भारत का संविधान एक अछूत ने ही क्यों लिखा?

महापरिनिर्वाण दिन

उत्तम कुमार

 

हिन्दू समाज की दमनकारी विशेषताओं के प्रति एक विद्रोह के प्रतीक के रूप में डॉ. अम्बेडकर को जाना जाएगा। उन्होंने उन बुराईयों को समाप्त करने का संकल्प किया। जिनके लिए हम सबको प्रयत्न करना चाहिए। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त जातिवाद, छुआछूत, लिंगभेद, बैरभाव और पूर्वाग्रहों को मिटाकर राष्ट्रीय एकता, देशभक्ति तथा संवैधानिक नैतिकता की परिपालन का रास्ता दिखाया। उनके व्यक्तित्व से यह शिक्षा भी मिली है कि आदमी को अन्य लोगों पर आश्रित होने के अपेक्षा अपने ही प्रयासों में विश्वास रखना चाहिए। अम्बेडकर अपने मां-बाप की  14 वीं संतान थे। उनका जन्म 14 अप्रैल 1891 महू (इन्दौर) में हुआ था।

उनके पिता का नाम रामजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई था। उनकी मृत्यु 6 दिसंबर 1956 को 26, अलीपुर रोड दिल्ली में हुई। डॉ. अंबेडकर का जन्म अछूत समुदाय के एक निर्धन परिवार में हुआ। वे घरेलू पशु नहीं रखते थे, केवल लोहे तथा तांबे के आभूषण पहन सकते थे, विशेष प्रकार के वस्त्र ही वे धारण कर सकते थे। उन्हें घटिया तथा अशुद्ध खाना मिलता था। गांवों के बाहर अस्वस्थ एवं गंदे स्थानों पर उन्हें रखा जाता था। सार्वजनिक कुंओं से पानी लेना निषेध था। शिक्षा से मीलों दूर रखा जाता था। अछूत हिन्दू देवी-देवताओं को मानते थे लेकिन हिंदू मंदिरों में उन्हें झांकने तक नहीं दिया जाता था। उनके साथ पशुओं की भांति व्यवहार किया जाता था। नाई उनकी हजामत नहीं बनाते और धोबी उनके कपड़े नहीं धोते थे। 

आम्बावड़े गांव के पास कापोसी में उन्होंने प्रायमरी शिक्षा प्रारंभ की। 6 वर्ष की उम्र में उनकी माता भीमा बाई का निधन हो गया। अम्बेडकर बचपन में अपने भाई आनंदराव के साथ जमीन में टाट में बैठकर पढ़ता था। यह स्थान कमरे से बाहर होती थी। नल की टोटी को किसी के द्वारा खोले जाने के बाद ही वह पानी पी सकता था। एक सार्वजनिक कुंए से पानी पीने के कारण हिंदुओं ने उनकी अच्छी पिटाई कर दी थी। नाई ने बाल नहीं काटकर दुत्कार कर भगा दिया था। उनकी ज्ञान पिपासा इतनी प्रबल थी कि एक बार पूरे नग्न अवस्था में भींगते हुए स्कूल पहुंच गए थे। यही वह स्थिति थी जहां अम्बेडकर के व्यक्तित्व को आधार मिला।

अम्बेडकर आम्बावड़े गांव के निवासी थे। वे आम्बावडेकर उपनाम से पुकारे जाते थे। एक ब्राह्मण अध्यापक ने बोलने में ठीक नहीं लगने के कारण आम्बावडेकर उपनाम हटवा कर अपना उपनाम उन्हें दिया तब से वे ‘अम्बेडकर’ कहलाए। बचपन से ही पुस्तक प्रेम ने उनके विशाल ग्रंथ संग्राहालय का निर्माण संभव बनाया। उन्होंने एल्फिन्स्टन हाई स्कूल में 1908 में मेट्रिक की परीक्षा पूरी की। 16 साल की उम्र में रमाबाई के साथ उनका विवाह हुआ। उस समय उनकी पत्नी की उम्र 9 वर्ष की थी।

