पत्रकार को पुलिस के खिलाफ लिखना पड़ा महंगा, परिजनों ने लगाए पुलिस पर गंभीर आरोप
द कोरस टीमलगातार सच्चाई लिखने और पुलिस की हरकतों को अपने वेबसाइट के माध्यम से उजागर करने वाले ‘भारत सम्मान’ के पत्रकार जितेंद्र जायसवाल को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। हो सकता है खबर बनाने का उनका तरीका गलत हो लेकिन इस तरह अलोकतांत्रिक गिरफ्तारी की सभी ने आलोचना की है और उनकी जल्द रिहाई की मांग की है। पत्रकारों पर दबाव बनाना, विज्ञापन ना देना, फर्जी मामलों में फंसा देना या फिर मारने की साजिश करना मानों प्रदेश के अफसरशाही की आदत सी हो गई। जिस तरह प्रदेश के बस्तर संभाग में आये दिन पत्रकारों के ऊपर पुलिस के द्वारा अत्याचार करने का मामला मीडिया के सुर्खियों में रहता हैं और इन पुलिस अफसरों पर उच्च अधिकारी व सरकार के द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की जाती है। गलत आरोपों में पुलिस व सरकारी अफसर पत्रकारों को फर्जी पत्रकार बता कर फर्जी मुकदमें चलवाने का कार्य करती हैं। अब सरगुजा पुलिस बस्तर के पुलिस का रवैया अपनाते हुए अम्बिकापुर से संचालित ‘भारत सम्मान’ न्यूज़ वेबसाइट के सम्पादक जितेंद्र जायसवाल को हिरासत में लिया हैं।

पत्रकार जितेंद्र जायसवाल की धर्म पत्नी प्रिया जायसवाल ने बताया कि पुलिस फिल्मी स्टाइल में 16 दिसम्बर को अपहरण कर किसी घटना को अंजाम देने की नाकाम कोशिश कर रही है।
विदित है कि कुछ दिनों से ‘भारत सम्मान न्यूज’ वेबसाइट ने पुलिस प्रशासन को आइना दिखाने का कार्य करते रहा जिस पर चिढ़े अम्बिकापुर पुलिस प्रशासन ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपनी आलोचना बर्दास्त नहीं की और संपादक जायसवाल को गिरफ्तार करने के आदेश दी हैं ।
श्रीमती जायसवाल ने बताया कि 10 दिसम्बर से ही पुलिस के द्वारा मेरे पति जितेंद्र जायसवाल को चोरी छुपे तरीके से अपहरण करने की साजिश की जा रही थी। पुलिस को मौका नहीं मिलने के कारण पुलिस अपने मिशन में कामयाब नहीं हो पाई और पुलिस मौके के तालाश में जायसवाल के पीछे मुखबर भेज कर उनके उठने बैठने के जगहों पर निगरानी की जा रही थीं।
आगे बताया कि 16 दिसम्बर की रात्रि में पत्रकार जायसवाल निजी काम के सिलसिले में अम्बिकापुर के पीजी कॉलेज के समीप अपने मित्र के 4 पहिये वाहन में गए हुए थे कि तभी अम्बिकापुर क्राइम ब्रांच की टीम बिना वर्दी में आये और वाहन में बैठ कर फिल्मों के माफिक हथियार की धमक दिखा कर जायसवाल के आखों में काली पट्टी बांधी गई और उनके मोबाईल फोन को स्विच ऑफ कर दिया गया।
