भीड़ की हिंसा से सच और झूठ के बीच फर्क करना हो जाएगा मुश्किल


 

दुकानदार ने अगर जातिसूचक गाली गलौच किया है तो उसका विरोध तो होना ही चाहिए। उसके लिये कानून और व्यवस्था है। यदि लिंचिंग का समर्थन करेंगे, तो सवाल उठता है सभी न्याय के नाम से जो कुछ कर रहे हैं वह सही ही हैं? लेकिन स्वभाविक रूप से किसी भी व्यक्ति द्वारा उसकेे गलत काम का विरोध होना चाहिए। लिंचिंग का समर्थन हर हाल में बुरा है, संविधान और कानून इसीलिए बनाया गया है ताकि हम संविधान और वर्तमान कानून और व्यवस्था के हिसाब से अपने अधिकार को हासिल कर सकें। 

वीडियो में जो लोग मारपीट रहे हैं, उनके मुंह से मां बहन की भद्दी गालियां दी जा रही है, वह कहां तक जायज है? किसी ने टिप्पणी की है कि बस मां  - बहन की गलियों का उपयोग मत करो। हमारे गुरु बाबा ने अहिंसा की शिक्षा दी थी, लेकिन आत्मरक्षा और आत्मसमान के लिए हमें शस्त्र चालन भी गुरुओं द्वारा ही सिखाया गया है। यहां शस्त्र चालन किसी भी व्यक्ति और संगठन द्वारा गैर कानूनी है।

इस मामले में एक बात समझने की है कि अगर उसने गलती किया है तो पुलिस और कानून है, दूसरी बात की कभी कभी ऐसा होता है कि हम जब बहुत उग्र होते हैं तो हमसे दो काम होता है, एक हमारे क्रोधित होने से भीड़ इकट्ठी हो जाती है और वह सामूहिक हिंसा में तब्दील हो जाती है। दूसरी बात 2-4 थप्पड़ मारकर छोड़ देना अलग बात होता है, लेकिन कोई भीड़ अगर हिंसा और हत्या में तब्दील हो जाये तो समाज को नुकसान होता है। जान माल की क्षति होती है।

गनीमत है हत्या नहीं हुई, बाकि लिंचिंग या गाली गलौच का कोई भी सभ्य समाज समर्थन नहीं करता है। जातिगत टिप्पणी पर विरोध होना चाहिए और दोषी व्यक्ति पर एट्रोसिटी का मामला बनना चाहिए। लेकिन किसी महिला के खिलाफ बुरी और भद्दी गाली और विशेषकर सत्य के मार्ग चलनेवालों द्वारा इस घृणित घटना को न्यायसंगत ठहराना निहायत ही गलत है।

भीड़ द्वारा हिंसा का समर्थन किसी भी हालात में सभ्य समाज में मान्य नहीं है। यदि भीड़ का समर्थन करने लगे, तो अखलाक जैसे सैकड़ों भीड़ की हत्या और सरकार और सुरक्षा बलों द्वारा प्रायोजित हिंसा का समर्थन करना होगा।

हालांकि दोनों मामलों में अंतर है लेकिन सवाल यह भी है कि इस मामले में एट्रोसिटी एक्ट में कार्रवाई भी बनती है और भीड़ द्वारा हमले पर भी मामला बनता है। गंभीरता से देखा जाये तो ये हिंसा हत्या में बदल सकती थी। किसी भी तरह की हिंसा को हमें स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। 

देश में सभी धार्मिक और साम्प्रदायिक विचारधाराओं के लोगों की टिप्पणियां उग्र हुवा करते हैं और वे बर्बर व्यवहार में भी उतर आते हैं जो साफ तौर पर ब्राह्मणवादी व्यवस्था और जाति व्यवस्था के परिचायक हैं और उसकी दंभ की निशानी है और जिस तरह की गालियां और जिस तरह मारपीट हो रही है ये समूह बिल्कुल भी संवेदनशील प्रतीत नहीं होता है। 

अगर इस तरह की घटनाओं का संविधान समर्थकों द्वारा समर्थन करने लगे तो आए दिन हर कोई अपनी- अपनी जाति, धर्म, संप्रदाय, विचारधारा आदि के लिए हिंसा का रास्ता अपनाने लगेंगे और उससे भी एक कदम आगे भीड़ की हिंसा को अंजाम देने लगेंगे। यह घटना बदले की कार्यवाही से प्रेरित है, इस तरह के किसी भी घटना का विरोध तो होना ही चाहिए।  सही गलत की लड़ाई के लिए संविधान और कानून हैं, यदि लिंचिंग का समर्थन करेंगे, तो सच और झूठ के बीच फर्क करना मुश्किल हो जाएगा।


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