दो ख़ूनी खेलों की कहानी

प्रेमकुमार मणि

 

बिहार और झारखण्ड आज पड़ोसी प्रान्त हैं, लेकिन इक्कीस साल पहले तक दोनों एक थे। 15 नवंबर 2000 को झारखण्ड अलग प्रान्त बन गया। बिहार और झारखण्ड दोनों अपने पिछड़ेपन के लिए जाने जाते हैं। झारखण्ड की लगभग तीस फीसद आबादी आदिवासी है और इन आदिवासियों का लगभग 92 फीसद गाँवों में रहते हैं। बिहार में आदिवासियों की संख्या नगण्य है।

पूर्वी बिहार में थोड़ी - सी संथाल आबादी है और बिहार का एक विधानसभा क्षेत्र आदिवासियों केलिए सुरक्षित है। बिहार के बंटवारे के बाद आदिवासियों के लिए तय 9 फीसद आरक्षण को पिछड़े वर्ग से जोड़ दिया गया और बिहार में ओबीसी को मिलने वाला आरक्षण 27 फीसद से बढ़ कर 35 फीसद हो गया।

लेकिन पिछले वर्ष बिहार में और इस वर्ष के पहले ही रोज झारखण्ड में अपने - अपने प्रांतों के एक - एक ख़ूनी खेल को शिद्दत से याद किया गया। 2021 में रूपसपुर - चंदवा नरसंहार की पचासवीं बरखी मनाई गई, वहीं 1 जनवरी को झारखंड में सरकार द्वारा काला दिवस मनाया गया, क्योंकि इसी रोज 1948 में खरसावां गोलीकांड हुआ था, जिसमें सरकारी स्तर पर तो केवल तीन दर्जन, लेकिन गैरसरकारी स्तर पर तकरीबन दो हजार लोगों के मारे जाने की खबर थी।

यह गोलीकांड आज़ाद भारत का पहला गोलीकांड था, जिसमें आदिवासी जनों पर धुंवाधार गोली चला कर उन्हें मार दिया गया था। यह घटना जलियावाला गोलीकांड से भी अधिक भयावह था।

इस रोज झारखण्ड के मुख्यमंत्री ने खरसावां जाकर शहीदों की स्मृति में बने स्मारक पर फूल चढ़ाए और उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनकी शहादत को याद किया।

पहले हम खरसावां गोलीकांड को ही जानना चाहेंगे। खरसावां एक स्टेट था, जहाँ नागवंशी शासक थे। भारत जब आज़ाद हुआ और देशी रियासतों का भारत में विलय हुआ तो खरसावां स्टेट के बारे में दो तरह की बातें फैली।

कोई कहता था इसे बिहार में मिलाया जाएगा, कोई कहता था इसे उड़ीसा में मिला दिया जाएगा। लेकिन वहां के आदिवासी चाहते थे कि उन्हें स्वतंत्र और पृथक प्रान्त का दर्जा दिया जाय।

उन दिनों ही पृथक झारखण्ड की मांग जोरशोर से उठी थी। तब आदिवासियों के काबिल नेता मशहूर खिलाड़ी जयपाल सिंह मुंडा थे, जो संविधान सभा के मुखर सदस्य भी थे। उन्होंने खरसांवा जाने का फैसला किया।

आदिवासी उनके स्वागत में उमड़ पड़े। कहा जाता है कोई पचास हज़ार लोग उन्हें सुनने आए थे। यह पहली जनवरी का दिन था। दिन बीफे यानी बृहस्पतिवार। इस रोज वहां बाजार लगता है।

आसपास के गाँवों से भीड़ आती ही जा रही थी। भीड़ देख उड़ीसा मिलिटरी पुलिस के सिपाही बौखला गए। वे भूल ही गए कि चार माह पूर्व देश आज़ाद हो गया है। अंग्रेजी सनक बनी हुई थी। कम से कम आदिवासी लोगों को तो अभी इतना आज़ाद नहीं ही होना चाहिए।