वहां से जितेंद्र जायसवाल को कई अनजान जगहों पर ले जाया गया जहां किसी अनहोनी को अंजाम देने की साजिश की जा रही है। देर रात्रि में घर नहीं आने के कारण जितेंद्र जायसवाल की धर्मपत्नी प्रिया जायसवाल ने आगे कहा कि वे अपने दो ब‘चों के साथ घबरा रही थी और मोबाइल में अपने पति के दोस्तों से संपर्क कर अपने पति के बारे में पूछताछ कर रही थी।
प्रिया जायसवाल ने बताया कि उन्हें पहले से ही पुलिस के द्वारा कोई साजिश की बू आ रही थी। पुलिस के द्वारा मेरे पति को अपहरण करने कोशिश पहले से कि जा रही थी। पुलिस मौके के तलाश में थी, पत्रकार जायसवाल को पुलिस ने गुप्त तरीके से गिरफ्तार के नाम पर अपहरण किया और कई दूसरे जगहों में दो दिनों तक घुमाते रहे, जब घर के द्वारा फ़ोन कॉल करने पर बन्द आया तब घर वालों की शक की सुई पुलिस के कार्यशैली की तरफ़ गई और पत्रकार के परिजनों ने कोतवाली थाना, देहात थाना में जाकर पूछताछ करते रहे, पुलिस गिरफ्तार करने की बात से इनकार करती रही।
पुलिस 2 दिनों बाद प्रेस रिलीज जारी कर गिरफ्तार करने को स्वीकार की है। पुलिस ने पत्रकार जायसवाल को भादवि की धारा 151 के तहत गिरफ्तार किया है। और साथ ही फर्जी पत्रकार होने की बात भी कही हैं। ऐसे में पुलिस किस आधार पर फर्जी पत्रकार होने की बात कही है ये तो समझ से परे हैं। खबरों के अनुसार उनकी गिरफ्तारी टिकरापारा पुलिस रायपुर ने होना बताया जा रहा है।
इस संबंध में लोकविचार वेबसाइट ने अम्बिकापुर कोतवाली थाना प्रभारी का हवाला देते हुवे बताया है कि कि पत्रकार जितेंद्र जायसवाल के द्वारा गलत शब्दों का प्रयोग किया जाता था। जायसवाल ने हरामखोर, पिल्ले, तलवाचाटने, दलाली जैसे गालियों का प्रयोग किया है, आगे बताया कि जायसवाल अपने मासिक अखबार के जरिये एक लाइन का विज्ञापन लिख कर 10 हजार रुपये की मोटी रकम की वसूली करता था। जो पूरी तरह से अवैध हैं।
लोकविचार ने बताया कि वह इन अपशब्द भाषा का समर्थन नहीं करती हैं। किन्तु पुलिस के द्वारा वर्दी का रौब दिखाना डिजिटल पत्रकारों को धमकाना बेहद निंदनीय हैं, पुलिस के द्वारा फर्जी पत्रकार बताना गलत हैं। पत्रकार को लिखने पढऩे का अधिकार संविधान के मौलिक अधिकार में दी गई हैं।
इससे पूर्व भी भ्रष्ट पुलिस की पोल खोलने वाले डिजिटल जर्नलिस्ट जितेंद्र जायसवाल दिसम्बर 2018 को फर्जी मुकदमों में गिरफ्तार हो चुके हैं। उस समय भी परिजनों का आरोप था कि एक तो पुलिस बिना बताए बिना किसी सूचना के रात में ही जितेंद्र को थाने ले गई। ऊपर से किसी भी प्रकार की सूचना भी नहीं दी गई।
