दिन उनके ट्राली-आश्रयों से औसतन 2 किसानों की लाशें निकल रही हैं। ये लाशें संवैधानिक रूप से शांतिपूर्ण अनशन कर रहे हमारे अपने लोगों की हैं, जिनके लिए शोक-संवेदना का एक भी शब्द किसी सरकारी पक्ष से नहीं आया है। 

लोकतंत्र में सरकार के बनाये कानूनों को अस्वीकार करने का अधिकार हमारा संविधान देता है और उसके विरुद्ध शांतिपूर्ण अनशन का भी। अनशन के लिए बैठना साधारण जन का मौलिक अधिकार है। आज हमारी युवा बेटियां, छात्राएं, बड़ी संख्या में इन मोर्चों में बैठी हुई हैं। इनमें से कई गंदगी से होने वाले मूत्र रोगों से ग्रसित होने के बाद भी आंदोलन में बने रहने के लिए प्रतिबद्ध हैं। ऐसे समाचार पिछले दिनों मीडिया ने दिखाए हैं। 

ऐसे असहनीय वातावरण में हम संवेदनशील सर्जक किस तरह सुकून से बैठ सकते हैं। प्रतिरोध की जमीन हमारी रचनात्मकता से कैसे वंचित रह सकती है। मानव गरिमा के इस यज्ञ में हम कलाकार, बौद्धिक इस सत्याग्रह में खुद को समर्पित करते सरकार से अनुरोध करते हैं कि वह हठ त्यागे व अपने देशवासियों की पीड़ा समझे। 

जाने माने पत्रकार उर्मिलेश लिखते हैं कि आज विद्रोही को पढ़ते हुए मुझे बार-बार वह गाजीपुर, टिकरी या सिंघू बार्डर के विशाल किसान-धरने में कविताएं कहते नजर आ रहे थे। एक धरने से दूसरे धरने की तरफ जाते विद्रोही, किसी ट्रैक्टर या ट्राली पर बैठकर कविता सुनाते विद्रोही! विद्रोही जिंदा हैं, अपनी कविताओं में, संघर्ष और प्रतिरोध की हर आवाज में और लोगों के दिलो-दिमाग में! 

दोनों संकलनों में पहली कविता है-नयी खेती। छोटी सी कविता है, आप भी पढिय़े। पहले से पढ़ी हो तो फिर पढ़ लीजिये. कविता यहां पेश है-


मैं किसान हूं /आसमान में धान बो रहा हूं /कुछ लोग कह रहे हैं /कि पगले आसमान में धान नहीं जमता/मैं कहता हूँ कि/गेगले-गोगले/अगर जमीन पर भगवान जम सकता है/तो आसमान में धान भी जम सकता है/और अब तो/दोनों में एक होकर रहेगा-या तो जमीन से भगवान उखड़ेगा/या आसमान में धान जमेगा।

सयुंक्त किसान मोर्चा प्रेस नोट

68वां दिन, 31 जनवरी 2021 को डॉ. दर्शन पाल के नाम से एक प्रेस नोट जारी हुआ है। जिसमें सयुंक्त किसान मोर्चा ने गणतंत्र दिवस की परेड के बाद सौ से अधिक व्यक्तियों के लापता होने की सूचना के बारे में गहरी चिंता जताई है। अब ऐसे लापता व्यक्तियों के बारे में जानकारी संकलित करने की कोशिश की जा रही है, जिसके बाद अधिकारियों के साथ औपचारिक कार्रवाई की जाएगी। इसके बाबत एक कमेटी का गठन किया गया है जिसमे प्रेम सिंह भंगू, राजिंदर सिंह दीप सिंह वाला, अवतार सिंह, किरणजीत सिंह सेखों व बलजीत सिंह शामिल है। लापता व्यक्ति के बारे में कोई भी जानकारी 8198022033 पर लापता व्यक्ति का पूरा नाम, पूरा पता, फोन नंबर और घर का कोई अन्य संपर्क और कब से गायब है, साझा किया जाएं।

