प्यार क्या है? - एक कल्पना, एक स्वप्न, एक फैंटेसी

प्रणय कृष्ण

 

इस टिप्पणी में ‘प्रेमकथा’ को केन्द्रित दो कारणों से किया गया है। एक तो इसलिए कि ये भरम टूटे कि ये यौन-संबंधों की अराजकता का वृतांत है। रूद्र और तस्लीमा की प्रेमकहानी यातनाओं की लम्बी सुरंग से गुजरकर लेखिका को जिस उदात्त भावनात्मक ऊंचाई तक ले जाती है, उसका रेखांकन इस भ्रम को तोडऩे के लिए बेहद जरूरी है। दूसरे, इसलिए कि इस ‘प्रेम-कहानी’ में लेखिका के आत्मविभाजन, और उससे निकलने की छटपटाहट के लिए आत्मकथा लिखने की प्रेरणा के बीज छिपे हुए हैं।

रूद्र से संबंध-विच्छेद के बहुत दिन बाद भी उसके खत के इंतजार करने के प्रसंग में लेखिका का ‘आत्मविभाजन’,उसका ‘द्विखण्डित’ होना सीधे शब्दों में अभिव्यक्ति पाता है-‘मुझे मालूम था कि पहले की तरह, अब किसी दिन भी, कोई खत मुझे नहीं मिलना है, फिर भी मेरे अंदर जड़ जमाकर बैठी हुई इच्छाएं, ढीठ बच्चों की तरह, जाने कैसे तो हड़बड़ाकर बाहर निकल आती थी। दरअसल यह मैं नहीं हूं, कोई और है, जो जानी-पहचानी लिखावट में खत न पाकर लम्बी उसांसें भरती रहती है। हर दिन डाकिए के सौंपे हुए खत हाथों में लेकर उसकी लम्बी-लम्बी उसांसों की आवाजें सुनती हूं। नहीं, वह आवाज मेरी नहीं होती। किसी और की होती है। कहीं किसी गुप्त कोठरी में छिपकर बैठी हुई वह कोई दूसरी।

मैं उसे धकियाकर दूर खदेड़ देने की कोशिश करती हूं, लेकिन नाकाम रहती हूं।’ (द्विखण्डित पृष्ठ 41-42) दरअसल गुप्त कोठरी में छिपकर बैठी हुई उस ‘दूसरी’ को दूर खदेडऩे की नाकामी ही उससे आत्मकथा लिखा ले जाती है। यह आत्मकथा उस दुर्निवार ‘दूसरी’ की जिद है बाहर आने की। इसीलिए ये आत्मकथा ‘द्विखण्डित’ है-निर्वासित ‘आत्म’ के स्पंदनों से रची गई।

‘द्विखण्डित’ महज तस्लीमा की कहानी नहीं है। हैजा से अपने तीनों भाइयों को रेहाना सब कुछ दांव पर लगाकर बचा ले आई-लेकिन हैजा खुद उसे ही लील गया। उसी रेहाना से अपने डाक्टरी जीवन की पहली फीस लेने वाली तस्लीमा का भीषण अपराध-बोध हमारे अपने जीवन के न जाने कितने छटपटाते पछतावों की याद हरी कर देता है। तस्लीमा की भाभी गीता अपने बच्चे सुहृद पर बरसते सास और ननद के बेइंतेहा प्यार से इतनी आक्रांत हो उठती है कि अपनी ही कोख से जने बच्चे को सौतेला बना डालती है। पारिवारिक शक्ति-संबधों में पिसती कितनी ही कोमल जिन्दगियों की कथा ‘सुहृद’ की ही कहानी है-जिसे हम भी जानते हैं लेकिन दिल की गहराइयों में दफन कर देते हैं।

‘द्विखण्डित’ दिल के भीतर दफन इन कहानियों को हृदयविदारक चीख की तरह बाहर खींच लाती है। ‘द्विखण्डित’ सिर्फ तस्लीमा की अपनी कहानी नहीं-वह रेहाना की भी कहानी है, सुहृद की भी, रूद्र की भी कहानी है-बलात्कार के बाद अपनी आवाज खो चुकी बकुली की भी कहानी है। रेहाना और रूद्र नहीं रहे, सुहृद बच्चा है और बकुली की आवाज चली गई है-कौन कहेगा इनकी कहानी? ‘द्विखण्डित’ उनकी कथा कहने की जिम्मेदारी उठाती है। कोई भी अच्छी आत्मकथा इसीलिए सिर्फ लेखिका की अपनी कहानी नहीं होती। जिम्मेदारी उठाना खतरे उठाना भी है।

इसीलिए अभिव्यक्ति की ताकत के धनी तमाम नामचीन कवि कलाकारों की जिन्दगी के स्याह सफों को रोशनी में लाने की सजा भी ‘द्विखण्डित’ को मिला-प्रतिबंध लगा। द्विखण्डित बांग्ला जाति की भी कथा है, धर्मों और भाषाओं के संघर्ष की भी कथा है, बांग्लादेश के राजनैतिक सफर की कहानी भी है, साहित्यिक पुरस्कारों के भीतर की राजनीति भी बयान करती है-साम्प्रदायिक उन्माद और धार्मिक कट्टरता में घुटते नवजात लोकतंत्र के संत्रास का भोगा हुआ वृत्तांत भी है। बड़े लोगों की लाज बचाना सामंती-बुर्जुआ सत्तातंत्र की जिम्मेदारी है और उन्हें निर्वस्त्र करना निर्भीक कलाकारों की। मर्द और धर्म और कानून की मिली जुली कू्ररता और छल की शिकार एक छोटे शहर में पली बढ़ी इस संवेदनशील मध्यवर्गीय लडक़ी की कहानी क्या हमारे ही घर-परिवार, आस-पड़ोस, मुहल्ले-टोले का अलबम नहीं है? आंसुओं में नम तमाम लड़कियों के उदास चेहरों की भुला दी गई स्मृतियां किसी ज्वार सी उठती हैं हम जब तस्लीमा से रूबरू होते हैं।

जिनके साथ ऐसा नहीं हुआ, उन्हें दिल नहीं मिला है। अच्छी कविता पाठक को भी कवि बनाती है। अच्छी आत्मकथा आपकी ‘निजता’ से संवाद करती है-आपको ‘आप’ से मिलाती है-आपके ‘आत्मनिर्वासन’ को भंग करती है-आपकी अपनी कहानी में घुलमिल जाती है। इसी तरीके से पढ़ा जा सकता है ‘द्विखण्डित’ को और आत्म कथा के बाकी खण्डों को भी। अपने ही आस-पड़ोस की एक लडक़ी ने क्या सचमुच सिर्फ अपनी कहानी कही है?