आरोप था कि जितेंद्र के साथ काफी मारपीट की गई है। जितेंद्र की पत्नी और परिजनों ने आईजी सरगुजा रेंज हिमांशु गुप्ता और एसपी सरगुजा सदानंद के कार्यालय में जाकर जितेंद्र के गुम होने की लिखित शिकायत की थी।
उन पर उस समय आरोप था कि अपने वेबसाइट पर एसपीओ अभय सिंह मार्को उर्फ बंटी की फर्जी गिरफ्तारी के संबंध में पुलिस अधीक्षक सदानंद के खिलाफ खबर लगाई थी।
कोतवाली थाने में दिवाली के समय पटाखा व्यापारियों से भयादोहन कर पुलिस कर्मियों द्वारा पटाखा लाकर थाने में रखने को लेकर भी न्यूज अपने ‘भारत सम्मान’ पोर्टल में छापी थी। इसकी खीज में पुलिस वालों ने जितेंद्र जायसवाल पर फर्जी मामला दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया था।
अखिल अहमद अंसारी के अनुसार- विदित हो कि यह घटना तब हुई जब पुलिस परिवार जो अपने वेतन एवं भत्तों की मांगों को लेकर आंदोलन कर रही है, उनकी सहायता से उक्त पत्रकार साथी ने कल रात ‘पुलिस आवास’ में करोड़ों रुपए के कथित घोटाले का पर्दाफाश किया। प्राप्त जानकारी के अनुसार उसके बाद से ही रात को पुलिस, पत्रकार को उठा कर ले गयी।
मेरी जानकारी के अनुसार अम्बिकापुर में हुए पंकज बेक कस्टोडियल डेथ मामले में IPC 306/34 अपराध क्रमांक 0712 दिनांक 24 नवम्बर 2019 के आरोपी पुलिसकर्मियों की बहाली रायपुर थाने में ही है। अत: ‘पुलिस परिवार’ आंदोलन की आड़ में छत्तीसगढ़ पुलिस, जितेन्द्र कुमार से बदले एवं दुर्भावनावश कार्य कर रही है जो कि घोर निंदनीय है।
सरगुजा पुलिस तो उक्त अखबार एवं पत्रकार साथी से घोर पूर्वाग्रह पहले से रखती ही है, अब कस्टोडियल डेथ के आरोपी पुलिस वाले संभव है कि रायपुर में मौके का लाभ उठाना चाहते हों।
पत्रकार साथी जितेंद्र के द्वारा जो कथित ‘पुलिस आवास’ घोटाले का खुलासा किया गया है, जिसमें उच्च अधिकारियों के नाम सामने आने का भय है, इससे पहले हमने मध्यप्रदेश में हुए व्यापम घोटाले में सीरियल किलिंग देखा है। अत: मैं आरोप लगाता हूँ कि छत्तीसगढ़ पुलिस जितेंद्र कुमार की हत्या करने का प्रयास कर सकती है।
फिर से दोहरा रहा हूँ परिस्थितियों को देखते हुए मुझे भय है कि छत्तीसगढ़ पुलिस पत्रकार साथी जितेन्द्र की हत्या करवा सकती है, साथियों मेरी चिंता बेवजह नहीं है। रायपुर के आईजी एवं एसपी से भी मुझे संतोषजनक उत्तर नहीं मिला इसलिए ज्यादा फिक्रमंद हूँ। माननीय सर्वोच्च न्यायालय की गाइडलाइन है संविधान के अनुच्छेद 22 में गिरफ्तार व्यक्ति के मानवाधिकार दिए गए हैं, सबको ताक में रखकर पत्रकार साथी को अगवा किया गया है, हम इसकी भर्त्सना करते हैं...
