वर्दी के रौब और खौफ मानवाधिकार के उल्लंघन के साथ कायम

सुशान्त कुमार

 

बेंगलुरु में नए साल के जश्न के दौरान छेडख़ानी को लेकर पूरे देश में हो-हल्ला मचा हुआ है और दिल्ली में भी इसी तरह की वारदात को लेकर विरोध के स्वर टीवी पर देखा जा रहा है, ठीक ऐसे समय में छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासी लड़कियों के साथ एक साल पहले सुरक्षाबलों द्वारा सामूहिक बलात्कार, यौन हिंसा और शारीरिक प्रताडऩा की पुष्टि करती राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट पर उठते आवाज को दबा कौन रहा है?

आदिवासी महिलाओं के साथ और वह भी सुरक्षाबलों द्वारा किए सामूहिक बलात्कार को भला कोई ‘देशभक्त’ कैसे स्वीकार कर सकता है। वह भी तब, जब सुरक्षाबल नक्सलियों के सफाए के पुनीत कार्य में लगे हो। ऐसे समय में मुख्यमंत्री का यह बयान कि जिले में वर्दी के रौब और खौफ होना चाहिए, लेकिन नक्सल इलाकों में मनावाधिकार का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दूसरा बयान रामसेवक पैकरा का है उन्होंने दावा किया है कि सरकार बस्तर में आदिवासियों की सुरक्षा के लिए सजग है। आदिवासियों के साथ अपमानजनक व्यवहार और कानून के खिलाफ जो भी काम करेगा, चाहे वह पुलिसकर्मी ही क्यों न हो, उसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह बयान जमीनी स्तर पर अर्थहीन और आदिवासियों और दलितों पर गंभीर वारदातों पर चुप्पी साधे रहने को जाहिर करता है ऐसे बयान निश्चित रूप से दोषी पुलिस अधिकारियों को शाबाशी और संरक्षण प्रदान करता है।

छत्तीसगढ़ में वर्तमान शासन व्यवस्था कमोवेश दमन और अत्याचार पर केंद्रित हो मनमानी पर उतर आई है। आजाद भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की इतनी अवहेलना शायद ही कभी हुई हो। यहां नागरिकों के संविधान सम्मत अधिकारों का दमन अब रोजमर्रा की दिनचर्या बन गई है। खनिज सम्पदा से भरपूर छत्तीसगढ़ के वर्ष 2000 में अलग राज्य बन जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वर्ष 2007 में यहां पुलिस अधिनियम पारित किया। देश में पुलिस सुधार पर कार्यरत एक संगठन, सीएचआरआई (कॉमन वेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशियेटिव) ने यह निष्कर्ष निकाला कि 1851 के पुलिस अधिनियम का स्थान लेने वाला यह नया कानून पुराने से भी गया बीता है और इसके तहत पुलिस पर निगरानी व पुलिस की जवाबदेही पहले से भी कम हो गई है।

आंतरिक मामले के सबसे खतरनाक कहे जाने वाले इस क्षेत्र में 2007 में 60,279 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी वहीं वर्ष 2014 में इस राज्य में 7,39,435 लोगों के खिलाफ पुलिस कार्यवाही की गई अर्थात पहले की अपेक्षा 12 गुना अधिक लोग पुलिस की गिरफ्त में आए। इनमें से 1,44,017 लोगों के खिलाफ जमानती वांरट जारी हुए। 81,329 को गैर-जमानती वारंटों पर जेल में डाल दिया गया और 4,88,366 लोगों को पूछताछ के लिए थाने बुलाया गया। (राष्ट्रीय अपराध शोध ब्यूरो की रिपोर्ट 2008'4) वर्ष 2007 से राज्य में पुलिस गतिविधियां असामान्य रूप से बढ़ी हैं। इस तरह देश की अन्य राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ की जेलें ठसा-ठस भरी हुई हैं।

