आदिम जनजाति बिरहोर के लिए बिरहोर-हिंदी-अंग्रेजी शब्दकोश 

विशद कुमार 

 

मातृभाषा को प्रोत्साहित करने हेतु राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 लागू की गई है। इस दिशा में यह पुस्तक लाभदायक सिद्ध होगी। अवसर पर इस शब्दकोश के लेखक देव कुमार ने बताया कि बच्चों की मनोवृत्ति का ख्याल रखते हुए आवश्यकतानुसार सरल एवं सहज तरीके से पुस्तक को अंतिम रूप दिया गया है। इस मौके पर संस्कृति संग्रहालय के संग्रहालाध्यक्ष गुस्तव इमाम, जस्टिन इमाम, दीपक कुमार, राजकुमार, उज्ज्वल पटेल, अरुण मेहता, मो0 कलाम, रवि रंजन, जयंती, सीमा, राधिका इत्यादि उपस्थित थे।

बता दें कि देव कुमार, पिता अघनु महतो (क्रेन चालक, अवकाश प्राप्त, स्वर्ण रेखा जल विद्युत परियोजना सिकीदिरी, राँची) उम्र-36 वर्ष, जनजाति-कुड़मी वर्ग से आते हैं। वे झारखंड की राजधानी राँची के ओरमांझी प्रखंड के दडदाग गाँव के निवासी हैं। इन्होंने मैट्रिक परीक्षा राज्य संपोषित उच्च विद्यालय, ओरमांझी से उत्तीर्ण की तथा गोस्सनर कॉलेज, राँची से भौतिकी प्रतिष्ठा विषय के साथ स्नातक किया है।

उसके उपरांत देश के प्रतिष्ठित संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फाउंड्री एंड फोर्ज टेक्नोलॉजी, हटिया, रांची से पोस्ट डिप्लोमा इन फोर्ज टेक्नोलॉजी की उपाधि प्राप्त की। निफ्ट के कैंपस प्लेसमेंट में इन्हें कई कंपनियों द्वारा नौकरी का प्रस्ताव मिला। उनमें से सर्वश्रेष्ठ विकल्प आधुनिक ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज में अभियन्ता के पद पर योगदान दिया। नौकरियों के क्षेत्र में प्रबंधकीय क्षमता की बढ़ती माँग को देखते हुए इन्होंने राँची विश्वविद्यालय से एमबीए की उपाधि प्राप्त की।

एमबीए के बाद इन्हें दो विकल्प मिले। पहला, कॉरपोरेट सेक्टर में प्रबंधक की शानोशौकत वाली नौकरी और जिंदगी या फिर गाँव में रहकर गरीब लोगों के विकास के लिए संघर्षरत विकास वाहक की जिंदगी। अपनी जरूरतों का आकलन और अपनी शिक्षा, उसकी महत्ता तथा उपयोगिता का मूल्यांकन करते हुए इन्होंने अंत:करण की आवाज सुनी और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में कार्यरत झारखंड सरकार के ग्रामीण विकास विभाग अंतर्गत गठित झारखंड स्टेट लाईवलीहुड प्रोमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस), राँची से जुड़कर कार्य करने का निर्णय लिया।

वैसे तो वे पिछले छः वर्षों से बिरहोर समुदाय के बीच कार्य कर रहे हैं। लेकिन पिछले दो वर्षों में इन्हें उनकी जिंदगी को करीब से देखने और समझने मौका मिला। हजारीबाग जिला मुख्यालय से सैकड़ों किलोमीटर दूर अवस्थित चलकुशा प्रखंड में बिरहोर समुदाय की दयनीय स्थिति देखकर उनके लिए कुछ करने की इच्छा जागृत हुई। लेकिन जैसे वे ही उनके पास जाते, वे लोग डर से भाग जाया करते थे। बिरहोर भाषा का ज्ञान न होने के कारण उनसे संवाद स्थापित करना  सबसे बड़ी चुनौती थी। इसलिए, अवकाश के दिन वे अपना समय बिरहोर समुदाय के बीच बिताने लगे।

बकौल देव कुमार "मेरे मन में बार-बार विचार मंडरा रहे थे कि किस तरह उनका सहयोग कर सकता हूँ। मैंने देखा कि घर में बच्चे बिरहोर भाषा समझते हैं। लेकिन, भाषा संबंधी पाठ्य सामग्री नहीं होने के कारण पढ़ाई में रुचि नहीं लेते है। स्कूल या आंगनबाड़ी केंद्र में अगर नामांकन भी होता तो मातृभाषा में पढ़ाई न होने के कारण स्कूल बीच में ही छोड़ देते हैं l तब मैंने निश्चय किया कि बच्चों की मनोवृत्ति का ख्याल रखते हुए सुंदर चित्रों के माध्यम से भाषा शब्दकोश तैयार करूंगा।

