कौन हैं सुधा भारद्वाज?

हिमांशु कुमार

 

सुधा भारद्वाज का जन्म अमेरिका के बोस्टन शहर में हुआ जहां हार्वर्ड और एमआईटी जैसे विश्व प्रसिद्द विश्वविद्यालय हैं। इसके बाद सुधा का परिवार लन्दन आ गया सुधा की कुछ पढ़ाई लन्दन में हुई।

इसके बाद सुधा की माँ कृष्णा भारद्वाज जो एक प्रसिद्द अर्थशास्त्री थीं वे भारत आ गई और उन्होंने दिल्ली में जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में सेंटर फार इकोनोमिक स्टडीज की स्थापना की। आज भी जेएनयू में हर वर्ष उनकी याद में कृष्णा मेमोरियल लेक्चर होता है जिसमें जाने माने अर्थशास्त्री भाग लेते हैं।

सुधा भारद्वाज ने आईआईटी कानपुर से डिग्री ली और भोपाल गैस पीड़ितों के लिए काम किया। इसी दौरान वे छत्तीसगढ़ के प्रखर मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी के सम्पर्क में आई और छत्तीसगढ़ आ गई। शंकर गुहा नियोगी के चारों तरफ उस समय कई तेजस्वी युवा कार्यकर्त्ता इकठ्ठा हो रहे थे।

डाक्टर बिनायक सेन नियोगी द्वारा पुलिस गोलीबारी में मारे गए मजदूरों की याद में बनाये गये शहीद अस्पताल में सेवा करने के लिए आये थे। इलीना सेन भी नियोगी की मदद के लिए आई थीं।

मजदूरों के अधिकारों के लिए लड़ने के कारण फैक्ट्री मालिकों के भाड़े के हत्यारे ने शंकर गुहा नियोगी की हत्या कर दी। इसके बाद सुधा ने सन 2000 में वकालत की डिग्री पूरी की और मजदूरों की कानूनी लड़ाई अदालतों में लड़ने लगीं। वे प्रसिद्द गांधीवादी विचारक, लेखक व वकील कनक तिवारी की जूनियर रहीं है।

सुधा भारद्वाज को बिलासपुर हाई कोर्ट का जज बनने का आफर भी दिया गया जिसके लिए सुधा ने नम्रता पूर्वक मना कर दिया क्योंकि फिर वे मजदूरों के लिए काम ना कर पातीं। छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार द्वारा आदिवासियों की ज़मीनों को हड़प कर देशी विदेशी कंपनियों को देने के लिए एक हिंसक अभियान चलाया गया जिसे सलवा जुडूम अभियान नाम दिया गया था।

बाद में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस अभियान को गैर संवैधानिक करार दिया और इसे तुरंत बंद करने का आदेश दिया। इस अभियान के दौरान सरकारी सिपाहियों द्वारा आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार किये गए, निर्दोष आदिवासियों की हत्या की गई तथा निर्दोष आदिवासियों को जेलों में ठूंस दिया गया।

सुधा भारद्वाज ने पीड़ित आदिवासियों की मदद की तथा उनके मुकदमें मुफ्त में लड़े। सुधा भारद्वाज देश भर में घूम घूम कर आदिवासियों पर सरकारी दमन, पूंजीपतियों द्वारा मजदूरों की हकमारी और मानवाधिकार हनन के बारे में बात करती थीं।

वे मजदूरों के मुकदमें अदालतों में लडती थीं और उनकी पूरी मजदूरी और काम में बहाली के कई मुकदमों में उन्होंने मजदूरों को जीत दिलवाई। इन सब जनहितैषी कामों की वजह से सुधा पूंजीपतियों की आँख की किरकिरी बन गई थीं। राजनैतिक नेता इन्हीं पूंजीपतियों के पैसे से चुनाव जीतते हैं।

इसलिए पूंजीपतियों की गुलाम मोदी सरकार ने सुधा भारद्वाज को जेल में डालने का षड्यंत्र किया। सुधा को भीमा कोरेगांव मामले में फंसा कर जेल में डाल दिया गया।

भीमा कोरेगांव मामले के बारे में भी जानना ज़रूरी है

भीमा कोरेगांव महाराष्ट्र में एक जगह है जहां दलित महारों की सेना ने ब्राह्मण पेशवा की सेना को हराया था। उस जगह हर साल दलित अपना शौर्य दिवस मनाते हैं। 2018 में इस युद्ध के दो सौ वर्ष पूरे हुए थे।