राज्य पुलिस पर औरतों के साथ यौन हिंसा करने के सबसे घिनौने आरोप हैं। ऐसे आरोप वर्ष 1980 में उत्तरप्रदेश के माया त्यागी मामले की याद दिलाते हैं। गौरतलब है 2009 में सोनी सोरी को गिरफ्तार करके हिरासत में घिनौनी यातनाएं दी गई। जमानत के लिए उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी लगानी पड़ी। भारतीय नागरिक यह जानकर व्यथित हुए थे कि सोनी सोरी की अपील सच थी व उसके गुप्तागों में पत्थर पाए गए। यह बड़े शर्म की बात है कि यातना देने वाले पुलिस अफसर को राष्ट्रपति का बहादुरी का पदक मिला। सोनी सोरी के साथ अमानवीय अत्याचार का देश-विदेश में विरोध किया गया था। जब इससे भी मान नहीं भरा तो उन्हें सबक सिखाने के लिए उनके चेहरे पर तेजाब फेंक दिया गया था। उनका कसूर यह था कि वह पीडि़त आदिवासियों महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए उनके साथ खड़ी होती थीं। मीना खलको और मडक़म हिड़मे के मामले भी सुर्खियां बने। मडक़म मामलें में ग्राम वालों के बयान लिए गए, जिससे स्पष्ट है कि बीमार अवस्था में घर पर सोई हुई मडक़म हिडमे को घर से जोर जबदस्ती डराकर जबरन घसीटते हुए जंगल ले जाकर बलात्कार पश्चात उनके शरीर के अंगों को काटा गया, वह घटना वीभत्स व मानवता पर कलंक थी कि मरने के बाद पुलिस बल ने उसे ड्रेस पहनाकर फोटो खींचा और नक्सली मुठभेड़ का रूप देते हुए दिखाया गया है। इन तथाकथित ‘देशभक्त’ पुलिसकर्मियों पर इस तरह के गंभीर आरोप लगे। यह कुछ मामले हैं। ऐसे अनगिनत मामले बस्तर में आए दिन होते रहते हैं। लेकिन कार्रवाई है कि किसी पर होती नहीं है। आदिवासी महिलाओं के लिए निर्भया मामले जैसे लोग सडक़ों पर क्यों नहीं उतरते? बलात्कार के आरोपी सरकारी संरक्षण प्राप्त हैं क्योंकि वे इन्हें सरकारी भाषा में या तो नक्सली कहते हैं या फिर उनको शरण देनेवाले सहयोगी।

इसी प्रकार बीजापुर जिले के सारकेगुडा के आदिवासी बीजपंडूम मनाने के लिए एकत्रित हुए लोगों के ऊपर अंधाधुंध गोली चलाकर तीन नाबालिक बच्चों सहित सत्रह लोगों को मार दिया गया । ऐसा ही झलियामेड़ी में लोग मारे गए। ऐसे अनगिनत लोगों की खून से बस्तर सहित छत्तीसगढ़ पुलिस का हाथ रंगा हुआ है। संभाग में पुलिसिया दमन से आदिवासी पलायन करने को मजबूर हैं और हजारों की संख्या में पलायन कर चुके हैं, जिससे कई गांव वीरान हो चुके हैं । जितने आदिवासी रह रहे हैं, उन्हे नक्सली बताकर फर्जी समर्पण एवं नक्सली घोषित कर जेल भेजा जा रहा है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासियों के ऊपर हो रहे अन्याय,अत्याचार के खिलाफ जो भी आवाज उठाएगा, उस आवाज को सरकार कुचल देना चाहती है। बस्तर में अभी वर्तमान में सोनी सोरी के ऊपर हुए हमले से यह साबित होता है की बस्तर में काम कर रहे पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और वकीलों जो निशुल्क कानूनी लड़ाई लड़ रहे है सब पुलिस के दुश्मन है, वो ये समझते है की नक्सल उन्मूलन के कार्य में ये हमारी सच्चाई बया करा डालते हैं। वो हर उस झूट को बेनकाब कर डालते हैं जो प्रायोजित नक्सल उन्मूलन के नाम पर रची जाती है। इस तरह वे लोकतंत्र के सभी तंत्रों को कुचल देना चाहते हैं।

पुलिस के महकमे से आखिर मालिनी, संतोष यादव व सोमारू नाग के लिखने से पुलिसिया अधिकारियो को दिक्कत क्या था ? क्या वो जो मिशन 2016 के नाम पर लगातार आत्मसमर्पण और मुठभेड़ो की घटनाएं एक झूट है, जिसकी पोल न खुल जाए इसके चलते पत्रकार मालिनी को प्रताडि़त कर उसके साथ धमकी चमकी किया जाता है की वह बस्तर में चल रहे सरकार के नक्सल उन्मूलन के नाम पर खूनी मंजर को लिख न सके। हां पुलिस ने उसे प्रताडि़त किया है, और जिन लोगों ने उनके घर पर हमला किया उसको भी पुलिस का पोषक ही माना जाता है। बाकी के दो पत्रकार पुलिस से सहयोग न करने के कारण झूठे मामलों में पहले से ही जेल में बंद हैं। देशभर के 160 पत्रकारों ने इनकी रिहाई के साथ ही प्रभारी पुलिस अफसर के खिलाफ कार्यवाही की भी मांग की है।