बाद में एल्फिन्स्टन कॉलेज में इंटर की परीक्षा पास की। उसके बाद कलुस्कर के सहयोग से बड़ौदा महाराजा संयाजीराव गायकवाड़ ने उन्हें 25 रुपए मासिक छात्रवृत्ति देना प्रारंभ किया। 1912 में बीए की परीक्षा पास कर ली। 2 फरवरी 1913 को उनके पिता रामजी सकपाल का निधन हो गया। उनके पिता सेना में सूबेदार थे। 15 जून 1913 को वे अमेरिका रवाना हुए। 21 जुलाई 1913 को न्यूयार्क के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। जहां फारसी नवल भथेना से मुलाकात हुई। जो जीवनपर्यंत साथ रहे। वे 20 घंटे पढ़ा करते थे। सन् 1914 में जब लाला लाजपतराय ने राष्ट्रीय आंदोलन के लिए ‘इंडियन होम रूल लीग ऑफ अमेरिका’ के लिए कार्य करने चर्चा की तो अम्बेडकर ने साफ कह दिया कि ‘ वह न्यूयार्क में विद्याध्ययन के सिवाय और कोई कार्य नहीं करेगा।’

1915 में एन्शेंट इंडियन कॉमर्स नामक प्रबंध पर कोलम्बिया यूनिवर्सिटी से एमए की डिग्री प्राप्त की। बाद में ‘नेशनल डिविडेंड ऑफ इंडिया ए हिस्टोरिक एंड एनेलिटिकल स्टडी’ पर 1916 में पीएचडी की। 1924 में विधिवत पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्हें अमेरिका में दो बाते प्रभावित की। पहला वहां के संविधान के 14 वें संशोधन से नीग्रो जाति के लोगों की स्वतंत्रता की घोषणा। दूसरा बुक टी वाशिंगटन जिनकी टस्केगी इंस्टीट्यूट ने नीग्रो लोगों में शिक्षा का प्रचार किया। अम्बेडकर की भी कुछ ऐसी ही मंशा थी। एडविन आरएस सेल्गिमन की सिफारिश से महाराजा बड़ौदा ने एक वर्ष छात्रवृत्ति और बढ़ा दी। जिससे 1916 में वे लंदन रवाना हो गए। 1916 में बैरिस्टरी के लिए लंदन स्कूल ऑफ इक्नॉमिक्स एंड पॉलीटिकल साइंस में प्रवेश ले लिया। छात्रवृत्ति की अवधि समाप्त होते ही लौट आए। 

वे 20 सितंबर 1917 को बड़ौदा के मिलिट्री सेकेट्री पद पर नियुक्त हुए। छुआछूत के कारण यहां आफिस में चपरासी सभी कागजों तथा फाइलों को दूर से फेंककर चल देते थे। ऑफिस से बाहर आने पर बिछी हुई दरियों को समेट लेते थे। यहां तक कि उन्हें पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं होता था। क्लब में हिन्दू, मुस्लिम व पारसी अधिकारी भी उनसे छुआछूत करते थे। 1917 में बड़ौदा में अछूत होने के अपमान के बावजूद फिर बड़ौदा गए। क्योंकि वे चाहते थे महाराजा बड़ौदा उन्हें छात्रवृत्ति के रूप में जो ऋण दिया था, उसे चुकाएं।

यह कहना ठीक होगा कि बड़ौदा में हिंदू समाज ने अम्बेडकर के साथ जो बर्ताव किया इन्हीं बातों ने उनमें दलित समाज के प्रति कुछ करने दृढ़ संकल्प वाला योद्धा बना दिया। उसी समय उनकी सौतेली मां का देहांत हो गया। उधर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दलितों के लिए सम्मेलन किया। नवंबर 1918 को सिड़ेनहम कॉलेज में अस्थाई अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हो गए। उसी समय उनके बड़े भाई आनंदराव का बीमारी के कारण देहांत हो गया। यहां भी छूआछूत ने उनका पीछा नहीं छोड़ा था। इसी बीच महाराष्ट्र में कोल्हापुर के छत्रपति साहू महाराज अपनी रियासत में अछूतोद्धार  आंदोलन चला रहे थे।

