युद्ध क्षेत्र में आदिवासी जिंदगियां

पीयूडीआर की मार्च 2015 की रपोर्ट

 

उग्रवाद से निपटने का हमेशा से ही यही मतलब होता है कि सुरक्षा बलों द्वारा उन्हीं लोगों को निशाना बनाया जाता है जिनकी सुरक्षा के लिए उन्हें लगाया जाता है। हर बार जब किसी बम धमाके से मौतें हो जाती हैं तो सुरक्षा बल गांव वालों पर हमला कर देते हैं। विडंबना यह है कि सुरक्षा बल असल में वहां आदिवासियों की तथाकथित सुरक्षा के लिए तैनात किए गए हैं! साफ है कि उद्देश्य आदिवासियों की राज्य का विरोध करने की इच्छाशक्ति को खत्म करना और उन्हें आधिकारिक प्रयासों को स्वीकार करने के लिए तैयार करना है।

इस स्थिति में जबकि आधिकारिक रूप से ऐसा मानने से इंकार किया जा रहा है कि बस्तर युद्ध क्षेत्र है, वहां कानून का शासन होने की संभावना ही नहीं रहती। इस तरह से एक ‘काफकाई’ स्थिति बन जाती है जिसमें कानून की पूरी ताकत आदिवासियों को निशाना बनाने में लगी है और कार्यकारिणी सैनिकों और अफसरों पर उनके द्वारा किए जा रहे युद्ध अपराधों के लिए अभियोजन चलाने की इजाजत न देकर उन्हें बचाने में लगी है। क्योंकि यह माना ही नहीं जाता कि यह युद्ध की स्थिति है, मानक नियमों का पालन ही नहीं किया जाता।

यहां ध्यान देने की जरूरत है कि हालांकि सभी सुरक्षा बल हथियारबंद होते हैं, आदिवासियों को अनुसूचित क्षेत्र में अपने परंपरागत हथियार जैसे धनुष बाण तक ले कर चलने नहीं दिया जाता। इस तरह की सैन्य तानाशाही जिसमें एक संवैधानिक अधिकार को आपराधिक कार्यवाही बना दिया जाता है सिर्फ युद्ध में ही संभव है।

यह साबित हो गया है कि युद्ध क्षेत्र में सैन्य बल ही सारे फैसले लेते हैं। दूसरी यूपीए सरकार के योजना आयोग ने इंटीग्रटिड एक्शन प्लान (आईएपी) की परिकल्पना की जिसके तहत उन जिलों में जहां माओवादी/नक्सलवादी सक्रिय हैं, ग्राम सभाओं को साथ में लेकर ‘विकास’ के काम शुरू किए जाने की कोशिश शुरू हुई।

अभी तक आईएपी कलेक्टर, पुलिस सुप्रिंटेंडेंट और जिला वन अधिकारी की तिगड़ी द्वारा गृह मंत्रालय के दबाव में लागू किया जाता रहा है और इसके लिए यह तर्क दिया जाता है कि ज्यादातर जगहों में स्थानीय निकाय या तो हैं ही नहीं या फिर बेहद कमजोर है।

अब मौजूदा एनडीए सरकार के राज में सैंट्रल पैरामिलिटरी फोर्स को भी आईएपी के खर्चे के बारे में अपनी राय देने का हक मिलेगा। और पहले जबकि पैसे का वितरण जिले के स्तर पर होता था अब यह वितरण ब्लॉक के स्तर पर होगा। इससे पैसे के वितरण में मिलिटरी की भूमिका बढ़ेगी।

5वीं अनुसूची, पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम 1996 (पेसा) और वन अधिकार अधिनियम 2006 (एफआरए) के तहत ग्राम सभाओं की बृहद आधिकारिक भूमिका की परिकल्पना थी। पर आज इसे पूरी तरह से नकार कर मिलिटरी को पैसों के आवंटन के अधिकार दे दिए गए हैं।

देश के कानून और न्यायपालिका भी अपने नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने में पूरी तरह से असफल रहे हैं। उल्टा कार्यकारिणी के युद्ध चलाने के अधिकार को संवैधानिक बना दिया गया है और युद्ध अपराधों में लगे सशस्त्र सैन्य बलों को किसी भी तरह की कार्यवाही से बचाने की कानूनी प्रतिरक्षा को मजबूत बना दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी चिंता जाहिर करने के लिए पीडि़तों को मुआवजा दिलाने या मुआवजे की रकम बढ़ाने से ज्यादा कभी कुछ नहीं किया है।

