सुधा भारद्वाज को रिहाई के लिये करना होगा एनआईए के फैसले का इंतजार
उत्तम कुमारबॉम्बे हाईकोर्ट ने एल्गार परिषद मामले में माओवादी होने के आरोप के चलते जेल में बंद अधिवक्ता सुधा भारद्वाज को बुधवार को डिफॉल्ट जमानत प्रदान कर दी। कोर्ट ने भारद्वाज को इस आधार पर जमानत प्रदान की कि उनके खिलाफ निश्चित अवधि में आरोप पत्र दाखिल नहीं हुआ इसलिए वह जमानत की हकदार हैं। न्यायमूर्ति एस.एस. शिंदे और न्यायमूर्ति एन.जे. जामदार की पीठ ने इसके साथ ही निर्देश दिया कि भारद्वाज को शहर की राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) की विशेष कोर्ट में पेश किया जाए, जो उनकी जमानत की शर्तें तय करेगी और मुंबई के भायकला महिला कारागार से रिहाई को अंतिम रूप देगी। भारद्वाज वर्ष 2018 में गिरफ्तारी के बाद से विचाराधीन कैदी के तौर पर कारागार में बंद हैं।

भारद्वाज के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता युग चौधरी ने इससे पहले हाईकोर्ट को बताया कि पुणे पुलिस द्वारा दाखिल आरोपपत्र पर संज्ञान लेने वाले और भारद्वाज एवं सात अन्य आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेजने वाले न्यायाधीश के.डी. वदने एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हैं।
चौधरी ने पहले हाईकोर्ट को बताया था कि वदने ने कोर्ट आदेश पर एक विशेष न्यायाधीश के तौर पर हस्ताक्षर किए जबकि वह एक विशेष न्यायाधीश नहीं थे। न्यायमूर्ति शिंदे के नेतृत्व वाली हाईकोर्ट की पीठ ने भारद्वाज की अर्जी पर इस साल चार अगस्त को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
हालांकि, हाईकोर्ट ने सह आरोपी वरवर राव, सोमा सेन, सुधीर धावले, रोना विल्सन, एडवोकेट सुरेंद्र गाडलिंग, महेश राउत, वरनॉन गोंजाल्विस और अरुण फरेरा की जमानत अर्जियां खारिज कर दी। इन अर्जियों में इस आधार पर जमानत दिये जाने का अनुरोध किया गया था कि उनके खिलाफ निश्चित अवधि में आरोप पत्र दाखिल नहीं हुआ।
उनकी गिरफ़्तारी के खिलाफ छत्तीसगढ़ समेत दुनिया के कई देशों में प्रदर्शन हुए थे। सुधा भारद्वाज की बेटी मायाशा ने भी अपनी मां की गिरफ़्तारी को लेकर एक बहुत ही मार्मिक चिट्ठी लिखी थी।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी ने भारत सरकार से भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में जेल में बंद सामाजिक कार्यकर्ताओं को तुरंत रिहा करने की मांग की थी। छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा सहित जनपक्षधर मीडिया ने लगातार उनकी रिहाई के लिये खबरे प्रकाशित करते रही।
क्या आप जानते हैं कौन हैं सुधा भारद्वाज
1 नवंबर 1961 में अमेरिका में जन्मी सुधा भारद्वाज ट्रेड यूनियन एक्टीविस्ट और वकील हैं। छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा की सक्रिय सदस्य होने के अलावा वह दिल्ली के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की विजिटिंग प्रोफेसर हैं। वह पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज छत्तीसगढ़ की महासचिव भी हैं।
मजदूरों और छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के बीच काम करने के लिए सुधा भारद्वाज ने अमेरिकी नागरिकता छोड़ दी और 80 के दशक में कामगार नेता शंकर गुहा नियोगी के संगठन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा में शामिल हो गईं। यहां आकर वह न सिर्फ मजदूरों, किसानों, आदिवासियों के हक-हुकूक की लड़ाई में शामिल हो गईं बल्कि उन्हीं की तरह का जीवन जीते हुए उनके संघर्ष में दृढ़ता के साथ खड़ी रहीं।
