मौत छू कर निकल गई, चार दिन बाद बंद खदान से निकले बाहर
विशद कुमारउल्लेखनीय है कि झारखंड के तमाम बंद पड़े कोल ब्लॉक में अवैध उत्खनन करके स्थानीय लोग अपनी रोज़ी-रोटी चलाते हैं। इन क्षेत्रों के लोगों का रोजगार का यह बहुत ही सशक्त माध्यम है। ऐसे में आए दिन चाल घंसने से कई लोग अपनी जान गंवा बैठते है, जिसका कोई आंकड़ा नहीं होता है। ऐसी हालत में उन्हें सरकारी पारिवारिक लाभ योजना का भी कोई लाभ नहीं मिलता है। सबसे दुखद पहलू यह है कि परिजनों को कभी - कभी इस घटना के शिकार अपनों की लाश भी नसीब नहीं होती है। क्योंकि अवैध उत्खनन का मामला दर्ज होने के डर से मरने वालों के परिजन ऐसी घटनाओं की जानकारी पुलिस को नहीं देते है। ऐसे में इनकी मौत भी अवैध हो जाती है।

बिरले ही ऐसे लोग होते हैं, जो ऐसी घटनाओं से जिन्दा बच जाते हैं। लेकिन उन्हें किस शब्द से नवाजा जाए 96 घंटे तक बिना खाए-पीए अंधकूप से स्वतः जिन्दा बाहर निकल आएं।
इसका जीता - जागता मिसाल हैं झारखंड के बोकारो जिले के चार लोग जो गत 29 नवंबर को ज़िन्दगी की जीत हासिल की और मौत को मात देकर चार दिन बाद कई सालों से बंद एक कोल माइंस से रेंगते हुए जिन्दा बाहर निकल गये, जबकि घटना के बाद बीसीसीएल की रेस्क्यू टीम और एनडीआरएफ का बचाव दल ने अपने हाथ खड़े कर दिए थे।
घटना के बारे में बताया जाता कि झारखंड के बोकारो जिला अंतर्गत वर्षों से बंद पड़े पर्वतपुर कोल ब्लॉक से सैकड़ों ग्रामीण अवैध ढंग से कोयला निकालते हैं और बेचकर अपना गुजारा-बसर करते हैं।
इसी क्रम में पिछले 26 नवंबर की सुबह 8 बजे क्षेत्र के तिलाटांड निवासी लक्ष्मण रजवार, रावण रजवार, भरत सिंह, अनादि सिंह, नेपाल सिंह और पप्पू पर्वतपुर बंद खदान में बेलचा, कुदाल, गैंता, टोकरी लेकर अंदर घुसे। इसी दौरान चाल धंस गई।
नेपाल सिंह और पप्पू निकलने में कामयाब रहे। बाकी चारों फंस गए। क्योंकि जहां चाल धंसी थी उसके उस पार ये चारों थे जबकि दो लोग चाल के इस पार थे, जो जल्दी चल्दी बाहर निकल गए। बता दें कि अंदर फंसे लोगों के परिजनों ने स्थानीय थाना अमलाबाद पुलिस को इसकी जानकारी नहीं दी, जिससे शुरू में पुलिस ने भी ध्यान नहीं दिया।
इस घटना की जानकारी जब बीसीसीएल को हुई तब उसके रेस्क्यू टीम बचाव कार्य के लिए आयी, लेकिन स्थिती को देखते हुए उसने हाथ खड़े कर दिए। बाद में एनडीआरएफ को बुलाया गया। उसने भी अपने पैर पीछे कर लिए। ऐसे में उनके परिजन और क्षेत्र के लोगों ने उन्हें मृत मान लिया और निश्चिंत हो गए।
दूसरी तरफ वे चारो अंदर फंसे ग्रामीणों ने अपने हौसले को टूटने नहीं दिया और मौत को मात देकर 96 घंटे बाद चौथे दिन 29 नवंबर की सुबह खुद रास्ता बनाकर बाहर निकल आए।
बता दें कि बीते 26 नवंबर की सुबह करीब 8 बजे अपने घरों से छह ग्रामीणों की टोली सुरंग से कोयला निकालने के लिए बोरा, कुदाल के साथ अन्य सामान लेकर निकले थे। इसी दौरान दोपहर 1 बजे अचानक सुरंग के ऊपर से पत्थर खिसकने शुरू हो गए। देखते ही देखते बाहर निकलने का रास्ता बंद हो गया। चारों बचने के ख्याल से करीब 50 फीट दूर सुरंग में एक चट्टान के नीचे छुपकर बैठ गए। वहीं बाहर निकले नेपाल और पप्पू ने गांव में जाकर लोगों को घटना की जानकारी दी। तब गांव के लोगों की इसकी जानकारी हुई। वहीं, प्रशासन को हादसे की जानकारी शाम के 4 बजे हुई।
