पत्थलगड़ी आंदोलन और हेमंत सरकार का वादाखिलाफी
ग्लैडसन डुंगडुंगआदिवासी अपनी जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए सदियों से राजसत्ता के खिलाफ संघर्ष करते आये हैं। बाबा तिलका मांझी का पहाड़िया विद्रोह से लेकर धरती आबा बिरसा मुंडा का उलगुलान इसके गवाह हैं। इसी तरह का झारखंड राज्य के खूंटी जिले से उपजे ‘‘पत्थलगड़ी आंदोलन’’ 21वीं सदी का उलगुलान है, जिसने भारतीय राजसत्ता को चुनौती दिया, जिसे राजसत्ता ने असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी तरीके से अपने ताकत का गलत इस्तेमाल करते हुए आतंकित किया, आंदोलन का अपराधीकरण किया एवं इसे कुचलने का काम किया।

दस हजार से ज्यादा आदिवासियों के उपर देशद्रोह का मुकदमा करते हुए सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया। हालांकि झारखंड की राजनीति में आदिवासियों की प्रभावशाली भूमिका की वजह से सत्ता परिवर्तन होने के साथ पत्थलगड़ी मामलों को वापस लेने की घोषणा भी की गई जो अबतक अधूरा है। मौलिक प्रश्न यह है कि क्या हेमंत सरकार ने आदिवासियों के साथ वादाखिलाफी किया है?
झारखंड सरकार के गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग के द्वारा उपलब्ध कराये गये दस्तावेजों के अनुसार जून 2017 से जुलाई 2018 तक खूंटी, पश्चिमी सिंहभूम एवं सरायकेला-खरसावां जिले में पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े 11,321 लोगों के खिलाफ 30 मामले दर्ज किये गये, जिनमें 381 लोगों को नामजद एवं 10,940 लोगों को बेनाम अभियुक्त बनाया गया। सबसे ज्यादा स्तब्ध करने वाली बात यह है कि सिर्फ खूंटी जिले में ही 23 मुकदमें दर्ज किये गये हैं, जिनमें 340 नामजद एवं 10,640 बेनाम लोगों के साथ कुल 10,980 लोगों को अभियुक्त बनाया गया।
पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े सभी 30 मामलों से संबंधित 182 अभियुक्तों के खिलाफ विभिन्न न्यायालयों में चार्जशीट दाखित किया गया तथा आरोपित अभियुक्तों में से 115 को गिरफ्तार किया गया, जिनमें 114 नामजद एवं 1 बेनाम शामिल है। इसके अलावा 3,210 अभियुक्तों को फरार घोषित किया गया है।
पत्थलगड़ी आंदोलन से संबंधित दर्ज 30 मुकदमों में से 21 मामले देशद्रोह से संबंधित हैं, जिसमें 19 मामले खूंटी जिले एवं 2 मामले सरायकेला-खरसावां जिले से संबंधित हैं। पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े 11,109 लोगों के उपर भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने एवं सरकार की शासन व्यवस्था को नकारते हुए गांवों में पारंपरिक ग्रामसभा का शासन स्थापित करने का आरोप लगाकर भारतीय दंड विधान 1860 की धारा 124ए के तहत देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया।
इन मुकदमों का विश्लेषण करने से पता चलता है कि 11,109 अभियुक्तों में 319 नामजद एवं 10,790 बेनाम लोग शामिल हैं। पत्थलगड़ी का गढ़ माने जाने वाले खूंटी जिले में देशद्रोह के सबसे ज्यादा 19 मामले दर्ज किये गये है, जिसके तहत 10,939 लोगों को अभियुक्त बनाया गया है, जिनमें 299 नामजद एवं 10,640 बेनाम लोग शामिल किये गये हैं।
आरोपित अभियुक्तों में से 124 के खिलाफ विभिन्न न्यायालयों में चार्जशीट दाखिल किया जा चुका है। इन आरोपियों में से 94 को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें 93 नामजद एवं एक बेनामी शामिल हंै। गिरफ्तार अभियुक्तों में सभी खूंटी जिले में दर्ज मामलों से संबंधित हैं। इसके अतिरिक्त झारखंड पुलिस ने 3,192 लोगों को फरार घोषित किया है।
झारखंड की तत्कालीन भाजपा सरकार के द्वारा पत्थलगड़ी आंदोलन से संबंधित दस हजार आदिवासियों के खिलाफ दर्ज किये गये देशद्रोह का मामला विगत झारखंड विधानसभा चुनाव में छाया रहा। इस मुद्दे का राज्यभर के आदिवासियों के भावना से जुड़े होने के चलते जेएमएम नेता हेमंत सोरेन ने इसे अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाते हुए घोषणा किया था की यदि राज्य में उनकी सरकार बनती है तो वे पत्थलगड़ी से संबंधित सभी मामलों को वापस ले लेंगे। इस घोषणा का राज्यभर में व्यापक असर पड़ा। फलस्वरूप, महागठबंधन चुनाव जीत गया और हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बन गये।