किसी मित्र ने एक बार कहा कि सच्ची प्रेमकथाएं वास्तव में आत्मकथाएं होती हैं। मुझे एक और वक्तव्य याद आया ‘सभी आत्मकथाएं झूठी होती है।’ इन दोनों बयानों को मिलाकर पढऩा भारी उलझन मोल लेना है। बहरहाल, तस्लीमा की आत्मकथा में, लेखिका के ‘आत्म’ के बनने और टूटने में उसके जीवन के इकलौते प्रेम का भारी महत्व है। कहीं वो कहती भी है कि प्रेम शायद जीवन में एक बार ही होता है। तस्लीमा के जीवन में अनेक पुरूष आए-गए, लेकिन ‘प्रेम’ पूरी आत्मकथा में सिर्फ एक ही है-‘रूद्र मुहम्मद शहीदुल्लाह’ से। यह प्रेम एक रोमान ही है, वास्तविकता की जमीन पर उतरते ही जिसने भयानक जख्म दिए और ट्रेजिडी में परिणत है। ‘उत्ताल हवा’ लेखिका के किशोर और आरंभिक यौवन तथा ‘द्विखण्डित’ उसके युवा, वयस्क जीवन की कथा है-आत्मकथा का क्रमश: दूसरा और तीसरा खंड। दोनों खंडों के शीर्षक इसी प्रेम की दो मनोदशाओं के सूचक हैं।

‘उत्ताल हवा’ आरंभिक प्रेम की मदमस्त रूमानियत का सूचक है-कविताओं और पत्रों के आदान-प्रदान से शुरू हुआ कालेज का प्रेम-सपनों और निबंध कल्पनाओं में परवान चढ़ता हुआ-शरीर के यथार्थ से बचता-सकुचाता, लेकिन उसके प्रति कौतूहल से भरा। ‘प्यार-कविता-विद्रोह’-रूमानियत का स्टैण्डर्ड पैकेज-मध्यमवर्ग के व्यक्तियों की चेतना का एक आवश्यक पड़ाव। ‘द्विखण्डित’ उस प्रेम के यथार्थ का सूचक है जिसने व्यक्तित्व को ही विभाजित कर दिया।

आत्मकथा समय के एक निश्चित बिंदु पर लिखी जाती है-इसलिए यह बीते हुए जीवन को फिर से जीने का भी उपक्रम है और उसकी समीक्षा भी। ‘बीते हुए जीवन को फिर से स्मृतियों में जीना’ एक बेहत कष्टसाध्य और अपूर्व धैर्य की मांग करने वाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में लेखिका भीषण जीवटता के साथ उतरी है। बचपन, किशोरावस्था और यौवन की बेइंतेहा यंत्रणाओं के ब्यौरों में फिर से उतरना और उनका ऐसा बयान करना कि ‘लिखने’ और ‘भोगने’ की कालगत दूरी का अहसास गायब हो जाए-इस आत्मकथा को दुनिया की महानतम और सबसे सच्ची आत्मकथाओं में स्थान दिला देता है।

‘रूद्र और तस्लीमा’ की प्रेम-कहानी इस आत्मकथा के अनुभव की विश्वसनीयता का अपूर्व आलेख है। इस प्रेम ने लेखिका के व्यक्तित्व को ‘द्विखण्डित’ किया है-शायद सदा के लिए-यहां तक कि इस प्रेम का बयान भी विभाजित है। एक बयान जो अनुभव की यात्रा के समानान्तर चलता है-दूसरा बयान जो कि काल की दूरी पर अनुभव की समीक्षा करता है। दोनों सच हैं-अलग-अलग समयों के आत्मगत सच, परस्पर विरोधी भी नहीं पर पूरी तरह एकमेक भी नहीं। रूद्र की मृत्यु के बहुत बाद ‘कैंसर’ के प्रति प्रेम महसूस करने के समय का बया है-

‘अच्छा, क्या मैंने किसी से प्यार किया था या प्यार का सिर्फ ख्याल ही लादे फिरती रही हूं? मैंने यह अद्भुत-सा सवाल, खुद अपने से करना शुरू किया। रूद्र से मेरा जो रिश्ता था, उसे किन-किन कारणों से प्यार कहा जा सकता है? और किन-किन कारणों से प्यार नहीं कहा जा सकता? जब इसका हिसाब-किताब किया, तो देखा, रूद्र के प्रति मेरा तीखा आकर्षण जरूर था, रूद्र के अनाचार ने लम्बे अर्से तक मुझे उससे विमुख नहीं होने दिया, लेकिन इसके पीछे प्यार नहीं, कुछ और था। इस ‘कुछ और’ में शामिल थी, नि:संगता, प्यार करने का आग्रह और प्यार के बारे में धारणाएं! प्यार करते हुए, इन्सान जो-जो सामाजिक आचरण करता है, वह मैं जान गई थी, इसलिए वही-वही आचरण मैं भी करती रही।

ये आचरण सीखे-पढ़े थे। ये आचरण मेरे अपने नहीं थे। रुद्र की चंद कविताएं, मैंने किसी साप्ताहिक में पढ़ी थीं, बस, इतना भर ही। इसके बाद एक दिन मुझे रूद्र का खत मिला, जब उसने मेरी सम्पादित कविता-पत्रिका ‘संझा-बाती’ के लिए अपनी कविताएं भेजी थीं। जवाब में, मैंने भी खत लिखा। इस तरह पत्राचार शुरू हो गया। जिसे मैंने कभी देखा नहीं, जिसके बारे में मैं जानती नहीं थी, उसकी मुहब्बत में पढ़ गई। सूरत-शक्ल से रूद्र किसी भी मायने में सुदर्शन नहीं था। पहली बार, जब उसे देखा था, तो मुझे उबकाई के अलावा और कोई अहसास नहीं हुआ था। रूद्र की कविताएं मुझे अच्छी लगती थीं। लेकिन ऐसे तो मुझे जाने कितनों की कविताएं अच्छी लगती थीं। असल में मैं प्यार के ख्याल से प्यार कर बैठी थी।’ (द्विखण्डित, पृष्ठ 309)

यह बयान बहुत कुछ सच्चा है क्योंकि वो रूद्र के साथ प्रेम शुरू होने के क्षणों के बयान के मेल में है। लेकिन दोनों बयानों में अनुभव के दो भिन्न धरातल हैं। दु:स्वप्न जैसे प्रेम की पूरी यात्रा से निकलने के बाद लेखिका रूद्र के प्रति अपने एकनिष्ठ संबंध को ‘तीखे आकर्षण’ की ही संज्ञा देना चाहती है, ‘प्यार’ की नहीं। यह कहते हुए भी कि-‘असल में मैं प्यार के ख्याल से प्यार कर बैठी थी’ लेखिका ‘प्यार के ख्याल से प्यार’ से मुक्त नहीं हो पाई। ‘प्यार’ को लेकर उसका रूमानी आदर्शवाद ही उसे रूद्र के प्रति अपने संबंध को प्यार’ कहने से रोक रहा है। रूद्र की मृत्यु के बाद भी उसके शब्दों और स्पर्शों को इतने दिनों तक अपने भीतर लिए रहने के बाद, वो अंतत: उन्हें विदाई देना चाहती है, अपने ही व्यक्तित्व के एक हिस्से का अंतिम विसर्जन करना चाहती है-

‘सपने का शख्स, अगर सपने में ही बसा रहे, तो बेहतर होता है। रोजमर्रा की जिंदगी में उसे शामिल करके, उसे धूल-धूसरित न करना ही बेहतर है। सपने हमेशा पहुंच के बाहर होते हैं, शुद्ध विमल रहते हैं, झक-झक जगमगाते हुए, खूबसूरत बने रहें। हॉं, बेहतर हो, सपने अपनी धर-पकड़ से परे हों। जिंदगी भर उन सपनों की पतंग उड़ाती रहूं और किसी दिन भी वह ‘वो-काट्टा’ न हो। वह पतंग कभी कटे नहीं। सपनों का सुख बना रहे। यही सोच-सोचकर, मैंने अपने सपनों को, अपने दु:ख-शोक से दूर रखा।

अपनी सियाह कालिमा से उसे परे रखकर, मैं खुद अपने पर धूल-मिट्टी चढ़ाती रही। हां, देह की जरूरत पर, चंद पुरूषों से देह-विनिमय जरूर हुआ। पहली बार शारीरिक सुख आविष्कार करने की उत्तेजना, मैंने रूद्र के साथ महसूस की थी। रूद्र जब जिंदगी में नहीं रहा, तब एक-एक करके मिलन, नईम, मीनार के साथ देह-स्पर्श का खेल चला। इस खेल में मेरे सुख के बावजूद, उनका सुख ही अहम् रहा।’ (द्विखण्डित, पृष्ठ 312)