ट्राइबल अफेअर मिनिस्ट्री की उच्च स्तरीय समिति ने इस ओर इशारा किया कि तथाकथित ‘नक्सलवादी अपराधों’ के आरोपियों को न्यायालय आसानी से जमानत नहीं देते, जबकि असल में ‘नक्सलवादी अपराध’ कोई अपराध नहीं हैं, इस परिभाषा का इस्तेमाल केवल माओवादियों के समर्थन या हमदर्द होने के नाम पर लोगों को आईपीसी, आर्म्स ऐक्ट या ऐक्सप्लोसिव सब्सटेंस ऐक्ट के गंभीर प्रावधानों के तहत पकडऩे के लिए किया जाता है। इस रिपोर्ट के अनुसार बीजापुर में रहने वाले सभी आदिवासी कानून की नजर में संदिग्ध हैं ओर कइयों को सिर्फ इसलिए पकड़ कर जेलों में डाल दिया जाता है।

मई 2012 में सुकुमा के कलेक्टर का माओवादियों ने अपहरण कर लिया था, उसके बाद राज्य की सरकार ने निर्मला बुच के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया जिसका काम छत्तीसगढ़ में विचाराधीन आदिवासी कैदियों के अभियोजन में देरी की जांच करना था। बुच समिति ने अपने इस सुझाव से कि गरीबी और बीमारी के आधार पर जमानत दे दी जानी चाहिए, कुछ राहत प्रदान की।

समिति अभी भी बीच-बीच में मिलती रहती है और विचाराधीन कैदियों के नामों की सूची जारी करती रहती है, जिनके लिए उनके अनुसार अभियोजन पक्ष को जमानत का विरोध नहीं करना चाहिए। परन्तु समिति ने आज तक स्थाई वारंट के मुद्दे की पड़ताल करने की कोशिश नहीं की है और न ही मामलों की न्यायिक समीक्षा की मांग उठाई है।

यह एक बहुत ही चिंता का विषय है कि आदिवासियों के रोजमर्रा के उत्पीडऩ और बीच-बीच में होने वाले नरसंहार की कोई खबर बाहर ही नहीं आतीं। सैन्य बलों द्वारा नियमित गश्त लगाना, सडक़ों और बसों में सुरक्षाकर्मियों की माजूदगी, काम की जगहों, घरों, खेतों पर या सफर करते समय लोगों को डराना धमकाना आदि से साफ दिखता है।

सलवा जुडूम की प्रत्यक्ष हिंसा की जगह किस तरह से लगातार, राजमर्रा की छिपी हुई हिंसा ने ले ली है। ‘बीच-बीच में और रोजाना’ की हिंसा और अधिकारों के हनन की दोहरी नीति से आदिवासी खुल कर बोलने और जानकारी बांटने से पूरी तरह डरने लगे हैं।

कई बार गांव वालों ने कहा कि वह व्यक्ति उनके बारे में हमसे बात करेगा। वे केवल तभी बोलते है जब उनसे सवाल पूछे जाते हैं या फिर उन्हें कुछ खास कहना होता है। दूसरी ओर उन्हें अपने क्षेत्र के बारे में कोई भी आधिकारिक जानकारी नहीं दी जाती।

उदाहरण के लिए लोगों को डर है कि पोलावरम बांध से 300 गांव डूब जाएंगे, पर सेन्ट्रल एम्पावरमेंट कमिटी 2006 के अनुसार बांध से 4 बस्तियों के 2335 परिवारों के 11, 766 लोग प्रभावित होंगे। सच क्या है? क्या डर बेवजह है? अगर ऐसा है तो लोगों के डर और असुरक्षा को शांत करने के लिए उन्हें कोई भी जानकारी क्यों नहीं दी गई है?

पूरी जांच के दौरान बार-बार यह सामने आया कि सुरक्षा बलों को लोग शिकारी मानते हैं। ग्रहान्ड और कोबरा जैसे उनके नाम अपने आप में यही संदेश देते भी हैं। यह सच में चौंकाने वाला है कि सीआरपीएफ जैसा सामान्य नाम भी यहां तुच्छ बन गया है। क्या ये सुरक्षा बल असल में उस काम को अंजाम दे रहे हैं जिसके लिए इन्हें तैनात किया गया है?