मसलन, छत्तीसगढ़ के केडिया डिस्टलरी में काम कर रहीं औरतों के शोषण के खिलाफ, सुधा भारद्वाज ने न सिर्फ हाईकोर्ट में मुकदमा लड़ा और जीत हासिल की बल्कि जब प्रबंधन ने उन औरतों को कंपनी से निकाल दिया तो इस फैसले के विरोध में उन औरतों के साथ सुधा भारद्वाज भी भूख हड़ताल पर बैठ गईं।
तीन साल पहले भीमा कोरेगांव में कुछ हिंदुत्ववादी संगठनों ने एल्गार परिषद में हिंसा और उत्पात मचाया था। लेकिन पुलिस अब तक किसी को गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी है। उल्टे हिंसा के बाद पुलिस और जांच एजेंसी ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और लोक कलाकारों पर केस दर्ज कर लिया। चार्जशीट में इन सभी पर भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेडऩे का आरोप है।
भीमा कोरेगांव मामले में ही जेल में बंद 84 साल के फादर स्टेन स्वामी इसी साल जुलाई में सरकारी लापहरवाही के चलते संस्थानिक हत्या के शिकार हो गए। सुधा भारद्वाज भी इसी आरोप के तहत 28 अगस्त 2018 यानी पिछले तीन साल से मुंबई की बाइकुला जेल में बंद है। इस बीच उन्होंने कई जमानत याचिका दायर की जिसे समय-समय पर खारिज कर दिया गया।
60 साल की हो चुकीं सुधा भारद्वाज जेल में काफी बीमार रह रही हैं। उन्हें इलाज की बेहद जरूरत है। कमोबेश यही हाल बाकी बंदियों का भी है। लेकिन केंद्र सरकार और उसकी एजेंसी का रवैया इस देश के लोकतंत्र और अमनपसंद नागरिकों, खासकर राजनीतिक बंदियों के खिलाफ बेहद साजिश भरा और खौफनाक नजर आ रहा है। नागरिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है जो असंवैधानिक है।
सुधा भारद्वाज छत्तीसगढ़ के मजदूरों के कितने ही केस उनका इंतजार कर रहे है, जो उन्होंने वहां के पूंजीपतियों और राज्य सरकार के खिलाफ दायर कर रखे हैं। कितने ही किसानों के केस उनका इंतजार कर रहे हैं, जो उन्होंने छत्तीसगढ़ में चल रहे अन्धाधुन्ध जमीन-दोहन के खिलाफ दायर कर रखा है।
इस विषय पर सुधा ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण किताब ‘बर्बर विस्थापन और बहादुराना प्रतिरोध’ लिखी है। कितने ही राजनीतिक कैदी उनकी रिहाई का इन्तेजार कर रहे हैं। मजदूरों के सैकड़ों घर अपनी सुधा के इंतजार में खुले हुए हैं, जहां सुधा उन मजदूर परिवारों के साथ न सिर्फ राजनीतिक बातें करती थी, बल्कि उनके साथ उन्हीं की छत्तीसगढिय़ा भाषा मे घंटों गपशप भी करती थीं। सुधा जैसे लोगों के लिए कभी भी जीवन शुरू करने का मतलब संघर्ष शुरू करना होता है।
मजदूर आंदोलन में शंकर गुहा नियोगी ने ‘संघर्ष और निर्माण’ का परिकल्पना रखा था। इसी के तहत मजदूरों के जुझारू संघर्षो के अलावा मजदूरों के श्रम व सहयोग से मजदूरों के लिए अस्पताल और स्कूल खोले गए। लेकिन 1990 के बाद बदली परिस्थितियों में शंकर गुहा नियोगी के मजदूर आंदोलन में सक्रिय कई लोगों ने ‘निर्माण’ पर पूरा जोर देते हुए संघर्ष से दूर होते गए।
सुधा भारद्वाज उन 14 कार्यकर्ताओं, वकीलों और शिक्षाविदों में शामिल हैं, जो 2018 में पुणे के पास एक गांव में कथित तौर पर जातिगत हिंसा भडक़ाने की साजिश रचने के आरोप में जेल में हैं। आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी को इस मामले में अपने कमजोर स्वास्थ्य के बावजूद बार-बार जमानत से इनकार करने के बाद हिरासत में ही मौत हो गई थी। इससे पहले, फरवरी में, 81 वर्षीय तेलुगु कवि वरवर राव को चिकित्सा आधार पर जमानत दी गई थी।
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