साहू महाराज की सहायता से अम्बेडकर ने 21 जनवरी 1920 को ‘मूकनायक’ नामक मराठी पाक्षिक का प्रकाशन प्रारंभ किया। हिंदू वातावरण से प्रभावित लोकमान्य तिलक ने अपने पत्र ‘केसरी’ में मूकनायक के प्रकाशन का विज्ञापन प्रकाशित नहीं किया। इस पत्र के माध्यम से अम्बेडकर ने हिंदू समाज की बुराइयों पर कड़ा प्रहार किया।वे अपने मित्र नवल भथेना के लिए लिखते हैं-‘मेरा विश्वास करो, मुझे अत्यधिक खेद है कि मैं तुम्हे तंग करता हूं।

मैं पूर्णत: महसूस करता हूं कि वे तकलीफें जो मैं तुम्हें देता हूं, वे ऐसी है, जिन्हें परम मित्र ही सहन कर सकता है। मुझे पूर्व आशा है कि मेरे बार-बार पैसा मांगने से तुम्हारी कमर कमजोर नहीं होगी, तुम मुझसे अलगाव नहीं चाहोगे, क्योंकि तुम ही मेरे एकमात्र प्रिय मित्र हो।’ वे इसी बात पर बल देते थे कि अछूत जातियों में एकता एवं संगठन स्थापित हो ताकि वे सामूहिक रूप से अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढ़ सकें। उन्हें 1921 में प्रॉविंसियल डीसेंटलाइजेशन ऑफ इम्पेरियल फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ पर मास्टर ऑफ साइंस की डिग्री प्रदान की गई। 1923 में ‘द प्राब्लम ऑफ रूपी’ के लिए उन्हें डीएससी प्रदान की गई। ग्रेज-इन से बार-एट-लॉ की डिग्री प्राप्त की।

अम्बेडकर विद्या, कर्म, परिश्रम, साहस तथा धैर्य को उत्कृष्ट जीवन में आवश्यक तत्वों के रूप में केवल स्वीकार ही नहीं करते अपितु समाज सुधार जैसे कठिन मार्ग की ओर बढ़े। जिसमें उन्हें भारी प्रसन्न्ता हुई और सफलता भी मिली। 1923 में वकालत व समाज सुधार प्रारंभ कर दिए। डॉ. अम्बेडकर सरकारी नौकरी के पक्ष में नहीं थे। 1925 में बॉटलीबॉय ‘द एकाउंन्टेंसी ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट’ में अंशकालिक लेक्चरर के पद पर कार्य किए। जहां वे मर्केंटायल लॉ पढ़ाते थे।

20 जुलाई 1924 के दिन बॉम्बे बहिष्कृत हितकारिणी सभा से अछूतोद्धार का कार्य प्रारंभ किया। जिसका मूलमंत्र आत्म सहायता तथा आत्म सम्मान था। सभा ने 4 जनवरी 1925 को एक छात्रावास शुरू किया। जिसमें छात्रों को कपड़े, स्टेशनरी, निवास स्थान का खर्च उठाना शामिल था। सोलापुर की म्यूनिसिपेलिटी ने भी 40 रुपया माहवार की मदद की। सभा ने ‘विद्या विलास’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन करता था, जिसमें विद्यार्थी लिखते थे। अम्बेडकर ने 1928 में ‘बांबे प्रातीय अस्पृश्य परिषद’ के अधिवेशन की अध्यक्षता की। देश में चल रहे आंदोलन का वे अध्ययन करते थे।

रामास्वामी नायकर के सत्याग्रह की उन्होंने प्रशंसा की। उन्होंने बंजर जमीनें हासिल करने आंदोलन किया। वे कहते थे तुम्हें जीवित रहना हैं तो जिंदादिल बनकर जिओ। इस देश के अन्य नागरिकों को मिलता है वैसा अन्न, वस्त्र और मकान के लिए लड़ों। शुरूआती दिनों में उन्होंने बड़े कष्टों का सामना किया। उन्हें बैठने के लिए कुर्सी नहीं दी जाती थी। कोर्ट जाते और खाली हाथ लौट आते थे। जून 1925 में बॉटलीबॉय ‘द एकाउन्टेंसी ट्रेनिंग इन्सटीट्यूट में मर्केंटाइल लॉ के पॉर्ट टाइम लेक्चरर हो गए और मार्च 1928 तक यह कार्य करते रहे। वे 1927 में बांबे लेजिस्लेटिव काउंन्सिल का सदस्य मनोनित किए गए।’