क्या होगा अगर इस क्षेत्र में खनन और पर्यावरण के ह्वास के काम को और तेज करने के लिए लोगों को चुप करने के प्रयास के खिलाफ लोग खड़े हो जाएं? क्या सैनिकों और अफसरों को इस विवाद के बारे में कुछ पता भी है? क्या उनकी अपनी भी कुछ राय है?

इन सवालों के कोई मायने नहीं हैं। झारखंड के सारंडा इलाके में यही हुआ, जहां से 2011 में माओवादी बाहर हो गए और 19 कैंपों के माध्यम से सीआरपीएफ अंदर पहुंच गई और खनन का काम चल निकला। छत्तीसगढ़ के रावघाट क्षेत्र में यही प्रक्रिया जारी है, जबकि यहां इसका विरोध हो रहा है और इसी तरह से हमारी जांच के क्षेत्र बैलाडिला खनन क्षेत्रों के चारों तरफ भी यही स्थिति है।

इस उद्यम में कुछ भी नेक नहीं है। बल्कि जिस तरह से भारतीय फौज किसी क्षेत्र को साफ कर देती है ताकि विकास के एक विवादित मॉडल को जबर्दस्ती लोगों के ऊपर थोपा जा सके, उसे केवल नीचता ही कहा जा सकता है।

तीन रातों और चार दिनों में नौ गांवों के दौरे से क्षेत्र की सूक्ष्म और वृहद वास्तविकताओं को पकड़ पाना संभव नहीं है। किन्तु, अगर हम इस दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करें की इस क्षेत्र में संवैधानिक अनुशासन से कार्यविधियां चलती ही नहीं है, तो हमें इन नौ गांवों से प्राप्त जानकारी पर्याप्त रूप से प्रतिनिधिक ही लगेगी।

युद्ध सभी धारणाओं को पैना बना देता है। क्षेत्र में जो स्थिति है उसके अलावा कुछ हो ही नहीं सकती क्योंकि युद्ध में केवल ‘मारो या मरो’ का नियम काम करता है। मौत की संभावना हर समय मंडराती रहती है।

जब तक कि दो वर्दी वाले बल गुरिल्ला युद्ध चला रहे हैं दोनों को ही, अगर वे अपने महान लक्ष्यों के प्रति ईमानदार हैं, विशिष्ठ मानकों का पालन करना चाहिए। दोनों पक्षों के लिए ही आम नागरिकों की जिंदगियों को खतरे में डालना वर्जित है। मौजूदा संदर्भ में हालांकि दोनों ही पक्षों ने गलतियां की हैं, सभी विवरण यही बताते है कि माओवादियों ने बहुत कम नुकसान पहुंचाया है और उन्होंने आम नागरिकों के प्रति अधिक जिम्मेदारी से काम किया है।

सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने भी युद्ध अपराध किए हैं पर उनसे आम लोगों को डर नहीं हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे आदिवासी समाज का ही हिस्सा है। यही बात उन्हें सरकारी सैन्य बलों से अलग कर देती है।

विरोधाभास यह है कि सरकार विकास शुरू करने से पहले युद्ध चलाए रखने और नक्सलवाद को खत्म करने के पक्ष में है। इसलिए निजी कॉरपोरेट कंपनियों ने अपनी परियोजनाओं को तब तक के लिए ठंडे बस्ते में डाला हुआ है जब तक कि जंगलों में से माओवादियों का सफाया न हो जाए। ऐसा इस डर के कारण है कि जैसे ही ये परियोजनाएं शुरू होंगी आदिवासियों का विरोध शुरू हो जाएगा।

परन्तु सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम इस इलाके में अपना काम फैला रहे हैं। बैलाडिला में दो नई खानों में उत्पादन शुरू होने वाला है और एमएमडीसी-सीएमडीसी नगरनार में अपना एकीकृत स्टील प्लांट शुरू करने वाले हैं।

सरकार जिस विकृत विकास को थोपने में लगी है वह असल में जंगल की जमीन को कॉरपोरेट कंपनियों द्वारा दोहन के लिए खोलने की नीति के अलावा कुछ नहीं है। बस्तियों में आदिवासियों की जनसंख्या के घनत्व के कम हो जाने से कॉरपोरेट्स के लिए समतल जमीन पर कब्जा जामाना आसान हो जाता है।

