जेल से अंतत: रिहा हुईं अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज

सुधा जेल से छूटने के बाद आजादी मिलती तो क्या करती?

उत्तम कुमार

 

मशहूर अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता  सुधा भारद्वाज को तीन साल पहले एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार किया गया था। उनके साथ ही 15 अन्य लोग भी गिरफ्तार किए गए थे। तीन साल और तीन महीने से अधिक समय तक जेल में रखने के बाद उन्हें महाराष्ट्र की भायकला जेल से रिहा कर दिया गया है। दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा 1 दिसंबर को दी गई डिफॉल्ट जमानत पर रोक लगाने की राष्ट्रीय जांच एजेंसी की याचिका को खारिज करने के बाद यह कदम उठाया गया। जिससे उनकी रिहाई सुनिश्चित हो सकी है।

न्यायमूर्ति यूयू ललित ने एनआईए का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलीसिटर जनरल अमन लेखी की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद जांच एजेंसी की अपील खारिज कर दी थी। न्यायमूर्ति रवींद्र भट और न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी की पीठ ने कहा था कि बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।

देश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं और आदिवासियों तथा मेहनतकश वर्ग ने भारद्वाज की रिहाई का स्वागत किया है और तीन साल बिना सुनवाई के जेल में रखने पर सवाल भी उठाया है।

एनआईए ने 6 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट से बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली अपनी याचिका को तत्काल सूचीबद्ध करने का आग्रह किया था, जिसने भीमा कोरेगांव मामले में कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज को डिफॉल्ट जमानत दी थी।

1 दिसंबर को बॉम्बे हाईकोर्ट ने भीमा कोरेगांव जाति हिंसा मामले में भारद्वाज को जमानत दी थी। हालांकि, कोर्ट ने अन्य आठ आरोपियों - रोना विल्सन, वरावारा राव, सुधीर धवले, सुरेंद्र गाडलिंग, शोमा सेन, महेश राउत, वर्नोन गोंजाल्विस और अरुण फरेरा की जमानत याचिकाओं पर विचार करने से इनकार कर दिया. ये सभी आरोपी तलोजा सेंट्रल जेल में बंद हैं। बताते चले कि इस मामले में फार स्टेन स्वामी की पहले ही जेल में मौत हो चुकी है।

इस मामले की पहले पुणे पुलिस जांच कर रही थी और बाद में केस एनआईए को सौंप दिया गया था। जब रा’य पुलिस मामले की जांच कर रही थी तो भारद्वाज पुणे की येरवडा जेल में बंद थीं, एनआईए के केस संभालने के बाद उन्हें भायकला महिला जेल में रखा गया था। एल्गार परिषद मामले की सुनवाई अभी बाकी है।

जमानत की कठिन शर्तें

विशेष एनआईए अदालत ने जमानत की शर्तों के तहत 60 वर्षीय भारद्वाज को अपना पासपोर्ट जमा करने तथा मुंबई में ही रहने के लिए कहा है। उन्हें शहर से बाहर जाने के लिए अदालत से अनुमति लेनी होगी। इसके अलावा उन्हें हर 14 दिन पर पास के पुलिस स्टेशन में खुद जाकर या वीडियो कॉल के जरिए हाजिरी लगानी देनी होगी।

भारद्वाज को इस मामले में अपने सह-आरोपियों के साथ किसी भी तरह का संपर्क स्थापित नहीं करने, कोई अंतरराष्ट्रीय कॉल नहीं करने का भी निर्देश दिया है। वह मुंबई अदालत के अधिकार क्षेत्र में रहेगी और अदालत की अनुमति के बिना कहीं नहीं जाएगी। भारद्वाज को अपने साथ रहने वाले अपने रिश्तेदारों के संपर्क नंबर भी पुलिस को देना होगा।

उन्हें कम से कम दो पहचान प्रमाण पत्र जैसे पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड, राशन कार्ड, बिजली बिल, मतदाता पहचान पत्र की प्रतियां जमा करना होगा। सबसे कड़ा शर्त यह कि वह मीडिया से दूरी बनाए रखेगी। उनकी ओर से पेश हुए अधिवक्ता युग मोहित चौधरी ने इस शर्त का विरोध करते हुए कहा था कि यह उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

भारद्वाज को 28 अगस्त, 2018 को गिरफ्तार किया गया था और बाद में उन्हें नजरबंद कर दिया गया था। उसके बाद 27 अक्टूबर, 2018 को उन्हें हिरासत में ले लिया गया था।

सुधा जेल से छूटने के बाद आजादी मिलती तो क्या करती?

जेल से छूटने के बाद सभी ने कयास लगाना शुरू  कर दया है कि सुधा अगर मीडिया से मिलती तो क्या कहती? जैसा कि आपने देखा है वह जेल से छूटते ही मीडिया को हाथ दिखाकर अभिवादन किया है। वह शायद कह रही होगी कि मुझे एक के बाद एक छत्तीसगढ़ सहित देश के सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं और पत्रकारों से बात ना करना पीड़ादयक लग रहा है।

वह कह रही होगी कि हसदेव मामले में उद्योगपति और राजनेताओं के बीच गठजोड़ को हमें समझना होगा। वह कह रही होगी कि जेल में बंद तमाम राजनीतिक कार्यकर्ताओं सहित बेकसूर आदिवासियों की रिहाई सुनिश्चित होनी चाहिए।

वह कह रही होगी कि पूरे देश में हासिये पर खड़े लोगों को और भी तेज लड़ाई लडऩी होगी? वह कह रही होगी कि काश? सभी का मैं शुक्रिया कर पाती जिन लोगों ने मेरी रिहाई के लिये रात दिन एक कर दिये? वह आज रात सोते समय सोच रही होगी कि छत्तीसगढ़ में उनके इंतजार में आलमारी में पड़े फाइल को फिर से रिओपन किया जाये और अदालत की लंबित प्रक्रियाओं को पूरी की जाये?


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