मोतीपुर रेलवे क्रासिंग बंद नहीं करने की उठी मांग 

द कोरस टीम

 

इधर पटरीपार मोतीपुर, गौरीनगर और स्टेशनपारा के लोगोंं में एक जनवरी से रेलवे क्रांसिंग बंद होने की चर्चा है, लेकिन अब तक स्थानीय रेलवे स्टेशन के समक्ष क्रांसिंग को बंद करने संबंधी किसी तरह का आदेश नहीं पहुंचा है। 

कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ राज्य अल्पसंख्यक आयोग सदस्य हफीज खान एवं गौरीनगर के पार्षद समद खान की अगुवाई में गौरीनगर स्टेशनपारा के नगारिकों ने भी रेलवे क्रासिंग बंद नहीं करने की मांग को लेकर स्टेशन प्रबंधक को ज्ञापन सौंपा था। बताया जाता है कि उन्होंने रेलवे स्टेशन पहुंचकर नागरेबाजी की थी एवं अंडरब्रिज बनाने की मांग की थी। उन्होंंने अंडरब्रिज नहीं बना तो उग्र आंदोलन की चेतावनी दी थी। 

मोतीपुर रेल्वे क्रांसिग (समपार) बंद के विरोध में नागरिक संघर्ष समिति द्वारा 24 दिसम्बर से इस जनान्दोलन के प्रथम चरण की शुरुआत हस्ताक्षर अभियान से की गई। अभियान के पहले दिन करीब 721 आक्रोशित महिला - पुरूष, छात्र - छात्राएं हस्ताक्षर अभियान में शामिल हुए। 

छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के उपाध्यक्ष शेख अंसार कहते हैं कि भारतीय रेल का यह बयान एकदम खोखला है कि हमने पहले वैकल्पिक व्यवस्था किया है,  तत्पश्चात रेल्वे क्रांसिग बंद कर रहे। चलिये थोड़ी देर के लिए बिना खंडन किये आपके इस तर्क को मान भी लिया जाये, आप तो पटरी पार के एक छोटी सी आबादी को   बमुश्किल अण्डरब्रिज से पार करा पा रहे हैं। केवल पार कराने को ही वैकल्पिक व्यवस्था नहीं मानी जा सकती?  सैकड़ों व्यापारी, सैकड़ों फल - सब्जी विक्रेताओं, हजारों रोजी - मजदूरी करने वालों के लिए कहां है वैकल्पिक व्यवस्था?

आपके इस फैसले से उनका जीवकोपार्जन का साधन तत्काल छिना जा रहा है। फिलहाल हम इस तर्क से पूरी तरह असहमत हैं कि यह तो रेल मंत्रालय का फैसला है बंद होकर रहेगा। अंसार कहते हैं कि बिना लड़े मान लेना अकर्मण्यता होगी। रेल मंत्रालय, केन्द्र सरकार का महज एक मंत्रालय है। लोकतंत्र में और लोकहित में हमने इतिहास में समूचे केन्द्र सरकार को झुकते और अपना फैसला पलटते देखा। 

मोतीपुर के पार्षद रंजू यादव कहती है कि मेरे वार्ड के आम नागरिक रेल्वे क्रांसिंग बंद हो जाने की सूचना से उद्वेलित हैं। लोकहित में मोतीपुर रेलवे कांसिंग स्थाई तौर पर बंद ना हो इस दिशा में आवश्यक कार्यवाही करें।

एल्डरमेन झम्मन देवांगन कहते हैं कि क्रासिंग के बंद हो जाने से मुख्य मार्ग का व्यापार, फुटकर सब्जी व्यवसाय से जुड़े लोगों के जीवकोपार्जन का साधन तत्काल छिन जाएगा। पटरी पार कर प्रतिदिन रोजी मजदूरी के लिए जाने वालों को भी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा, छोटे-छोटे स्कूली बच्चों को स्कूल जाने में तकलीफ होगी। आसपास के आम जनता को भी अन्य कार्यों से पटरी पार कर शहर की ओर जाना पड़ता है। इसके बंद होने से आम जनमानस को कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। 

पूरखों की जमीन और रेल मंत्रालय!

भारत में पहली रेलगाड़ी (जो एशिया महाद्वीप के लिये भी पहली रेलगाड़ी थी) 21 तोपों की सलामी के साथ 16 अप्रैल 1853 को बम्बई और थाने मध्य चलाई गयीं।  भारतीय रेल के विस्तार का पहिया 1871 के उस सर्वे से दौडऩा आरंभ हुआ जो नागपूर से राजनांदगांव के बीच रेलपटरी के निर्माण से हुआ था। 

कब हुआ मोतीपुर से गुजरने वाली पहली रेल लाईन का जन्म

यहां यह बताना बेहद प्रासंगिक होगा कि मोतीपुर से गुजरने वाली पहली रेल लाईन (पटरी) का निर्माण अप्रैल 1880 मे हुई। राजनांदगांव रेल्वे स्टेशन के मुताबिक यह रेलपांत अप लाईन कहलाती है। दूसरी रेल लाईन (पटरी) का निर्माण आजाद भारत में हुआ। तीसरे रेलपटरी का निर्माण कोरोनाकाल मे और रेल मंत्रालय के अनुसार नवम्बर 2021 को हुई है। पहली पटरी, दूसरी पटरी, तीसरी पटरी और अब चौथी पटरी हमारी ही छाती खोदकर बनाये गये हैं। ये सारी जमीनें हमारे पूरखे किसानों की जमीनें थी। कुछ लोगों को यह कहते सुना जा सकता है कि रेलमार्ग, (बीएनआर, बंगाल नागपूर रेल्वे) बीएनसी मिल्स यह सारे रियासत कालिन है राजा साहब ने बनवाए। बेशक...! 

राजनांदगांव रियासत और रेल लाइन

राजनांदगांव रियासत की स्थापना 1765 में महंत प्रहलाद दास बैरागी ( प्रथम ) से होती है। 22जनवरी 1958 को महंत राजा दिग्विजय दास बैरागी के निधन से एक तरह से रियासत कालिन प्रशासन का अवसान होता है। शेख अंसार कहते हैं कि राजनांदगांव रियासत और दिवंगत राजाओं के शान के खिलाफ कुछ कहने की गुश्ताखी किये बिना पुरजोर तरीके से हम यह कहना चाहते हैं कि सरकारें आयेगी और जायेगी, जनता अमर हंै यह सरकारों की तरह पांच सालों की नहीं होती है। जनता का ज्ञात इतिहास पांच हजार वर्षों का है और भविष्य भी हजारों वर्षों का होगा। लिहाजा आम - ओ - खास से पुरजोर तरीकें से अपील है कि रेल्वे क्रांसिग (समपार) बंद के विरोध में चल रहे इस आन्दोलन को तहेदिल से समर्थन करिये।


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