भारत में मानवाधिकार और संविधान
सुशान्त कुमारआर्थिक आपातकाल के इस दौर में मानवाधिकार का विशेष महत्व है। जो सरकार लोगों की रोजीरोटी और सम्पत्ति को नष्ट करने में लगा हो ऐसे समय में मानवाधिकार दिवस का महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है। लोग अपने मेहनत के पैसो को हासिल करने के लिए बैंकों के लाइनों में खड़े होकर मौत को गले चुके हैं और कालाधन का जुमला बकवास बनकर रह गया है। कालाधन जहां से लेकर आना था विदेशी बैंकों से वहां सरकार पहुंच भी नहीं रही है। और इस योजना के विरोधियों को भ्रष्टाचारी और उनके जनविरोधी नीतियों का पर्दाफाश करने वालों को देशद्रोही कहा जा रहा है।

मानवाधिकार दिवस का विश्व सहित पूरे देश में धूमधाम से मनाया गया। प्रदेश के कई जिलों में छत्तीसगढ़ पीयूसीएल ने मानवाधिकार दिवस में जेल में बंद निर्दोष आदिवासियों की रिहाई और जनआंदोलन में दमन को मुद्दा बनाया। बड़ी संख्या में संविधान के प्रस्तावना में अंकित समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के स्वर्णिम सिद्धांतों पर विश्वास रखनेवाले लोग उपस्थित हुए हुवे।
जहां तक मानवाधिकार का सवाल है भारतीय संविधान ने ही संयुक्त राष्ट्र महासंघ के मानवाधिकार चार्टर को दिग्दर्शन किया था। 10 दिसम्बर 1948 से पहले भारत के संविधान ने तमाम अवैज्ञानिक तथ्यों को नकारकर जातीय और धार्मिक शोषण के सदियों पुरानी व्यवस्था को खत्म कर 5000 सालों से अधिक पुरानी जाति व्यवस्था, अधार्मिक और मानव द्वारा मानव के शोषण एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के शोषणकारी व्यवस्था को खत्मकर कम दिनों में भारत सहित देश का सबसे बड़ा संविधान 26 नवम्बर 1949 को आत्मसात किया था। यही भारत में मानवता और लोकतंत्र को स्थापित करने में कट्टरतावाद, तानाशाही और अधिनायकत्व के खिलाफ ताबूत में पहली कील थी।
मनुष्य की व्यक्तिगत गरिमा की रक्षा मानवाधिकार की सार्वभोम सच्चाई है। कोई भी धर्म या संविधान किसी भी मानव की गरिमा से सर्वोच्च नहीं हो सकती है। जब से मानव ने जन्म लिया है उसके जीने से लेकर मृत्यु तक के तमाम अधिकार मानवाधिकार में निहित है। और भारत का संविधान मानवाधिकार की आवृत्ति करता है।
महामानव बुद्ध वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने दुनिया के तमाम काल्पनिक और अलौकिक शक्तियों को खारिज करते हुए दुनिया को मनुष्य केन्द्रित समाज के जनक के रूप में मनुष्य को स्थापित किया था। और कल्पप्रवर्तक बाबासाहब आम्बेडकर ने मानव गरिमा और उसके अधिकारों को सुनिश्चित करते हुए भारत और विश्व के सबसे बड़े संविधान भारतीय संविधान की रचना की थी। जो बेवकूफ यह मानते हैं कि बाबा साहेब ने संविधान की रचना नहीं की उन्हें कान्स्टीट्यूशन डिबेट को पढ़ लेना चाहिए।
क्या आप जानते हैं?