इसी उद्देश्य से स्थानीय अर्थव्यवस्था, खासकर कृषि को मन्द कर दिया गया है। इसे गहन मिलिटरी कार्यवाहियों के साथ में होने वाली क्षति (कोलैट्रल डैमेज) या स्वीकार्य परिणाम के रूप में देखा जाता है। वरिष्ठ पुलिस अफसरों, कमांडरों और सरकारी अधिकारियों के आम नागरिकों को माओवादियों से बचाने के पाखंडी दावे इस भयावह यथार्थ को छिपा लेते हैं।

माओवादी खेती में विध्न नहीं डाल रहे, असल में सरकारी सैन्य बल ऐसा कर रहे हैं। सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस तरह का व्यवहार आदिवासियों की रक्षा करने से संबंधित हर कानून और संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन है। बच्चों को खाना और आश्रय घरों में भी मिल जाता है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की भी व्यवस्था थी। इस व्यवस्था को और मजबूत करने की जगह स्कूलों को जानबूझ कर बर्बाद कर दिया गया है और बच्चों को आश्रम वाले स्कूलों में पढऩे के लिए मजबूर कर दिया गया है।

इस तरह से बच्चों को अपनी संस्कृति से जुड़े प्राकृतिक परिवेश और अपने घरों की सुरक्षा से दूर कर दिया गया है। उन्हें बंद जगहों में रह कर नियंत्रित जिंदगियां जीने के लिए मजबूर कर दिया गया है। उनके भौतिक परिवेश को रहने लायक बना कर उन्हें मुख्यधारा में शामिल करना क्या एक किस्म की मत शिक्षा का ही संकेत नहीं है? यह तथ्य कि यह ‘स्थाई विकास’ के आश्वासन और वादे का मजाक है, सरकार को बिल्कुल भी परेशान नहीं करता।

यह कोई राज की बात नहीं है कि ऑपरेशन ग्रीन हंट का एक बुनियादी मकसद खनन में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (फॉरेन डाइरेक्ट इन्वेस्टमेंट या एफडीआई) को आकर्षित और सुनिश्चित करने की नीति है। इस ऑपरेशन और माओवादियों के खिलाफ जंग से लोगों को होने वाली परेशानियों के अलावा, लौह अयस्क खनन के कारण पर्यावरण के प्रदूषण का खतरा बढ़ रहा है। जैसा कि पहले बताया गया है एनएमडीसी और सीएमडीसी बैलाडिला पहाडिय़ों में दो खानें शुरू कर रहे हैं। मिलिटरी का उद्देश्य इनके निवेश की रक्षा करना है।

इससे किरन्दुल और बचेली में एनएमडीसी की दो बड़ी ओपन कास्ट खानों से पर्यावरण को होने वाले नुकसान, जिसमें शंखिनी और डंखिनी नदियों का प्रदूषण शामिल है और बढ़ जाएगा। जमीन और जंगल के मुद्दों पर, जो कि आदिवासी जीवन की स्व-अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है और जो उनकी पहचान को पोसता है, आज उस पर हमला हो रहा है।

उनका भविष्य अपनी जमीन से बेदखल कर दिया जाना या सिमटते जंगलों और बर्बाद होते पर्यावरण के कारण अपनी जमीन से हटने को मजबूर होना ही है। आदिवासियों को अपने भविष्य के बारे में कुछ तय कर पाना तो दूर, अपने हित में अपना मत रखने तक से सक्रिय रूप से वंचित किया जा रहा है जबकि इस विकास के परिणाम उन्हें ही भुगतने पड़ेंगे।

इन 9 गांवों के अलावा बाकी बस्तर की स्थिति में भी खास फर्क नहीं है। कुछ अंतर जरूर हैं परन्तु समानताएं ज्यादा हैं। कानूनी लड़ाई वारंट और फरार होने की है, जो कि उतनी ही हिंसक है जितनी कि लाठी और गोली की होती है और जैसा कि उनकी संख्या बताती है शायद ज्यादा प्राणघातक है।

3 से 7 लाख बिना नाम के लोगों को फरार बताना इस बात का सूचक है कि राज्य पूरी तरह से निरंकुश हो गया है। क्या ऐसा नहीं है? केन्द्र सरकार ऐसा मान सकती है कि उसके सैन्य बल 3 सालों में नक्सलवाद का सफाया कर देंगे, पर इस क्षेत्र में लोग कमलेश झाड़ी के शब्दों पर विश्वास करते हैं, ‘आप आदमी को मार सकते हैं, विचारधारा को नहीं।

दक्षिण कोसल के मई-2015 के अंक में प्रकाशित हो चुकी है।


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