पुरूषों के साथ अनुभव ने उसे सिखाया है कि ‘इस खेल में मेरे सुख के बावजूद उनका सुख ही अहम रहा’, लिहाजा वो इन संबंधों को ‘आकर्षण, ‘खेल’ या ‘देह विनिमय’ जैसे शब्द देती है-‘प्यार’ कहना नहीं चाहती। तब फिर प्यार क्या है?-एक कल्पना, एक स्वप्न, एक फैंटेसी। दरअसल प्यार के बारे में यह भी एक धारणा ही है-एक सामाजिक बौद्धिक आचरण जो न्याय, स्वतंत्रता, सुख और सौन्दर्य की मानवीय आकांक्षाओं की कल्पना या यूटोपिया की तरह ‘प्यार’ कोक बरतता है। विषमताग्रस्त दुनिया में इसीलिए रूमानियत का कहीं अन्त नहीं।

मध्यकाल के अंत तक तो विवाह एक ऐसा संबंध था जो कि दो प्रमुख पक्षकारों (पति और पत्नी) द्वारा तय ही नहीं किया जाता था। आरंभिक मानव समाजों में तो हर व्यक्ति संसार में शादी-शुदा ही आता था-विपरीत लिंग के पूरे समूह के साथ पहले से ही विवाहित। मानव समाज के विकास क्रम में समूह-विवाहों के बाद के रूपों में भी कमोवेश यही स्थिति कायम रही हालांकि समूह लगातार छोटे होते गए। समूह-विवाहों से आगे बढक़र जोड़े वाले परिवारों के युग में माएं अपने बच्चों का विवाह गोत्र या कबीलों में युवा जोड़े की स्थिति मजबूत करने के लिहाज से और नए संबंध बनाने के ख्याल से आयोजित करती थीं।

जब सामुदायिक संपत्ति की अपेक्षा व्यक्तिगत संपत्ति का दबदबा बढ़ा और उत्तराधिकार के प्रश्न पर दिलचस्पी बढ़ी तब मातृ अधिकार की जगह पितृ अधिकार और एकनिष्ठ विवाह संस्थाबद्ध हुए और विवाह संस्था पहले के किसी भी समय की अपेक्षा आर्थिक कारकों पर अधिक निर्भर हुई यही खरीद फरोख्त के माध्यम से विवाह का रूप समाप्त होने लगा लेकिन स्त्री और पुरूष दोनों के लिए विवाह की योग्यता उनके व्यक्तिगत गुणों की जगह उनकी संपत्ति से आंकी जाने लगी। पूंजीवाद ने पुराने सारे संबंधों, परम्पराओं और ऐतिहासिक अधिकारों को मुक्त ‘समझौतों’ से बदला और विवाह संस्था के साथ भी ऐसा ही हुआ।

लेकिन सभ्यता के विकास क्रम में समूह-विवाह (पाशव अवस्था), जोड़े में विवाह (बर्बर अवस्था) और एकनिष्ठ विवाह (सभ्य अवस्था) के साथ-साथ विवाहेतर संबंधों और वेश्यावृत्ति का भी विकास होता रहा। वास्तव में पूंजी के युग में संपत्ति के हस्तांतरण के लिए वैध संतानों की जरूरत के तहत विवाह में एकनिष्ठता स्त्री के लिए अनिवार्य मानी गई, वहीं आदिम समाजों में उपलब्ध यौन स्वच्दंदता उत्तरोत्तर पुरूषों के लिए ही उपलब्ध रही, खास तौर पर वेश्यावतृत्ति के जरिए।

तस्लीमा की आत्मकथा में पुरूषों की खुली और ढंकी यौन-स्वच्छंदता और स्त्री के यौन-जीवन पर हिंसक नियंत्रण की लम्बी लोमहर्षक दास्तान है। रूद्र के साथ उसका प्रेम भी इस आख्यान का ही हिस्सा है। यदि परिपक्व अवस्था में पहुंची लेखिका ‘रूद्र’ के साथ अपने विशिष्ट संबंध को अन्य संबंधों की सामान्यता विलीन कर देना चाहती है तो इसके पीछे यही सामाजिक सच्चाई और वैचारिक समझ काम कर रही है कि अंतिम विश्लेषण में यह संबंध भी इसी आख्यान का हिस्सा है। मनोवैज्ञानिक तौर पर लेखिका उसकी विशिष्टता से मुक्त होना चाहती है।

इतिहास के पूंजीवादी दौर का दोगलापन उसके उत्पादन संबंधों से लेकर सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों तक व्याप्त है। स्त्री-पुरूष के बीच का प्रेम एक ऐसा क्षेत्र है जो इस दोगलेपन का प्रत्यक्ष और वास्तविक अनुभव मध्य वर्ग तक को करा देता है। रूद्र शादी के पहले और शादी के बाद भी वेश्याओं सहित अनेक स्त्रियों से संबंध रखता है-एक ही समय में। बुर्जुआ समाज इस बात का प्रचार करता है-दम भरता है कि स्त्री और पुरूष के बीच पूर्ण वरण की स्वतंत्रता और बराबरी के आधार पर संबंध उसने संभव किया है।

स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, लोकतंत्र, मानवाधिकार, सामाजिक न्याय आदि की तरह यह वादा भी कागज पर ही रहा। बुर्जुआ वर्ग के सबसे उन्नत समाज और धर्म सुधार आंदोलनों (लूथरवाद और काल्विनवाद) के उपरांत भी प्रेम और विवाह की अवस्था एंगेल्स के शब्दों में कुछ यों थी, ‘विवाह वर्ग-विवाह ही रहा, लेकिन वर्ग की सीमा के भीतर दोनों पक्षों को एक हद एक दूसरे को चुनने की आजादी दी गई। नीतिशास्त्र और काव्यात्मक वर्णनों में, कागज पर, अकाट्य रूप से यही स्थापना की जाती रही कि स्त्री और पुरूष के बीच वास्तविक सहमति और परस्पर प्रेम के बगैर कोई भी विवाह अनैतिक है। संक्षेप में प्रेम विवाह को एक मानवाधिकार बनाया गया सिर्फ पुरूषों का अधिकार नहीं, बल्कि अपवाद स्वरूप महिलाओं का भी।’

एंगेल्स आगे लिखते हैं, ‘लेकिन एक मामले में यह मानवाधिकार अन्य तमाम दूसरे तथाकथित मानवाधिकारों से भिन्न था। जहां दूसरे तमाम मानवाधिकार व्यवहार में सिर्फ शासक वर्ग यानि पूंजीपति वर्ग तक सीमित रहे तथा उत्पीडि़त सर्वहारा उनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर वंचित ही रहे-वहीं इतिहास की विडम्बना यहां फिर से जोर मारती है। शासक वर्ग आर्थिक प्रभावों से ही वशीभूत होकर शादी ब्याह के संबंधों में जाते हैं और अपवाद स्वरूप ही इस वर्ग में स्वैच्छिक विवाह होते हैं जबकि वंचित तबकों में स्वैच्छिक विवाह एक नियम की तरह है।’

प्रेम में पारस्परिकता, स्वतंत्रता आदि का प्रचार बुर्जुआ नीतिशिास्त्र, काव्य और कानून ने खूब किया, लेकिन वास्तविकता में इसका निषेध किया। इसीलिए प्रेम का यह रूप वास्तविक दुनिया से बेदखल होकर स्वप्नों और फैंटेसी के रूप में लोगों की चेतना का अंग बना। हालांकि प्रेम के बारे में आदर्शवादी धारणा उच्च शासक समूह के युवाओं में प्राय: कम होती है क्योंकि वे स्त्री-पुरूष संबंधों के संपत्ति आधारित नियमन को अनुभवसिद्ध नियम के रूप में जानते हैं। ठीक इसी तरह जैसे कि एंगेल्स के एक उद्धरण से पहले कह आए हैं, सर्वहारा वर्ग में भी प्रेम की आदर्शवादी धारणा प्रचलित नहीं रहती क्योंकि पारस्परिक और मुक्त प्रेम व विवाह संबंध वहां सामान्य जिंदगी की वास्तविकता है, यों बुर्जुआ विकृतियों से वे भी आजाद नहीं हैं।