बिरहोर समुदाय के ही थोड़े बहुत पढ़े लिखे लोगों से चित्रों के माध्यम से एक-एक शब्द संग्रहण करना शुरू किया। ऐसा करते देख आसपास के लोग खूब हँसते । लेकिन, जैसे जैसे उनके बीच मेरा मेलजोल बढ़ने लगा, मेरे कार्य में उनकी भी रुचि बढ़ने लगी। फिर बिरहोर शब्दों का संकलन हेतु मैंने विभिन्न टोलों का भ्रमण और देश विदेश के भाषा विद्वानों के मार्गदर्शन में शब्दावलियों का सत्यापन कार्य में तेजी लाने की कोशिश की। चूँकि आज भी बिरहोर जनजाति जंगलों पर पूरी तरह आश्रित हैं एवं "मार लाओ कूट खाओ" वाली जिंदगी जीते हैं। इसलिए, कभी कभी दिन भर भटकने पर भी बिना शब्दों का संकलन किए वापस आना पड़ता था।

साथ ही, अपने विभाग के उत्तरदायित्व एवं पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए इस कार्य को जारी रखने में कभी-कभी हताशा भी होती थी। लगता था कि इस कार्य को छोड़ दूँ। इतने में ही मेरी नजर सोशल साइट फेसबुक के एक पोस्ट पर पड़ी जिसमें रमेश घोलप, तत्कालीन उपायुक्त, कोडरमा सपरिवार बिरहोर समुदाय के साथ दीपावली मना रहे थे। पोस्ट में उनके लिखे शब्द मेरे दिल को छू गए, जो इस प्रकार थे।

"देखकर दर्द जो किसी का, आह निकल आती है।
बस इतनी सी बात, हमें इंसान बना देती है।।"

मेरे मन में आई निराशा अब उत्साह में बदल चुकी थी और मैंने दोगुने उत्साह से संकलन कार्य करना शुरू कर दिया।

इस कार्य को पूर्ण करने में बिरहोर समुदाय के विभिन्न लोगों यथा शांति बिरहोर, नागो बिरहोर, विनोद बिरहोर, शनिचर बिरहोर के साथ निम्न प्रमुख लोगों का मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन लगातार मिलता रहा जिसका मैं ऋणी हूँ। 

अन्य लोगों में प्रो0 दिनेश कुमार दिनमणि, खोरठा भाषा के प्राध्यापक, डॉ0 वीरेंद्र कुमार महतो, प्राध्यापक, जनजातीय विभाग, राँची विश्वविद्यालय, राँची, दीपक सवाल, पत्रकार बोकारो, पद्मश्री बुलु इमाम, हजारीबाग, डॉ0 नेत्रा पी0 पौडयाल, शोध विद्वान, कील विश्वविद्यालय, जर्मनी, डॉ0 मोहन के0 गौतम, कुलपति, यूरोपियन यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्ट एंड ईस्ट, नीदरलैंड, अरुण महतो, अध्यक्ष, करम फाउंडेशन, राँची, जलेश्वर कुमार महतो, शिक्षक सह समाजसेवी, ओरमांझी, राँची शामिल रहे।"

देव आगे की योजना बताते हैं कि "अभी तक मैंने सामान्य बोलचाल की भाषा में प्रयुक्त होने वाली शब्दावलियों को समावेश किया है। अब विभिन्न क्रियाओं को शामिल कर वाक्यों में इसे परिवर्तित करने का कार्य कर रहा हूं। इसके साथ ही, बिरहोर जनजाति द्वारा चिकित्सा हेतु उपयोग में लाये जाने वाले जड़ीबूटियों का विस्तृत रूप से विवरण तैयार कर पुस्तक प्रकाशित करने की भी योजना है।"

 वे अपनी भाषा और प्रोमोशन के बारे में बताते हैं कि "मेरी भाषा हिंदी, नागपुरी, खोरठा एवं कुड़माली है। वर्त्तमान में मैं ग्रामीण विकास विभाग, झारखंड सरकार के अधीन कार्यरत झारखंड स्टेट लाईवलीहुड प्रोमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस), राँची के अंतर्गत हजारीबाग जिले के टाटीझरिया प्रखंड में प्रखंड कार्यक्रम प्रबंधक के पद पर कार्यरत हूँ और अपने संस्था द्वारा दी गई जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी के साथ निर्वहन करने हुए बिरहोर समुदाय की भाषा संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए भी पूरी निष्ठा के साथ कार्य कर रहा हूं।"


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