वाइसराय की कार्यकारिणी में लेबर मेंबर बनने के बाद 1942 में नई दिल्ली आ गए। बाद में कानून मंत्री बनने के बाद इस्तीफा दे दिया। उन्होंने निरंतर संघर्ष किया, दलितों की चिंताएं की और स्वयं अनेक प्रकार की मुसीबतों से घिरे रहे। उन्हें एवेण्डिसाइटिस, ब्लड प्रेशर, डॉयविटीज व पैरों का रोग हो गया। उन्होंने प्राचीन एवं आधुनिक दर्शनों, धर्मों एवं सिद्धांतों का विश£ेषण किया। उनका मानना था रूचि अनुसार काम, धंधा या रोजगार न मिले तो आर्थिक हालात बिगड़ जाती हैं। साथ ही आदमी परंपराओं और संस्कारों के इशारे पर दास भी बन जाता है। उन्होंने उत्तम जीवन के लिए ज्ञानोपार्जन, चरित्र निर्माण और सामाजिक हित के प्रति निष्ठा को महत्व दिया।

गोलमेज परिषदों में उन्होंने भारत में रहने वाले अछूतों की करूण कहानी इतने प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत की कि सुनने वाले चकित रह गए और उन्हें ही दलितों का एकमात्र नेता तथा प्रतिनिधि स्वीकार किया गया। 27 मई 1935 को रामाबाई का बीमारी के कारण निधन हो गया। 1947 में रोग के दौरान वे संविधान के मूलरूप व हिन्दू कोड बिल की पृष्ठभूमि बनाई थी। इसी दौरान उन्होंने ‘द बुद्ध एंड हिज धम्म’ की रचना की। बाद में रमाबाई को समर्पित करते हुए ‘पाकिस्तान ऑर द पार्टीशन ऑफ इंडिया’ की रचना की। अपने पुत्र यशवंत के विवाह संबंध में कहा था कि-‘शादी कोई ऐसी सीढ़ी नहीं जो मानव को आकाश तक ऊपर उठा ले जाए।’

पहली पत्नी की मृत्यु के बाद 14 मार्च 1948 को दूसरी विवाह किया। अपने अस्वस्थता के स्थिति में भी उन्होंने ‘बुद्ध और कॉर्ल माक्र्स’, ‘रिवॉल्यूशन द अंटचेविल्स’, ‘रिवॉल्यूशन इन एन्शेंट इंडिया’, ‘द बुद्ध एंड हिज धम्म’ जैसे ऐतिहासिक महत्व के ग्रंथों की रचना की।23 दिसंबर 1956 को उन्होंने हिंदू धर्म परिवर्तन कर बौद्ध धर्म ग्रहण करने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि ‘मैंने इस बात का ध्यान रखा है कि मेरे धर्म परिवर्तन से इस भूमि की संस्कृति एवं इतिहास की पंरपरा को कोई हानि नहीं पहुंचे।’ उन्होंने भातृत्व, समानता तथा स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर ऑल इंडिया रिपब्लिकन पार्टी की स्थापना की।

बौद्ध धर्म पर उन्होंने कहा कि बौद्ध संघ अपना दृष्टिकोण बदलकर संन्यासी बनने की अपेक्षा भिक्षुओं को, क्रिश्चियन मिशनरियों के समान, सामाजिक कार्यकर्ता और सामाजिक प्रचारक बनना चाहिए।’ महाड़ का जल सत्याग्रह, नासिक का धर्म सत्याग्रह की अगुवाई की। 12 नवंबर 1930 में प्रथम गोलमेज परिषद में अछूतों के अधिकार पूंजीपति द्वारा श्रमिकों को सही मजदूरी नहीं देना, डोमीनियन स्टेट्स की मांग रखी। द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में अंबेडकर ने अपने पक्ष को दमदारी के साथ रखकर सभी को अछूतों के अस्तित्व को स्वीकार न्यायोचित समाधान पर अधिक बल दिया था। 