लिहाजा ये बीच का मध्यम वर्ग है जिसमें प्रेम विवाह की आदर्शवादी धारणाएं सर्वाधिक प्रचलित हैं। अद्र्ध-सामंती विशेषताओं वाले बुर्जुआ समाजों में मध्यवर्गीय युवाओं खासतौर पर युवतियों में यह आदर्शवादी धारणा विद्रोह के तत्व भी लिए रहती है। प्रेम के जरिए युवतियां परिवार और दूसरी सामाजिक संस्थाओं के दमघोंटू माहौल से अपना विद्रोह भी व्यक्त करती हैं। एक ऐसी ही लडक़ी है तस्लीमा जो रूद्र से, उसकी कविताओं और पत्रों के माध्यम से प्रेम कर बैठती है। उसके पत्रों और कविताओं में क्या है, जो तस्लीमा को आकर्षित करता है? वह तत्व है ‘विद्रोह’-

‘रूद्र मुहम्मद शहीदुल्लाह, ढाका का एक उदीयमान कवि! उत्ताल हवा, पृष्ठ 141)

‘रूद्र, सत्तर के दशक का उज्जवल तरूण था। सत्तर का दशक मौत की टूटती दरारों का दशक था, सत्तर का दशक कविता का दशक था, कविता में लाशों की गंध! चीत्कार! प्रतिवाद 78! रूद्र ने अपनी कविता में उस दशक की अद्भूत तस्वीर आंकी थी।’ (उत्ताल हवा, पृष्ठ 210'1)

70 का दशक बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम, पश्चिमी बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन जिसे ‘वसंत का वज्रनाद’ जैसे काव्यात्मक मुहावरे में याद किया जाता है, पश्चिमी दुनिया के युवाओं के वियतनाम-युद्ध विरोधी आंदोलन से बने विश्वव्यापी साम्राज्यवाद विरोधी माहौल के लिए जाना जाता है। चे-ग्वेरा इस दशक के सबसे बड़े युवा प्रतीक बने। 70 के दशक ने मध्यवर्गीय युवाओं को भी बुनियादी संघर्षों की दुनिया में खींच लिया था। इन आंदोलनों में स्वप्निलता और आदर्शमय कुहासा भी बहुत था।

‘प्रेम-विद्रोह-काव्य’ का समीकरण पूरे दौर पर छाया हुआ था-युवाओं के भावनात्मक उद्वेग की मुहर पूरे दौर पर लगी हुई थी। लेकिन इस दशक का रक्तरंजित यथार्थ भी ‘प्रेम-विद्रोह-काव्य’ के इस पूरे समीकरण को परिव्याप्त कर गया। तस्लीमा ने रूद्र की बिल्कुल सटीक तस्वीर खींची है-उस दशक का एक प्रतिनिधि कवि-व्यक्तित्व। रूद्र और तस्लीमा का प्रेम बावजूद शब्दों/कविताओं की मध्यस्थता के इस पूरे दौर की भावनात्मक और यथार्थ वास्तविकताओं के ताने-बाने से बना हुआ है। ‘रूद्र और तस्लीमा’ की प्रेमकथा का नैरेशन गद्य कविता में साथ-साथ चलता है-इतिहास, समाज और भीतरी-बाहरी संघर्षों को अपने घेरे में लिए हुए।

परिपक्व लेखिका भले ही पश्चात्बुद्धि के तहत रूद्र के साथ संबंध को स्त्री-पुरूष के सामान्य बेमेल और शोषणपरक संबंध के आख्यान में ही जगह देना चाहती है, लेकिन उसके भीतर की प्रेमिका और कवयित्री बिल्कुल ही अलग स्वर धारण करती है। रूद्र के साथ-साथ 70 के दशक का क्रांतिकारी रोमान इस प्रेम को सारे अंतर्विरोधों के बावजूद किसी अन्य आख्यान का हिस्सा नहीं बनने देता। दोनों की प्रेमकथा कभी तस्लीमा का गद्य कहता है, कभी रूद्र की कविताएं। एक जबर्दस्त जुगलबंदी-विवाद के राग में श्रृंगार, रौद्र और भयानक का अद्भूत सन्निवेश।

70 के दशक का प्रतिनिधि विद्रोही बांग्ला कवि-व्यक्तित्व तस्लीमा की आत्मकथा के पन्नों पर अमर हो गया है। रूद्र का व्यक्तिगत पतनशील जीवन और उसकी कविताओं का ‘उद्दाम-उत्ताल’ स्वर जो कि एक क्रांतिकारी दशक के तमाम रचनात्मक और आंदोलनात्मक ऊर्जा, मानव नियति के गहन-भीषण साक्षात्कार से प्रेरित है, एक अद्भूत विडम्बनामय विषाद की रचना करता है। ‘उत्ताल हवा’ में उद्धृत रूद्र की एक कविता 70 के दशक के मिजाज का अत्यंत प्रामाणिक दस्तावेज है-

‘फर्ज करो, तुम चले जा रहे हो, और बिल्कुल अकेले हो!

तुम्हारे हाथ में उंगलियों जैसी जडें, मानो, उंगलियां

तुम्हारी हड्डियों जैसे ध्वनि, मानो अस्थियां

तुम्हारी त्वचा में अनार्य की शोभा, रेशमी और ताम्रवर्णी

तुम चल रहे हो, फर्ज करो दो हजार सालों से बस, चलते जा रहे हो

तुम्हारे पिता का हत्यारा, कोई एक आर्य

तुम्हारे भाई का कातिल, कोई एक मुगल

एक अदद अंग्रेज ने तुम्हारा सर्वस्व लूट लिया

तुम चलते रहे हो, तुम अकेले हो,

तुम चलते जा रहे हो दो हजार सालों से।

तुम्हारे पीछे है पराजय और ग्लानि...तुम्हारे सामने?

तुम चलते जा रहे हो, नहीं,

नहीं तुम अकेले नहीं हो, तुम अब इतिहास हो

फर्ज करो, यह है पाला-गीतों की मजलिस,

फर्ज करो, वह सांवली औरत

तुम्हारे सीने के करीब नत नयन, थरथराते रक्तिम अधर

तुम चल रहे हो,

दो हजार सालों से चलते जा रहे हो तुम!’ (उत्ताल हवा, पृष्ठ 269)

उस दशक की कौन युवती भला इन शब्दों के जादू से बच सकती थी?

ऐसे शब्द जिन्हें पढक़र आज का पाठक भी रोमांचित हो जाए। जबरदस्त क्रांतिकारी आशावाद और हथियारबंद तरीके से दुनिया बदलने का जज्बा-शहीद होने का जज्बा-

‘झोंप-झंखाड़ भरे जंगल में आता है गुरिल्लाओं का झुंड

हाथों में चमकते हैं हथियार! झलकता है हाथों में

शेष प्रतिशोध! शोध लेंगे खून का, लेंगे तख्त का अधिकार,

उतर पड़ते हैं झंझा में, जाती है जान,

बेशक जाए, कोई फर्क नहीं पड़ता! गूंजती है हुंकार!

अर्जित करता है महा-क्षमता!