संयुक्त किसान मोर्चा ने मनदीप पुनिया और अन्य जैसे पत्रकारों की गिरफ्तारी की निंदा की। झूठे और मनगढ़ंत आरोपों की आड़ में अपनी वास्तविक साजिश को दबाने और किसानों में डर पैदा करने के प्रयासों को किसानों ने अपनी बढ़ती ताकत से जवाब दिया।

सयुंक्त किसान मोर्चा ने विभिन्न विरोध स्थलों की इंटरनेट सेवाओं को काटने के लिए किसानों के आंदोलन पर सरकार के हमले की भी निंदा की।  सरकार नहीं चाहती कि वास्तविक तथ्य किसानों और सामान्य जनता तक पहुंचें, न ही उनका शांतिपूर्ण आचरण दुनिया तक पहुंचे। सरकार किसानों के चारों ओर अपना झूठ फैलाना चाहती है।  यह विभिन्न धरना स्थलों पर किसान यूनियनों के समन्वित कार्य से भी डरती है और उनके बीच संचार साधनों में कटौती करने की कोशिश कर रही है।  यह अलोकतांत्रिक और अवैध है।

मोर्चा के नेताओ ने सिंधु बॉर्डर व अन्य धरना स्थलों तक पहुंचने से आम लोगों और मीडिया कर्मियों को रोकने के लिए लंबी दूरी से विरोध स्थलों की घेराबंदी पर सवाल उठाया। भोजन और पानी जैसी बुनियादी आपूर्ति को भी बाधित किया जा रहा है। सरकार के इन सभी हमलों की हम निंदा करते है। पुलिस और सरकार द्वारा हिंसा के कई प्रयासों के बावजूद, किसान अभी भी तीन कृषि कानूनों और एमएसपी पर बहस कर रहे हैं।  हम सभी जागरूक नागरिकों को स्पष्ट करना चाहते हैं कि दिल्ली मोर्चा सुरक्षित और शांतिपूर्ण है।

बड़े ही खेद के साथ महाराष्ट्र के एक और प्रदर्शनकारी की मौत की दुखद खबर को साझा कर रहे है, जिन्होंने शाहजहांपुर संघर्ष में भाग लिया। शायरा पवार सिर्फ 21 साल की थीं। उनके बलिदान को याद रखा जाएगा और व्यर्थ नहीं जाएगा।

कल घोषित किए गए सद्भावना दिवस को देश भर में और मध्य प्रदेश में रीवा, मंदसौर, इंदौर, ग्वालियर, झाबुआ और अन्य स्थानों पर व्यापक रूप से समर्थन मिला। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के शिक्षक गणों और शोधार्थियों ने भी किसानों के समर्थन में एक दिन का उपवास रखा। राजस्थान और हरियाणा से बड़ी संख्या में किसान शाहजहांपुर मोर्चे पर पहुंच रहे हैं। मोर्चा दिन पर दिन मजबूत होता जा रहा है। प्रदर्शनकारी किसानों के नए समूह सिंघू बॉर्डर और टिकरी बॉर्डर पर भी पहुंच गए हैं, जबकि गाजीपुर विरोध स्थल भी प्रतिदिन मजबूत हो रहा है।

एक पत्रकार पर हमला जनता की आवाज़ पर हमला है। 

रवीश कुमार लिखते हैं कि अब लगता है सरकार इन पत्रकारों को भी मुक़दमों और पूछताछ से डरा कर ख़त्म करना चाहती है। यह बेहद चिन्ताजनक है। बात बात में एफआइआर के ज़रिए पत्रकारिता की बची खुची जगह भी ख़त्म हो जाएगी। जिस तरह से स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पूनिया और धर्मेंद्र को पूछताछ के लिए उठाया गया उसकी निंदा की जानी चाहिए। आम लोगों को यह समझना चाहिए कि क्या वे अपनी आवाज के हर दरवाजे को इस तरह से बंद होते देखना चाहेंगे? एक पत्रकार पर हमला जनता की आवाज पर हमला है। जनता से अनुरोध है कि इसका संज्ञान लें और विरोध करे। मनदीप को तुरंत रिहा किया जाना चाहिए। 