20 अगस्त 1932 को कम्युनल एवार्ड की घोषणा के बाद दलितों को पृथक निर्वाचन मिला। पृथक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर गांधी उनके खिलाफ हो गए। गांधी ने ईसाई, मुसलमानों को पृथक प्रतिनिधित्व के विरूद्ध एक शब्द भी नहीं बोले लेकिन अछूतों को प्राप्त अधिकारों के वे विरोधी हो गए। यहीं नहीं गांधी ने पृथक चुनाव के विरूद्ध आत्महत्या करना चाहते थे। पूना पैक्ट से अम्बेडकर नेता के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
9 सितंबर 1946 को अंबेडकर संविधान सभा के सदस्य चुने गए। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद स्थायी अध्यक्ष नियुक्त हुए। नेहरू ने स्वतंत्र सार्वभौम सत्ता प्राप्त कर प्रजातंत्र के रूप में संविधान में समाजवाद को जोडऩे की वकालत की। 22 जुलाई 1947 को ध्वज में अशोक चक्र स्वीकार किया गया।

अंबेडकर को इस समिति के अध्यक्ष के रूप में चुन लिया गया। जिसका उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। भारत ने अपना कानूनवेत्ता, नया स्मृतिकार उस जाति से चुना जिसे सदियों से कुचला एवं शोषित किया गया। नये स्वतंत्र भारत में कानून बनाने का कार्यभार एक ऐसे व्यक्ति को सौंपा। जिसने कुछ ही वर्ष पूर्व मनुस्मृति को जला दिया था। 16 नवंबर 1948 को संविधान सभा का प्रारूप रखा गया। 5 फरवरी 1951 को ढेरों संशोधनों के साथ हिंदू कोड बिल रखा। मार्च 1952 में राज्य सभा सदस्य के रूप में अम्बेडकर निर्वाचित हुए।

उनकी योग्यता तथा उपलब्धि के लिए 12 जनवरी 1953 को उस्मानिया विश्वविद्यालय ने उन्हें डीलिट से सम्मानित किया। उन्होंने कहा यदि हम लोकतंत्र की स्थापना करना चाहते हैं, तो हमें अपने सामाजिक एवं आर्थिक लक्ष्य को प्राप्ति संवैधानिक ढंग से हासिल करनी चाहिए। अन्य हिंसात्मक तरीकों से नहीं। संवैधानिक विशेषज्ञ होने के साथ कोलम्बिया विश्वविद्यालय अमेरिका ने 5 जून 1952 को उन्हें एलएलडी की डिग्री से विभूषित किया। दर्शन के क्षेत्र में पुरोहितवाद, ब्राह्मणवाद, गांधीवाद व माक्र्सवाद का खंडन किया।

उन्होंने मार्क्सवाद का खंडन करते हुए कहा कि साम्यवादियों को क्रांति लाने के लिए पहला प्रहार वर्णव्यवस्था, जात-पात के पोषक धर्मग्रंथों पर करना चाहिए। उनका मानना था देश का राजनीतिक हुकूमत समाजवादी समाज की स्थापना का लक्ष्य स्वीकार करते हुए भी श्रमिकों द्वारा सशस्त्र क्रांति लाना संभव नहीं है। डॉ. अंबेडकर के मिशन को पूरा करने की बड़ी जिम्मेदारी उस पीढ़ी पर आती है जो उनके आंदोलन से लाभान्वित होकर बेहतर सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में हैं। उन्हें अपनी स्थिति से संतुष्ट होकर यह नहीं भूल जाना चाहिए कि उनके नीचे अब भी बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों से हैं जो लगभग गुलामी का जीवन जी रहे हैं।

abhibilkulabi007@gmail.com
dakshinkosal.mmagzine@gmail.com


Add Comment

Enter your full name
We'll never share your number with anyone else.
We'll never share your email with anyone else.
Write your comment

Your Comment