वह दिन आएगा! आएगा जरूर! समता के दिन!’ (उत्ताल हवा, पृष्ठ 270) 18'9 साल की युवती ने उसकी कविताओं और पत्रों की मार्फत उससे रिश्ता जोड़ लिया-

‘खतों में इंसान को अपना बना लेना, मेरे स्वभाव में शामिल था।’ (उत्ताल हवा, पृष्ठ 141)

‘मेरा प्यार, रूद्र के शब्दों के साथ था। ‘उपद्रुत उपकूल’ की कविताओं और उसके खतों के अक्षरों के साथ था। इसके पीछे के इंसान को मैं नहीं पहचानती थी। मैंने तो उसे कभी देखा तक नहीं था, सिर्फ एक कल्पना भर कर ली थी कि आर-पार कोई अपूर्व, सुदर्शन पुरूष मौजूद है, जो पुरूष किसी दिन झूठ नहीं बोलता, इंसानों के साथ कोई अन्याय नहीं करता, जो उदार, मिलनसार, प्राणवंत है! जिसने अब तक किसी लडक़ी की तरफ नजरें उठाकर भी नहीं देखा, वगैरह-वगैरह! ऐसी ही सैकड़ों खूबियां!’ (उत्ताल हवा, पृष्ठ 205)

लेकिन इस व्यक्ति से जब युवती की मुलाकात हुई तो पाया कि ‘दाढ़ीवाला, लंबे-लंबे बालोंवाला, लुंगीधारी लडक़ा सामने आ खड़ा हुआ और उसने बताया कि वही रूद्र है। प्रेमिका से पहली मुलाकात लुंगी में?’ (उत्ताल हवा, पृष्ठ 206) उम्र में कई बरस बड़े रूद्र को जल्दी थी शादी की। तस्लीमा को अभी डाक्टरी की पढ़ाई करनी थी। 3-4 साल लगने थे। घर पर इस रिश्ते को छिपा कर ही रखना था। लेकिन रूद्र ने लगभग भावनात्मक ब्लैकमेल करके शादी के कागज पर दस्तखत ले लिए। ‘बहू’ संबोधन वाला खत घर में पकड़ गया-फिर यातना का सिलसिला।

‘सुहागरात’ का दृश्य तो जैसे बलात्कार का दृश्य हो-बेहद खौफनाक

‘मैंने अपनी मुंदी हुई आंखों को हथेलियों से ढंक लिया और यह सोचना शुरू किया कि यह मैं नहीं हूं, यह मेरी देह नहीं है, मानों मैं अपने घर में, अपने ही कमरे में लेटी हूं। यहां जो कुछ अश्लील घट रहा है, इससे मैं कहीं भी नहीं जुड़ी। जो कुछ घट रहा था, वह मेरी देह, मेरे जीवन में बिल्कुल भी नहीं घट रहा था। यह कोई और है, यह किसी और की देह है। इसके बाद, रूद्र मेरे समूचे शरीर पर चढ़ गया। इस बार मेरी आंखें ही नहीं, मेरी सांसें तक रूक गई। अवश देह के दोनों पांव सिमटकर, घनिष्ठ होने की कोशिश में जूझते रहे। मेरे दोनों पांवों को रूद्र अपने दोनों पांव सिमटकर, घनिष्ठ होने की कोशिश में जूझते रहे। मेरे दोनों पांवों को रूद्र अपने दोनों पांवों में फंसाकर, तलपेट की संधि पर किसी अतिरिक्त कुछ का दबाव डालने लगा।

मैं अपनी सांसें अवरूद्ध किए उस दबाव को पति का स्वाभाविक दबाव मान लेने की कोशिश करती रही। लेकिन मेरी सोच बीच में ही टूट गई। न चाहते हुए भी मेरे गले से एक आर्त-चीत्कार गूंज उठी। रूद्र ने अपनी दोनों हथेलियों में मेरा मुंह दबोच दिया। लेकिन, नीचे का दबाव, सारा कुछ मेरी देह में प्रवेश नहीं कर पा रहा था। सारी रात रूद्र धीरे-धीरे, पूरे तरीके से, स्वाभाविक नियम माफिक मुझमें प्रवेश करने की कोशिश करता रहा। लेकिन हर बार, उसे समझाने की मेरी यंत्रणा, ‘हाय अम्मी! हाय बाप रे! की पुकार, समूची रात को मुखर किए रही, हर बार, मेरी चीत्कार पर रूद्र का दबाव और-जोर बढ़ता गया। उस दबाव को चीरते हुए, मेरी चीत्कार लगातार गूंजती रही।’ (उत्ताल हवा, पृष्ठ 281)

19-20 साल की लडक़ी जिसने अभी तक खुद को भावनात्मक रूप से विवाहित जीवन के लिए तैयार नहीं किया था, उसके लिए ये सुहागरात हादसे से कम न थी। हमारे उपमहाद्वीप की अधिसंख्य लड़कियों की ही तरह। इस पूरे अनुभव से वो छूटते ही उबरना चाहती है-

‘काश, सारी रात हम बातें करते हुए या कविताएं पढ़ते हुए गुजार देते, सिर्फ थोड़ी-बहुत छेड़छाड़, दो-एक निर्मल-विमल चुंबन में ही, हमने सारी रात बिता दी होती।’ (उत्ताल हवा, पृष्ठ 282)

हालांकि बाद में सेक्स सम्पर्क के सामान्य होने के बाद

‘मैं गहरे सुख, महासुख में आकुल-व्याकुल होती रही।’ (उत्ताल हवा, पृष्ठ 323)

लेकिन रूद्र ने प्रेम का जो उपहार तस्लीमा को दिया-वह था सिफलिस का रोग जो उसने वेश्यागमन से हासिल किया था। इस विश्वासघात ने दिल के आइने को बुरी तरह चटखा दिया।

‘...कोमल, कुंवारी औरत, विवाह के दिन, झुकाए बैठी है,

अपना लजाया-शर्माया चेहरा!

अजाने सुख के भय से थर-थर कांपती है। उसकी नीलाभ देह!

अब जाने क्या हो! शेष हो जाते हैं, शहनाई के सुर, रात बढ़ती जाती है!

दुल्हन की आवाज मंद पड़ जाती है, नि:शब्द, निर्जन कमरे में,

जब पहली बार दाखिल होगा पुरूष, जाने वह क्या कहे!

देवता नामक पति, दरवाजे पर चढ़ाकर सिटकिनी,

कुटिल निगाहों से निहारता है,

मांसल, अनछुई-अनसूंघी बालिका की सलज्ज देह-यष्टि!

चकले के कोठों में उसने उन्मोचित किए थे, बहुत-से तन, बहुत बार!

अबूझ, किशोरी, लडक़ी, कुचलकर अपने ख्वाब-साथ!

अबूझ, किशोरी, लडक़ी, कुचलकर अपने ख्वाब-साथ!

दु:खी मन से बटोरती है हिम्मत!

शायद ऐसा ही होता है, शायद यही है दुनिया का नियम-कानून!

पैशाचिक उल्लास करे, मसले हुए देह-मन में, वासना का खून!

परम प्यार में डूबी वधू ने किया उपहार स्वीकार,

अंग-अंग में किया वर्र्जित रोग!

साल-भर बाद, औरत ने प्रसव किया, एक विकलांग शिशु!

