क्या रावघाट खनन परियोजना आदिवासी नश्ल विरोधी है?
सुशान्त कुमाररावघाट माइंस के खुलने से होने वाले पर्यावरण, जैविक और आदिवासी हितों को नुकासान से संबंधित एक महत्वपूर्ण पत्र स्थानीय आदिवासियों ने कलेक्टर नारायणपुर और उत्तर बस्तर को सौंपा है। इस पत्र में प्राकृतिक संसाधन और संपत्ति को होने वाले दीर्घकालीन क्षति को दर्शाया है। पत्र में यह दर्शाया गया है कि किन कारणों से हमें इस माइंस के दूरगामी परिणामों को मद्देनजर रखते हुवे माइंस खनन के कार्य को रोक देना चाहिए। सवाल उठता है कि इस पत्र पर स्थानीय कलेक्टर जो जिलों के हित में प्रशासनिक शक्ति रखते हैं क्या इस पत्र के प्राप्ति के साथ प्रभाव से इस खनन कार्य को रोकने में सक्षम होंगे या फिर इस कार्य को कार्पोरेट और सरकार के हित में यूं ही चालू रखा जाएगा?

पत्र में आदिवासियों में दर्शाया है कि रावघाट खदान से प्रभावित क्षेत्र के लगभग सभी लोगों का विचार है कि रावघाट माइनिंग में 15 वर्षों से समस्या निवारण निम्न बिंदुओं पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
आदिवासी कहते हैं कि रावघाट में पूर्वजकाल से राजाराव बाबा जिसको आदिवासी देवता के रूप में मानते हैं जिसके कारण पूरे माइनिंग क्षेत्र के पहाड़ को ही देवता के रूप में मानते आ रहे हैं और भविष्य में भी इस देव स्थल का किसी भी कीमत में सौदा नहीं करेंगे ना ही क्षति होने देंगे। इस संदर्भ में आदिवासी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुवे तर्क देते हैं कि यह नैसर्गिक क्षेत्र उनके मौलिक अधिकार का हिस्सा भी है।
जीवन और जीवकोपार्जन का वास्ता देते हुवे आदिवासियों ने बताने कि कोशिश की है कि आदिवासियों के जीवन का एकमात्र साधन रावघाट पहाड़ी का लघु वनोपज है जिससे उनके पूर्वज और आज का आदिवासी समाज जुड़ा हुवा है। आदिवासियों ने पत्र में बताया है कि महुआ - टोरा, आंवला, चार - चिरौंजी, तेंदू सहित कई प्रकार के कंदमूल आदि का संग्रहण आसानी से इस क्षेत्र में मौजूद संसाधनों के बलबूते हो जाता है और इस तरह उनका जीवनयापन चल रहा है।
आदिवासी पूरी दूरदृष्टि के साथ कहते हैं कि रावघाट माइनिंग खुलने से उनके जीवनयापन का सारा साधन छीन जायेगा। इसलिए आदिवासी इस खनन परियोजना का विरोध करते हैं।
जीवन और चिकित्सा से जुड़े सवालों पर कहते हैं कि लघु वनोपज के साथ पहाड़ों में कई प्रकार की औषधियों का भंडार है जिसके कारण आदिवासी कई बीमारियों का इलाज औषधि के माध्यम से अभी भी कर रहे हैं। आदिवासियों ने अपने दीर्घ स्वस्थता का खुलासा करते हुवे कहते हैं कि सारे रोगों का इलाज आदिवासी ग्राम स्तर से इन जंगलों से प्राप्त औषधियों से करते हैं।
आदिवासियों ने पत्र में बताने की कोशिश की है कि रावघाट माइनिंग की शुरूआत किये जाने की स्थिति में सम्पूर्ण औषधि नष्ट हो जायेगा और आदिवासी ऐसा कुछ भी मनुष्य जाति के खिलाफ गतिविधियों को होने नहीं देंगे।
अपने वास स्थान के संबंध में गंभीरता के साथ बात करते हुवे कहते हैं कि -‘हमारे रावघाट क्षेत्र में आदिवासी लोग पहाड़ के ऊपर स्थित मैदानी क्षेत्र में खेती एवं कृषि कार्य करते हैं और घर का निर्माण भी करते हैं और पहले से ही कई गांव बसे हुए हैं। रावघाट माइनिंग से ये सभी खेती और मकान नष्ट हो जायेंगे और लोग गांव छोडऩे के लिए मजबूर हो जायेगे।’
इस बात को बड़े दमदारी के साथ रखते हुवे कहते हैं कि आदिवासी समुदाय के ग्राम अन्जरेल, पल्लाकसा और अन्य गांव पहाड़ के ऊपर बसे हुए हैं ये सभी माइनिंग से प्रभावित होंगे।
पर्यावरण प्रदूषण के आशंकाओं पर अपनी समझ रखते हुवे आदिवासी कहना चाहते हैं कि रावघाट माइनिंग शुरू की जाएगी तो इस क्षेत्र का वातावरण प्रदूषित हो जायेगा जिसके कारण प्रभावित क्षेत्र के लोगों को कई प्रकार की गंभीर बीमारियां होगी जैसे अस्थमा, कैंसर व सांस की कई गंभीर बीमारियों तथा नदी - नालों में गन्दगी फैलेगी। जिसके कारण यह आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में असमय परेशानियाँ लौट आएगी।
