क्या अकूत पूंजी का संचय एक नए विश्व युद्ध को जन्म देगा?

सुशान्त कुमार

 

ऑक्सफैम के रिपोर्ट ने साबित कर दिया है कि पूंजीवादी व्यवस्था खत्म नहीं हुई है और किसी न किसी रूप में समतामूलक समाजवादी संघर्ष के रास्ते इस आंकड़ों के साथ नई इतिहास लिखने तत्पर है। पूंजी पर आधारित कथित वैश्विक व्यवस्था धर्म, जाति, रंग, नस्ल, बच्चों व महिलाओं के खिलाफ अपना साम्राज्य मजबूती के साथ स्थापित कर रखा है।

ऑक्सफैम की ताजा रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ 8 लोगों  बिल गेट्स अमरीका, माइक्रोसॉफ्ट सह-संस्थापक, (75अरब डॉलर) एमैन्सियोग ऑर्टेगा, स्पेन, इंडाइटेक्स,(67 अरब डॉलर) वॉरेन बफेट, अमेरिका, बर्कशायर हैथवे, (61 अरब डॉलर) कार्लोस स्लिम, मैक्सिको, ग्रुपो कार्सो के मालिक, (50 अरब डॉलर) जेफ बेजोस, अमेरिका अमैजन संस्थापक, (45.2 अरब डॉलर) मार्क जुकरबर्ग, अमरीका, फेसबुक सह-संस्थापक, (45 अरब डॉलर) लैरी एलिसन, अमेरिका, ओरैकल, सह-संस्थापक, (44 अरब डॉलर) माइकल ब्लूमबर्ग,अमेरिका, ब्लूमर्ग के मालिक (40 अरब डॉलर)। मुकेश अंबानी (19.3 अरब डॉलर), दिलीप संघवी (16.7 अरब डॉलर), अजीम प्रेमजी (15 अरब डॉलर)। इस रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ 8 लोगों के पास 421 अरब डॉलर की संपत्ति है।

इनमें अमरीका के 6, स्पेन व मैक्सिको के 1' उद्योगपति शामिल हैं। 
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सालाना बैठक के पहले ऑक्सफैम ने कहा, धन की खाई पहले से कहीं ज्यादा व्यापक हुई है। इसी तरह भारत में 8 प्रतिशत दौलत सिर्फ एक प्रतिशत लोगों के पास है। भारत में 57 अरबपतियों के पास 216 अरब डॉलर की संपत्ति है। यह नीचे के 70 प्रतिशत लोगों की कुल संपत्ति के बराबर है। देश में 84 अरबपति के पास 248 अरब डॉलर की संपत्ति है। 2,557 खरब डॉलर हैै पूरी दुनिया की संपत्ति और 3.1 खरब डॉलर की संपत्ति भारत के पास।

421 अरब डॉलर की संपत्ति है 8 धनकुबेरों के पास। पिछले साल ऑक्सफैम की रिपोर्ट में कहा गया था कि 62 लोगों के पास दुनिया की आधी आबादी के बराबर दौलत है। अगर सिर्फ अरबपतियों की बात करें तो भारत के 57 बिलेनियर्स के पास 14 लाख 72 हजार करोड़ रु. (21 हजार 600 करोड़ डॉलर) की संपत्ति है। इतनी वेल्थ देश की 70 फीसदी आबादी के पास है।

उपरोक्त सभी आंकड़े चौंकाने वाले है इसलिए भी कि भारत सहित दुनिया को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी, पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक दुनिया बनाने के कार्य आज भी अधूरे है। कुछ लोगों के द्वारा दान दे देने से गरीबी दूर नहीं हो जाती है। जब तक उत्पादन के संबंध और साधन पीडि़तों के हाथ में नहीं आ जाता यह संभव भी नहीं है। जल्द ही दुनिया की एक प्रतिशत आबादी के पास विश्व की कुल संपत्ति का 50 फीसदी होगा। दूसरी ओर, पहले से ही गरीब दुनिया की करीब आधी आबादी की संपत्ति लगातार घट रही है।

यह नतीजे उस सिद्धांत को झुठलाते हैं जिसका कहना है कि आर्थिक विकास न सिर्फ धनी लोगों को फायदा पहुंचाता है बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था में मेहनत के रूप में लगे गरीब लोगों के सामने श्वांग रचता है और यह भी कि कर्म की इच्छा मत करो इस उक्ति को धत्ता बताता है और गरीबी पूर्व जन्म का पाप पर सवाल उठाते हैं।