मैदानी क्षेत्र जांजगीर-चांपा के मुलमुला में सतीश नोर्गे की पुलिस हिरासत में मौत छत्तीसगढ़ में दलितों पर हो रहे अत्याचार का सुबूत है। मृत सतीश का पुत्र राहुल नोर्गे कहता है कि 17 सितंबर के दिन पुलिस स्टेशन में पुलिस उसके पिता की मौत के लिए पीट रही है। सतीश की हत्या के बाद सतनामी समाज कई बैठकें आयोजित कर चुका है। अब अन्य दलित एकजुट हो रहे हैं। देवी दुर्गा के ऊपर एक फेसबुक पोस्ट को लेकर राजनांदगांव में व्यवसायी विवेक कुमार सिंह तथा मुुंगेली जिले के सतनामी नेता विकास खांडेकर को गिरफ्तार किया और इस मामले ने भी दलितों को उद्वेलित किया है।

छत्तीसगढ़ राज्य दलितों पर अत्याचार के मामले में सबसे आगे है। नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति एक लाख दलित आबादी के खिलाफ अपराध की राष्ट्रीय दर 22.3 है, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 31.4 है. देशभर में दलितों के खिलाफ आगजनी के कुल 179 मामले 2015 में दर्ज किए गए और छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा सबसे उपर है। राष्ट्रीय दर देखें तो यह 0.1 है। लेकिन छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 43 और दर कहीं अधिक 0.3 है। वहीं आदिवासियों के खिलाफ अपराध की दर छत्तीसगढ़ में 19.4 है। राष्ट्रीय स्तर पर यह दर 10.5 है। 2015 के यह आंकड़े एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट में सामने आए हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार आदिवासियों के खिलाफ बलात्कार के मामले में छत्तीसगढ़ देश में दूसरे नंबर पर है, जबकि पहले नंबर पर पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश है। 2015 में आदिवासियों पर बलात्कार के 952 मामले दर्ज किए गए, जिनमें मध्य प्रदेश में 359, छत्तीसगढ़ में 138, महाराष्ट्र में 99, ओडिशा में 94, राजस्थान में 80, केरल में 47, तेलंगाना और गुजरात में 44, तथा आंध्रप्रदेश में 21 बलात्कार के मामले शामिल हैं।

सीबीआई का दावा है कि मार्च 2011 में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के ताड़मेटला गांव में पुलिस और अर्धसैनिक ने 160 घरों को आग लगा दी थी और इसका सारा ठीकरा नक्सलियों के सिर फोड़ दिया था। 5 साल बाद सीबीआई ने इस बात का खुलासा किया है। सुप्रीम कोर्ट ने पांच जुलाई 2011 को मामला सीबीआई को सौंपा था। सीबीआई ने सलवा-जुडूम नेता तथा एसपीओ के 35 लोगों पर विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। कोर्ट से पीडि़तों को मुआवजा देने का भी आदेश दिया है। ताड़मेटला, तिम्मापुर और मोरपल्ली गांवों में 11 से 16 मार्च 2011 के बीच फोर्स के जवानों ने गश्त की थी। बताया जाता है इसी दौरान इन तीनों गांवों को पूरी तरह आग के हवाले कर दिया गया था। याचिकाकर्ता नंदिनी सुंदर ने कहा कि सीबीआई जांच से पुलिस के झूठ का पर्दाफाश हो गया है।

पुलिस राज उस इलाके को कहते हैं जहां नागरिकों का जीवन, उनकी आवजाही, राय जाहिर कर पाना और रह पाना सभी पुलिस के नियंत्रण व निगरानी में होता है। वैसे भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सिर्फ सिफारिश ही कर सकता है और उसके आधार पर कार्रवाई करने की कोई बाध्यता नहीं है। आदिवासी जंगल और जमीन की रक्षा के लिए आवाज उठाते रहते हैं। सरकार विकास के नाम पर आदिवासियों से जंगल और जमीन छीनती रहती है। सरकार चाहती है कि इसमें किसी तरह की बाधा न आए और वह अपने चहेते देशी-विदेशी पूंजीपतियों को राज्य की बहुमूल्य खनिज संपदा की लूट की छूट दे सके। इसके लिए जो भी करना पड़े, सरकार करती है। इस तरह बस्तर में पुलिस के रौब और खौफ छत्तीसगढ़ में कायम है।

13 जनवरी 2017 को फेसबुक में प्रकाशित।


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