कोरोना की वैक्सीन लगवाना तथा मास्क लगाना सही है या गलत?

डॉ. क्रांति भूषण बन्सोड़े

 

किसी भी बीमारी की रोकथाम के लिये उस बीमारी के लिये बनाई गई वैक्सीन एक विकल्प होता है। बीमारी का उपचार (Treatment ) और रोकथाम (Prevention ) दो अलग अलग बात है।

आज भी जैसे बच्चों को उनके जन्म के बाद अनेक बीमारियों से बचाव के लिये उन्हें बाल्यकाल में ही वैक्सीन लगवाई जाती है। जिससे वे उन बीमारी की गम्भीर स्थिति से निपटने के लिये तैयार हो जाते हैं।

इसलिये पोलियो, छोटी माता, बड़ी माता, कोलेरा, टीबी, हिपेटाइटिस बी इत्यादि बीमारियों का प्रकोप काफी कम है। ऐसा नहीं है कि वे बीमारियां बाद में होती ही नहीं है। लेकिन हुई भी तो उसके कारण बच्चों की मृत्युदर अत्यंत कम हो गई है।

‘कोविड 19’  बीमारी भी वायरल इंफेक्शन है। यह एक आरएनए वाईरस है। यह वाईरस शरीर के भीतर कोशिका के RNA से  DNA में जाकर उसके भीतर जाकर कोशिका की सामान्य तथा निर्धारित कार्यप्रणाली को बदलकर तेजी से अपने जैसा वायरस हमारे शरीर की कोशिका से वायरस तैयार करने को मजबूर कर देता है।

प्रत्येक व्यक्ति के शरीर की आंतरिक रक्षा प्रणाली (Immunity) अलग अलग होती है। जिसके कारण प्रत्येक व्यक्ति के शरीर पर वैक्सीन के द्वारा पैदा की जाने वाली प्रतिरोधक क्षमता भी भिन्न होती है। 

जब बीमारी के कारण शरीर रोगग्रस्त हो जाता है, तब उसका उपचार जरूरी है। लेकिन बीमारी से बचने के लिये वैक्सीन का महत्व अधिक हो जाता है।

कोविड 19 एक नई बीमारी है। विश्वस्तर पर भी इस बीमारी के द्वारा शरीर के भीतरी अंगों के कार्य में क्या - क्या परिवर्तन हो जाते हैं, इस पर अध्ययन जारी है।

फिलहाल यह मालूम है कि इसके कारण किसी व्यक्ति के फेफड़ों में इतना अधिक तेजी से बदलाव आता है कि उसकी मृत्यु चिकित्सा के दौरान ही हो जाती है।

इसलिये ऑक्सीजन तथा वेन्टीलेटर्स की आवश्यकता लगभग कई मरीजों को पड़ जाती है । जबकि फेफड़ों के खराब होने के अन्य कारण जैसे Bronchial Asthama, Tuberculosis, Viral Pneumonia, Silicosis, Interstitial Lungs Disease वगैरह अनेक बीमारी में किसी भी व्यक्ति के फेफड़े तेजी से खराब नहीं हो जाते हैं।

लगातार उपचार से अनेक व्यक्ति ठीक हो जाते हैं  या उनकी बीमारी में इतना नियंत्रण हो जाता है कि उनके फेफड़ों के खराबी के बाद भी वे जिंदा रहते हैं।  फेफड़ों की खराबी से हमारे शरीर के अन्य अंगों के कार्यप्रणाली में बदलाव हो जाता है। फिर भी उनके अन्य अंग भी ठीक से काम करते हैं।

कोविड 19 में ना केवल फेफड़े बल्कि अन्य आंतरिक अंग जिसमें हार्ट, लिवर तथा किडनी के भी तेजी से खराब होने की संभावना अधिक है। हालांकि विभिन्न विशेषज्ञ अपने अपने क्षेत्र में अध्ययन कर रहे हैं कि क्यों इतनी तेजी से फेफड़े  तथा अन्य अंग खराब हो जाते हैं?

इसलिये वर्तमान परिस्थिति में वैक्सीन का इस्तेमाल किया जाना जरूरी है। भले ही वैक्सीन के द्वारा पैदा की जाने वाली Immunity कम हो  या बेहद कम समय तक शरीर के भीतर सुरक्षा देती हो। लेकिन अधिकतम हालात में वैक्सीन फायदेमंद ही है।

कुछ लोगों के शरीर पर इसका असर विपरीत भी हो सकता है। अधिकांश लोगों को वैक्सीन से फायदा ही होगा। वैक्सीन के कारण नुकसान होने या वैक्सीन का असर कम होने या बिल्कुल भी असरहीन होने वाले लोगों की संख्या काफी कम है 

इसलिये मेरी सलाह है कि वैक्सीन सभी को लगाई जानी चाहिये। बच्चों पर इस वैक्सीन से कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होने की स्थिति में उन्हें भी वैक्सीन दिया जाना ही बेहतर विकल्प है।

ऐसे व्यक्ति जिन्होंने बिलकुल ही वैक्सीन नहीं लिया है वे हमेशा रिस्क पर रहेंगे। फायदा या नुकसान के बारे में कोई भी अवधारणा बनाना सही कैसे हो सकता है? 