ऑक्सफैम ने इस तथ्य पर भी जोर दिया है कि 2008 के विश्व बैंकिंग संकट के बाद के सालों में आम लोगों के चुकाए गए टैक्स की मदद से ही विश्व की वित्तीय व्यवस्था को ढहने से बचाया जा सका था। लेकिन उसके बाद भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने उत्पादकता से हुए फायदे को मेहनतकशों तक पहुंचाने में  रूचि नहीं दिखाई है। और विशेषज्ञों की माने तो अब भारत में नोटबंदी देश की आर्थिक हालात को बिगाडऩे आगे बढ़ गई है। 

दावोस में जमा होने वाले विश्व नेता, जो अपने साथ अमीरों और विख्यात लोगों का हुजूम लेकर आएगा शायद फिर वही करेंगे जो वे कई सालों से करते आ रहे हैं। वे फिर मीडिया के लिए गंभीर बयान देंगे और अमीरों और गरीबों के अंतर को मिटाने के लिए कोई अर्थपूर्ण कदम उठाने के बजाए इसे मानवजाति के सामने खड़ी गंभीर समस्याओं में से एक बता कर अपना कर्तव्य पूरा समझेंगे। गरीबी दूर करने के ऑक्सफेम और यूएनओ के सतत विकास के उपाय को अमल में लाएगा? एक तरफ पूंजी का भूमंडलीकरण हुआ है तो दूसरी तरफ तमाम देश राष्ट्र-राज्यों में बंटे हुए हैं।

अब तो दुनिया भर में अंधराष्ट्र्र्रवाद की नई बयार भी चल पड़ी है, इधर विभिन्न देशों के बीच और खुद उनके अंदर आर्थिक विषमता की खाई बढ़ती ही जा रही है। 
चर्चित फ्रांसीसी अर्थशास्त्री टॉमस पिकेट्टी अपनी किताब ‘कैपिटल इन द ट्वेंटी फस्र्ट सेंचुरी’ में इसी बात को रेखांकित करते  हैं कि कैसे 1970 के दशक के बाद से आर्थिक विषमता लगातार बढ़ती जा रही है।

पिछले साल ऑक्सफैम ने यह अनुमान लगाया था कि 2016 तक दुनिया की आधी संपत्ति पर एक प्रतिशत लोगों का कब्जा हो जाएगा। इस साल ऑक्सफैम की रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया के 62 सबसे अमीर व्यक्तियों के पास इतनी दौलत है, जितनी इस धरती पर मौजूद आबादी के आधे सबसे गरीब यानी तीन अरब लोगों के पास भी नहीं है।

भारत में भी करीब एक प्रतिशत लोगों का मुल्क की आधी दौलत पर कब्जा है। यकीनन असमानताएं बहुत तेजी से बढ़ रही हैं, भारत जैसे देशों में जहां भुखमरी, बेरोजगारी और कुपोषण की दर बहुत अधिक है, इसको लेकर शर्मिंदिगी होनी चाहिए, लेकिन इसके उलट खोखले विकास गौरवगीत गाए जा रहे हैं, जिस पर हमसे देशभक्ति की उम्मीद भी की जाती है।

लेकिन बात सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, भारत के आंकड़ों को माने तो चंद लोगों के 6 लाख करोड़ रुपए एनपीए के बहाने माफ कर दिए गए, है, जबकि वास्तविक आंकड़े इससे भी कई गुना ज्यादा बताया जा रहा है। 
भूमंडलीकरण के बाद उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों को सभी मर्जों की एकमात्र इलाज के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन मुनाफे के तर्क पर टिकी यह व्यवस्था लोगों के बड़े हिस्से को लगातार आर्थिक संसाधनों से वंचित करती जा रही है।

भारत जैसे देशों को यह समझना होगा कि विकास का मतलब केवल जीडीपी में उछाल नहीं है, असली और टिकाऊ विकास तब होगा, जब समाज के सभी वर्गों का समान विकास हो और उन्हें बराबर का अवसर मिले या कम से कम हम एक ऐसा देश और समाज बना सकें, जहां सभी को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सुरक्षित माहौल में सांस ले सकें।

ऑक्सफैम का यह रिपोर्ट ब्रिटेन सहित तमाम धनी देशों को आईना दिखाता है कि व्यक्ति की गरिमा और बराबरी के साथ विश्व में शांति पूंजी के संचय से संभव नहीं है। क्या हम अपेक्षा कर सकते हैं कि विश्व के नेता इन सूचकों को समझेंगे? क्या इस दलील पर ध्यान होगा कि गरीबी आतंकवाद की कुंजी है और इसलिए भी दुनिया में शांति और लोकतंत्र के स्थापना में बातचीत गरीबी से लडऩे के बारे में हो?

उत्तम कुमार के फेसबुक, 17 जनवरी 2017 से प्रकाशित 

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