जटिल रोग का जहर देह में धधकाए हुए अंगार, उसने स्वागत किया।

उस रोग का नाम है-सिफिलिस! (उत्ताल हवा, पृष्ठ 376-377)

आंदोलन-कविता और प्रेम के अलावा भी एक जीवन था रूद्र का-शराब, जुआ और वेश्यालय में डूबा हुआ। ढहते हुए जमींदार परिवार के कुछ दूसरे ही तर्क थे-दूसरे ही संस्कार। चट्टग्राम स्थित ससुराल की हवेली में तस्लीमा को साड़ी पहनकर माथे पर आंचल भी डालना पड़ा। पांव छूकर बड़ों को सलाम भी करना पड़ा। जेवर से शरीर को लादना भी पड़ा और घर से बाहर की तो कोई दुनिया ही नहीं थी-ढहती जमींदारी के संयुक्त परिवार की बहू बनने के लिए उसने घर से विद्रोह नहीं किया था।

‘मेरे मन ने कहा-नहीं, यह असंभव है। रूद्र तो उन अस्सी प्रतिशत लोगों के लिए कविताएं लिखता था, जो उसकी इस दो मंजिला कोठी तक कभी पहुंच ही नहीं सकते। उन लोगों को तो कोठी के हरकारे-प्यादे, कोठी की सीढिय़ों से ही खदेड़ देते थे। जो सब खेतिहर-किसान, आग बरसाती धूप में जलते-तपते खेतों में हल चलाते हैं, जिनकी मेहनत-मशक्कत की फसल इस कोठी के भंडार में जमा होती है, उन लोगों को यहां आने का अधिकार कहां है? उन लोगों में और रूद्र में काफी फर्क है।

मैं उस फर्क को कहीं से भी मिला नहीं पाई। रूद्र समान अधिकार के लिए पूरे दम से चीख-चीखकर कविताएं पढ़ता था, वह क्या सच ही समान अधिकार का पक्षधर है?’ (उत्ताल हवा, पृष्ठ 446)

सब कुछ को बर्दाश्त करने कदम-दर-कदम रूद्र की तमाम अराजकताओं के बीच भी उसी सम्भालती, नई जिंदगी की शुरूआत का सपना लिए वो रूद्र के साथ ढाका आ जाती है। लेकिन रूद्र के सपने बदल गए थे-

‘अब रूद्र का सपना यह नहीं था कि कहीं एकांत में जाकर, मेरे साथ अपनी गृहस्थी बसाए। ढाका में रहने का सपना भी, अब उसके दिमाग से मिट चुका था। उन सब पुराने सपनों को धकेलकर, अब उसकी आंखों में नए-नए सपने सिर उठाकर खड़े हो गए थे। अब रूद्र का सपना था, चिंगड़ी मछली का धंधा करके, ढेर-ढेर रुपए कमाना। अब उसका सपना था, अपने छह भाई-बहनों को शान-शौकत से बड़ा करना’ (उत्ताल हवा, पृष्ठ 457)

पढऩे वाले को हैरत होती है कि एक मेधावी, रौशन ख्याल, सुंदर डाक्टर युवती जो खुद एक प्रतिभाशाली कवयित्री भी है, तो इस बदसूरत अराजक इंसान के साथ इतना क्यों निभाती है? वो बार-बार उसके पास क्यों लौटती है? बार-बार खुद को बदलने का झूठ बोलकर रूद्र उसे कैसे लौटा लाता है? उत्तर सरल है क्योंकि यहां मनुष्यों का ‘आत्मजगत’ उनकी भीतरी दुनिया दांव पर लगी हुई है। प्रेमी कहीं न कहीं अपनी एक अलग भावनात्मक दुनिया बसा ही लेते हैं।

इस अलग दुनिया का सबूत ये है कि वे दुनिया में प्रचलित अपनी शिनाख्त (नाम) से अलग एक दूसरे का नाम भी रख लेते हैं जिससे सिर्फ वे ही एक दूसरे को पुकारते हैं। तस्लीमा और रूद्र ने क्रमश: ‘सुबह’ और ‘धूप’ नाम रख रखे हैं एक दूसरे को खतों में संबोधित करने के लिए-

‘पता है, धूप, जब तुम मेरे पास होते हो, तो हैरत है, मैं सब भूल जाना चाहती हूं। मेरा और कोई आश्रय नहीं है, कहीं भी पनाह लेने की जगह नहीं है, पलटकर जाने की कोई राह भी नहीं-शायद, इसीलिए सब कुछ भूल जाने की कोशिश करती हूं, शायद इसीलिए मैं अपने सजाए हुए सपनों में ही खोई रहना चाहती हूं, तुम्हारे बर्बाद अतीत से मुकर जाने की कोशिश करती हूं।

लेकिन दरअसल ऐसा नहीं होता, अपने ही साथ कुछ जरूरत से ज्यादा ही नाटक हो जाता है। सीने में दबाई हुई तकलीफें, आग बनकर फैल जाती हैं। तुम तो प्यार करना जानते ही नहीं, इसीलिए तुम समझते भी नहीं कि कैसी होती है यह तकलीफ! किस कदर जलाती है यह! (उत्ताल हवा, पृष्ठ 349)

रूद्र के प्रति तस्लीमा का प्यार क्यों और कैसे धीरे-धीरे सहानुभूति और ममता में बदलता है, ये शायद हमारे उपमहाद्वीप की ज्यादातर स्त्रियां अपने जीवनानुभव के कारण ज्यादा महसूस कर सकती हैं। एक ऐसा प्यार जो कई जगह लम्बी चलने वाली हॉरर फिल्म की तरह लगे, उसकी उदात्त परिणति सचमुच पाठक के बतौर हमें बेचैन करती है लेकिन क्या ऐसा ही हमारे आस-पास रोज-रोज नहीं होता? लेकिन यदि यह एक स्त्री की सहनशीलता का आख्यान मात्र होता तो कोई खास बात इस कहानी में न होती। बात उससे ज्यादा गहरी है।

रूद्र स्वयं द्विखंडित है, आत्म विभाजित है। तस्लीमा का प्यार उस रूद्र से है जो अपनी कविताओं में जिंदा है। न्याय, समता, विप्लव और निर्बंध प्यार की भावनाओं से लवरेज। वास्तविक जिंदगी में एक हद तक वो इनकी कीमत चुकाता भी है। कवि और आंदोलनकारी जीवन का चुनाव यहीं से आता है। लेकिन ढहती जमींदारी के संयुक्त परिवार का तर्क, व्यक्तिवादी बौद्धिक अहं, कठिन राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों और अत्यंत भावुक आत्मिक जीवन के द्वंद्व के बीच अराजकता में शरण लेना, अपनी ही कुत्सित आदतों की कैद से निकल पाने में उसे असफल बना डालता है।

रूद्र अपनी वास्तविक जिंदगी में बेतरह बिखरा हुआ आदमी है लेकिन उसकी कविताएं सधी हुई है। उसके व्यक्तित्व का भावावेग कविता में संगठित और समेकित है लेकिन जिंदगी में उसे अराजक बना डालता है। प्यूओटिक सेल्फ उसका दूसरा ‘आत्म है-वास्तविक जीवन से निर्वासित। वो दो जिंदगियां जी रहा है-कविता में एक जिंदगी, वास्तविकता में दूसरी। कविता में वह स्वयं कर्ता है सब्जेक्ट है-अपने शिल्प का मास्टर। वास्तविक जिंदगी में वो परिस्थितयों, आदतों और वासनाओं का दास है। तस्लीमा इस हाड़-मांस के वास्तविक रूद्र से भयानक दुख पाती है लेकिन कवि रूद्र का आकर्षण उसे लौटा लाता है बार-बार।

इसे पूरे एनकाउंटर में वो खुद भी भीतर से टूट जाती है-द्विखण्डित होती जाती है। कुचली हुई कोमल भावनाएं, न्याय और समतामूलक जीवन के स्वप्न जो जीवन में हर दिन रौंदे जाते हैं-आत्मकथा बन जाते हैं। रूद्र की कविताएं और तस्लीमा की आत्मकथा दोनों ही दोनों के अलिंगनबद्ध निर्वासित ‘आत्म’ हैं। जिंदगी की असफल प्रेमकथा साहित्य के पन्नों में अमर, अत: सफल हो गई।

ऐसा नहीं कि उसे रूद्र से नफरत नहीं होती। ऐसा भी नहीं कि वह श्रद्धा की तरह मनु को क्षमा करने के लिए, उस पर वारी जाने के लिए ही पैदा हुई है। एक तरफ रूद्र के प्रति प्यार और सहानुभूति, तो दूसरी तरफ रूद्र से तीखी नफरत के ध्रुवान्तों पर वो झूलती रहती है-

‘अब तुम्हारा मुखौटा नोचकर, तुम्हारा वह असली वीभत्स चेहरा देखूं तो सही। अब और कितनी धोखाधड़ी करोगे? टूट-फूट का यह नृशंस खेल क्या इतना निर्मम होता है? पूर्णिमाहीन चांद, अशुभ अमावस्या को आवाजें देता है-आ! आ! जुगनू को रोशनी मानकर, मैं मगन थी, निकष अंधेरे के उत्सव में! यही मेरी भूल थी। यह है मेरा गुनाह, जाल में रूंधा-फंसा! अब मैं फरार होना चाहती हूं। अपने दांतों से काटकर, चीर देना चाहती हूं बंधन!