उन्होंने खड़िए का एक घेरा बनाया और घोषणा की कि कोई भी इस लक्ष्मण रेखा के पार नहीं करेगा। बेचारे आदिवासी मिलिटरी की भाषा नहीं समझ रहे थे। वे जाने किस जुबान में बोल रहे थे। यूँ भी आदिवासियों से कोई संवाद तो करता नहीं। वे चुपचाप रहते हैं।

उन्होंने उत्साह में खड़िए के घेरा और पुलिस के आर्डर को नहीं सुना समझा। मिलिटरी पुलिस भी कहाँ कुछ समझती है। उनसे मशीनगन से गोलियां बरसानी शुरू कर दी। खून की नदी बह गई। लाशों से इलाका पट गया। एक बड़े कुँए में लाशों को डाल कर ढँक दिया गया। सरकार ने केवल तीन दर्जन लोगों के मरने की खबर दी।

मारने वाले लाश गिनने वाले कैसे हो सकते हैं। जिनके परिवार के लोग मारे गए थे, वही लाशों का हिसाब रख सकते थे। लोगों का कहना था कोई दो हजार लोग मारे गए। जलियावाला बाग गोलीकांड 1919 के तेरह अप्रैल को हुआ था।

वहां भी सभा होनी थी, रोलेट एक्ट के खिलाफ। अंग्रेज हुक्मरानों को हिन्दुस्तानियों का यह उत्साह पसंद नहीं आया। जनरल डायर अपनी फौजी टुकड़ी लेकर पहुँच गया और उसके सिपाही तब तक मशीनगन चलाते रहे, जब तक उनकी सारी गोलियां ख़त्म नहीं हो गईं।

कुल 379 लोग मारे गए। सैंकड़ों घायल हुए। खबर मुल्क भर में फैली और लोग बेचैन हो गए। कवि रवीन्द्रनाथ ने अपनी उपाधि लौटा दी। पूरा हिंदुस्तान मातम में डूब गया।

1 जनवरी 1948 का खरसावां गोलीकांड जलियावाला बाग़ से कई गुना भयावह था। लेकिन यह हिन्दुस्तानियों की नहीं, आदिवासियों की जान थी। इस पर किसी कवि ने उपाधि नहीं लौटाई. कहीं कोई खबर नहीं छपी।

अंग्रेजी अख़बारों ने नोटिस ली, लेकिन बाकि इस पर चुप लगा गए। मातम में डूबने के लिए केवल आदिवासी थे। इतने बड़े गोलीकांड को आज भी कितने लोग जानते हैं?

बिहार का रूपसपुर चंदवा नरसंहार भी आदिवासियों से जुड़ा हुआ है। 22 नवंबर 1971 को पूर्णिया जिले के धमदाहा प्रखंड के चंदवा - रूपसपुर गांव में चौदह संथाल मजदूर आदिवासियों को गोली मार कर जला दिया गया। आज़ादी के बाद बिहार का यह दूसरा नरसंहार था। पहला नरसंहार खरसावां गोलीकांड था।

नवंबर 1971 में बिहार में भोलपासवान के मुख्यमंत्रित्व वाली कांग्रेस सरकार थी। बिहार विधानसभा के अध्यक्ष थे डॉ लक्ष्मीनारायण सुधांशु। गोलीकांड के पीछे उनका ही हाथ था।

तब बिहार में समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर विपक्ष के नेता थे। उन्होंने बिहार भर में हंगामा खड़ा कर दिया। इतना दबाव बनाया कि सरकार को विधानसभा पुलिस भेज कर सुधांशु को गिरफ्तार करना पड़ा। पिछले नवंबर में उस नरसंहार के पचास साल पूरे हुए। कुछ जनसंगठनों ने उसकी बरखी मनाई।

नरसंहार की भयावहता को याद किया और कुछ संकल्प भी लिए गए। लेकिन यह क्यों होता है कि आदिवासी केवल मारे जाने के लिए पैदा होते हैं। उनके बारे में हमारा समाज कब सोचेगा। वे कब तक अन्य बने रहेंगे?


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