चुनावी घोषणा के अनुरूप हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली झारखंड सरकार ने 29 दिसंबर 2019 को हुई मंत्रीपरिषद् की बैठक में पत्थलगड़ी से संबंधित सभी मामलों को वापस लेने का निर्णय लिया।
झारखंड सरकार के निर्णय के आलोक में 28 जनवरी 2020 को पत्थलगड़ी आंदोलन से संबंधित मुकदमों को वापस लेने की प्रक्रिया प्रारंभ करते हुए अमित कुमार सिंह, सरकार के संयुक्त सचिव, गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग ने खूंटी, पश्चिमी सिहंभूम एवं सरायकेला-खरसावां जिले के उपयुक्तों को पत्र लिखकर उपायुक्त की अध्यक्षता में जिला स्तरीय तीन सदस्यीय समिति का गठन कर पत्थलगड़ी आंदोलन से संबंधित इन जिलों में 1 जनवरी 2015 से 29 दिसंबर 2019 तक दर्ज मुकदमों को वापस लेने हेतु कार्रवाई करने का आदेश जारी किया।
सरकार के आदेशानुसार तीनों जिलों में त्रिस्तरीय जिला समितियों का गठन किया गया एवं पत्थलगड़ी आंदोलन से संबंधित मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया प्रारंभ की गई। लेकिन अफसोस की बात यह है कि इन समितियों ने सरकार के क्रांतिकारी निर्णय पर ही ग्रहण लगा दिया।
इन समितियों ने 30 में से सिर्फ 19 मामलों को वापस लेने की अनुशंसा की तथा 7 मामलों में भारतीय दंड विधान 1860 की धारा 121ए एवं 124ए को हटाने हेतु सिफारिश किया जबकि 4 मामलों में उन्होंने कोई मन्तब्य नहीं दिया।
यदि हम इसे जिले स्तर पर देखें तो सरायकेला-खरसावां जिले की त्रिस्तरीय समिति ने सभी 5 मामलों को वापस करने की अनुशंसा की, जिसमें 2 मामले देशद्रोह से संबंधित हैं। इसी तरह पश्चिमी सिंहभूम जिले की समिति ने पत्थलगड़ी आंदोलन से संबंधित दर्ज दोनों मामलों को वापस लेने हेतु सिफारिश किया।
लेकिन पत्थलगड़ी आंदोलन का गढ़ माने जाने वाले खूंटी जिले की त्रिस्तरीय समिति ने जिले में दर्ज 23 मामलों में से सिर्फ 12 मामलों को वापस लेने की सिफारिश की तथा 7 मामलों में भारतीय दंड विधान 1860 की धारा 121ए एवं 124ए को हटाने हेतु अनुशंसा भेजा है जबकि 4 मामलों में समिति ने अपना मत प्रकट ही नहीं किया है। समिति का यह निर्णय सरकार के निर्णय के विरूद्ध है, जिससे निर्दोष आदिवासी दंडित होंगे और हेमंत सरकार से लोगों का भरोसा उठेगा।
यहां मौलिक प्रश्न यह है कि कैबिनेट के निर्णय एवं हेमंत सोरेन की क्रांतिकारी घोषणा के दो वर्ष पूरे हो जाने के बावजूद पत्थलगड़ी मामलों की अबतक वापसी क्यों नहीं हुई? ऐसे प्रतीत होता है कि झारखंड सरकार के गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग ने एक रणनीति के तहत इस पर चुपी साधे हुए है क्योंकि त्रिस्तरीय जिला समितियों के सिफारिशों ने सरकार को चैराहे पर खड़ा कर दिया है।
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पत्थलगड़ी से संबंधित सभी मामलों को वापस लेने की घोषणा की थी लेकिन उनके द्वारा गठित समितियों का अलग मंतब्य है। ऐसी स्थिति में यदि विभाग सिर्फ आधे मामलों को वापस लेने की घोषणा करता है तब लोग हेमंत सरकार के निर्णय पर सवाल उठायें, जिसका असर अगले विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा।
सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री का शपथ लेने के तुरंत बाद कैबिनेट की बैठक बुलाकर पत्थलगड़ी मामलों को वापस लेने की क्रांतिकारी घोषणा करने में हडबड़ी दिखाने वाले हेमंत सोरेन अपने दो वर्षों के कार्यकाल पूरा करने के बाद भी इस मामले पर मौन हैं? हेमंत सरकार के रिपोर्ट कार्ड में पत्थलगड़ी मामला पूरी तरह से गौण है। ऐसा क्यों?
सरकार के इस चुप्पी पर कहीं से क्यों आवाज नही उठ रही है? क्या यह हेमंत सोरेन और उनकी सरकार का वादाखिलाफी नहीं है? क्या हेमंत सोरेन त्रिस्तरीय जिला समितियों के निर्णय एवं सिफारिशों के खिलाफ कोई ठोस पहल करेंगे? पत्थलगड़ी मामले में मौन रहना हेमंत सोरेन को अगले विधानसभा चुनाव में महंगा पड़ सकता है।
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