अब मैं जीना चाहती हूं, अपने जान-प्राण में भर लेना चाहती हूं, विशुद्ध वाताश! और कितना चकमा दोगे? मैं क्या समझती नहीं तुम्हारी धूर्तता? अपनी जिंदगी में कूड़े का ढेर संजोए, तुम होठों की कोरो में खिलाते हो सुवासित हंसी? ग्लानि से भरा अतीत ग्लानि से भरी देह, घृणित फिर भी अमृत समझकर, मैंने छुई है जहर की आग!’ (उत्ताल हवा, पृष्ठ 342)

लेकिन जैसे ही रूद्र का वह दूसरा ‘आत्म’ कविताओं या पत्रों में उसे पुकारता है, वह खुद को रोक नहीं पाती-

‘तुम्हें लौटा लाएगा प्रेम, आधी रात झरता हुआ, पलकों का शिविर

सोने का जख्म, झुलसा हुआ चांद, तुम्हें लौटा लाएगा।

प्यार के लिए देगा सदाएं, आश्विन का उदास मेघ

तुम्हें लौटा लाएगा, सपना, पारिजात, धरती का कुसुम/

तुम्हें लौटा लाएंगे प्राण, यह प्राण-निषिद्ध जहर

तुम्हें लौटा लाएंगे नयन, इन नयनों की तेज-तेज लपटें

तुम्हें लौटा लाएंगे हाथ, इन हाथों के निुपण सृजन,

तुम्हें लौटा लाएंगे अंग-अंग, इस तन का तपा हुआ स्वर्ण

तुम्हें लौटा लाएंगे, इस बात रात के नींद-जगे पंछी

बांई तरफ सीने में जमा, दुखों का सियाह ताबूत

तुम्हें लौटा लाएंगे लहर-झाग, सागर की अदिगंत साथ

खुशबू में नहाई आंखें, नील मत्स्य लौटा लाएंगे तुम्हें

यह विष-कंटकित लता, प्यार से रोक लेगी राह

झरे हरसिंगार का शव, पड़ा रहेगा राह पर,

निभृत अंगार चिरकाल, लौटा लाएगा तुम्हें

अफसोस में डूबा अंधियार, छू-छूकर मृत्यु,

लौटा जाएगा तुम्हें!’ (उत्ताल हवा, पृष्ठ 359-360)

कौन कह सकता है इन शब्दों का शिल्पकार महज एक झूठा, मक्कार और लोलुप आदमी है, जो सिर्फ एक स्त्री की अबोधता या कमजोरी का फायदा उठा रहा है? दरअसल, रूद्र खुद अपने आत्मविभाजन को कहीं न कहीं जानता है और उसे प्यार करनेवाली तस्लीमा भी। बहरहाल सपनों पर वास्तविकता हरदम भारी पड़ती है। कविता में जीवित रूद्र पर संदेह रूद्र के अनुभव भारी पड़ते हैं। तस्लीमा तलाक लेती है। उत्ताल हवा की अंतिम पंक्तियां हैं-

‘ना, मेरी जिंदगी किसी की भी जिंदा बैसाखी बनने के लिए, हरगिज नहीं हैं किसी दूसरे की बैसाखी बनने के लिए, मैं अपनी जिंदगी कुर्बान नहीं कर सकती। रूद्र के लिए मुझे अफसोस है। उसके लिए मुझे हमदर्दी होती है। लेकिन इससे भी ज्यादा हमदर्दी मुझे अपने लिए होती है।’ (उत्ताल हवा, पृष्ठ 494)

‘द्विखण्डित’ के दो अध्याय ‘कर न पाया स्पर्श, तुममें ही, तुमको ही’ तथा ‘दिवस रजनी जैसे मुझे किसी का इंतजार’ रूद्र को समर्पित हैं। दोनों ही अध्यायों में अलगाव के बाद का वर्णन है। दोनों ही अध्याय प्रेम की उदात्ता का सुंदर आलेखन हैं। पहले अध्याय का शीर्षक रूद्र की उस कविता से है जिसमें पहली बार प्रेम की असफलता की उसने जिम्मेदारी ली-पहली बार आत्मालोचन किया। पहली बार उसके विद्रोह, विप्लवी, स्वप्निल प्यूओटिक सेल्फ में एक दरार दिखाई दी। यह पश्चाताप, यह आत्मग्लानि, यह असफलता रूद्र के यथार्थ जीवन द्वारा उसके आदर्श जीवन में, उसके कवि व्यक्तित्व में डाली गई दरार है।

‘दूर हो तुम, बहुत दूर

कर न पाया स्पर्श, तुममें ही, तुमको ही।

देह की तपिश में छानता-बीनता रहा सुख!

परस्पर खोदते-विदोरते खोजता रहा निभृति!

तुममें ही, तुमको ही कर न पाया स्पर्श!

सीपी खोलकर, लोग जैसे खोजते हैं मोती

मुझे खोलते ही, तुम्हें मिला रोग!

मिली तुम्हें आग की तटहीन नदी!

तन-बदन के तीखे उल्लास में,

पढ़ते हुए तुम्हारे नयनों की भाषा, हुआ हूं विस्मित!

तुममें ही तुमको ही कर न पाया स्पर्श!

जीवन पर रखे हुए विश्वास की हथेली,

जाने कब तो शिथिल हुई, भर गई लता

जाने कब तो फेंक दिया हिया, छुआ सिर्फ हतपिंड,

अब बैठा हूं उदास, आनंद मेले में!

तुम्हें कर न पाया स्पर्श, तुम जो मेरी हो!

उन्मत्त बाघ-सा, करता रहा तहस-नहस

शांत आकाश की नीली पटभूमि,

मूसलाधार बारिश में भिंगोता रहा हिया!

तुममें ही, तुमको ही,

कर न पाया स्पर्श! आज तक!’ (द्विखंडित, पृष्ठ 44-45)

ट्रेजडी का पूर्वाभास जैसे इस कविता के माहौल में ही व्याप्त है। ऐसा नहीं कि रूद्र ने पहले कभी अपनी ज्यादतियों के लिए क्षमा नहीं मांगी, पश्चाताप नहीं किया। बातचीत और पत्रों में उसने कई बार ऐसा किया। लेकिन ये पश्चाताप हरदम अविश्वसनीय था क्योंकि वो सब तस्लीमा को मनाने और फिर से उसे पाने के लिए था। इस कविता से पहले काव्य में उसने ऐसा कभी नहीं किया (कम से कम लेखिका के बयान में ऐसी कोई कविता उद्धृत नहीं की गई) ये कविता रूद्र के प्यार की सबसे प्रामाणिक अभिव्यक्ति है।

विडम्बना यह कि यह अभिव्यक्ति संबंध टूट जाने के बाद की है। रूद्र के जीवन में दाखिल हुई नयी प्रेमिका शिमुल के बारे में सुनकर तस्लीमा को रूद्र के साथ अपने दिन याद आते हैं, वेदना उमड़ आती है, लेकिन शिमुल के प्रति ईष्र्या का एक शब्द भी नहीं। प्रेम की पीर मनुष्य को कितना उदात्त बना सकती है, इसका प्रमाण है ये पंक्तियां जिनमें रूद्र की आंखों में शिमुल के फूल खिलने का बयान है-