राजीव ध्यानी लिखते हैं कि शुरु में राकेश टिकैत को किसान आंदोलन में सबसे कमजोर कड़ी माना जा रहा था, और ऐसा मानने के पर्याप्त कारण भी थे। लेकिन आज समय और संयोग उनके साथ है। सच्चाई के आंसुओं ने बाबा टिकैत के बेटे को अचानक बहुत ऊपर खड़ा कर दिया है। स्थितियां पूरी तरह से अनुकूल हैं। संयुक्त किसान मोर्चा और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के रूप में देश के सैकड़ों ताकतवर किसान संगठन एक साथ हैं। लाखों किसान संकल्पबद्ध होकर दिल्ली की सीमाओं पर टिके हुए हैं। योगेन्द्र यादव,  हन्नान मोल्ला, दर्शन पाल, उगराहां और राजेवाल जैसे सुलझे हुए नेता नेतृत्व कर रहे हैं। लालकिले की सरकारी साजिश का पर्दाफाश हो चुका है, और इससे विचलित हुए किसान भी वापस आ रहे हैं। बल्कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों की नई ताकत भी साथ जुडऩे लगी है। 

साल 2005 आपको याद होगा छत्तीसगढ़ से ‘सलवा जुडूम’ की भयावह तस्वीरें और ब्यौरे सामने आने लगे थे, तो जन-पक्षधर लोगों के दिल कांप उठे थे। उस वक्त 600 गांव जला दिये गये थे। नागा जैसी सुरक्षा बल आदिवासियों का कत्लेआम कर रहा था। डेढ़ लाख से ज्यादा आदिवासी आंध्र - छत्तीसगढ़ के सीमाओं में धकेल दिये गये थे। जो लौटे उन गांवों को फर्जी मुठभेड़ों का सामना करना पड़ा। लगभग 350 गांवों के हजारों आदिवासियों को जबरदस्ती सडक़ों पर लाकर उन्हें एक तरह से कैद कर लिया गया था। उद्देश्य था कि ग्रामीण आदिवासियों को नक्सलवादियों से अलग कर दिया जाये। 

आज दिल्ली में किसान-आंदोलन को कीलों, कंटीले तारों, खाइयों, बैरिकेट्स, से जिस तरह से घेरा जा रहा है, उसका उद्देश्य भी यही है कि आंदोलनकारियों को अलग-थलग कर दिया जाये। आज दिल्ली में किसान आंदोलन के साथ जो कुछ हो रहा है, वह बहुत पहले नागालैंड, मणिपुर, कश्मीर, छत्तीसगढ़-झारखंड में आजमाया जा चुका है। लेकिन वह सब रात के अंधेरे में मीडिया से बचाकर किया जाता था। सरकार की तरफ से नकाबपोश गुंडे भी रात के अंधेरे में आते थे। लेकिन आश्चर्य यह है कि दिल्ली में यह सब खुलेआम राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने हो रहा है। नकाबपोश गुंडे अब दिन के उजाले में बिना नकाब के ट्वीटर - फेसबुक पर एलान करके पुलिस के संरक्षण में आंदोलनकारियों पर हमले कर रहे है। पुलिस ही अब अपना ड्रेस बदल कर स्टूडियो से आंदोलन की रिपोर्टिंग कर रही है। यह एक प्रतीक है कि अब सत्ता को किसी नकाब की जरूरत नही है। जनता के सामने अब वह एकदम नंगी है।

