बीएनसी मिल एक मिल नही मिल्स थी!

बीएनसी मिल की कहानी मजदूर नेता शेख अंसार की जुबानी

शेख अंसार, नेता छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा

 

हर दिन की तरह सुबह चलना शुरू किया, मिल तक जाकर ठहर गया, आगे चला ही नहीं गया। फिर भी सौ साल पीछे चले गया...?

कपड़ा खाता, घड़ी खाता, रंगघर, तरासन खाता, ब्लूरूम, बही खाता, वाडिंग, साईजिंग, मच्छरदानी, बॉयलर, गोडाउन, मैकेनिक, वारपिन, बण्डलिंग, मिक्सिंग, पावर हाउस, प्रोसेसिंग, टाईम ऑफिस, मालिक - मजदूर, मिस्त्री - हेल्पर, जॉबर - सुपरवाइजर, फैक्ट्री मैनेजर - जनरल मैनजर। जमीनी कार्यकर्ता होने के नाते किसी शोधार्थी की तरह समस्त मजदूरों के नाम खातावार कंठस्थ थे अब तो केवल उनके जीवन के शेष - अवशेष ही दिखाई देते है!

घर से निकलकर रेल पटरी पार करता हूं। पुराने सिग्नल के पास से पटरी पारकर जीएम ( महाप्रबंधक ) बंगला के पास वाले आवासीय परिसर से गुजरते हुए मिल के मुख्य द्वार की ओर जा रहा हूं। सोचने लगता हूं, महाप्रबंधक का बंगला प्रबंधन के अभाव में खंडहर हो गया है।

बीएनसी मिल्स के महाप्रबंधक के रूतबे की बानगी देखिये यदि वे कलकत्ता से आ रहे होते हैं तो रेलगाड़ी स्टेशन के ठहराव के बाद जीएम साहब को छोडऩे बंगले के ड्योढी तक रेलगाड़ी आती थी। यह परिसर चहुंओर से चाहरदीवारी से घिरे होने के बावजूद दर्जनों वालगार्ड तैनात होते थे।

अब मैं बीएनसी मिल्स के मुख्यद्वार पर था। प्रतिदिन की भांति मुझे पांच - सात किलोमीटर चलना है, लेकिन पता नहीं क्यूं मेरे कदम आज आगे नहीं बढऩा चाह रहे हैं। ऐसे अहसास तो तब होता है, जब मैं अपने माता - पिता से मिलने कब्रिस्तान जाता हूं। सैकड़ों मजदूरों के खून - पसीना उनकी उम्मीदें, भविष्य के सपने सब कुछ दफ्न हो गया इस मिल के साथ ...

यह मिल एक समय राजनांदगांव की पालनहार हुआ करती थी। जबसे इसकी सांसे थमी है, राजनांदगांव की आपेक्षित प्राकृतिक परिवर्तन जैसे मृतप्राय: हो गया। अब मिल का पोंगा नहंी बजता। अब पोंगा किसी को जगाता नहीं, और ना ही किसी मजदूर को काम पर बुलाता है।

बूढ़ा हो गया था तब भी यह मिल हर महीने के 10 तारिख और 25 तारिख को अपने सूती के कपड़े के बटुए से लाखों रूपये की धनराशि निकालता था और जब वह बांटता था तो हजारों को बांटता था, और हजारों में, तब यह नंद का गांव खिलखिला उठता था। मजदूर बस्तियों मे रौनक पूरे परवान पर होती थी। भीड़ देखते बनती थी, गुडाखू लाईन, कामठी लाईन, गोलबाजार की, गोलबाजार तो किसी अल्हड़ यौवना की भांति मारे खुशी के फुदकने - मचलने लगती थी।

जयस्तंभ चौक मानव मंदिर चौक सिनेमा लाईन में समूचे राजनांदगांव का रहवासी जनसमूह के मानिंद हिलोरें लेने लगता। मेरे इस तसव्वूर को एक लाईन में कोई यह कहकर खारिज कर सकता है कि सब समय - समय की बात है।