‘रूद्र ने मेरी आंखों में देखा। उसकी आंखों में शिमुल के अनगिनत फूल खिलते हुए। उसने अपनी आंखें, खिडक़ी की तरफ मोड़ लीं। बाहर खिले कृष्णचूड़ा की फूलों को निहारते हुए, जाने कहीं वह शिमुल को तो नहीं ढूंढ़ रहा है?’ (द्विखंडित, पृष्ठ 51)

‘दिवस रजनी जैसे मुझे किसी का इंतजार’ रूद्र की मृत्यु पर तस्लीमा का हृदय विदारक हाहाकार है। जिसने इतने दुख दिए, जिससे संबंध भी खत्म हो चुका, उसके लिए ऐसा हाहाकार! ‘रूद्र अब कविताएं नहीं लिखेगा। रूद्र अब कभी नहीं हंसेगा। रूद्र अब किसी मंच पर कविता नहीं पढ़ेगा। सभी लोग अपनी-अपनी जिंदगी जिएंगे, सिर्फ रूद्र ही नहीं होगा।’ (द्विखंडित, पृष्ठ 202)

‘सारा कुछ जैसा पहले था वैसा ही अब भी मौजूद था। सिर्फ रूद्र ही नहीं था। रूद्र अब किसी भी सडक़ पर नहीं चलेगा, अब वह किसी भी फूल की खुशबू नहीं लेगा। किसी नदी का रूप नहीं निहारेगा, न भटियाली गाने सुनेगा। लेकिन मुझे विश्वास नहीं होता कि रूद्र अब घूमेगा-फिरेगा नहीं, खुशबू नहीं लेगा, कुछ देखेगा-सुनेगा नहीं। पता नहीं क्यों तो मेरा दिल कहता था कि रूद्र लौट आएगा।’ (द्विखंडित, पृष्ठ 203)

‘ढाका श्मशान-श्मशान जैसा लग रहा था। इसलिए मयमनसिंह लौटी थी। मगर यहां आकर देखा, यह घर भी श्मशान हो चुका था। मैंने पलंग के नीचे से अपना ट्रंक खींचकर, बाहर निकाला। उसे खोला! रूद्र की छुअन पाने के लिए खोला था। चाहे जैसे भी हो, मुझे रूद्र के परस की तलब थी। मैं उसे याद नहीं बनने देना चाहती। रूद्र के खत पढ़ते-पढ़ते पुराने दिन मेरी आंखों के सामने आ खड़े हुए! वे तमाम दिन मुझे इतने करीब लगे कि मैं उन गुजरे दिनों को छू-छूकर महसूस करती रही। मैं उन दिनों में तैरती रही, उनसे खेलती रही, उन्हें वेणी की तरह मैंने अपने से गूंथ लिया।’ (द्विखंडित, पृष्ठ 203) पूरा अध्याय ‘ऐलेगी इन प्रोस’ है।

ट्रेजिडी का भाव तभी जागता है जब नायक को उसके पतन के लिए जिम्मेदार नहीं माना जाता। तभी वह पाठक/दर्शक की विराट सहानुभूति का पात्र होता है। यदि शहीदुल्ला रूद्र की मृत्यु एक ट्रेजिक भाव जगाती है, तो इसलिए कि तस्लीमा का बयान उसे उसकी मौत की जिम्मेदारी से संवेदना के धरातल पर मुक्त करता है। रूद्र जैसे व्यक्ति को यदि तस्लीमा की आंख से न देखें तो शायद ही उससे किसी की सहानुभूति हो। लेकिन ये संभावना ही अप्रासंगिक है क्योंकि रूद्र की कहानी तस्लीमा के बगैर पूरी ही नहीं होती-तस्लीमा के अलावा उसे बयान करने वाला भी कोई और नहीं। 70 के दशक ने रूद्र के कवि को पैदा किया, लेकिन व्यक्ति रूद्र को जिंदा नहीं छोड़ा।

70 के दशक में दुनिया के पैमाने पर भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमि के तमाम युवा सामाजिक बदलाव की आंधी में खिंचे चले आए। उनमें से बहुतों का रूपांतरण हो गया। जिन्होंने जीवन की तमाम चाहतों और यहां तक कि खुद जीवन को ही कुर्बान कर दिया। कई ऐसे और व्यक्तित्व के विभाजन में हुआ और आत्महन्ता रास्ते पर चल पड़ा। रूद्र का कवि व्यक्तित्व, उसकी चेतना का एक हिस्सा तूफानी दशक की विप्लवी और उत्सर्गमयी चेतना से एकमेक हो गया, लेकिन उसका व्यक्तिगत जीवन वंचित तबकों के साहचर्य के बावजूद सामंती संस्कारों और माध्यवर्गीय इच्छाओं के दबाव में रहा, रूपांतरित नहीं हो सका।

पूरी प्रेमकहानी पर 70 के दशक की अमिट छाप है। तस्लीमा के लिए रूद्र को प्यार करना प्यार, विद्रोह, कविता, मनुष्यता के अपराजेय स्वप्नों की तामीर के लिए शहादतें देने वाले 70 के दशक को प्यार करना भी है, जिससे रूद्र की कविताओं का नाता था। रूद्र से प्यार करना, रूद्र के ‘आत्म-निर्वासन’ को ‘समझना’ भी है-रूद्र को अपने भीतर पालना भी है।

रूद्र ने कविता सिर्फ वंचितों की मुक्ति के लिए नहीं लिखी, अपनी मुक्ति के लिए भी लिखी। तस्लीमा ने भी आत्मकथा सिर्फ स्त्री-मुक्ति के लिए नहीं, आत्म-मुक्ति के लिए भी लिखी। काव्य और आत्मकथा दोनों के लिए अपने ही निर्वासित आत्म की पुनप्र्राप्ति की यात्रा है। तस्लीमा की आत्मकथा में दोनों निर्वासित ‘आत्म’ कहीं उच्चतर उदात्त स्तर पर जुड़ गए हैं। रूद्र का तस्लीमा के प्रति प्यार क्या सच्चा था? क्या वे सिर्फ देह की हवस नहीं थी? यदि वो सिर्फ देह की हवस होती, रूद्र को स्त्री-देह कई प्रान्त थे। वो उसे वापस लौटा लाने की कातर प्रार्थनाएं क्यों करता है?

वास्तव में रूद्र को उस लडक़ी से प्यार है जो उसके कवि को प्यार करती है क्योंकि उसके व्यक्तित्व के उस हिस्से को भी प्यार की तड़प है। वास्तविक जीवन की उसकी अराजकता और लोलुपता उसे दूर करती जाती है, जबकि उसकी कविताएं उसे लौटा लाती हैं। इस आत्मकथा में यही इतना दर्ज है।

हो सकता है कि विराट बदलावों का उथल-पुथल भरा समय फिर लौटे। हो सकता है कि फिर से लौटे इस समय में मानवीय आकांक्षाएं और कुर्बानियां पराजय और आत्म-विभाजन पर समाप्त न हों। हो सकता है कि उसके किरदारों का ट्रेजिक अंत न हो। हो सकता है कि सर्वतोन्मुखी विद्रोहों के नए विश्वव्यापी कालखंड का प्रेम इतना अभिशप्त न हो। हो सकता है कि व्यक्तियों की मुक्ति सिर्फ काव्य और आत्मकाव्य में न होकर सचमुच सामाजिक परिवर्तन के रास्ते हो। रूद्र और तस्लीमा के प्रेम की काव्य-कथा अपनी वास्तविक तर्कसंगत परिणति की मुंतजिर है।

दक्षिण कोसल, वर्ष', अंक-5, फरवरी 2015 में छप चुकी है।


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