आंदोलन की राहों पर खुलेआम नुकीली कीले बिछाना इसी का प्रतीक है। लेकिन यह तो वक्त ही बताएगा कि ये कील किसके ताबूत का आखिरी कील साबित होंगी। नागरिकता कानून के विरोध के बाद सरकार अराजक हो गई है। दिल्ली दंगों  से पहले केन्द्र की सरकार और उनकी पार्टी लोकतांत्रिक ताकतों को कुचलने अपने आप को मजबूत करते जा रहे हैं। ये जहां भी जाते हैं देशभक्ति के नारे लगाते हैं और पुलिस और तिरंगे की आड़ में अपना झंडा नहीं दिखलाते हैं। पहले गाजीपुर, टिकरी और उसके बाद सिंघु में इन्होंने हद कर दी है। इंटरनेट, पानी, बिजली बंद किया जा रहा है। सडक़ों पर किलों की खेती हो रही है। खतरनाक प्लान के तहत दिल्ली के लोगों से प्रदर्शनकारियों को अलग-थलग करने की कोशिश हो रही है। किसानों के खिलाफ उग्रता को बढ़ावा दिया जा रहा है। राकेश टिकैत के आंसू और बिजनौर (उत्तरप्रदेश) जैसे जगहों में महापंचायतों और खाप का आ जुडऩा शासनकर्ती जमात की परेशानी बढ़ा दी है। नवरीत सिंह का परिवार दिल्ली के आईटीओ में ट्रेक्टर पलटने से मौत को पचा नहीं पा रहा है। सरकार पर आरोप है कि वह आंदोलन में तोडफ़ोड़ और आगजनी कर युवाओं को उकसाकर उन्हें पकड़ कर गायब करते जा रहे हैं।

29 को मुजफ्फरनगर में महापंचायत की घोषणा से ये बौखला गये हैं। लोनी का विधायक नंदकिशोर गुर्जर सूट करने, जूते मारकर अपमानित करने के लिये गृहमंत्री से दरख्वास्त कर रहे हैं। योगेन्द्र यादव के घर के बाहर दिल्ली के गद्दारों को गोली मारों के नारे लगाये जा रहे हैं। मनदीप पुनिया को गिरफ्तार किया गया। उनके कैमरा को तोड़ दिया गया। धमेन्द्र और मनदीप के मोबाइल के सारे वीडियों को जानकारियों को डिलीट कर दिया गया है। राजदीप सरदेसाई, मृणाल पांडेय, सिद्धार्थ वद्र्यराजन, जफर आगा, परेशनाथ, अनंतनाथ, विनोद के जोस पर राजद्रोह के मामले लगा दिये गये हैं। 

लिहाजा किसान अपनी जान की बाजी लगाकर पूरी मजबूती के साथ डटे हुए हैं। उनकी मदद के लिए समाज के कई तबकों से मदद के हाथ बढ़ रहे हैं। कहीं किसान मॉल खुला है तो कहीं रूके कृषि को गति मिल रही है। नौजवान सोशल मीडिया जैसे आधुनिक वैकल्पिक तकनीकों का उपयोग कर आंदोलन को गति दे  रहे हैं। उन्हें सही राह दिखाने के लिये अनुभवी नेतृत्वकर्ता भी साथ हैं। महिलाएं, बच्चे, युव-युवतियां सब अपनी-अपनी तरह से इस अभूतपूर्व आंदोलन में योगदान दे रहे हैं। किसान आंदोलन की खबरों को सही समय पर लाने के लिये ‘ट्रॉली टाइम्स’ जैसे अखबार संचालित हैं।

सभी गतिरोध के बाद भी आंदोलन टिके रहता है तो समझिये लोकतंत्र जिंदा है। ‘ट्रॉली टाइम्स’ भाग - पांच हाथ लगा है जिसमें मुकेश कुलरिया, नवनीत पहल, आदित्य वकील हाकम सिंह पुरूषोत्तम शर्मा के खबर लगे हैं साथ ही गोरख पांडेय और गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताएं हैं। यह अखबार गुरूमुखी और हिन्दी में प्रकाशित हो रहा है। और आगे भी भरोसा करना चाहिए कि किसानों की जायज मांगों के सामने अलोकतांत्रिक सरकारें झुकेंगी। कड़ाके की ठंड के बीच हम सभी लौट आये हैं। तमाम कुर्बानियों, गिरफ्तारियों, लापता, दमन और बाधाओं के बीच ऐसा क्या हुआ कि हम हजारों किलोमीटर दूर से एक-एक चीज देख पा रहे हैं कि क्या कुछ हो रहा है या फिर होगा?


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