दूसरे दिन चास के एसडीपीओ पुरुषोत्तम कुमार सिंह ने चंदनकियारी बीडीओ, सीओ, बीसीसीएल के कोल ब्लॉक प्रभारी ने निरीक्षण किया। बीसीसीएल की रेस्क्यू टीम को बुलाया रेस्क्यू टीम में शामिल लोगों ने सुरंग में जाने की कोशिश तो की, लेकिन करीब 10 फीट के बाद ही रास्ता बंद होने के कारण आगे जाने का साहस नहीं जुटा सके।
जिन्दगी लिए लौटे इन चारों ने बताया कि हम चारों 26 नवंबर की सुबह 8 बजे बेलचा, कुदाल, गैंता, टोकरी लेकर खदान में घुसे थे, कोयला काट रहे थे कि तभी आवाज हुई और खदान धंस गई। रास्ता बंद हो गया। अंदर अंधेरा था। हम चट्टान के किनारे बैठ गए। ऊपर से मलबा गिर रहा था और मौत सामने खड़ी थी।
चिल्लाए भी पर कोई जवाब नहीं आया। एक दिन ऐसे ही निकल गया। दूसरे दिन भी हम वहीं फंसे रहे। ऐसे में रावण ने सुझाव दिया कि हम चारों की मौत निश्चित है। क्यों न निकलने की कोशिश कर लें। 30 मीटर बढ़े होंगे कि रिसता पानी मिला।
पहले प्यास बुझाई। उसके बाद हमें ताजी हवा महसूस हुई, जिसके रास्ते चलकर हमें बाहर का रास्ता मिला। उन्होंने बताया कि उन्हें लगा कि जिस तरह अंदर में लगातार पत्थर टूटकर गिर रहे हैं। उनका बचना अब संभव नहीं है।
ऐसे में चारों मोबाइल टॉर्च की रोशनी के सहारे किसी तरह एक जगह पहुंचे। उसके बाद सुरंग के अंदर खिसकते हुए पत्थरों के गिरने के बंद होने का इंतजार किया, अंदर में उन्हें दिन और रात का पता नहीं चल रहा था।
ऐसे में रावण के पास एक मोबाइल था, जिसमें टावर भी नहीं मिल रहा था, तो मोबाइल में समय देखकर यह पता लगाने की कोशिश करने लगे कि अब दिन है या रात, शुक्रवार के दिन 1 बजे के बाद से रविवार की सुबह में पत्थरों का गिरना बंद हो गया। तब उन्होंने टॉर्च की रोशनी से रास्ता खोजने की शुरुआत की।
ऐसे में अंदर ही अंदर करीब 200 फीट कोल ब्लॉक से हुघुकटांड़ की ओर चले गए। एक पुरानी सुरंग उन्हें नजर आई। उस रास्ते काफी पत्थर गिरे हुए थे। उन्हें हाथों से हटाकर रेंगते हुए आगे बढ़ते रहे।
उन्होंने आगे बताया कि अपने हाथों से ही पत्थर हटाते रहे। एक-दूसरे पत्थरों को तोड़ते रहे रास्ता बनाते रहे। जब उन्हें थोड़ी ठंडी हवा लगने लगी तो लगा कि अब वह किसी रास्ते के पास पहुंच गए हैं।
चार टार्च में से दो ही काम कर रही थी। जिधर से ठंडी हवा मिली, अब चारों उसी ओर रेंगते हुए खिसकने लगे और घुसने वाली सुरंग के करीब 115 मीटर दूसरी सुरंग पर निकलकर सीधे अपने गांव चले आए।
29 नवंबर की सुबह चार बजे चारों ग्रामीण तिलाटाड़ गांव पहुंचे। उस वक्त अंधेरा था। चारों सबसे पहले रावण रजवार के घर गए और आवाज लगाई। उनकी आवाज सुनकर घरवाले डर गए। दरवाजा नहीं खोला।
फिर लक्ष्मण, भरत और अनादि के घर गए। लेकिन किसी के घर का दरवाजा नहीं खुला। अंधेरे में चारों गांव में घूमते रहे। सुबह उजाला होने पर ग्रामीणों ने उन्हें पहचाना। वास्तव में रात में उन्हें भूत समझकर डर से किसी ने दरवाजा नहीं खोला था।
उनके लौटने के बाद उनके गांव तिलाटांड में 29 नवंबर को एक साथ होली- दिवाली का जश्न देखने को मिला। यह गांव चंदनकियारी ब्लॉक की नयावन पंचायत में है। उनके गांव में पहुंचने के बाद एक जश्न का माहौल हो गया। उनके परिवारों के बीच खुशियों का ठिकाना नहीं रहा।
चारों ग्रामीणों की सकुशल वापसी के बाद ग्रामीणों में काफी खुशी देखी गई। पटाखे फोड़े और ढोल नगाड़ा बजाना शुरू कर दिया। ढोल और बाजा की आवाज सुनने के बाद आसपास के लोगों को सूचना हो गई कि चारों लौट आए हैं। बताते हैं कि चार दिन से इनके घर का चूल्हे नहीं जल रहे थे।
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