पंकज बेक कस्टोडियल डेथ: इंसाफ की लड़ाई एक कदम आगे बढ़ी...
द कोरस टीमपंकज बेक कस्टोडियल डेथ मामले में छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग ने आरोपी पुलिस वालों के विरुद्ध, अजाक्स थाने में, अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के तहत अपराध पंजीबद्ध करने का आदेश जारी किया है। आयोग ने माना कि पीडि़ता के पूर्व के आवेदन में पुलिस ने कार्यवाही नहीं करते हुए खानापूर्ति के लिए 306/34 का अपराध पंजीबद्ध किया है एवं झूठे दस्तावेज प्रस्तुत कर न्याय को प्रभावित किया जा रहा है।

रानू बेक पूरे सिस्टम से अकेले लडऩे जुटी हुई है। अब बड़ा प्रश्न यह है कि क्या शासन-प्रशासन राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग की बात को नजर अंदाज करते हुए इतने दागदार पुलिस वालों को राजधानी के थानों में सुशोभित करके रखेंगे या बाहर का रास्ता दिखाएंगे?
घटना साल 2019 की है
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 28 साल का आदिवासी युवक पंकज बेक एक प्राइवेट कंपनी के साथ इंटरनेट और सीसीटीवी कैमरे लगाने का काम करता था। इस कंपनी में वह पिछले कई सालों से काम कर रहा था। इस बीच उस पर कभी भी चोरी या पैसों के हेरफेर का इल्जाम नहीं लगा।
27 जून 2019 की शाम पंकज बेक कंपनी के ही एक कर्मचारी इमरान खान के साथ शहर के व्यवसाई तनवीर के घर पर सीसीटीवी कैमरा लगाने गया था अपना काम खत्म कर पंकज वापस घर लौट गया।
अगले दिन 28 जून को व्यवसायी तनवीर ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई की उनके घर सीसीटीवी कैमरा लगाने आए युवक पंकज और इमरान ने उनके घर की अलमारी से 13 लाख रुपए चुरा लिए हैं।
चोरी होने की पुष्टि हो सके, इस संबंध में व्यवसायी तनवीर ने किसी भी तरह के साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए थे। मसलन अलमारी के उथल-पुथल होने की तस्वीरें, सीसीटीवी फूटेज, कोई गवाह आदि।
शिकायतकर्ता व्यवसाई ही थाने में इंटेरोगेशन करते हुवे पंकज को पीटते थे
एफ आई आर दर्ज होने के बाद पंकज, इमरान और उसके परिवार वालों का जीना मुश्किल कर दिया गया। पूछताछ के नाम पर पुलिस उन्हें आए दिन उठा लिया करती। नंगे बदन दिन दिन भर पंकज थाने में पड़ा रहता था। उसके साथ बेतहाशा मारपीट की जाती थी। थर्ड डिग्री टॉर्चर जिसके बारे में आपने फिल्मों में सुना होगा, पंकज उसे आए दिन झेल रहा था। अपनी पत्नी के साथ पंकज थाने की बातें साझा करने की कोशिश करता था। पंकज के बताए अनुसार थाने में सिर्फ पुलिस नहीं शिकायतकर्ता व्यवसाई तनवीर और उसके साथी भी उसे पीटते और सवाल पूछते थे।
जिस दिन पंकज को मार दिया गया
20 जुलाई 2019 को पुलिस वालों ने पंकज और इमरान से कहा के अपने और अपने घर वालों के बैंक डिटेल के साथ 21 जुलाई को थाने में हाजिर ओ जाएं।
खबरों की माने तो शुक्रवार 21 जुलाई 2020 को दिन से लेकर रात तक पारी बदल बदल कर पुलिस वालों ने दोनों को इतना मारा था कि दोनों के पैरों के तलुए रंग पोत देने सरीखे नीले पड़ गए थे। अगले दिन सुबह अंबिकापुर थाने के साइबर सेल के पास ढेर सारे घावों से भरी पंकज बेक की लाश मिली।
पुलिस ने कहा पंकज ने आत्महत्या की है लेकिन...
