भारत में सतनामी संतों की परम्परा और संत गुरू घासीदासजी

 डॉ. रामायण प्रसाद टण्डन

 

आगे सतनामी परम्परा को अग्रसर करने में इन 12 महापुरूषों ने सतगुरू रविदासजी (1433) का इस धार्मिक क्रांति में पूरा-पूरा साथ दिया '. संत कबीर, 2. संत नामदेव, 3. संत सधना, 4.संत सेन, 5. संत पीपा, 6. संत धन्ना, 7. संत त्रिलोचन, 8. गुरू नानक, 9. संत ओहर, 10. साध्वी मीराबाई, 11. संत कमाल, 12.संत उदयदास - संत वीरभानजी (ई.1543 में गद्दी नशीन हुए) - संत जोगीदासजी (ई.1658 में गद्दी नशीन हुए) 1672 में अंग्रेजों से युद्ध - संत घासीदासजी का जन्म 18 दिसम्बर सन् 1756 ई.(मध्यप्रदेश में सतनामी गद्दी चलाई वर्तमान छत्तीसगढ़) - स्वामी अछूतानंदजी (ई.1879 से 1933) कानपुर में गद्दी चलाई। - स्वामी भगतसिंह आदिवासी (ई. 1882 से 1984) कानपुर से सतगुरू रविदास पंथ की गद्दी चलाई।

स्वामी रवि चरनदासजी - संत प्रेमदासजी - गुरू रतनसिंहजी इस प्रकार स्वामी भगतसिंहजी के पश्चात् अब सतगुरू रविदास पंथ का प्रचार सतगुरू रविदास गद्दी कानपुर से स्वामी रवि चसनदासजी, संत प्रेमदासजी तथा गुरू रतनदासजी कर रहे हैं। श्री इन्द्रराजसिंह (कबीर चौरा पृष्ठ 42) के अनुसार गुरू गोविंदसिंहजी ने साधो को सिक्ख बनने और शस्त्र धारण करने के लिए आह्वान किया था क्योंकि वह उस समय की पुकार थी, आवश्यकता एवं जरूरत थी। अहमदशाह ने अपनी बीजक के टीका में लिखा है कि गुरू गोविंदसिंहजी ने एक जगह ‘‘कबीर पंथ अब भयो खालसा’’कहा था।

वे साध सम्प्रदाय के ही लोग थे जिन्होने सर्वप्रथम अपने अस्तित्व का बलिदान देकर पांच-ककार ग्रहण किए थे। (केश, कंघा, कडा़, कटार, कच्छा) निर्मलों और उदासियों को भी साध सम्प्रदाय के अन्तर्गत समझा जाता रहा है। साध और दादू पंथी सिक्खों के समर्थक थे। डॉ. भगतसिंह बेदी (मध्यकालीन भक्ति काव्य की भूमिका पृष्ठ 136) के अनुसार उदासी, निर्मला, नामधारी, निरंकारी तथा राधा स्वामी आदि यह सभी सम्प्रदाय सिक्ख धर्म के साथ संबंधित है।(सतगुरू रविदास पृष्ठ 242)।  

इसी तरह आज सतनामी परम्परा को आगे बढ़ाने में आधुनिक नवजागरण के अग्रदूत मानव मसीहा छत्तीसगढ़ की धरा में जन्में महा मानव संत गुरूघासीदासजी ने अपनी वाणी में सतनाम का गुणगान किया तथा साथ ही लोंगों में सतनाम चेतना का संचार एवं प्रचार-प्रसार भी किया जो हमें सतनाम साहित्य, जन श्रुतियों, पंथी गीतों आदि के माध्यम से छत्तीसगढ़ी लोक भाषा में देखनें एवं सुनने को सहज रूप से मिलता है।

कबीर ने सतनाम रूपी बीज मंत्र को ही एक मात्र तारन मार्ग बताते हैं -

सतनाम को सुमिरतेे, उधरे पतित अनेक।
कह कबीर नहीं छाड़िए, सतनाम की टेक।। - (कबीर वाणी)

कबीर के पश्चात् सतनाम की धार्मिक व्याख्या करने वालों में पंजाब में सिक्ख धर्म के संस्थापक गुरू नानकजी (1467'538) का नाम बड़े आदर के साथ  लिया जाता है।

छत्तीसगढ की धरती में संत गुरू घासीदासजी, गुरू अमरदासजी एवं गुरू बालकदासजी के समय में एक वृहत् सतनाम आंदोलन चला था। जिसके प्रभाव से छत्तीसगढ़ की अनेक जातियाँ जिनमें तेली, कुर्मी, गोंड़ कंवर बिंझवार लोहार, चन्द्रनाहू, पनिका, ढीमर, राउत, कलार, नाई, धोबी, कुम्हार सहित सवर्ण समाज के लोग अर्थात ब्राम्हण, क्षत्रीय वर्गो के लोग भी सतनाम पंथ में शामिल हुए थे और जात-पात के बंधन को तोड दिए थे। और सतनाम धर्म रूपी वृहत सतनाम सागर में समा गये थे। यही वजह है कि आज भी छत्तीसगढ़ के लोगों में स्वतंत्रता ,समानता, समरसता, भाईचारा एवं साहिष्णुता की भावना से ओत-प्रोत आनंदित, खुशहाल एवं सतनाम मय दिखाई देता है। 