महराष्ट्र के एक संगठन एल्गार परिषद ने यहाँ एक सभा की जिसमें देश भर से सामाजिक कार्यकर्ता, सांकृतिक मंडलियाँ और दलित संगठन शामिल हुए। अगले दिन एक एक जलूस का आयोजन किया गया।

इस जलूस पर साम्प्रदायिक हिंदुत्ववादी गुंडों ने हमला किया। इस हमले के सूत्रधार संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे थे। संभाजी भिड़े को मोदी अपना गुरु मानते हैं।

शुरू में पुलिस ने इन दोनों दंगाइयों के खिलाफ एफआईआर लिखी लेकिन महाराष्ट्र की तत्कालीन भाजपा सरकार के दबाव में इनके खिलाफ एफआईआर पर कोई कार्यवाही ना करते हुए पीड़ित पक्ष को ही आरोपी बना दिया।

इसी के साथ भाजपा सरकार ने बदमाशी करते हुए कहा कि यह सभा और रैली माओवादियों द्वारा की गई थी। तथा देश भर के सोलह सम्मानित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं वकीलों लेखकों प्रोफेसरों और बुद्धिजीवियों को जेल में डाल दिया।

सुधा भारद्वाज ना तो इस सभा में गई थीं ना इसके आयोजन समिती की सदस्य थीं | उनका इस आयोजन से कोई सम्बन्ध नहीं था। इसी दौरान एक फर्जी केस और बनाया गया जिसमें सरकार ने कहा कि हमें दिल्ली के एक कार्यकर्ता रौना विल्सन के लैपटाप से एक चिट्ठी मिली है जिसमें ये बुद्धिजीवी लोग मोदी को मारने की साजिश कर रहे हैं।

हाल ही में अमेरिका की एक डिजिटल फोरेंसिक लैब ने जांच करके बताया कि लैपटाप में यह चिट्ठी दरअसल सरकारी एजेंसियों ने ही प्लांट की थी। अलबत्ता ना तो यह चिट्ठी सुधा भारद्वाज के पास से मिली ना उनके लैपटाप से मिली। फिर भी उन्हें फर्जी मामला बना कर जेल में डाल दिया गया।

कानूनन इस तरह की चिट्ठी को जिस पर किसी के दस्तखत तक नहीं हैं ना ही इन सोलह लोगों में से किसी की हैण्ड राइटिंग से मिलती है कोर्ट में सबूत के तौर पर स्वीकार ही नहीं की जा सकती। फिर भी आश्चर्यजनक रूप से इसे कोर्ट ने सबूत के तौर पर स्वीकार किया और तीन साल तक इन सोलह सामाजिक कार्यकर्ताओं में किसी को भी ज़मानत तक नहीं दी।

अभी भी सुधा को जो ज़मानत मिली है वह डिफाल्ट बेल है अर्थात कानूनन अगर जांच एजेंसी एक निश्चित अवधि के भीतर आरोप पत्र दाखिल नहीं करती है तो आरोपी को ज़मानत देना कानूनी तौर पर ज़रूरी होता है।

सुधा को बेल के साथ एनआईए ने जो शर्तें लगाईं हैं वे भी अनोखी हैं

सुधा मुंबई से बाहर नहीं जा सकेंगी। वे मीडिया से बात नहीं कर सकेंगी। वे किसी सभा में भाग नहीं ले सकेंगी। उन्हें अपने तीन रक्त सम्बन्धियों के नाम पते कोर्ट को देने होंगे। वे बिलासपुर से बस में बैठ कर लम्बा सफर करके बस्तर तक आती थीं और आदिवासियों की तकलीफें सुनती थीं उनके मुकदमों में कोर्ट में पैरवी करती थीं।

वे आभिजात्य परिवार से थीं लेकिन मजदूरों के बीच काम करती थीं। उन्हीं की झोपडी में ज़मीन पर चटाई बिछा कर सो जाती थीं। एक सूती साड़ी और सस्ती सी हवाई चप्पल उनका पहनावा था।

सुधा भारद्वाज जैसे लोग इस देश के युवाओं के प्रेरणा स्रोत हमेशा रहेंगे। जिस महिला को भारत रत्न दिया जाना चाहिए था। इस देश की फासीवादी सरकार ने उसे जेल दी।


Add Comment

Enter your full name
We'll never share your number with anyone else.
We'll never share your email with anyone else.
Write your comment

Your Comment