26 नवंबर 1949 के दिन (72 वर्ष पहले) बाबासाहब आम्बेडकर ने 395 अनुच्छेद एवम् 8 अनुसूचियों वाले भारत के संविधान को भारत के प्रथम राष्ट्रपति को सौंपा था। इस ऐतिहासिक दिन का पर्व पूरे राष्ट्र के लिए मनाना अनिवार्य होना चाहिए।
कुछ लोग प्रश्न उठाते हैं कि हम बाबा साहब को संविधान निर्माता आखिर क्यों कहे? इसके लिए निम्न तथ्य प्रमाण के रूप में दिए जा सकते हैं।
1. बाबासाहब ने संविधान सभा में संविधान के रखे गए मसौदे में निहित तथ्यों को समझाते हुए 17 दिसम्बर, 1946 को 3310 शब्दों का अपना प्रथम वक्तव्य दिया।
2. बाबासाहब ने लगातार 141 दिनों तक संविधान निर्मात्री कमेटी के चेयरमैन के रूप में अकेले कार्य किया यद्यपि कहने के लिए उस कमेटी में कुल 7 लोग थे।
3. बाबासाहब के अनुसार जब संविधान का प्रारूप तैयार हो गया तो उसे जनता की प्रतिक्रिया के लिए रखा गया। इस प्रतिक्रिया में 7635 संशोधन पारित हुए। बाबा साहब ने इन संशोधनों को पढक़र 5162 संशोधनों को अस्वीकार करते हुए 2473 संशोधनों को संविधान में समायोजित किया।
4. अपने द्वारा तैयार किए गए संविधान के प्रारूप में निहित तथ्यों को संविधान सभा के सदस्यों को समझाने के लिए उन्होंने नवम्बर 4, 1948 को 8334 शब्दो का भाषण (वक्तव्य) दिया।
5. संविधान सभा की कार्यवाही में बाबासाहेब आंबेडकर रोजाना 8 से 9 बार खड़े होकर बोलते थे पर अनेक बार ऐसा भी समय आता था जब 1 ही दिन में बाबासाहेब को 24 से 25 खड़े होकर सदन का मार्गदर्शन करना पढ़ता था।
6. शायद इसी लिए टी.टी. कृष्णमाचारी ने संविधान सभा को यह बताया था कि यद्यपि संविधान निर्मात्री कमेटी में 7 सदस्य थे परंतु एक ने त्यागपत्र दे दिया, एक की मृत्यु हो गई, एक सदस्य अमरीका चले गए, एक अन्य सदस्य राज्य के कार्यों में व्यस्त थे, एक या दो सदस्य दिल्ली से दूर रहते थे, और अपने खराब स्वास्थ्य के कारण संविधान के कार्यों में हिस्सा नहीं ले पाए। अत: हुआ यह कि संविधान बनाने का सारा काम अकेले डॉक्टर आम्बेडकर को ही पूरा करना पड़ा।
7. इस तरह बाबासाहेब आंबेडकर ने संविधान सभा में कुल 2 साल 11 महीने एवं 18 दिन तक लगातार काम किया।
8. संविधान की फाइनल कापी राष्ट्रपति के हाथों में सौंपते समय नवम्बर 25, 1949 को संविधान सभा में संविधान के गुण, दोष, प्रकृति, भविष्य, आदि को विस्तार से समझाते हुए तथा सभी राजनीतिक विचारधारा के सदस्यों का, एवं अपने सहयोगियों का धन्यवाद करते हुए 3900 शब्दो का अंतिम भाषण दिया।
इसमें निहीत मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ तमाम अधिकार प्रदान करते हैं। जिस पर कार्य करना आज अधूरा है। अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए व्यापक अधिकार 5वीं और 6वीं अनुसूचियों को खत्म करने शासक वर्ग ने अभियान छेड़ रखा है। यदि संविधान को लागू कर दिया जाए तो सही मायने में हमारा देश एक राजनैतिक प्रजातांत्रिक देश के रूप में स्थापित हो सकेगा।
आम्बेडकर ने संविधान में प्रजातांत्रिक समाज के साथ सभी धर्मों को मानने की स्वतंत्रता पर भी बल दिया था। उन्होंने महिलाओं और पिछड़े कौम के लिए कानून मंत्री के पद से त्याग पत्र दिया था। हिन्दू धर्म में व्याप्त दमनकारी नीतियों को सुधारने के लिए हिन्दू धर्म सहित तमाम महिलाओं के लिए हिन्दू कोड बिल की स्थापना की थी।
कालंतर में कम्यूनल राईट को खारिज कर हिन्दू कोड बिल से हजारों सालों से पीडि़त लोगों के मानवाधिकार को कुचलने का प्रयास किया गया है। आरक्षण शब्द को सभी नए-नए नजरों से देख रहे हैं यह असलियत में हजारों वर्षों से पीडि़त लोगों के लिए प्रतिनिधित्व का सवाल है। जिस पर विचार करने की जरूरत है।
मुस्लिम तथा हिन्दू महिलाओं अधिकार की व्यवस्था बाबा साहब के कार्यों का वृहद रूप है। बतौर भारतीय संविधान का निर्माण ही विश्व में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पारित चार्टर को बलवती प्रदान करता है। जो आंबेडकर के कार्यों का प्रतिफलन है। देश सहित विश्व में शांति हो इसके लिए संविधान और संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर पर गौर करने की जरूरत है।
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