...अरे, हुजूर यह समय - समय की बात नहीं नीयत और नीति की बात है। घर का एक बेकार सबके परेशानी का सबब माना जाता है, यहां एक घर नहीं, एक परिवार नहीं, पूरा गांव समूचा राजनांदगांव बेकार हुआ है। काम नहीं होगी तो मजदूरी नहीं मिलेगी तो भूखमरी बढ़ेगी। और जब सब लोग काम करते हैं तो लोगों की क्रय क्षमता स्वाभाविक रूप से बढ़ती है, तो समाज खुशिहाली की ओर अग्रसर होती है।

और जब लोगों के हाथों से उनका काम छीन जाता है तो नतीजतन उनके हाथों से खरीदने की शक्ति शून्य हो जाती है, तब समाज भूखमरी का निवाला बनकर काल- कलवित हो जाता है। वीरान है, बीएनसी मिल्स का मुख्यद्वार, मुख्यद्वार के करीब उस जमाने का धर्मकांटा अधर्मियों की गलत नीतियों के चलते जमींदोश हो गया है।

चिल्हर कपड़ों के उस दुकान का अब कहीं कोई नामोनिशां नहीं है। स्वर्गीय बसंत बहेकर का आवास दिखाई दे रहा है, पार्टी की बात आजकल कौन करता है लेकिन बसंत बहेकर हॉकी के होनहार खिलाड़ी थे, अच्छे मृदुभाषी मिलनसार व्यक्ति थे। कभी - कभार ताराचंद जी (बसंत बहेकर के जीजाजी) से मुलाकात होने पर चर्चा हो जाती है।

कपड़े के रिटेलशॉप ( बीएनसी मिल्स ) पर धनराज शर्मा, बसंत बहेकर, मदनसिन्हा, जुबैर अहमद, फुलचंद, मंगलदास साहू और किशोरीलाल शर्मा काम करते थे। यहां से मिल मजदूर रियायत दरों में कपड़ा खरीदते उस कपड़े को वापरते भी थे, और बस्ती (शहर) के बड़े कपड़ा व्यापारियों के पास रूपये - दो रूपये अधिक लेकर बेच भी देते थे।

शहर के स्थापित दुकान के व्यापारी उसी कपड़े को बाजार के उतार - चढ़ाव के तासीर को समझकर दुगुने - तीगुने दामों पर बेच देते। रिटेलशॉप से व्यापारी तक पहुंचाने के काम में कुछ मजदूर साथियों के घर परिवार चल जाता था। रामकुमार सिन्हा, अलकू बाबा इसी काम के भरोसे अपने परिवार चला रहे थे। और भी कई लोग...

अनगिनत हरे - हरे विशाल सीसम नीम वृक्षों के बीच बहुत बड़ा कैंटीन था, जहां से चौबीसों घंटे मजदूरों को चाय उनके कार्यस्थल पर पहुंचाएं जाते थे, उस जमाने के कैंटीन के नियमित कामगार हरी देवांगन, होरीलाल, मनहरण भट्ट, गणेशू साहू थे।

उन दिनों जब बीएनसी मिल बंद होने के कगार पर थी तब हम लोगों ने जिला उद्योग संगठन और संयुक्त संचालक, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग, रायपुर से जानकारी निकाले थे, तभी यह जानकारी मिली कि छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल का 15 करोड़ रूपये का भुगतान नहीं होने के कारण बीएनसी मिल्स बंद हो रही है।

छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने और राजनांदगांव का एकमात्र उद्योग जब अपनी अंतिम सांसे गिन रहा था, तब केन्द्र सरकार में उद्योग मंत्री डॉ. रमन सिंह थे और राज्य में मुख्य मंत्री अजीत जोगी थे।


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