इस प्रकार सतनाम को सैद्धांतिक मान्यता दिलाने वालों में भारत में नारनौल शाखा के सतनामी संत बीरभान साहेब, कोटवा एवं बाराबंकी शाखा के सतनामियों में संत जगजीवन साहेब एवं छत्तीसगढ़ी शाखा के सतनामी परम्परा में संत गुरू घासीदासजी का नाम बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है। इन संतो ने दलित, पिछडे, आदिवासियों एवं उपेक्षित समाज के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सतनाम का सिद्धांत किसी जाति या समुदाय विशेष के लिए ही नही है वह तो मानव मात्र में कल्याण के लिए निमित सार्वभौमिक सिद्धांत है। जिसे अपनाकर कोई भी मनुष्य अपने जीवन को अर्थ पूर्ण, आदर्श एवं सफल बना सकता है।

पंथी गीतो में उल्लेखित है जो इस तरह से है-

                           तोर हंसा फँसे हे मया जाल , साहेब सतनाम ले ल हो।
                           जीना मरना नईये कछु हाथ , साहेब सतनाम ले ल हो।
                           दुनिया मा आ के नर तन पाके , करले कछु काम,
                           माटी के तन हावै, पाछु नई आही कछु काम 
                           दुख के घनेरा हे , सुख बहुत थोड़ा हे,
                           ढल जाही बेरा ये सुबह शाम , अब भी सुमरि ले सतनाम 
                           सहेब सतनाम ले ल हो़...।

भारतीय समाज में जहॉ एक ओर भोग विलास , कर्मकाण्ड, यज्ञ, हवन, हिंसा,पशु बलि, नर बलि, छल कपट, आडम्बर  अपनी चरम पर था तो दूसरी ओर लूट-पाट, अन्याय, अत्याचार, ऊँच-नीच, भेद-भाव, छुआ-छूत जैसी बिमारी समाज को नाश करते हुए और स्वस्थ, समदर्शी समाज के निर्माण के बतौर सतनाम पंथ  का अभ्युदय हुआ। लेकिन भारतीय समाज में इसके उपरांत आज भी विषमताएँ एवं असहिष्णुता विद्यमान है। किसी ने ठीक ही कहा है-                

                       तेरी इस दुनिया में ये मंजर क्यों है,
                       जख्म तो कही पीठ पर खंजर क्यों है...
                       सुना है तू हर जर्रे में हैं रहता फिर भी जमीं पर कही मंदिर तो 
                       कही मस्जिद क्यों है...
                       जब रहने वाले दुनिया के हर बंदे तेरे है फिर कोई किसी का 
                       दोस्त तो कोई दुश्मन क्यों हैं...
                       तू ही लिखता है हर किसी का मुकद्दर फिर कोई बदनसीब 
                       तो कोई मुकद्दर का सिकंदर क्यों हैं...

इस तरह सतनामी संतो की परम्परा के अंतर्गत भारत भूमि में अनेक संतो का अभ्युदय हुआ। जिन्होंने भारत के जन मानस में एक अलग पहचान बनाते हुए इन पूज्य संतो ने समस्त मानव समाज में मानवता का संदेश एवं सत उपदेश देते हुए सम्पूर्ण मानव समाज में समानता, समरसता, सद्भावना, स्वतंत्रता, सहिष्णुता एवं भाईचारा की भावना से ओत-प्रोत कर दिए थे। तथा समाज में फैलें अंधविश्वास, पाखंण्ड, रूढ़िवादिता, धर्मान्धता आदि की विसंगतियों को दूर करते हुए छुआ-छूत एवं ऊंच-नीच की खाई  को पाटने में समर्थ हुए थे।

लेकिन आज भारत भूमि की धरती पर फिर से धर्मान्धता साम्प्रदायिकता, विषमता एवं असहिष्णुता की भावना को बरकरार रखने में हमारे देश के कुछ तथाकथित असामाजिक तत्वों , धर्मान्धतावादियों, सम्प्रदाय वादियों एवं असहिष्णु विचार धारा के लोग विषमता का बीज बोने लगे हैं। तथा बहुत सारी अनेक वीभत्स घटनाओं को अंजाम देने लगे हैं। जो कि हमारे सतनाम संस्कृति और मानवतावादी परम्परा को कलुषित करने की मंशा बना लिए हैं, जिससे हमें सावधान रहने की जरूरत है।

और ये भारत के पवित्र संविधान जिसमें स्वतंत्रता एवं समानता की बात कही गई है, उसे दरकिनार करते हुए असहिष्णुता का परिचय देने लगे हैं। जो कि इनकी संकीर्ण भावना को दर्शाता है। अतः हमें ऐसे संकीर्ण मनोभावना का परित्याग करते हुए भारत की धरती पर जन्में भारतीय सतनामी संतो, गुरूओं एवं महापुरूषों की पावन परम्परा को कायम रखते हुए स्वच्छ, सुन्दर एवं खुशहाल मानव समाज निर्मित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दें।

इन्ही सद्भावनाओं के साथ...गीत...‘‘सतनाम सा नाम नहीं ,सतनाम धर्म सा धर्म। यथा सभी को चाहिए सदा करे सतकर्म।।   


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