साइबर सेल के पास ही एक निजी अस्पताल के प्रांगण में पंकज की लाश बैठी हुई मिली ऊंची खिडक़ी पर लगे कूलर में पानी का एक प्लास्टिक पाइप फंसा हुआ था जिसका दूसरा सिरा फांसी के फंदे की तरह पंकज के गले में बंधा था।
जिस स्थिति में लाश मिली उसे देखकर सभी ने कहा कि ये आत्महत्या तो बिल्कुल नहीं लगती। लेकिन पुलिस ने कहा कि ये आत्महत्या है। याद रहे कि ये वही पुलिस वाले थे जिनकी कस्टडी में पंकज पिछले रोज दिन भर से पीटा जा रहा था।
क्यों लगता है कि यह आत्महत्या नहीं, हत्या है
जिस कूलर पर प्लास्टिक पाइप का फंदा बंधा था वह जमीन से 9 फीट ऊपर था। वहां तक पहुंचने के लिए कोई सीढ़ी या कोई दूसरा साधन मौजूद नहीं था। फंदे वाला पाइप कूलर में बंधा नहीं है सिर्फ फंसा हुआ है जिंदा व्यक्ति फांसी पर झूल जाए इतनी मजबूती नहीं लगती इस फंसे हुए पाईप की। पूरे शरीर पर जगह-जगह गहरी चोट के निशान मिले हैं जो फांसी लगाने के हो ही नहीं सकते। लाश जिस तरह सलीके से बैठी है वह खुद ही बहुत सारे सवालों का जवाब है।
प्रथम दृष्टया हत्या का मामला
स्थानीय विपक्षी दल ने घटना के विरोध में चक्का जाम किया। पूर्व गृहमंत्री के नेतृत्व में एक जांच कमेटी गठित की गई। साक्षियों के बयान और घटनास्थल का मुआयना कर, जांच दल ने जो रिपोर्ट प्रस्तुत की उसमें प्रथम दृष्टया हत्या का मामला सामने आया।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के लिए दो बार आरटीआई लगानी पड़ी
कानून कहता है कि मृतक के परिवार को उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तुरंत दी जानी चाहिए लेकिन पंकज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट उसकी विधवा पत्नी को 2 महीने तक नहीं दी गई। रोज धक्के खाती रानू बेक ने दो बार आरटीआई लगाई तब कहीं जाकर उसे उसके पति की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल पाई।
सवाल जिनसे पुलिस भाग रही है
खोजी पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मामले से जुड़े कुछ जरूरी और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं- पंकज बेक के पैरों और तलवे पर गहरी चोट के निशान मिले हैं। ऐसे घावों के रहते हुए किसी का चलना ही मुश्किल होगा तो फिर पंकज बेक पुलिस की हिरासत से भाग कैसे सकता है?
पुलिस के अनुसार पंकज बेक ने चार दीवारें फांदी फिर आत्महत्या की। गौर करने की बात है कि इन चार दीवारों में से एक दीवार 12 फीट से भी ज्यादा ऊंची है जिसे तो कोई एथलीट भी आसानी से न फांद पाए तो घायल पैरों के साथ पंकज बेक उसके पार कैसे कर सकता था?
मजिस्ट्रेट ने अपनी जांच में उन गहरी चोटों का जिक्र आखिर क्यों नहीं किया जो मृतक के शरीर पर पाई गई थीं?
मजिस्ट्रियल जांच में मुख्य आरोपी का बयान क्यों नहीं लिया गया?
पंकज बेक आदिवासी था, उसकी पत्नी रानू बेक लगातार इस बात की मांग कर रही है के आरोपियों के विरुद्ध ह्यष्-ह्यह्ल प्रताडऩा अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया जाए पर ऐसा क्यों नहीं किया गया?
पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु मामले के आरोपी तत्कालीन टीआई विनीत दुबे द्वारा स्वयं प्रश्न-उत्तर डेटा ऑपरेटर को निर्देशित कर लिखवाया जा रहा था। पीडि़त पक्ष कुछ बोले तो उन्हें डांट-डपटकर और अभियोजन साक्षियों के बयान को काट-छाटकर अपनी इच्छानुसार बयान लिखवाकर भयभीत कर उनका हस्ताक्षर लिया गया।
जांच अधिकारी पूरे समय अपने अलग चैम्बर में बैठे हुए थे। आरोपियों को खुली छूट दे दी गई थी कि वे अपने मन मुताबिक़ पीड़ित पक्ष को डरा धमका कर बयान लिखवा लें।
रानू बेक ने पूछताछ के दौरान डराए धमकाए जाने की इस घटना की लिखित शिकायत पुलिस अधीक्षक सूरजपुर से की और आईजी सरगुजा रेंज को भी शिकायत कर मामले से अवगत कराया।
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