इन सारे बातों को इस पत्र में रखने के साथ आदिवासी अपने चिरकालीन अनुभव तथा आसपास संचालित माइनिंग से प्रभावित क्षेत्रों का जायजा और अध्ययन का हवाला दिया है। और इस तरह न्यायसंगत ढंग से इसका पूरजोर विराध की बात कही है।
आदिवासी इस पत्र में कहते हैं कि खदान से विकास नहीं बल्कि नुकसान ही नुकसान होगा। वे कहते हैं कि रावघाट माइंस से 22 गोद ग्राम के अतिरिक्त भी बहुत बड़ा क्षेत्र प्रभावित होगा। खनन से संबंधित प्रक्रियाओं के परिणामों के कारण आर्थिक, सामामजिक और पर्यावरणीयरूप से एक विशाल स्थानीय आबादी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होगी। यहां की जल, मिट्टी और वायु की गुणवत्ता में गिरावट, जलधारा प्रवाह में कमी और खनन के कारण भू -जल स्तर में गिरावट आने की आशंका दर्ज करवाई है।
अपने अध्ययन के दौरान वे यहीं नहीं रूकते हैं बल्कि कहते हैं कि जनसंख्या में वृद्धि और खनिज परिवहन के प्रदूषण के कारण विद्यमान अधोसंरचना और संसाधनों पर अधिक बोझ होगा। इन नकारात्मक प्रभावों से बचने के लिए हम इस माइंस का विरोध करते हैं। यह अध्ययन आदिवासियों में निश्चित तौर से वैज्ञानिक समझ को दर्शाता है।
आदिवासी अधिसूचित क्षेत्र में अपने स्वशासन और मालिकाना के अधिकार के तहत अपने प्राप्त अधिकारों पर कहते हैं कि वन अधिकार मान्यता कानून 2006 के अंतर्गत इस क्षेत्र के निवासियों को कई वनाधिकार प्राप्त हैं, जैसे कि जंगलों में निस्तार, गौण वन उत्पादों का संग्रहण, चारागाही का और जलाशयों में मछली पकडऩा, सामुदायिक वन संसाधनों का दावा एवं सत्यापन की प्रक्रिया, विविधता से संबंधित बौद्धिक सम्पदा और अन्य पारंपरिक अधिकार प्राप्त हैं।
उनका कहना है कि तमाम संवैधानिक अधिकारों के बावजूद रावघाट क्षेत्र के आदिवासी गांवों में सामुदायिक वन अधिकार, सामुदायिक वन संसाधन अधिकार के दावा एवं सत्यापन की प्रक्रिया अपूर्ण है। इस स्थिति में रावघाट माइंस का चालू होना गैरकानूनी है।
आवाजाही पर आदिवासियों का मानना है कि लौह अयस्क परिवहन के लिए रोड निर्माण किया जा रहा है जिससे आदिवासी समाज लगातार प्रभावित हो रहे हैं। आदिवासियों ने इस महत्वपूर्ण पत्र में बताया कि घर, खेत एवं बाड़ी इस निर्माण कार्य से प्रभावित हो चुके हैं। आदिवासियों ने आशंका जताया कि -‘जब परिवहन शुरू होगा तब हमारे घर खेत बाड़ी जो सडक़ से एकदम लगे हैं वे नष्ट हो जायेंगे। हमारे बच्चे उसी रास्ते से आते जाते हैं। जिसके कारण गंभीर हादसे होने का डर है।’
आदिवासियों ने अपने 8 सूत्रीय मांग पत्र में सभी कारणों का विस्तार से व्याख्या की है और शासन प्रशासन को बताने की कोशिश की है कि यह रावघाट खनन परियोजना किस कारणों से आदिवासी विरोधी है। आदिवासियों ने स्पष्ट किया है कि ग्राम सभाओं ने अभी तक रावघाट माइंस परियोजना को सहमति नहीं दी है और आज भी उनका भरपूर विरोध कर रहे हैं।
आदिवासियों ने अगाह किया है कि संविधान के 244 (1) में दर्ज पांचवी अनुसूची के अंतर्गत इस क्षेत्र में ग्राम सभाओं के अनुमति के बिना माइंस संचालित करना गैरकानूनी है। इस खनन परियोजना से संबंधित तमाम तकलीफों को पत्र में विस्तार से दर्ज कर इसकी प्रति आदिवासियों ने सूचनार्थ मुख्य सचिव पर्यावरण मंत्रालय, इंदिरा पर्यावरण भवन 166 जोरबाग रोड ब्लॉक 17 लोधी कॉलोनी, नई दिल्ली तथा छत्तीसगढ़ में मुख्य सचिव छत्तीसगढ़ शासन, महानदी भवन, मंत्रालय नया रायपुर को प्रेषित किया है।
बहरहाल देखना बाकी है कि प्राकृतिक संपत्ति और संसाधन को बचाने के लिए रावघाट खनन परियोजना को क्या सरकार प्रभाव से रोक लेगी या फिर आदिवासी इस आत्मघाती खनन परियोजना को रोकने में सक्षम होंगे?
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