शिक्षा की देवी सावित्रीबाई फुले

सुशान्त कुमार

 

सावित्रीबाई फुले की एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है-

 

‘जाओ जाकर पढ़ो-लिखो

बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती

काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो

ज्ञान के बिना सब खो जाता है

ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते हैं

इसलिए खाली ना बैठो, जाओ, जाकर शिक्षा लो

दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का अन्त करो

तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है

इसलिए सीखो और जाति के बन्धन तोड़ दो

ब्राह्मणों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो’

जिस देश में एकलव्य का अंगूठा गुरु दक्षिणा में मांगने वाले के नाम पर पुरस्कार दिए जाते हो, जिस देश में शम्बूक जैसे विद्वान के वध की परम्परा हो, जिस देश में शूद्रों-अतिशूद्रों और स्त्रियों को शिक्षा ग्रहण करने पर यहां के धर्मग्रन्थों में उनके कान में पिघला शीशा डालने का फरमान जारी किया गया हो और जिस देश के सवर्ण कवि द्वारा यहां की दलित शोषित-वंचित जनता को ‘ढोल गंवार शूद्र अरु नारी यह सब ताडऩ के अधिकारी’ माना गया हो ऐसे देश में किसी शूद्र समाज की स्त्री द्वारा इन सारे अपमानों, बाधाओं, सड़े-गले धार्मिक अंधविश्वास व रूढियां तोडक़र निर्भयता और बहादुरी से घर-घर, गली-गली घूमकर सम्पूर्ण स्त्री व दलित समाज के लिए शिक्षा की क्रांति ज्योति जला देना अपने आप में विश्व के किसी सातवें आश्चर्य से कम नहीं था।

परन्तु अफसोस तो यह है कि इस ‘जाति ना पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान’ वाले देश में जाति के आधार पर ही ज्ञान की पूछ होती है। प्रतिभाओं का सम्मान होता है। हमेशा जाति के आधार पर पुरस्कार, सम्मान और मौके ऊंची जात के लोगों को आराम से मिलते रहे हैं।

शिक्षा की देवी सावित्रीबाई फुले न केवल भारत की पहली अध्यापिका और पहली प्रधानाचार्या थीं, अपितु वे सम्पूर्ण समाज के लिए एक आदर्श प्रेरणा स्त्रोत, प्रख्यात समाज सुधारक, जागरूक और प्रतिबद्ध कवयित्री, विचारशील चिन्तक, भारत के स्त्री आंदोलन की अगुआ भी थीं। सावित्रीबाई फुले ने हजारों-हजार साल से शिक्षा से वंचित कर दिए शूद्र अतिशूद्र समाज और स्त्रियों के लिए बन्द कर दिए गए दरवाजों को खोल दिया। इन बन्द दरवाजों के खुलने की आवाज इतनी ऊंची और कानफोडू थी कि उसकी आवाज से पुणे के सनातनियों के तो जैसे कान के पर्दे फट गए हो। वे अचकचाकर सामन्ती नींद से जाग उठे।

वे सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले पर तरह-तरह के घातक और प्राणलेवा प्रहार करने लगे। सावित्री और ज्योतिबा द्वारा दी जा रही शिक्षा ज्योति बुझ जाए इसके लिए उन्होंने ज्योतिबा के पिता गोविंदराव को भडक़ाकर उन्हें घर से निकलवा दिया। घर से निकाले जाने के बाद भी सावित्री और ज्योतिबा ने अपना कार्य जारी रखा। जब सावित्रीबाई फुले घर से बाहर लड़कियों को पढ़ाने निकलती थीं तो उन पर इन सनातनियों द्वारा गोबर-पत्थर फेंके जाते थे।

उन्हें रास्ते में रोककर उच्च जाति के गुंडों द्वारा भद्दी-भद्दी गालियां दी जाती थी, उन्हें जान से मारने की लगातार धमकियां दी जाती थी। लड़कियों के लिए चलाए जा रहे स्कूल बंद कराने के प्रयास किए जाते थे। सावित्री बाई डरकर घर बैठ जाएं इसलिए उन्हें सनातनी अनेक विधियों से तंग करवाते। ऐसे ही एक बदमाश रोज सावित्रीबाई फुले का पीछा कर उन्हें तंग करने लगा। जिसका उन्होंने मुंहतोड़ जवाब दिया।

1 जनवरी 1848 से लेकर 15 मार्च 1852 के दौरान इन तीन सालों ने सावित्रीबाई फुले ने अपने पति और सामाजिक क्रांन्तिकारी ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर लगातार एक के बाद एक बिना किसी आर्थिक मदद और सहारे के लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोलकर, सामाजिक क्रांन्ति का बिगुल बजा दिया था। ऐसा सामाजिक क्रांतिकारी और परिवर्तनकामी काम इस देश में सावित्री-ज्योतिबा से पहले किसी ने नहीं किया था। समाज बदलाव के इतने दमदार योगदान के बाबजूद इस देश के सवर्ण समाज के जातीय घमंड से भरे पुतलों ने उनके इस शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र में दिए योगदान को किसी गिनती में नहीं रखा।

लेकिन सबसे बड़ी खुशी की बात यह है कि आज स्वयं दलित पिछड़ा वंचित शोषित समाज उनके योगदान के एक-एक कण को ढूंढक़र-परखकर उनके अतुलनीय योगदान की गाथा को सबके सामने उजागर कर रहा है। न केवल वह उनके काम को ही उजागर कर रहा है अपितु उनको और उनके निस्वार्थ मिशन को आदर्श मानकर उनसे प्रेरणा लेकर उनके नाम पर स्कूल, कालेज, आदि खोलकर दलित आदिवासी व वंचित समाज के छात्र-छात्राओं की आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक मदद कर रहा है।