मास्क लगाने से आक्सीजन की शरीर में कमी होने या कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ जाने की थ्योरी गलत है। मास्क का उपयोग हालांकि हमारे देश में प्राचीनकाल से ही है। जैन श्वेताम्बर लोग ही इसके हिमायती थे।

रेगिस्तान के लोग भी अपने चेहरे को तथा नाक को ढांककर ही रखते हैं। फैक्ट्रियों में तथा खेतों में काम करने वाले लोग भी अपने चेहरे तथा नाक को ढांककर रखें तो काम में परेशानी नहीं होती है।

फिर धूल, मिट्टी, राख वगैरह के नाक में सीधे जाने से जो तकलीफ किसी व्यक्ति को होती है वह मास्क के कारण नहीं होती है। 

हालांकि किसी भी वायरस या बैक्टीरिया या परजीवी से बचाव के लिये मास्क लगाने की थ्योरी भी बहुत सही तो नहीं है, लेकिन इसका इस्तेमाल घातक है यह कहना भी सही नहीं है ।

जैसा कि हम जानते तथा समझते भी हैं कि एलोपैथी के विकास में पूंजीवाद का बड़ा योगदान है,  उसी तरह से चिकित्सा की अन्य पद्धितियों जैसे होमियोपैथी या आयुर्वेद की पद्धति का अब कोई विशेष महत्व नहीं है। बल्कि कहें कि अब सभी प्राचीन काल का इतिहास मात्र है। 

प्राचीनकाल के चिकित्सा की सभी अच्छी बातों को एलोपैथी ने समावेश कर लिया है और उसे आधुनिकता के साथ विकसित भी किया है। 

हालांकि होमियोपैथी और आयुर्वेद के अनेक चिकित्सक एलोपैथी की दवाओं के द्वारा अपने मरीज का उपचार करते हैं लेकिन वे उन प्राचीन पद्धतियों का बेवजह महिमामंडन करते हैं।

प्राचीन थैरेपी का महिमामण्डन एक बात तो है लेकिन वे लोग एलोपैथी को बदनाम भी करना चाहते हैं, जो वास्तव में गलत है।

एलोपैथी के विकास में वैज्ञानिक विचारधारा के साथ ही पूंजीवाद का बड़ा भयानक खेल शामिल हो जाता है।

चूंकि बीमारियों की पहचान एवं उसकी रोकथाम के लिये विभिन्न प्रकार की खोजबीन एवं प्रयोग में तथा शोध इत्यादि में वैज्ञानिकों को बड़ी मेहनत करना होता है जिसके लिये बिना पूंजी के संसधानों को उपलब्द्ध करवाना आसान भी नहीं है। 

इसलिये भी एलोपैथी चिकित्सा में पूंजीवाद एवम पूंजीवादियों का शामिल होना लाजिमी है।

यह भी जानना यहां प्रांसगिक है कि इसके बावजूद भी चिकित्सा जगत से जुड़े अनेक वैज्ञानिक तथा चिकित्सक भी पूंजीवादी मानसिकता से अपना काम नहीं करते हैं, बल्कि वे ईमानदारी से मानवता के भलाई में कार्य करते हैं।

इसलिये हमें यह जानना चाहिये कि एलोपैथी क्यों महंगी है तथा इसको आसानी से हासिल करना सबके लिये मुमकिन नहीं है। बहुत सारे लोग इसलिये भी मजबूरी में प्राचीनकालीन चिकित्सको के चुंगल में फंसकर परेशान हो जाते हैं।

एलोपैथी या मॉडर्न एविडेन्स बेस्ड थैरेपी में भी अनेक प्रकार की लूट शामिल है  तथा दवाओं की गुणवत्ता के साथ ही कुछेक चिकित्सकों की लालची प्रवृत्ति के कारण उपचार में अनेक प्रकार की गड़बड़ी होती है।

इसलिये आम व्यक्ति का एलोपैथी चिकित्सा पद्धति के बारे में  भ्रमित होने की संभावना भी बहुत अधिक है।

कोई भी सरकार, चिकित्सा से जुड़े सभी संस्थाओं का निजीकरण बन्द करके सरकारीकरण किये जाने से एलोपैथी के अधिकतम लाभ आम जनता को मिल सकेगा।

पूंजीवादी षड्यंत्र से स्वास्थ्य के सभी संस्थाओं यानी चिकित्सा शिक्षा, अस्पताल, दवा बनाने वाली कम्पनियों तथा विभिन्न उपकरण बनाने वाली फैक्ट्रियों को सभी सार्वजनिक क्षेत्र में बदल देने से चिकित्सा पद्धति का विकास अधिक अच्छा होगा।

तथा सबको इसका लाभ आसानी से मिल सकेगा। पूंजीवादी हस्तक्षेप बंद होने से सभी को इसका लाभ बराबरी से मिलेगा।

लेखक पेशे से चिकित्सक हैं और लगातार वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धिति के क्षेत्र में उत्पन्न हो रहे उलझनों को सुलझाने में कार्य कर रहे हैं।


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