साथियों पूरे प्रदेश में केवल एक पत्रकार है जो पुलिस की आंख में आंख डालकर उसके घोटालों एवं मानवाधिकारों के हनन के विरुद्ध चिंघाड़ सकता है। अत: पुलिस उसे समाप्त करना चाहती है, लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे हम यह बता देंगे कि यह ‘लुई लार्ड माउंटबेटन’ का शासन नहीं है। हमारा देश लोकतांत्रिक है।
जमानती धाराओं में गिरफ्तारी होने पर जमानत मिलना गिरफ्तार व्यक्ति का अधिकार होता है, रायपुर पुलिस अधीक्षक गैर जिम्मेदारी से लगातार मुझसे कहते रहे कि उनके वकील को जानकारी दी गयी है परन्तु वकील साहब दिनभर एक थाने से दूसरे थाने घूमते रहे। जब पत्रकार साथी को जेल भेज दिए तब रात को हमें अपने स्रोत से पता चला कि CRPC 151 में गिरफ्तार किया गया है।
जब हमें पता चल चुका है तब रायपुर पुलिस अधीक्षक रात 8 बजे मुझे व्हाट्सएप पर झूठी जानकारी दे रहे हैं कि वे जितेन्द्र के भाई जो बलरामपुर में पुलिस विभाग में पदस्थ हैं उन्हें सूचित किया गया है जबकि पुलिस अधीक्षक महोदय ने इतनी तो कानून की किताब पढ़ी ही होगी कि करीबी रिश्तेदार/नातेदार को सूचित करना आवश्यक है जो कि पत्नी/बच्चे या साथ में रहने वाले माता-पिता होते हैं।
इस संबंध में रायपुर प्रेस क्लब के उपाध्यक्ष और पत्रकार प्रफुल्ल ठाकुर ने इस पूरे घटनाक्रम को छत्तीसगढ़ का अलोकतांत्रिक सरकार करार दिया है। उन्होंने कहा है कि एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया जाता है, लेकिन परिवार को गिरफ्तारी की जानकारी तक नहीं दी जाती। उसे जेल भेज दिया जाता है, फिर भी परिवार को नहीं बताया जाता। उसे अपना पक्ष रखने, वकील करने का भी मौका नहीं दिया जाता।
कल को यही पुलिस अपनी कस्टडी में अमित बेग जैसा उसे मार देगी, तब भी परिवार को नहीं बताया जाएगा। उसकी लाश किसी गटर में फेंक दी जाएगी। आप कभी साबित नहीं कर पाएंगे कि उसे पुलिस ने मारा। यह खेल अभी तक जंगल में होता आया है, अब राजधानी में होने लगा है। यह सब एक पत्रकार के साथ हो रहा है।
प्रफुल्ल 'द कोरस' को बताया कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार पत्रकारों के साथ अपराधियों जैसा बर्ताव कर रही है। लगातार पत्रकारों का दमन हो रहा है। चार चाटुकारों संपादकों को खरीद कर सरकार बाकी पत्रकारों को कीड़ा-मकोड़ा समझ रही है। छत्तीसगढ़ की सरकार देश की सबसे ’यादा अलोकतांत्रिक सरकारों में से एक है। नहीं तो भला बताइए किसी लोकतांत्रिक रा’य में ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाए और उसके परिवार को जानकारी तक न दिया जाए।
मीडिया को भी दोपहर बाद से गुमराह किया जाता रहा। गिरफ्तारी होने से ही इंकार किया जाता रहा। क्या यह जो सब हुआ है, वह अलोकतांत्रिक, गैरसंविधानिक और अमानवीय नहीं है?
पत्रकार मनीष सोनी लिखते हैं कि छत्तीसगढ़ पुलिस अपने ही परिवार का सहयोग करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करके क्या साबित करना चाहती है। जबकि कलंकित हो चुकी पुलिसिया कार्यशैली को वर्तमान में कौन व्यक्ति नहीं जानता हर एक तो इनसे पीडि़त है, बेचारे विभाग में जो वाकई ईमानदार हैं वो अपने ही लोगों के कारण शर्मिंदगी महसूस कर रहे हैं।
जाने माने साहित्यकार और पत्रकार गिरीश पंकज इस पूरे मामले पर टिप्पणी करते हुवे कहते हैं कि पत्रकार प्रफुल्ल ठाकुर ने बहुत सही सवाल उठाया। इस सरकार के लोग जब विपक्ष में थे तो लोकतंत्र - लोकतंत्र चिल्लाते थे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते थे, अब इनका चरित्र देखकर हैरत हो रही है। यानी सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं।
बहरहाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन जारी हैं। अब देखना बाकी है कि नई हुकूमत में इन वर्दीधारीयों पर कार्यवाही हो पाती है या इन्हें संरक्षण देती हैं।
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11/01/2022
Tushar Bharti
Yes
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