सावित्रीबाई फुले ने पहला स्कूल भी पुणे, महाराष्ट्र में खोला और अठारहवां स्कूल भी पूना में ही खोला। पूना में अस्पृश्यता का सबसे क्रूर और अमानवीय रूप देखने को मिलता है। इसी स्थान पर दलित-वंचित और स्त्री समाज के लिए लगातार स्कूल खोलना भी एक तरह से इस बात का इशारा था कि अब ब्राह्मणवाद की जड़ें हिलने में देर नहीं है। पूना के भिडेवाड़ा में 1848 में खुले पहले स्कूल में छह छात्राओं ने दाखिला लिया। जिनकी आयु चार से छह के बीच थी। जिनके नाम अन्नपूर्णा जोशी, सुमती मोकाशी, दुर्गा देशमुख, माधवी थत्ते, सोनू पवार और जानी करडिले थी।

इन छह छात्राओं की कक्षा के बाद सावित्री ने घर-घर जाकर अपनी बच्चियों को पढ़ाने का आह्वान करने का फल यह निकला कि पहले स्कूल में ही इतनी छात्राएं हो गई कि एक और अध्यापक नियुक्त करने की नौबत आ गई। ऐसे समय विष्णुपंत थत्ते ने मानवता के आधार पर मुफ्त में पढ़ाना स्वीकार कर विद्यालय की प्रगति में अपना योगदान दिया। सावित्रीबाई फुले ने 1849 में पूना में ही उस्मान शेख के यहां मुस्लिम स्त्रियों व बच्चों के लिए प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र खोला। 1849 में ही पूना, सतारा व अहमद नगर जिले में पाठशाला खोली।

शिक्षिका सावित्रीबाई फुले ने न केवल शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया अपितु भारतीय स्त्री की दशा सुधारने के लिए उन्होंने 1852 में ‘महिला मण्डल’ का गठन कर भारतीय महिला आन्दोलन की प्रथम अगुआ भी बन गई। इस महिला मंडल ने बाल विवाह, विधवा होने के कारण स्त्रियों पर किए जा रहे जुल्मों के खिलाफ स्त्रियों को तथा अन्य समाज को मोर्चाबंद कर समाजिक बदलाव के लिए संघर्ष किया। हिन्दू स्त्री के विधवा होने पर उसका सिर मूंडा दिया जाता था। सावित्रीबाई फुले ने नाईयों से विधवाओं के ‘बाल न काटने’ का अनुरोध करते हुए आंदोलन चलाया जिसमें काफी संख्या में नाइयों ने भाग लिया तथा विधवा स्त्रियों के बाल न काटने की प्रतिज्ञा ली।

इतिहास गवाह है कि भारत सहित पूरे विश्व में ऐसा सशक्त आंदोलन नहीं हुआ जिसमें औरतों के ऊपर होने वाले शारीरिक और मानसिक अत्याचार के खिलाफ स्त्रियों के साथ पुरुष जाति प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हो। नाइयों के कई संगठन सावित्रीबाई फुले द्वारा गठित महिला मंडल के साथ जुड़े। सावित्री बाई फुले और ‘महिला मण्डल’ के साथियों ने ऐसे ही अनेक आन्दोलन वर्षों तक चलाए व उनमें अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की।

28 नवंबर 1890 में ज्योतिबा फुले की मृत्यु होने के बाद भी सावित्रीबाई फुले पूरे सात साल समाज में काम करती रहीं। 1897 में महाराष्ट्र में भयंकर रुप से प्लेग फैल गया था, परन्तु सावित्रीबाई फुले बिना किसी भय के प्लेग-पीडितों की मदद करती रहीं। एक प्लेग पीडि़त दलित बच्चे को बचाते हुए स्वयं भी प्लेग पीडि़त हो गई। अंतत: अपने पुत्र यशवंत के अस्पताल में 10 मार्च 1897 को सावित्रीबाई फुले की मृत्यु हो गई।

ज्योतिबा-दम्पति संतानहीन थे। उन्होंने 1874 में काशीबाई नामक एक विधवा ब्राह्मणी के नाजायज बच्चे को गोद लिया। यशवंतराव फुले नाम से यह बच्चा पढ़लिखकर डाक्टर बना और आगे चलकर फुले दम्पति का वारिस भी। महात्मा फुले के निधन के बाद सावित्रीबाई ने बड़ी मजबूती के साथ इस आन्दोलन की जिम्मेदारी सम्भाली और सासवड, महाराष्ट्र सत्य-शोधक समाज के अधिवेशन में ऐसा भाषण दिया जिसने दबे-पिछड़े लोगों में आत्म-सम्मान की भावना भर दी।

सावित्रीबाई का दिया गया यह भाषण उनके प्रखर क्रांन्तिकारी और विचार-प्रवर्तक होने का परिचय देता है। सावित्रीबाई प्रतिभाशाली कवियित्री भी थीं। इनके कविताओं में सामाजिक जन-चेतना की आवाज पुरजोर शब्दों में मिलती है। उनका पहला कविता-संग्रह सन 1854 में ‘काव्य फुले’ नाम से प्रकाशित हुआ और दूसरी पुस्तक ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ शीर्षक से सन 1882 में प्रकाशित हुआ।


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